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शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 23


पाप का समाधान - उद्धार - 19

हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्यों के पाप से उत्पन्न स्थिति के समाधान के लिए ऐसा मनुष्य चाहिए था जो पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो; इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके; और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। ऐसा मनुष्य पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। इस संदर्भ में हम देख चुके हैं कि: 

  • प्रभु यीशु पूर्णतः परमेश्वर होने के साथ ही पूर्णतः मनुष्य भी थे, किन्तु उनकी मानवीय देह में पाप का दोष, और उनमें पाप की कोई प्रवृत्ति नहीं थी।
  • उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता में व्यतीत किया, बिना परमेश्वर पर कोई संदेह किए अथवा उनकी आज्ञाकारिता के लिए कोई आनाकानी किए। 
  • वे साधारण और सामान्य मनुष्यों के सभी अनुभवों में से होकर निकले किन्तु निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र बने रहे। 
  • उन्होंने स्वेच्छा से मनुष्यों के पापों के लिए अपने आप को बलिदान किया, ये जानते हुए भी कि क्रूस की मृत्यु कितनी पीड़ादायक, क्रूर, और वीभत्स होगी। 

        आज से हम उनके पाप का समाधान होने के लिए आवश्यक सिद्ध पुरुष होने के एक और गुण - उनके मृत्यु पर जयवंत होने के बारे देखना आरंभ करेंगे। हम पहले के लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर ने प्रथम पुरुष और स्त्री को चेतावनी दे रखी थी कि वर्जित फल को खा लेने की अनाज्ञाकारिता का परिणाम मृत्यु, अर्थात पवित्र और सिद्ध परमेश्वर से और मनुष्यों की परस्पर एक दूसरे से अपरिवर्तनीय दूरी, होगी (उत्पत्ति 2:17)। यह मृत्यु दो स्वरूप में आएगी - आत्मिक, अर्थात परमेश्वर से दूरी; और शारीरिक, अर्थात एक दूसरे से दूर हो जाना – उनका शरीर क्षय होना आरंभ हो जाएगा, और अंततः मर जाएगा, फिर से मिट्टी में मिल जाएगा, जिस से उसे बनाया गया है (उत्पत्ति 3:17-19)। इसलिए यह स्वाभाविक है, जो भी व्यक्ति पाप का समाधान करेगा, पाप के दुष्प्रभावों को मिटाएगा, वह पाप के इस सबसे घातक परिणाम, आत्मिक तथा शारीरिक मृत्यु का अभी अंत करेगा, उसे मनुष्यों पर से हटा देगा। तब ही उसके द्वारा किया गया पाप के निवारण और समाधान का कार्य उचित, स्वीकार्य, और पूर्ण माना जा सकेगा। यदि सब कुछ करने के बाद भी मृत्यु अपने स्थान पर बनी रहेगी, तो जो किया गया वह अपूर्ण और व्यर्थ रहेगा। इसीलिए परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु मसीह के कार्य के लिए लिखा गया हैक्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे। इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे” (रोमियों 5:17-21)

मसीही विश्वास के लिए वास्तविकता तो यही है कि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान ही मसीही विश्वास का आधार है – यदि मसीही विश्वास में से पुनरुत्थान को हटा दें, या उसे झूठा प्रमाणित कर दें, तो फिर मसीही जीवन और शिक्षाएँ किसी भी अन्य धर्म की शिक्षाओं से भिन्न नहीं रह जाती हैं। इसीलिए प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बादऔर उसने दु:ख उठाने के बाद बहुत से बड़े प्रमाणों से अपने आप को उन्हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्हें दिखाई देता रहा: और परमेश्वर के राज्य की बातें करता रहा” (प्रेरितों 1:3)। प्रभु के लिए अपने मृतकों में से पुनरुत्थान को शिष्यों पर दृढ़ता से प्रमाणित करना, जिससे वे इसके विषय कभी धोखा न खाएं, कभी डगमगाए न जाएं अनिवार्य था - भविष्य की सारी मसीही सेवकाई इस एक बात पर निर्भर थी; और वह यह कार्य अपने पुनरुत्थान के बाद चालीस दिन तक उनके सामने करता रहा। बाइबल में 1 कुरिन्थियों 15 – पूरा अध्याय इसी विषय – पुनरुत्थान के महत्व, पर है, और पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस लिखता है कि यदि पुनरुत्थान नहीं है, यदि मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ, तो मसीही विश्वास से संबंधित सभी प्रचार और शिक्षा व्यर्थ है (1 कुरिन्थियों 15:12-18)। इसीलिए, जैसा 1 कुरिन्थियों 15:12 में पूछे गए प्रश्न सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?से प्रकट है, कलीसिया के आरंभ के साथ ही प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की वास्तविकता पर हमले होने, उसका इनकार करने के प्रयास आरंभ हो गए थे। पुनरुत्थान को झुठलाने के शैतान के ये प्रयास दिखाते हैं कि यह तथ्य उसके तथा उसके राज्य के लिए कितना खतरनाक है।

  प्रभु यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान को झुठलाने के एक प्रयास को हम पिछले लेख में देख चुके हैं - लोगों में यह मनगढ़ंत कहानी प्रचलित कर दी गई कि प्रभु यीशु मरा नहीं था, बेहोश हुआ था, और कब्र के ठन्डे वातावरण में जब उसे होश आया, तो वह उठकर कब्र से बाहर आ गया और कहीं चला गया। इसी प्रकार से और भी कुछ कहानियाँ पुनरुत्थान को झुठलाने के लिए बनाई गई हैं, जिन्हें हम अगले लेख में देखेंगे। किन्तु बारीकी से जाँचने पर इनमें से कोई भी कहानी बाइबल में दिए गए विवरणों पर खरी नहीं उतरती है। लेकिन पुनरुत्थान को झुठलाने के ये प्रयास दिखाते हैं कि प्रभु यीशु का पुनरुत्थान कितनी महत्वपूर्ण घटना है, और शैतान इसे नकारने के लिए कितना बेचैन है। इसी से यह भी समझ में आने पाता है कि क्यों प्रभु ने चालीस दिन तक अपने शिष्यों को इस बात में दृढ़ किया कि वह वास्तव में शारीरिक रीति से जी उठा है, उसका पुनरुत्थान कोई कल्पना या छलावा या सामूहिक सम्मोहन द्वारा दिमाग में डाली गई बात नहीं है। 

वह जो मृत्यु के इस पार और उस पार, दोनों स्थितियों से भली-भांति अवगत है, वह आपसे, आपके प्रति अपने महान और समझ से बाहर प्रेम के अंतर्गत, अपने शिष्यों में होकर, इन लेखों में होकर, संसार की घटनाओं के प्रमाणों में होकर निवेदन कर रहा है “...मानो परमेश्वर हमारे द्वारा समझाता है: हम मसीह की ओर से निवेदन करते हैं, कि परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो” (2 कुरिन्थियों 5:20)। शैतान की किसी बात में न आएं, किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।  

 

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 15:12-22 

1 कुरिन्थियों 15:12 सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?

1 कुरिन्थियों 15:13 यदि मरे हुओं का पुनरुत्थान ही नहीं, तो मसीह भी नहीं जी उठा।

1 कुरिन्थियों 15:14 और यदि मसीह भी नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है; और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।

1 कुरिन्थियों 15:15 वरन हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे; क्योंकि हम ने परमेश्वर के विषय में यह गवाही दी कि उसने मसीह को जिला दिया यद्यपि नहीं जिलाया, यदि मरे हुए नहीं जी उठते।

1 कुरिन्थियों 15:16 और यदि मुर्दे नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा।

1 कुरिन्थियों 15:17 और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो।

1 कुरिन्थियों 15:18 वरन जो मसीह में सो गए हैं, वे भी नाश हुए।

1 कुरिन्थियों 15:19 यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं।

1 कुरिन्थियों 15:20 परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ।

1 कुरिन्थियों 15:21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।

1 कुरिन्थियों 15:22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 27-29

·      2 कुरिन्थियों 10 

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 22

 

पाप का समाधान - उद्धार - 18

       पिछले लेखों में हमने देखा था कि मनुष्यों के पापों के प्रायश्चित और पाप से उत्पन्न हुई समस्याओं के निवारण के लिए जिस सिद्ध पुरुष की आवश्यकता थी, उसके गुणों में से एक था उसका स्वेच्छा से अपने आप को मनुष्य जाति के पापों  के लिए बलिदान होने के लिए दे देना। इस संदर्भ में हमने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह ने अपने आप को स्वेच्छा से यह बलिदान होने के लिए अर्पित किया, और उन्हें मारे जाने के लिए क्रूस पर चढ़ा दिया गया। इससे पिछले लेख में हमने देखा था कि शैतान ने प्रभु यीशु की मृत्यु के विषय तुरंत ही अनेकों भ्रम भी फैला दिए जिससे लोगों को लगे कि उनके इस बलिदान की यह गाथा एक काल्पनिक बात है अथवा बढ़ा-चढ़ा कर कही गई बात है, और लोगों का ध्यान उनके इस बलिदान के महत्व एवं महानता से भटक जाए। उनकी मृत्यु से संबंधित भ्रमों को आज इस लेख में हम आगे देखते हैं। 

       क्रूस की मृत्यु रोमी साम्राज्य के समय में समाज के सबसे निकृष्ट अपराधियों को दी जाती थी, और इस सबसे अधिक अपमानजनक मृत्यु माना जाता था। क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले अपराधियों को बहुत मारा-पीटा जाता था, कोड़े लगाए जाते थे। उन कोड़ों के सिरों पर नुकीली वस्तुएं लगी होती थीं, जो कोड़े के शरीर पर पड़ने के वेग से खाल के अंदर धंस जाती थीं और जब कोड़े मारने वाला कोड़े को वापस खींचता था तो वे धँसी हुई नुकीली वस्तुएं खाल और माँस को फाड़ते हुए बाहर आती थीं। जब सिपाही यह सब कर चुकते थे, तब उस व्यक्ति को काठ से बना अपना क्रूस, अपनी पीठ पर लादे हुए क्रूसित होने के स्थान तक जाना पड़ता था, और वहाँ पर उसकी बाहें फैला कर हाथों में से होकर मोटी कीलें क्रूस के काठ में ठोक कर तथा पैरों को एक ऊपर दूसरा रख कर उनमें से भी मोटी कील क्रूस के काठ में ठोक कर उस क्रूस को सार्वजनिक स्थान पर धरती में गाड़कर खड़ा कर दिया जाता था। क्रूस पर चढ़ाए गए अपराधियों के प्राण तुरंत ही नहीं निकलते थे। यह बहुत ही पीड़ादायक मृत्यु होती थी। कोड़ों की मार से उधड़ा हुआ उसका बदन हर सांस के साथ खुरदरे काठ पर रगड़ता रहता था; लटके होने के कारण, शरीर का सारा वज़न कीलों से ठोके हुए हाथों पर आता था, जो हाथों की पीड़ा को असहनीय बना देता था; राहत पाने के लिए यदि अपराधी पैरों का सहारा लेकर उचकने का प्रयास करता तो यही असहनीय पीड़ा फिर पैरों में भी होती, और इस सारी प्रक्रिया में उसका उधड़ा हुआ बदन और भी ज़ोर से क्रूस के काठ पर रगड़ खाता। अर्थात अपराधी कुछ भी करे, वह उसकी पीड़ा को और बढ़ाता ही था, किसी भी रीति से कोई राहत उसे नहीं मिल सकती थी। अंततः थके हुए और लहू बहने से कमज़ोर हो चुके, कीलों से ठुके हुए हाथों के भार टंगे हुए शरीर को सांस लेना भी भारी हो जाता था, और पैरों के सहारे थोड़ा सा उचक कर सांस लेने के प्रयास उसे सांस तो ले लेने देते थे, किन्तु साथ ही उसकी पीड़ा को बहुत बढ़ा भी देते थे। कुछ अपराधियों को इस स्थिति में टंगे हुए, तिल-तिल करके मरने में एक दिन से भी अधिक लग जाता था, और जब तक वो मर नहीं जाते थे, उन्हें क्रूस पर से उतारा नहीं जाता था। प्रभु यीशु ने यह सब जानते हुए भी, इस मृत्यु को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया जिससे हम मनुष्यों को अनन्त-काल की नरक की पीड़ा से बचने का मार्ग बनाकर सेंत-मेंत प्रदान कर सकें। 

प्रभु यीशु को दो पहर में क्रूस पर चढ़ाया गया, और उन्होंने लगभग तीन घंटे क्रूस पर टंगे रहने के बाद अपने प्राण त्याग दिए (मत्ती 27:45-50)। क्योंकि यहूदियों की व्यवस्था के अनुसार मृत्यु-दण्ड भुगतने वाले अपराधी की लाश को सूर्यास्त से पहले दफनाया जाता था (व्यवस्थाविवरण 21:22-23), और क्योंकि प्रभु यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से अगला दिन सबत का दिन था जिसमें यहूदी कोई भी कार्य नहीं करते थे, इसलिए प्रभु यीशु की देह को उसी संध्या, सूर्यास्त से पहले दफनाया जाना आवश्यक था। क्रूसित अपराधी की मृत्यु को कुछ शीघ्र कर देने के लिए रोमियों ने एक और पीड़ादायक विधि अपना रखी थी - वे अपराधी की टांगें तोड़ देते थे - पीड़ा भी होती थी, और अपराधी अब सांस लेने के लिए पैरों का बिल्कुल भी सहारा नहीं ले सकता था, शरीर पूर्णतः हाथों में ठुकी हुई कीलों के सहारे लटक जाता था, जो पीड़ा को बढ़ाता था, सांस लेने के लिए छाती को ठीक से फूलने नहीं देता था, जिससे सांस ठीक से नहीं आने पाती थी और व्यक्ति घुटन के अनुभव और तड़पने के साथ कुछ शीघ्र मर जाता था। यही करने सिपाही प्रभु यीशु के पास भी आए, परंतु उसे मरा हुआ पाकर उसकी टांगें तो नहीं तोड़ीं, किन्तु उसकी मृत्यु निश्चित कर लेने के लिए उसकी छाती में भाला मारा, “और इसलिये कि वह तैयारी का दिन था, यहूदियों ने पिलातुस से बिनती की कि उन की टांगे तोड़ दी जाएं और वे उतारे जाएं ताकि सबत के दिन वे क्रूसों पर न रहें, क्योंकि वह सबत का दिन बड़ा दिन था। सो सिपाहियों ने आकर पहिले की टांगें तोड़ीं तब दूसरे की भी, जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे। परन्तु जब यीशु के पास आकर देखा कि वह मर चुका है, तो उस की टांगें न तोड़ीं। परन्तु सिपाहियों में से एक ने बरछे से उसका पंजर बेधा और उस में से तुरन्त लहू और पानी निकला। जिसने यह देखा, उसी ने गवाही दी है, और उस की गवाही सच्ची है; और वह जानता है, कि सच कहता है कि तुम भी विश्वास करो। ये बातें इसलिये हुईं कि पवित्र शास्त्र की यह बात पूरी हो कि उस की कोई हड्डी तोड़ी न जाएगी। फिर एक और स्थान पर यह लिखा है, कि जिसे उन्होंने बेधा है, उस पर दृष्टि करेंगे” (यूहन्ना 19:31-37)

प्रभु यीशु की मृत्यु निश्चित हो जाने के बाद, प्रभु के दो शिष्यों ने उनकी देह को पिलातुस से माँग लिया और सूर्य ढलने से पहले शीघ्रता से देह को पचास सेर सुगंध-द्रव्यों - गंधरस और एलवा में कफन में लपेटकर पास ही की एक कब्र में रख दियाइन बातों के बाद अरमतियाह के यूसुफ ने, जो यीशु का चेला था, (परन्तु यहूदियों के डर से इस बात को छिपाए रखता था), पिलातुस से बिनती की, कि मैं यीशु की लोथ को ले जाऊं, और पिलातुस ने उस की बिनती सुनी, और वह आकर उस की लोथ ले गया। निकुदेमुस भी जो पहिले यीशु के पास रात को गया था पचास सेर के लगभग मिला हुआ गन्‍धरस और एलवा ले आया। तब उन्होंने यीशु की लोथ को लिया और यहूदियों के गाड़ने की रीति के अनुसार उसे सुगन्ध द्रव्य के साथ कफन में लपेटा। उस स्थान पर जहां यीशु क्रूस पर चढ़ाया गया था, एक बारी थी; और उस बारी में एक नई कब्र थी; जिस में कभी कोई न रखा गया था। सो यहूदियों की तैयारी के दिन के कारण, उन्होंने यीशु को उसी में रखा, क्योंकि वह कब्र निकट थी” (यूहन्ना 19:38-42); “अरिमतिया का रहने वाला यूसुफ आया, जो प्रतिष्ठित मंत्री और आप भी परमेश्वर के राज्य की बाट जोहता था; वह हियाव कर के पिलातुस के पास गया और यीशु की लोथ मांगी। पिलातुस ने आश्चर्य किया, कि वह इतना शीघ्र मर गया; और सूबेदार को बुलाकर पूछा, कि क्या उसको मरे हुए देर हुई? सो जब सूबेदार के द्वारा हाल जान लिया, तो लोथ यूसुफ को दिला दी। तब उसने एक पतली चादर मोल ली, और लोथ को उतारकर उस चादर में लपेटा, और एक कब्र में जो चट्टान में खोदी गई थी रखा, और कब्र के द्वार पर एक पत्थर लुढ़का दिया” (मरकुस 15:43) 

किन्तु यहूदी धर्म-गुरुओं को आशंका थी कि प्रभु के शिष्य आकर उसकी देह को उठा ले जाएंगे और कह देंगे कि वह जी उठा है, इसलिए उन्होंने कब्र के मुंह पर एक भारी पत्थर लुढ़का दिया और कब्र को मोहर-बंद करके, वहाँ पहरा बैठा दियादूसरे दिन जो तैयारी के दिन के बाद का दिन था, महायाजकों और फरीसियों ने पिलातुस के पास इकट्ठे हो कर कहा। हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमाने वाले ने अपने जीते जी कहा था, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा। सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहने लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा। पिलातुस ने उन से कहा, तुम्हारे पास पहरूए तो हैं जाओ, अपनी समझ के अनुसार रखवाली करो। सो वे पहरूओं को साथ ले कर गए, और पत्थर पर मुहर लगाकर कब्र की रखवाली की” (मत्ती 27:62-66) 

इन तथ्यों के संदर्भ में हम उस मिथ्या धारणा की ओर आते हैं, जिसके अंतर्गत लोग कहते हैं कि प्रभु यीशु क्रूस पर मरे नहीं, केवल बेहोश हुए, और फिर कब्र के ठन्डे वातावरण में कुछ समय के बाद उन्हें होश आया, और तब वे कब्र से बाहर निकाल कर आ गए, कहीं चले गए, और शिष्यों ने यह कह दिया कि वे जीवित हो उठे हैं। किन्तु उपरोक्त तथ्यों के सामने यह धारणा पूर्णतः निराधार है, बिना तथ्यों का ध्यान किए भ्रम फैलाने के लिए बनाई गई है। ध्यान कीजिए:

  • रोमी गवर्नर पिलातुस के कहने पर सूबेदार और सिपाहियों ने जाकर यह निश्चित किया कि प्रभु यीशु वास्तव में मर गया है। वे रोमी सैनिक क्रूस पर चढ़ाए हुओं के मरे अथवा जीवित होने की पहचान में अनुभवी थे, उन्होंने देखा कि प्रभु यीशु मर गए हैं, इसलिए उनके साथ क्रूसित किए गए शेष दोनों डाकुओं के समान, उन्होंने प्रभु यीशु की टांगें नहीं तोड़ीं, वरन छाती को भाले से भेद अवश्य दिया, और फिर पिलातुस को बता दिया कि प्रभु यीशु मर गया है। यदि उन्होंने पिलातुस से झूठ बोल होता, और यह बात सामने आ जाती, तो उस सूबेदार और उन सिपाहियों की मौत निश्चित थी, इसलिए वे प्रभु यीशु की मृत्यु का झूठा समाचार पिलातुस को देने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।
  • प्रभु की देह को पचास सेर सामग्री में और कफन में लपेट कर (केवल ढाँप कर नहीं) कब्र में रखा गया था। क्या यह संभव कि कब्र के अंदर होश आने पर सारे शरीर की कोड़ों से उधेड़ दी गई स्थिति, और हाथों तथा पैरों में शरीर का वज़न सहन कर सकने लायक मोटी कीलों के घावों वाला व्यक्ति बिना किसी सहायता के, अकेले अपने आप ही पचास सेर सामग्री तथा लिपटे हुए कफन को खोल कर उतार देगा और खड़ा हो जाएगा?
  • क्या इतनी यातना सहने और फिर इतना लहू बह जाने के बाद किसी भी मनुष्य के शरीर में यह कर पाने की सामर्थ्य बचेगी?
  • क्या ऐसा घायल और निर्बल व्यक्ति अंदर से अकेले ही कब्र के मुँह पर लगे मोहर बंद भारी पत्थर को स्वयं ही लुढ़का कर बाहर आने पाएगा? उन घायल हाथों और पैरों में, उसे भेदी गई छाती में, और लहू बहने से दुर्बल हो गई देह में क्या यह सब करने की शक्ति एवं क्षमता शेष रही होगी?
  • यदि एक बार को मान भी लिया जाए कि प्रभु यीशु उस भारी पत्थर को लुढ़का कर बाहर आ गया, तो फिर उन पहरेदारों ने उसे पकड़ क्यों नहीं लिया? वह अकेला और घायल, दुर्बल था; और पहरेदार कई थे - यीशु को पकड़ लेने में उन्हें क्या कठिनाई हो सकती थी?

 

       किसी भी रीति से प्रभु यीशु के क्रूस पर मारे जाने, और दफनाए जाने से संबंधित तथ्य इस मिथ्या धारणा को कोई समर्थन प्रदान नहीं करते हैं कि वे क्रूस पर मरे नहीं थे। थोड़ा रुक कर, उनके स्वेच्छा से यह सब सहना स्वीकार कर लेने और उनकी क्रूर, वीभत्स, अवर्णनीय, अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु के बारे में विचार कीजिए। उन्होंने यह सब मेरे और आपके लिए, संसार के सभी मनुष्यों के लिए, हम मनुष्यों की पापी दश को जानते हुए भी सह लिया, जिससे हम मृत्योपरांत परलोक की अनन्त पीड़ा में न जाएं, वरन उनके साथ स्वर्ग की आशीषों और सुख-शांति में संभागी हों। प्रभु यीशु मेरे और आपकी अंदर-बाहर की वास्तविक दशा को, हमारे द्वारा दिन-प्रतिदिन मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में किए जा रहे सभी पापों और बुराइयों को अच्छे से जानता है, फिर भी हमसे प्रेम करता है, हमें क्षमा करना चाहता है। और यह अनन्तकालीन स्वर्गीय सुख वह हमें सेंत-मेंत दे रहा है, हमसे केवल यह अनुमति चाहता है कि हम उसे हमारे जीवनों में विद्यमान पापों के दुष्परिणामों को दूर करके, उसे हमारे मन और जीवन को स्वच्छ एवं निर्मल कर लेने दें। उसे हम से हमारी कोई भी शारीरिक या सांसारिक बात नहीं चाहिए, उसे केवल हमारा मन चाहिए, जिसे वह पवित्र और शुद्ध करना चाहता है।

       यदि वह निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध प्रभु मेरे और आपके पापों के लिए घोर यातनाएं सहने और क्रूस की अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु सहने के लिए तैयार हो गया, तो क्या हम उससे आशीष और अनत जीवन पाने, नरक की अनन्त पीड़ा से बचने के लिए तैयार नहीं होंगे? वह तो केवल हमारा भला ही चाहता है, जिसके लिए उसने हमारा सारा दुख सह लिया; तो फिर हम क्यों उसके इस आमंत्रण को अस्वीकार करें? शैतान की किसी बात में न आएं, किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

 

बाइबल पाठ: यशायाह 53:1-12 

यशायाह 53:1 जो समाचार हमें दिया गया, उसका किस ने विश्वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?

यशायाह 53:2 क्योंकि वह उसके सामने अंकुर के समान, और ऐसी जड़ के समान उगा जो निर्जल भूमि में फूट निकले; उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते।

यशायाह 53:3 वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुःखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहचान थी; और लोग उस से मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और, हम ने उसका मूल्य न जाना।

यशायाह 53:4 निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्वर का मारा-कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा।

यशायाह 53:5 परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएं।

यशायाह 53:6 हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया।

यशायाह 53:7 वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला; जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय व भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उसने भी अपना मुंह न खोला।

यशायाह 53:8 अत्याचार कर के और दोष लगाकर वे उसे ले गए; उस समय के लोगों में से किस ने इस पर ध्यान दिया कि वह जीवतों के बीच में से उठा लिया गया? मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी।

यशायाह 53:9 और उसकी कब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उसने किसी प्रकार का उपद्रव न किया था और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी।

यशायाह 53:10 तौभी यहोवा को यही भाया कि उसे कुचले; उसी ने उसको रोगी कर दिया; जब तू उसका प्राण दोषबलि करे, तब वह अपना वंश देखने पाएगा, वह बहुत दिन जीवित रहेगा; उसके हाथ से यहोवा की इच्छा पूरी हो जाएगी।

यशायाह 53:11 वह अपने प्राणों का दु:ख उठा कर उसे देखेगा और तृप्त होगा; अपने ज्ञान के द्वारा मेरा धर्मी दास बहुतेरों को धर्मी ठहराएगा; और उनके अधर्म के कामों का बोझ आप उठा लेगा

यशायाह 53:12 इस कारण मैं उसे महान लोगों के संग भाग दूंगा, और, वह सामर्थियों के संग लूट बांट लेगा; क्योंकि उसने अपना प्राण मृत्यु के लिये उण्डेल दिया, वह अपराधियों के संग गिना गया; तौभी उसने बहुतों के पाप का बोझ उठ लिया, और, अपराधियों के लिये बिनती करता है 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 25-26

·      2 कुरिन्थियों

बुधवार, 15 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 21

 

पाप का समाधान - उद्धार - 17

       हम उन गुणों को, और उनके कारणों को देखते आ रहे हैं, जो उस सिद्ध मनुष्य में होने चाहिएं जो मनुष्यों के पाप का समाधान और निवारण करने के लिए अपना बलिदान दे। हमने देखा कि ऐसा मनुष्य स्वाभाविक प्रणाली से मानव जन्म लेने वाला नहीं हो सकता है; किन्तु प्रभु यीशु के मानव स्वरूप में अवतरित होकर पृथ्वी पर आने के लिए परमेश्वर ने एक विशेष प्रयोजन किया, और उन्होंने मनुष्य के रूप जन्म तो लिया, किन्तु अन्य सभी मनुष्यों के समान उनके मानव शरीर में पाप का दोष और स्वभाव में पाप करने की प्रवृत्ति नहीं थी। वे पूर्णतः परमेश्वर थे, यद्यपि मनुष्य रूप में अवतरित होते समय उन्होंने अपने आप को अपने परमेश्वरत्व से शून्य कर लिया था; और पूर्णतः मनुष्य भी। उन्होंने सामान्य, साधारण मनुष्यों के समान ही सब कुछ सहते हुए, सभी अनुभवों में से होकर निकलते हुए जीवन बिताया, किन्तु निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध बने रहे। पिछले लेख में हमने देखा था कि उन्होंने स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के बदले उनके पापों के दण्ड को सहने, यातनाएं सहने और अपने आप को बलिदान करने को स्वीकार किया, और इसके लिए अपने आप को पकड़ लिए जाने दिया। आज हम उनकी मृत्यु के बारे में देखेंगे। 

       बहुत से लोगों, और कुछ धर्मों तथा मतों का यह मानना है, कि प्रभु यीशु क्रूस पर नहीं मारे गए, वरन उनके स्थान पर उनके समान दिखने वाला कोई और व्यक्ति क्रूस पर चढ़ा दिया गया, और लोगों ने समझ लिया कि प्रभु यीशु को क्रूस पर मार डाला गया है। यह शैतान द्वारा फैलाए गए उस भ्रम का एक भाग है, जिसके द्वारा उसने प्रभु द्वारा उपलब्ध करवाए गए पापों की क्षमा और उद्धार के मार्ग को व्यर्थ और निष्क्रिय दिखाने का प्रयास किया है।

       प्रभु के पकड़वाए जाने के समय से लेकर, उनके क्रूस पर चढ़ाए जाने तक वे निरंतर पहरे में तथा विभिन्न लोगों की उपस्थिति में रहे; एक से दूसरे स्थान पर ले जाए गए, विभिन्न अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किए गए, और अन्ततः रोमी गवर्नर पिलातुस के सामने लाए गए, जहाँ से फिर उन्हें क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए ले जाया गया। दिन के उजाले में वे धार्मिक अगुवों के सामने भी प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने उन्हें पहचाना, और उनके मसीह और परमेश्वर का पुत्र होने के बारे में उनसे पूछा (लूका 22:66-71)। इस दौरान उन्हें भयानक यातनाओं, कोड़े खाने, उपहास आदि के अनुभव से भी निकलना पड़ा, जिसे वे चुपचाप बिना कोई प्रतिक्रिया दिए, या कोई अपशब्द कहे सहते रहे। इस पूरी प्रक्रिया में वे कभी अपने विरोधियों और बैरियों की दृष्टि से ओझल नहीं हुए, तो फिर उनके स्थान पर कोई दूसरा कब और कैसे आता; और क्यों? जिन यातनाओं से होकर प्रभु को निकलना पड़ा, उनमें कोई भी अन्य मनुष्य कुछ भी भला-बुरा कह सकता था, कोई पापमय प्रतिक्रिया दे सकता था, जो नहीं हुआ। यदि वह प्रभु यीशु नहीं था तो फिर इन बातों को सहन करने वाला अपनी वास्तविक पहचान बता कर अपने आप को इस हृदय विदारक वेदना से बचा सकता, जो नहीं हुआ।

यदि यह कहें कि पकड़ने के समय ही कोई गलती हुई, रात के अंधेरे में लोगों ने किसी गलत व्यक्ति को पकड़ लिया, तो इसका भी कोई आधार अथवा प्रमाण नहीं है। उन्हें यहूदा इस्करियोती द्वारा पहचाने जाने के बाद पकड़वाया गया था, और उस समय उनके और यहूदा के मध्य वार्तालाप भी हुआ था (मत्ती 26:47-50); इसलिए किसी गलत व्यक्ति के पकड़े जाने की कोई संभावना नहीं थी। उनके पकड़े जाने के समय दो आश्चर्यकर्म भी हुए; एक तो जब पकड़ने आए लोगों ने प्रभु से उनकी पहचान के लिए पूछा, और प्रभु ने कहा किमैं ही हूँतब उन्हें पकड़ने आए हुए सभी लोग तुरंत स्वतः ही पीछे की ओर गिर पड़ेतब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो? उन्होंने उसको उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े” (यूहन्ना 18:4-6) - जो किसी साधारण मनुष्य के पकड़े जाने पर नहीं हो सकता था। दूसरा, प्रभु के शिष्य, पतरस ने तलवार चलाकर उन लोगों में से एक का कान काट दिया, जिसे प्रभु ने तुरंत चंगा भी कर दियाऔर उन में से एक ने महायाजक के दास पर चला कर उसका दाहिना कान उड़ा दिया। इस पर यीशु ने कहा; अब बस करो: और उसका कान छूकर उसे अच्छा किया” (लूका 22:50-51) - यह भी कोई सामान्य जन नहीं कर सकता था।

इसके अतिरिक्त, दिन के समय में उन्हें क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद वहाँ खड़े लोगों और धर्म-गुरुओं ने पहचाना कि वे प्रभु यीशु मसीह ही हैं, और उनका उपहास कियालोग खड़े खड़े देख रहे थे, और सरदार भी ठट्ठा कर कर के कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले। सिपाही भी पास आकर और सिरका देकर उसका ठट्ठा कर के कहते थे। यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा” (लूका 23:35-37)। फिर, क्रूस पर से प्रभु यीशु ने अपनी माता मरियम की देखभाल की ज़िम्मेदारी अपने शिष्य को दीपरन्तु यीशु के क्रूस के पास उस की माता और उस की माता की बहिन मरियम, क्‍लोपास की पत्नी और मरियम मगदलीनी खड़ी थी। यीशु ने अपनी माता और उस चेले को जिस से वह प्रेम रखता था, पास खड़े देखकर अपनी माता से कहा; हे नारी, देख, यह तेरा पुत्र है। तब उस चेले से कहा, यह तेरी माता है, और उसी समय से वह चेला, उसे अपने घर ले गया” (यूहन्ना 19:25-27); जो कोई दूसरा जन नहीं कर सकता था। 

       इसलिए किसी अन्य जन को उनके स्थान पर पकड़े जाने और क्रूस पर चढ़ाए जाने का कोई आधार अथवा प्रमाण नहीं है। शैतान द्वारा एक अन्य धारणा प्रचलित की गई है कि प्रभु यीशु क्रूस पर मरे नहीं, बस बेहोश हुए, और बाद में कब्र के ठन्डे वातावरण में होश में आकर, वे कब्र से बाहर आ गए। इसके बार में हम कल देखेंगे, कि यह बात भी परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु के विवरण से बिल्कुल मेल नहीं खाती है। किन्तु अभी के लिए, हमारे विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है - यदि वह निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध प्रभु मेरे और आपके पापों के लिए घोर यातनाएं सहने और क्रूस की अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु सहने के लिए तैयार हो गया, तो क्या हम उससे आशीष और अनत जीवन पाने, नरक की अनन्त पीड़ा से बचने के लिए तैयार नहीं होंगे? वह तो केवल हमारा भला ही चाहता है, जिसके लिए उसने हमारा सारा दुख सह लिया; तो फिर हम क्यों उसके इस आमंत्रण को अस्वीकार करें? शैतान की किसी बात में न आएं, किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

बाइबल पाठ: लूका 23:32-43 

लूका 23:32 वे और दो मनुष्यों को भी जो कुकर्मी थे उसके साथ घात करने को ले चले।

लूका 23:33 जब वे उस जगह जिसे खोपड़ी कहते हैं पहुंचे, तो उन्होंने वहां उसे और उन कुकर्मियों को भी एक को दाहिनी ओर और दूसरे को बाईं और क्रूसों पर चढ़ाया।

लूका 23:34 तब यीशु ने कहा; हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं और उन्होंने चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।

लूका 23:35 लोग खड़े खड़े देख रहे थे, और सरदार भी ठट्ठा कर कर के कहते थे, कि इस ने औरों को बचाया, यदि यह परमेश्वर का मसीह है, और उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचा ले।

लूका 23:36 सिपाही भी पास आकर और सिरका देकर उसका ठट्ठा कर के कहते थे।

लूका 23:37 यदि तू यहूदियों का राजा है, तो अपने आप को बचा।

लूका 23:38 और उसके ऊपर एक पत्र भी लगा था, कि यह यहूदियों का राजा है।

लूका 23:39 जो कुकर्मी लटकाए गए थे, उन में से एक ने उस की निन्दा कर के कहा; क्या तू मसीह नहीं तो फिर अपने आप को और हमें बचा।

लूका 23:40 इस पर दूसरे ने उसे डांटकर कहा, क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता? तू भी तो वही दण्ड पा रहा है।

लूका 23:41 और हम तो न्यायानुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं; पर इस ने कोई अनुचित काम नहीं किया।

लूका 23:42 तब उसने कहा; हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना।

लूका 23:43 उसने उस से कहा, मैं तुझ से सच कहता हूं; कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 22-24

·      2 कुरिन्थियों

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 20

 

पाप का समाधान - उद्धार - 16

हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्य के पाप में पड़ने के कारण उत्पन्न हुई बातों के समाधान के लिए जिस मनुष्य की आवश्यकता थी, उस में निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य था:

  • वह एक पाप के दोष और पाप करने के प्रवृत्ति से रहित मनुष्य हो
  • वह अपना जीवन और सभी कार्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञाकारिता में होकर, उसे समर्पित रहकर करे। वह सदा ही परमेश्वर पर अपना पूरा भरोसा बनाए रखे, उस की किसी भी बात पर कोई संदेह न करे, उसकी आज्ञाकारिता के लिए कोई आनाकानी न करे;  
  • वह पृथ्वी के किसी भी अन्य साधारण और सामान्य मनुष्य के समान सभी परिस्थितियों और बातों के अनुभव में से होकर निकले, किन्तु फिर भी वह अपने जीवन भर, अपने  मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र रहा हो;
  • वह स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के पापों को अपने ऊपर लेने और उनके दण्ड - मृत्यु को सहने के लिए तैयार हो 
  • वह मृत्यु से वापस लौटने की सामर्थ्य रखता हो; मृत्यु उस पर जयवंत नहीं होने पाए
  • वह अपने इस महान बलिदान के प्रतिफलों को सभी मनुष्यों को सेंत-मेंत देने के लिए तैयार हो 

       हमने देखा कि प्रभु यीशु मसीह के जीवन में इस सूची की पहली तीन बातें सटीक पूरी होती हैं। आज हम चौथी बात, उसके स्वेच्छा से अपना बलिदान देने के बारे में देखते हैं। 

        उत्पत्ति 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप के संसार में प्रवेश और कार्यान्वित होने के समय के विवरण में हम आदम द्वारा परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करके, उस वर्जित फल को खा लेने और पाप करने के बारे में लिखा पाता हैं:सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया” (उत्पत्ति 3:6)। दिए गए क्रम के अनुसार, शैतान की बातों के प्रभाव में आकर, उस फल से आकर्षित होकर, पहले स्त्री ने अनाज्ञाकारिता की - फल को तोड़कर खाया, और फिर अपने पति, आदम, को भी दिया। उत्पत्ति 3:6 के इस वर्णन में निहित है कि शैतान ने आदम को प्रभावित नहीं किया था; केवल स्त्री को ही किया था। अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार, पाप करने का निर्णय स्त्री ने लिया था, और फिर अपने उस निर्णय को कार्यान्वित भी किया। पहले स्वयं पाप कर लेने के बाद, उसने आदम को भी यही करने के लिए कहा। पौलुस इस बात का हवाला तिमुथियुस और कुरिन्थियों को लिखी अपनी पत्रियों में देता है (1 तिमुथियुस 2:14; 2 कुरिन्थियों 11:3)

आदम के पास यह अवसर था कि वह परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बना रहता, स्त्री के समान फल को न खाता, उसके निर्णय से अपने आप को अलग रखता। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। आदम बहकाया नहीं गया था; किन्तु उसने भी अपनी स्वेच्छा के अंतर्गत, स्त्री के समान परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने, और पाप करने का निर्णय लिया, और उसे कार्यान्वित कर लिया। अब पाप के परिणामों के समाधान को उपलब्ध करवाने वाले के लिए भी यही बात आवश्यक थी - वह पाप के निवारण से संबंधित सभी बातों, इस प्रक्रिया में निहित परेशानियों, अपमान, तिरस्कार, कष्टों और यातनाओं, और अन्ततः एक भयानक मृत्यु को भली-भांति जानते-बूझते हुए भी, स्वेच्छा से उन सभी को सहने के लिए, उनमें होकर निकालने में भी अपने पवित्र, सिद्ध, निष्पाप, निष्कलंक अस्तित्व को बनाए रखने वाला हो।

हम पिछले लेख में देख चुके हैं कि इब्रानियों 10:7 और फिलिप्पियों 2:6 में प्रभु यीशु के संसार में आते समय किए गए निर्णय के बारे में लिखा है, कि वह स्वेच्छा से परमेश्वर द्वारा पहले से लिख दी गई बातों की पूर्ति के लिए इस संसार में मानव-देहधारी होकर आ गया। आते समय उसने अपने ईश्वरत्व को छोड़ कर मानव रूप में अपने आप को ईश्वरत्व की सभी महिमा और आदर से शून्य कर लिया। वह एक पूर्णतः आज्ञाकारी दीन और नम्र दास का स्वरूप धरण कर के पृथ्वी पर आया, और प्रभु पृथ्वी पर इसी स्वरूप में रहा और कार्य किया।

जब उसने अपने शिष्यों से अपने आने वाले बलिदान और कष्ट के बारे में बात की, तो उसके शिष्य पतरस ने, प्रभु के प्रति अपने प्रेम के अंतर्गत, प्रभु को ऐसा करने से रोकना चाहा, किन्तु प्रभु ने उसे तुरंत ही झिड़क दिया:उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगा, कि मुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूं। इस पर पतरस उसे अलग ले जा कर झिड़कने लगा कि हे प्रभु, परमेश्वर न करे; तुझ पर ऐसा कभी न होगा। उसने फिरकर पतरस से कहा, हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो: तू मेरे लिये ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्वर की बातें नहीं, पर मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है” (मत्ती 16:21-23)  यहाँ 21 पद में प्रभु की कही बात पर ध्यान कीजिएमुझे अवश्य है, कि यरूशलेम को जाऊं, और पुरनियों और महायाजकों और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दुख उठाऊं; और मार डाला जाऊं; और तीसरे दिन जी उठूंउसका यह सब बातों को सहने के लिए यरूशलेम को जाना, उसका अपना निर्णय था; वह स्वयं, या पतरस के कहने पर, इस निर्णय से हट सकता था, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वरन, उसे इस निर्णय से हटाने का प्रयास करने वाले पतरस को हीशैतानकहकर झिड़क दिया, और उसे परमेश्वर की आज्ञाकारिता में बाधा होने की उलाहना दी। 

यही एकमात्र समय नहीं था, जब प्रभु यीशु ने अपने यरूशलेम जाने, और वहाँ पर यातनाएं देने तथा मारे जाने के लिए पकड़वाए जाने की बात अपने शिष्यों से कही। उसने अन्य अनेकों अवसरों पर भी उनके सामने इसी बात को रखा (मत्ती 17:21-22; 20:17-19; मरकुस 9:30-32; लूका 9:22, 44; 18:31-33; आदि)। अर्थात प्रभु के लिए यरूशलेम जाकर अपने आप को मारे जाने के लिए पकड़वाया जाना, कोई अनपेक्षित या अनायास घटने वाली बात नहीं थी। वह इससे भली-भांति परिचित था, फिर भी उन्होंने यह किया, स्वेच्छा से किया, परमेश्वर की इच्छानुसार ऐसा किया।  

जब समय आया, और यहूदा इस्करियोती प्रभु को पकड़वाने के लिए जाने के लिए फसह के भोज से जाने को तैयार हो रहा था, तब भी प्रभु ने उसे रोका नहीं, वरन उसे जा लेने दियाऔर टुकड़ा लेते ही शैतान उस में समा गया: तब यीशु ने उस से कहा, जो तू करता है, तुरन्त कर” (यूहन्ना 13:27)

जब उसे पकड़ने और यातनाएं देने के बाद, क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए ले जाया जा रहा था, तब उसके हाल देखकर कुछ स्त्रियाँ विलाप करने लगीं, तो प्रभु ने उन्हें उसके लिए विलाप करने से मना कियाऔर लोगों की बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली: और बहुत सी स्त्रियां भी, जो उसके लिये छाती-पीटती और विलाप करती थीं। यीशु ने उन की ओर फिरकर कहा; हे यरूशलेम की पुत्रियों, मेरे लिये मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिये रोओ” (लूका 23:27-28)। प्रभु को अपने नहीं, उन पर शीघ्र ही आने वाले दुख की चिंता थी। 

कुल मिलाकर, परमेश्वर का वचन बाइबल यह स्पष्ट दिखाती है कि प्रभु यीशु ने स्वेच्छा से अपने आप को मारे जाने के लिए दे दिया। वह पापी मनुष्यों के बदले में उनके मृत्यु दण्ड को सहने के लिए तैयार था। उसने यह इसलिए स्वीकार किया ताकि मुझे और आपको अनन्त जीवन की आशीष दे सके - यदि मैं और आप उसके इस बलिदान पर विश्वास लाएं, उसे अपना प्रभु स्वीकार करें, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं।

 यदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

 

बाइबल पाठ: यूहन्ना 5:39-47 

यूहन्ना 5:39 तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है।

यूहन्ना 5:40 फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।

यूहन्ना 5:41 मैं मनुष्यों से आदर नहीं चाहता।

यूहन्ना 5:42 परन्तु मैं तुम्हें जानता हूं, कि तुम में परमेश्वर का प्रेम नहीं।

यूहन्ना 5:43 मैं अपने पिता के नाम से आया हूं, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते; यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो उसे ग्रहण कर लोगे।

यूहन्ना 5:44 तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो और वह आदर जो अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते, किस प्रकार विश्वास कर सकते हो?

यूहन्ना 5:45 यह न समझो, कि मैं पिता के सामने तुम पर दोष लगाऊंगा: तुम पर दोष लगाने वाला तो है, अर्थात मूसा जिस पर तुम ने भरोसा रखा है।

यूहन्ना 5:46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करते, तो मेरी भी प्रतीति करते, इसलिये कि उसने मेरे विषय में लिखा है।

यूहन्ना 5:47 परन्तु यदि तुम उस की लिखी हुई बातों की प्रतीति नहीं करते, तो मेरी बातों की क्योंकर प्रतीति करोगे।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 19-21

·      2 कुरिन्थियों 7