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मंगलवार, 28 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 34

 

पाप का समाधान - उद्धार - 30 - कुछ संबंधित प्रश्न और उनके उत्तर (3.2)

 

पिछले लेख में हमने प्रभु यीशु मसीह में लाए गए विश्वास द्वारा मिलने वाले पाप क्षमा तथा उद्धार से संबंधित प्रश्नों की शृंखला में एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्नक्या कभी गँवाए न जा सकने वाले अनन्त उद्धार के सिद्धांत में, बिना किसी भय के पाप करते रहने की स्वतंत्रता निहित नहीं है?को देखना आरंभ किया था। पिछले लेख में हमने दो बातें देखी थीं कि क्यों यह विचार रखना परमेश्वर के इस उद्धार के कार्य और आश्वासन से असंगत है। पहली बात थी कि जिसने मसीह के बलिदान और पुनरुत्थान के महत्व को समझा है और उसे सच्चे मन से स्वीकार किया है, वह फिर प्रभु के बलिदान, पुनरुत्थान, और उसके परिणामस्वरूप मिले इस महान उद्धार का आदर करेगा; उसका दुरुपयोग नहीं करेगा, उसका अनुचित लाभ उठाने का प्रयास नहीं करेगा। दूसरी बात हमने देखी थी कि परमेश्वर अज्ञानी नहीं है जो बिना सोचे समझे मनुष्य को एक ऐसी संभावना प्रदान कर दे, जिसका दुरुपयोग किया जा सके। परमेश्वर का वचन बाइबल यह स्पष्ट बताती है कि चाहे मसीही विश्वासी का उद्धार न भी जाए, तो भी उसके पाप और दुर्वचन, उसे स्वर्ग में मिलने वाले उसके प्रतिफलों का नुकसान करते हैं, और यहाँ पर लापरवाही से बिताया गया जीवन, स्वर्ग में मिलने वाले प्रतिफलों का नाश करता है, जो स्थिति अनन्तकाल के लिए होगी, कभी सुधारी या पलटी नहीं जा सकेगी। आज इसी प्रश्न के उत्तर से जुड़ी एक तीसरी बहुत महत्वपूर्ण बात भी देखते हैं, जिसकी ओर सामान्यतः लोगों का ध्यान या तो जाता ही नहीं है, अथवा बहुत कम जाता है।    

हमने पिछले लेख में यह भी देखा था कि पाप करने से मनुष्य पर दो बातें आईं - मृत्यु - आत्मिक एवं शारीरिक; और जीवनपर्यंत एक शारीरिक दण्ड की स्थिति में जीते रहना और अन्ततः उसी स्थिति में मर भी जाना। प्रत्येक मनुष्य के पाप के लिए, उसके पाप की मृत्यु प्रभु यीशु ने वहन कर ली, उसकी पूरी कीमत चुका दी, और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है। जिसने प्रभु के इस कार्य को स्वीकार कर लिया और अपने आप को उसका शिष्य होने के लिए समर्पित कर दिया, प्रभु ने परमेश्वर के साथ उसकी संगति को बहाल कर दिया, उस पर से मृत्यु के दण्ड को हटा दिया, जैसा हम पहले देख चुके हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रभु यीशु मसीह के कार्य के द्वारा हमें मृत्यु से तो निकासी मिल गई, परमेश्वर के साथ हमारी संगति बहाल हो गई; किन्तु प्रभु यीशु मसीह ने हमारे पापों के साथ जुड़े हुए उसके शारीरिक दण्ड की स्थिति को हमारे लिए वहन नहीं किया है। पाप के कारण आए इस शारीरिक दण्ड को हम में से प्रत्येक को मसीही विश्वासी को भुगतना ही पड़ेगा। बाइबल में इसके कई स्पष्ट उदाहरण हैं और संबंधित हवाले हैं कि लोगों के पाप क्षमा होने पर परमेश्वर के साथ उनकी संगति बहाल रही, किन्तु उन्हें उन पापों के लिए शारीरिक दण्ड फिर भी सहते रहना पड़ा। हम यहाँ पर केवल तीन उदाहरणों को ही देखेंगे:

  • गिनती की पुस्तक के 13 और 14 अध्यायों को देखिए। जब इस्राएली मिस्र के दासत्व से निकलकर, वाचा किए हुए कनान देश के किनारे पर पहुँचे, तो उनके मनों में कुछ संदेह उठे, और परमेश्वर ने मूसा से कहा कि वह इस्राएल के हर गोत्र में से एक जन को लेकर कनान की टोह लेने को भेज दे, जिससे इस्राएल के लोगों का उस देश के उत्तम होने के बारे में संदेह का निवारण हो जाए। उन भेदियों ने जाकर कनान देश की टोह ली, और आकर इस्राएलियों को बताया कि देश तो बहुत अच्छा और उपजाऊ है, किन्तु वहाँ दैत्याकार लोग भी रहते हैं, और उन्हें उस देश में जाने के विषय घबरा दिया। उनके बारंबार परमेश्वर के प्रति प्रदर्शित किए जाने अविश्वास और अनाज्ञाकारिता की प्रवृत्ति के कारण परमेश्वर ने उन्हें दण्ड देना और मार डालना चाहा, और मूसा से कहा कि अब वह उन इस्राएलियों के स्थान पर उससे एक नई जाति उत्पन्न करेगा (गिनती 14:11-12)। मूसा ने उन लोगों के लिए परमेश्वर से क्षमा माँगी, परमेश्वर के आगे उनके लिए गिड़गिड़ाया और विनती की। परमेश्वर ने मूसा की प्रार्थना के उत्तर में उनके मृत्यु दण्ड को तो हटा लिए, किन्तु यह दण्ड दिया कि अब उन्हें 40 वर्ष तक जंगल में यात्रा करते रहना होगा, जब तक कि वह अविश्वासी और अनाज्ञाकारी पीढ़ी के लोग मर कर समाप्त न हो जाएं (गिनती 14:22-34)। प्रभु यीशु मसीह के हमारे पापों के लिए मध्यस्थ और सहायक की भूमिका को मूसा ने निभाया - मृत्यु दण्ड हटा दिया गया, स्वाभाविक मृत्यु रह गई, किन्तु अविश्वास और अनाज्ञाकारिता के पाप के कारण जीवन भर सहने वाले एक दण्ड की आज्ञा बनी रह गई। 
  • गिनती की पुस्तक के 20 अध्याय को देखिए। जंगल की यात्रा के दौरान, जब लोगों को पानी की कमी हुई, तो इस्राएली लोग हाहाकार करने लगे (पद 1-5); परमेश्वर ने मूसा से कहा कि वह वहाँ की एक चट्टान से जाकर कहे, और उसमें से पानी निकल पड़ेगा (पद 7-8)। मूसा ने परमेश्वर के कहे के अनुसार लोगों को एकत्रित किया; किन्तु उनके अविश्वास और परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाने के कारण उनसे क्रुद्ध होकर, उसने क्रोधावेश में आकर अनुचित बोला, और चट्टान से बोलने के स्थान पर उसपर अपनी लाठी दो बार मारी (पद 10-11)। चट्टान से पानी तो निकला, किन्तु परमेश्वर ने उसे दण्ड दिया कि वह अपनी इस अनाज्ञाकारिता के कारण कनान में प्रवेश नहीं करने पाएगा (पद 12), और मूसा को अपनी अनाज्ञाकारिता का दण्ड आजीवन भुगतना पड़ा। कनान के किनारे पहुँच कर मूसा ने फिर से परमेश्वर से उसे कनान में जाने देने की अनुमति देने की विनती की, किन्तु परमेश्वर ने उसे डाँट कर चुप करा दिया (व्यवस्थाविवरण 3:23-27)। मूसा को उसकी अनाज्ञाकारिता के लिए मृत्यु, या परमेश्वर से पृथक होने की सजा तो नहीं दी गई, किन्तु शारीरिक दण्ड की आज्ञा को आजीवन भुगतना पड़ा। 
  • 2 शमूएल 12 अध्याय देखिए। दाऊद द्वारा बतशेबा के साथ किए गए व्यभिचार और उसके पति ऊरिय्याह हत्या के पाप के कारण परमेश्वर उससे अप्रसन्न हुआ। परमेश्वर ने दाऊद को लगभग एक वर्ष का समय दिया, कि वह पश्चाताप कर ले, किन्तु उसने नहीं किया। तब परमेश्वर ने नातान नबी को उसके पास भेजा, जिसने दाऊद के सामने उसके पाप को प्रकट कर दिया (पद 1-7), और दाऊद पर परमेश्वर की अप्रसन्नता को व्यक्त कर दिया तथा परमेश्वर द्वारा निर्धारित दण्ड उसको बता दिया (पद 8-12)। यह सुनकर दाऊद ने अपना पाप स्वीकार किया, पश्चाताप किया। दाऊद के इस पश्चाताप के कारण परमेश्वर ने जो नातान से कहलवाया, वह ध्यान देने योग्य हैतब दाऊद ने नातान से कहा, मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है। नातान ने दाऊद से कहा, यहोवा ने तेरे पाप को दूर किया है; तू न मरेगा” (2 शमूएल 12:13)। दाऊद पर से मृत्यु तो हटा ली गई, किन्तु शेष दण्ड उसे भुगतना पड़ा, और आज तक परमेश्वर के वचन में उसके इस पाप का वर्णन है। दाऊद जितना अपने भजनों औरपरमेश्वर के मन के अनुसार व्यक्तिहोने के लिए जाना जाता है, उतना ही ऊरिय्याह के हत्यारे और बतशेबा के साथ व्यभिचार करने के लिए भी जाना जाता है, और परमेश्वर की दृष्टि में बतशेबा ऊरिय्याह ही की पत्नी रही, दाऊद की पत्नी नहीं बनी (मत्ती 1:6) 
       इस्राएल परमेश्वर की चुनी हुए प्रजा है,  दाऊद और मूसा उसके प्रिय जन और भविष्यद्वक्ता हैं, किन्तु उनके किए पापों के लिए यद्यपि वे नाश नहीं हुए, किन्तु उन्हें भी शारीरिक दण्ड उठाना ही पड़ा, वे उससे बच नहीं सके। यदि अनुग्रह के युग से पहले भी परमेश्वर का चुना हुआ जन परमेश्वर से पृथक नहीं हो सकता था, तो फिर अब इस अनुग्रह के युग में यह क्योंकर संभव होगा? प्रभु यीशु मसीह ने हमें पाप के परमेश्वर से पृथक करने वाले प्रभाव, अर्थात आत्मिक और शारीरिक मृत्यु, को अपने ऊपर ले लिया, हम सभी के लिए सह लिया, और उसके प्रभाव को मिटा दिया। अब मृत्यु, अर्थात परमेश्वर से दूरी का स्थाई समाधान हो गया है, और कोई भी, कुछ भी उस समाधान को पलट नहीं सकता है। जो भी व्यक्ति उस समाधान को स्वीकार कर लेता है, उसके लिए वह सदा सक्रिय तथा अनन्त काल के लिए लागू है। किन्तु साथ ही परमेश्वर ने यह भी प्रकट कर दिया है कि पाप के शारीरिक दण्ड को, परमेश्वर द्वारा उनके लिए दी गई ताड़ना को, मनुष्य को इस पृथ्वी पर भुगतना होगा (इब्रानियों 12:5-11; 1 पतरस 4:1), और साथ ही उस पाप का दुष्प्रभाव उसके स्वर्गीय प्रतिफलों पर भी आएगा। अब यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वयं परखने और निर्णय लेने की बात है कि क्या वह अपने उद्धार को लापरवाही से लेगा, और इस पृथ्वी पर ताड़ना सहने तथा स्वर्ग में अपने प्रतिफलों के हानि उठाने को तैयार रहेगा? इसलिए यह धारणा रखना कि उद्धार के अनन्तकालीन होने के कारण उद्धार पाया हुआ व्यक्ति चाहे जैसा भी जीवन जीए, उसे कोई हानि नहीं होगी, परमेश्वर के वचन से पूर्णतः असंगत है। और जो इस अनुचित धारणा के आधार पर यह शिक्षा देते हैं कि पाप करने के कारण उद्धार खोया जा सकता है उन्हें परमेश्वर के वचन को सही प्रकार से पढ़ने, समझने, और मानने की आवश्यकता है। 

इसलिए शैतान के द्वारा फैलाई जा रही इन व्यर्थ और मिथ्या बातों पर ध्यान मत दीजिए। प्रभु के आपके प्रति प्रमाणित किए गए प्रेम, कृपा, और अनुग्रह, तथा उसके द्वारा आपको प्रदान किए जा रहे पाप-क्षमा प्राप्त करने के अवसर के मूल्य को समझिए, और अभी इस अवसर का लाभ उठा लीजिए। आपके द्वारा स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ आपके द्वारा की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लेंआपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को आशीषित तथा स्वर्गीय जीवन बना देगा। अभी अवसर है, अभी प्रभु का निमंत्रण आपके लिए है - उसे स्वीकार कर लीजिए। 

 

बाइबल पाठ: भजन 139:1-12

भजन 139:1 हे यहोवा, तू ने मुझे जांच कर जान लिया है।

भजन 139:2 तू मेरा उठना बैठना जानता है; और मेरे विचारों को दूर ही से समझ लेता है।

भजन 139:3 मेरे चलने और लेटने की तू भली भांति छानबीन करता है, और मेरी पूरी चालचलन का भेद जानता है।

भजन 139:4 हे यहोवा, मेरे मुंह में ऐसी कोई बात नहीं जिसे तू पूरी रीति से न जानता हो।

भजन 139:5 तू ने मुझे आगे पीछे घेर रखा है, और अपना हाथ मुझ पर रखे रहता है।

भजन 139:6 यह ज्ञान मेरे लिये बहुत कठिन है; यह गम्भीर और मेरी समझ से बाहर है।

भजन 139:7 मैं तेरे आत्मा से भाग कर किधर जाऊं? या तेरे सामने से किधर भागूं?

भजन 139:8 यदि मैं आकाश पर चढूं, तो तू वहां है! यदि मैं अपना बिछौना अधोलोक में बिछाऊं तो वहां भी तू है!

भजन 139:9 यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़ कर समुद्र के पार जा बसूं,

भजन 139:10 तो वहां भी तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा।

भजन 139:11 यदि मैं कहूं कि अन्धकार में तो मैं छिप जाऊंगा, और मेरे चारों ओर का उजियाला रात का अन्‍धेरा हो जाएगा,

भजन 139:12 तौभी अन्धकार तुझ से न छिपाएगा, रात तो दिन के तुल्य प्रकाश देगी; क्योंकि तेरे लिये अन्धियारा और उजियाला दोनों एक समान हैं।

 

एक साल में बाइबल:

· यशायाह 5-6  

· इफिसियों

सोमवार, 27 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 33

 

पाप का समाधान - उद्धार - 29 - कुछ संबंधित प्रश्न और उनके उत्तर (3.1)

हम पिछले दो लेखों से प्रभु यीशु मसीह द्वारा सेंत-मेंत उपलब्ध करवाए गए पापों की क्षमा और उद्धार से संबंधित कुछ सामान्यतः उठाए जाने वाले प्रश्नों को देख रहे हैं। पिछले लेख में हमने देखा था कि उद्धार अनन्तकालीन है, कभी खोया अथवा गंवाया नहीं जा सकता है। उद्धार गँवाने की बात परमेश्वर के वचन और उसके चरित्र तथा गुणों से कदापि मेल नहीं खाती है, वरन उनके विरुद्ध है। किन्तु कुछ लोग यह विचार रखते हैं कि यदि मनुष्य धार्मिकता का जीवन न जीए, और पाप करे, तो फिर उसका उद्धार जा सकता है। साथ ही वे यह भी तर्क भी देते हैं कि यदि उद्धार कभी नहीं जा सकता है, तब तो परमेश्वर ने मनुष्यों को पाप करने का लाइसेंस दे दिया है - एक बार उद्धार पा लो, और फिर उसके बाद जैसा चाहो वैसा करो, क्योंकि उद्धार तो जाएगा नहीं, स्वर्ग तो हर हाल में मिलेगा ही। किन्तु यह भी मनुष्यों को भरमाने के लिए, और प्रभु यीशु के सिद्ध और पूर्ण कार्य में मनुष्यों की अपने ही प्रयासों की धार्मिकता और कर्मों को मिलाने की शैतान द्वारा फैलाई जाने वाली एक गलत शिक्षा, एक गलत धारणा है, और आज हम इसी प्रश्न के विषय देखेंगे।

प्रश्न: क्या कभी गँवाए न जा सकने वाले अनन्त उद्धार के सिद्धांत में, बिना किसी भय के पाप करते रहने की स्वतंत्रता निहित नहीं है? 

उत्तर: यदि परमेश्वर ने हमें अनन्त उद्धार का प्रावधान उपलब्ध करवाया है, तो अवश्य ही कुछ सोच-समझ कर, कुछ जानते-बूझते हुए ही करवाया होगा। उपरोक्त संभावना यदि हम सीमित बुद्धि और ज्ञान वाले मनुष्यों के मन में आ सकती है तो उस असीम ज्ञान और समझ रखने वाले परमेश्वर से भी छिपी हुई नहीं होगी, कि यदि पाप की प्रवृत्ति रखने वाले मनुष्य को अनन्त, कभी न गँवाया जा सकने वाला उद्धार प्रदान कर दिया, तो वह फिर निडर होकर मनमानी और पाप करने के लिए इसका दुरुपयोग अवश्य ही करेगा। इसीलिए परमेश्वर के विषय लिखा है, “क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है; और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है” (1 कुरिन्थियों 1:25)। वास्तविकता यही है कि इस संभावना को उठाने और मानने वाले लोग, परमेश्वर के वचन के प्रति अपने अधूरे ज्ञान और अपूर्ण समझ के कारण शैतान द्वारा बहकाए और पथभ्रष्ट किए जा रहे हैं; जैसा कि यशायाह ने लिखा, “इसलिये अज्ञानता के कारण मेरी प्रजा बंधुआई में जाती है, उसके प्रतिष्ठित पुरूष भूखों मरते और साधारण लोग प्यास से व्याकुल होते हैं” (यशायाह 5:13) 

यदि लोग पाप और उसके कारण उत्पन्न परिस्थितियों, तथा परमेश्वर के वचन में दी गई अन्य संबंधित शिक्षाओं एवं उदाहरणों का ध्यान करें, तो उन्हें स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा कि अनन्त उद्धार के सिद्धांत में पाप करते रहने की स्वतंत्रता निहित नहीं है; वरन एक चेतावनी है कि मनुष्य अपने उद्धार की कीमत और महत्व को समझे अन्यथा परिणाम बहुत दुखदायी होंगे, इस लोक में भी और परलोक में भी। जैसा हम पहले देख चुके हैं, वास्तव में अपने पापों से पश्चाताप करने वाले, और प्रभु यीशु को सच्चे मन से जीवन समर्पित करने वाले व्यक्ति के अंदर परमेश्वर पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगते हैं, जो उसे पाप के विषय कायल करते हैं। यदि उस व्यक्ति से किसी कारणवश कभी कोई पाप हो भी जाए, तो उसमें निवास करने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा उसे उस पाप में बने नहीं रहने देते हैं, वरन उसे उभारते और उकसाते हैं कि वह व्यक्ति अपने पाप के लिए पश्चाताप कर ले; उसको परमेश्वर के सम्मुख स्वीकार कर के उसके लिए क्षमा माँग ले, ताकि परमेश्वर उसे वापस क्षमा की स्थिति में बहाल कर देक्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँपा गया हो। क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो। जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते कराहते मेरी हड्डियां पिघल गई। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई। जब मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया और अपना अधर्म न छिपाया, और कहा, मैं यहोवा के सामने अपने अपराधों को मान लूंगा; तब तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन संहिता 32:1-5); साथ ही 1 यूहन्ना 1:9 भी देखिए। इसलिए सच्चे मन से, और पूर्ण समर्पण से मसीह यीशु पर विश्वास लाने वाला व्यक्ति, जिसने प्रभु यीशु द्वारा उसके लिए चुकाई गई उसके पापों की कीमत को, प्रभु यीशु के बलिदान और पुनरुत्थान के मूल्य तथा महत्व को समझा है, वह कभी इस प्रवृत्ति के साथ कोई भी कार्य नहीं करेगा कि अब अनन्त उद्धार तो मिल ही गया है, इसलिए जैसा जी में आए कर लो, कोई हानि नहीं होगी। यह विचार और व्यवहार वही रखेगा जो अभी भी अपने पापों में ही है, जिसने वास्तव में उद्धार नहीं पाया है, और जो प्रभु द्वारा उसके उद्धार के लिए चुकाए गए दाम के मूल्य का एहसास नहीं करता है, जो प्रभु परमेश्वर के प्रति उसके इस महान अनुग्रह के लिए कृतज्ञ एवं दीन और नम्र नहीं है। 

उद्धार पाए हुए व्यक्ति की उसे पाप करने से रोकने वाली इस कृतज्ञता और समर्पण, तथा पवित्र आत्मा द्वारा उसे गलती से भी हुए पाप के लिए कायल करने के अतिरिक्त भी कुछ और संबंधित बातें हैं, जिनको समझने के लिए हमें वापस अदन की वाटिका में, प्रथम पाप के साथ घटी की घटनाओं का पुनःअवलोकन करके देखना होगा। जैसा हम पहले देख चुके हैं, पाप करने के बाद प्रथम मनुष्यों के साथ दो बातें हुईं - (i) वे तुरंत ही आत्मिक और शारीरिक मृत्यु के अंतर्गत आ गए - परमेश्वर से उनकी संगति टूट गई, और उनका शरीर क्षय होना आरंभ हो गया, जो अन्ततः शारीरिक मृत्यु में पहुँच गया; (ii) परमेश्वर ने उन्हें दंड दिया - स्त्री को आदम की अधीनता में कर दिया, उसकी प्रसव की पीड़ा बढ़ा दी, और आदम को दुख के साथ परिश्रम की रोटी खाने के अधीन कर दिया, उसके परिश्रम के बावजूद धरती उनके लिए कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी; और उन दोनों को उस आशीष की विशिष्ट वाटिका के बाहर निकाल दिया गया। अर्थात पाप के कारण मनुष्य की परमेश्वर से संगति तो टूट ही चुकी है, किन्तु साथ ही मनुष्य जब भी पाप करता है उस पाप का दंड भी उसके जीवन में जुड़ जाता है, जिसे उसे इस पृथ्वी पर भुगतना ही होता है। साथ ही परलोक में उस पाप का प्रतिफल भी उसके नाम पर अर्जित हो जाता है, जिसे उसे परलोक में जाकर भुगतना होगा। 

इस पृथ्वी पर पाप का दण्ड भुगतने से संबंधित चर्चा कुछ लंबी है, इसलिए उसे हम अगले लेख में देखेंगे; आज हम परलोक के जीवन से संबंधित पाप के प्रभाव को देख लेते हैं। 

पाप का प्रभाव प्रत्येक मनुष्य के परलोक के जीवन पर भी पड़ता है। पापों की क्षमा पाए हुए मसीही विशासी को, इस पृथ्वी पर प्रभु की आज्ञाकारिता में उसकी उपयोगिता के लिए बिताए गए जीवन के अनुसार, स्वर्ग में आदर और प्रतिफल भी मिलेंगेभविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं” (2 तीमुथियुस 4:8)। किन्तु इसके साथ ही पृथ्वी पर उसके द्वारा की गई परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता तथा पाप उसके इन प्रतिफलों को बिगाड़ता भी रहता है। स्वर्ग में मनुष्य को मिलने वाले प्रतिफल इन दोनों - भले और बुरे के कुल योग के अनुसार दिए जाएंगे। किन्तु ये आदर और प्रतिफल मिलने से पहले प्रत्येक मसीही विश्वासी के जीवन के प्रत्येक कार्य की बहुत बारीकी से जाँच भी की जाएगी, “क्योंकि वह समय आ पहुंचा है, कि पहिले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए, और जब कि न्याय का आरम्भ हम ही से होगा तो उन का क्या अन्‍त होगा जो परमेश्वर के सुसमाचार को नहीं मानते? और यदि धर्मी व्यक्ति ही कठिनता से उद्धार पाएगा, तो भक्तिहीन और पापी का क्या ठिकाना?” (1 पतरस 4:17-18)। बाइबल से इस विषय से संबंधित कुछ और पदों को देखते हैं: 

  • हर पाप, हर अनाज्ञाकारिता, मसीही विश्वासी के प्रतिफलों को खराब करता है; और जिसका जीवन ऐसा रहा होगा कि उसकी लापरवाही और पापों ने उसके प्रतिफलों को या तो अर्जित ही नहीं होने दिया, अथवा बिगाड़ कर समाप्त कर दिया, वह फिर अनन्तकाल के लिए स्वर्ग में खाली हाथ ही प्रवेश करेगा और रहेगा, “तो हर एक का काम प्रगट हो जाएगा; क्योंकि वह दिन उसे बताएगा; इसलिये कि आग के साथ प्रगट होगा: और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है। जिस का काम उस पर बना हुआ स्थिर रहेगा, वह मजदूरी पाएगा। और यदि किसी का काम जल जाएगा, तो हानि उठाएगा; पर वह आप बच जाएगा परन्तु जलते जलते” (1 कुरिन्थियों 3:13-15) 
  • न केवल कार्यों का, वरन हर एक मनुष्य को अपनी हर व्यर्थ बात, हर शब्द का भी हिसाब देना होगा, “और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे। क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा” (मत्ती 12:36-37) 
  • परमेश्वर मसीही विश्वासियों की बातचीत को ध्यान से सुनता है और उसके सम्मुख उन बातों का लेखा रखा जाता है, “तब यहोवा का भय मानने वालों ने आपस में बातें की, और यहोवा ध्यान धर कर उनकी सुनता था; और जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके साम्हने एक पुस्तक लिखी जाती थी” (मलाकी 3:16) 

 

इसलिए कोई भी यह न समझे कि उद्धार पाने के बाद पाप करने से उसे अब कोई हानि नहीं होगी। परमेश्वर मूर्ख नहीं है, कि मनुष्य उद्दंड होकर उसकी उदारता, कृपा, और प्रेम का दुरुपयोग कर ले और परमेश्वर बस एक मूक दर्शक ही बनकर मनुष्य द्वारा उसका अनुचित लाभ उठाते हुए देखता रह जाए। इसलिए शैतान के द्वारा फैलाई जा रही इन व्यर्थ और मिथ्या बातों पर ध्यान मत दीजिए। प्रभु के आपके प्रति प्रमाणित किए गए प्रेम, कृपा, और अनुग्रह, तथा उसके द्वारा आपको प्रदान किए जा रहे पाप-क्षमा प्राप्त करने के अवसर के मूल्य को समझिए, और अभी इस अवसर का लाभ उठा लीजिए। आपके द्वारा स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ आपके द्वारा की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लेंआपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को आशीषित तथा स्वर्गीय जीवन बना देगा। अभी अवसर है, अभी प्रभु का निमंत्रण आपके लिए है - उसे स्वीकार कर लीजिए।   

 

 बाइबल पाठ: रोमियों 6:11-18

रोमियों 6:11 ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।

रोमियों 6:12 इसलिये पाप तुम्हारे मरनहार शरीर में राज्य न करे, कि तुम उस की लालसाओं के आधीन रहो।

रोमियों 6:13 और न अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आप को मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धर्म के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो।

रोमियों 6:14 और तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के आधीन नहीं वरन अनुग्रह के आधीन हो।

रोमियों 6:15 तो क्या हुआ क्या हम इसलिये पाप करें, कि हम व्यवस्था के आधीन नहीं वरन अनुग्रह के आधीन हैं? कदापि नहीं।

रोमियों 6:16 क्या तुम नहीं जानते, कि जिस की आज्ञा मानने के लिये तुम अपने आप को दासों के समान सौंप देते हो, उसी के दास हो: और जिस की मानते हो, चाहे पाप के, जिस का अन्त मृत्यु है, चाहे आज्ञा मानने के, जिस का अन्त धामिर्कता है

रोमियों 6:17 परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, कि तुम जो पाप के दास थे तौभी मन से उस उपदेश के मानने वाले हो गए, जिस के सांचे में ढाले गए थे।

रोमियों 6:18 और पाप से छुड़ाए जा कर धर्म के दास हो गए।

एक साल में बाइबल:

· यशायाह 3-4  

· गलातियों 6

रविवार, 26 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 32

 

पाप का समाधान - उद्धार - 28 - कुछ संबंधित प्रश्न और उनके उत्तर (2)

 

पिछले लेख में हमने उद्धार से संबंधित कुछ सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों को देखा था। आज भी हम प्रश्नों की इसी शृंखला को ज़ारी रखेंगे, और एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न को देखेंगे। 

प्रश्न: क्या उद्धार खोया जा सकता है? क्या व्यक्ति का उद्धार उससे वापस लिया जा सकता है? 

उत्तर: जैसा हम उद्धार से संबंधित पिछले लेखों में बारंबार देखते चले आ रहे हैं, परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में होकर हमें उद्धार एक उपहार के समान मुफ़्त में दिया है। उसका दिया गया यह उद्धार अनन्तकालीन है; कभी समाप्त नहीं होगा; कभी वापस नहीं लिया जाएगा; कोई व्यक्ति किसी भी रीति से अपने उद्धार को खो नहीं सकता है। 

इस प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए, पहले परमेश्वर के कुछ गुणों का एक संक्षिप्त अवलोकन आवश्यक है; और फिर उन गुणों के आधार पर हम उत्तर को बेहतर समझने पाएंगे।  

परमेश्वर के गुण: संक्षेप में परमेश्वर के कुछ गुण और चरित्र हैं:     

  • वह ईमानदार है, कभी झूठ नहीं बोलता है और कभी धोखा नहीं देता है (तीतुस 1:2)
  • वह न तो कभी गलती करता है, और न कभी बदलता है (इब्रानियों 6:17-18; याकूब 1:17)
  • वह जो कहता है, वही करता है (गिनती 23:19; भजन 89:34), और जो वह कहता है, वह हो कर रहता है, कोई उसे रोक नहीं सकता है।
  • वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है (उत्पत्ति 17:1; प्रकाशितवाक्य 21:22)। कोई भी, किसी भी रीति से, किसी भी शक्ति, बुद्धि, या युक्ति से, उस पर या उसकी योजनाओं और इच्छाओं पर प्रबल नहीं हो सकता है, उन्हें बदल नहीं सकता है, मिटा नहीं सकता है।
  • वह हर बात के बारे में सब कुछ जानता है – सर्वज्ञानी है – आरंभ से ही अन्त को भी जानता है (यशायाह 46:10)
  • उसका वचन मनुष्य के अंदर के सबसे गहरे स्थान तक भी छेदता और उसे खोलता है, और हर बात को स्पष्ट एवं प्रकट कर देता है (इब्रानियों 4:12)
  • वह मनुष्य के विचारों के पीछे की मनसा तक को भी भली-भांति जानता है (1 इतिहास 28:9)
  • वह समय द्वारा सीमित नहीं है – उसके लिए समय का कोई अस्तित्व नहीं है (भजन 90:4; 2 पतरस 3:8) – वह कभी नहीं बदलता, कल आज और युगानुयुग तक एक समान है (मलाकी 3:6; इब्रानियों 13:8) 

       इसलिए परमेश्वर या परमेश्वर से संबंधित कोई भी धारणा या विचार यदि उसके उपरोक्त तथा बाइबल में वर्णित अन्य गुणों के अनुरूप नहीं है, तो वह धारणा या विचार अपूर्ण है, गलत है, परमेश्वर को अस्वीकार्य है। चाहे वह धारणा या विचार रखने वाला व्यक्ति परमेश्वर के प्रति कितने भी श्रद्धा या भक्ति-भाव रखने वाला क्यों न हो, किन्तु उसके वचन से असंगत किसी का भी कोई भी विचार परमेश्वर को कदापि स्वीकार्य नहीं है। इस अति-महत्वपूर्ण बात को ध्यान में रखते हुए बाइबल के परमेश्वर ने उद्धार के विषय जो कहा है, उसमें से कुछ बातें, और उनसे संबंधित अभिप्रायों को देखते हैं: 

उद्धार के विषय परमेश्वर के कुछ कथन:

  • उसका उद्धार अनन्तकाल का है (2 तिमुथियुस 2:10; इब्रानियों 5:9) – ऐसी कोई भी शिक्षा जो इसे अस्वीकार, या इसका इनकार करती है, तो ऐसा करने से वह शिक्षा यह अभिप्राय देती है कि परमेश्वर और उसका वचन झूठा है, अविश्वासयोग्य है, उनमें त्रुटियाँ तथा झूठे आश्वासन हैं।
  • चाहे हम अविश्वासी भी हों, तो भी वह हमारे प्रति विश्वासी बना रहेगा (2 तिमुथियुस 2:13 – यहाँ पद 12 उनके लिए है जो उद्धार के लिए प्रभु की पुकार को अस्वीकार करते रहते हैं; फिर मृत्योपरांत प्रभु भी उन्हें अस्वीकार कर देगा; 13 पद उद्धार पा लेने वालों, विश्वास करने वालों, के प्रति परमेश्वर का रवैया है); और वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा न त्यागेगा (इब्रानियों 13:5)
  • इसी प्रभु परमेश्वर ने यूहन्ना 10:27-29 में अपने लोगों/भेड़ों के लिए कहा है कि:
    • वह अपनी भेड़ों को जानता है
    • वह उन्हें अनन्त जीवन देता है
    • वे कभी नाश न होंगी
    • कोई उन्हें उसके हाथों से नहीं छीन सकता है

      अभिप्राय यह कि प्रभु के उपरोक्त दावों के होते हुए भी यह धारणा रखने और मानने/सिखाने कि उद्धार जा सकता है, का अर्थ यह कहना और सिखाना है कि:

  • परमेश्वर झूठा तथा अविश्वासयोग्य है – उसके कहने और करने में फर्क है। उसके दावों के बावजूद न तो वह अपनी भेड़ों को जानता है, न उन्हें अनन्त जीवन देता है, और न ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि वे कभी नाश नहीं होंगी। अर्थात, इसलिए यह भी संभव है कि अपने दावे के बावजूद वह अपने विश्वासी के प्रति विश्वासयोग्य बना न रहे और किसी समय पर उसे त्याग दे या छोड़ दे।
  • परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है – वरन सृजा गया प्रधान स्वर्गदूत लूसिफर, जो परमेश्वर के विरुद्ध की गई बगावत के कारण शैतान बन गया, सृष्टिकर्ता परमेश्वर से अधिक शक्तिशाली है – वह परमेश्वर के हाथों में से उसके उद्धार पाए हुए लोगों को अपनी किसी युक्ति अथवा शक्ति द्वारा छीन के ले जा सकता है (मत्ती 12:29; मरकुस 3:27 के साथ मिलाकर देखिए), और परमेश्वर कुछ नहीं करने पाता।
  • परमेश्वर गलती कर सकता है – वह सर्वज्ञानी नहीं है; अर्थात, आदि से अन्त को नहीं जानता है, मनुष्य के विचारों और मनसा, उसके हृदय की गहराइयों को नहीं जानता है। तात्पर्य यह कि जब उसने उद्धार को अनन्तकाल का कहा, तब उसे पता नहीं था कि लोग उसके अनुग्रह का दुरुपयोग करेंगे और उद्धार पा लेने को निश्चिंत होकर पाप करते रहने का आधार बना लेंगे। उसने गलती से एक बात तो कह दी, किन्तु अब उसे निभा पाने में असमर्थ है, इसलिए अब चुपचाप से लोगों से उनके उद्धार को वापस ले लेता है।
  • उद्धार पा लेने के बाद मनुष्य अपने कर्मों और व्यवहार से इतना धर्मी बना रह सकता है कि परमेश्वर को उसे स्वर्ग में स्वीकार करना ही पड़ेगा (यशायाह 64:6; अय्यूब 14:4; 15:4; 25:4-6; इफिसियों 2:1-9 से तुलना करें)। यदि यह संभव होता, तो मनुष्य फिर उद्धार से पहले भी यह कर सकता था; तो फिर प्रभु यीशु मसीह को संसार में आने, अपमानित होने, एक घृणित मृत्यु सहने की क्या आवश्यकता थी? वह तो स्वर्ग से ही मनुष्यों को प्रोत्साहित कर सकता था, उनका मार्गदर्शन कर सकता था, कि अपने कर्मों के द्वारा उद्धार प्राप्त कर लें। 

उपरोक्त अभिप्रायों से प्रकट है कि उद्धार के खोए जा सकने का विचार परमेश्वर के गुणों और चरित्र के विरुद्ध कितना गलत और निन्दनीय है; इसलिए पूर्णतः अस्वीकार्य है। ऐसा विचार रखने वाले को दीन होकर पश्चाताप करने, परमेश्वर से उसके विरुद्ध ऐसे कुविचार रखने के लिए क्षमा माँगने की आवश्यकता है। एक अन्य इससे संबंधित प्रश्न उठाया जाता है कि यदि उद्धार कभी नहीं जा सकता है, तब तो परमेश्वर ने मनुष्यों को पाप करने का लाइसेंस दे दिया है - एक बार उद्धार पा लो, और फिर उसके बाद जैसा चाहो वैसा करो, क्योंकि उद्धार तो जाएगा नहीं, स्वर्ग तो हर हाल में मिलेगा ही। यह भी शैतान द्वारा फैलाई जाने वाली एक गलत शिक्षा, एक गलत धारणा है, और इसे हम कल देखेंगे। अभी के लिए, आप से विनम्र निवेदन है कि यदि आप ने अभी तक प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार नहीं किया है, उसके शिष्य नहीं बने हैं, तो आज और अभी, जब यह अवसर आपके पास है, तो इसे व्यर्थ न जाने दें; प्रभु के इस आह्वान को स्वीकार कर लें, अपने जीवन में कार्यान्वित कर लें। कल तो क्या, अगले पल को भी किसी ने नहीं देखा है, कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता है; इसलिए अवसर को बहुमूल्य समझें और सही निर्णय ले लीजिए। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ आपके द्वारा की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लेंआपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को आशीषित तथा स्वर्गीय जीवन बना देगा। अभी अवसर है, अभी प्रभु का निमंत्रण आपके लिए है - उसे स्वीकार कर लीजिए।

 बाइबल पाठ: इब्रानियों 3:7-15

इब्रानियों 3:7 सो जैसा पवित्र आत्मा कहता है, कि यदि आज तुम उसका शब्द सुनो।

इब्रानियों 3:8 तो अपने मन को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय और परीक्षा के दिन जंगल में किया था।

इब्रानियों 3:9 जहां तुम्हारे बाप दादों ने मुझे जांच कर परखा और चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे।

इब्रानियों 3:10 इस कारण मैं उस समय के लोगों से रूठा रहा, और कहा, कि इन के मन सदा भटकते रहते हैं, और इन्होंने मेरे मार्गों को नहीं पहचाना।

इब्रानियों 3:11 तब मैं ने क्रोध में आकर शपथ खाई, कि वे मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाएंगे।

इब्रानियों 3:12 हे भाइयो, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए।

इब्रानियों 3:13 वरन जिस दिन तक आज का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।

इब्रानियों 3:14 क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें।

इब्रानियों 3:15 जैसा कहा जाता है, कि यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय किया था।

एक साल में बाइबल:

· यशायाह 1-2  

· गलातियों 5

शनिवार, 25 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 31


पाप का समाधान - उद्धार - 27 - कुछ संबंधित प्रश्न और उनके उत्तर

प्रभु यीशु मसीह द्वारा समस्त मानवजाति के लिए किए गए इस महान उद्धार तथा पापों के समाधान एवं निवारण के कार्य को लेकर लोगों के मनों में कई प्रश्न भी रहते हैं। सामान्यतः पूछे जाने वाले कुछ प्रश्न और उनके उत्तर हैं:

प्रश्न: जब पाप का दण्डात्मक दुष्प्रभाव वंशागत हो सकता है, तो उद्धार का आशीषपूर्ण रक्षक प्रभाव वंशागत क्यों नहीं हो सकता है? क्यों प्रत्येक को अपने ही पापों के क्षमा मिलती है; वह क्षमा उसकी संतानों पर क्यों नहीं जाती है? 

उत्तर: यह तो ज्ञात एवं स्पष्ट है कि मनुष्यों की पार्थिव देह मरनहार है, पाप के दोष के साथ है, और पाप के दोष और उसके प्रभाव - मृत्यु को, एक से दूसरी पीढ़ी में दे देती है, और इसीलिए प्रत्येक पार्थिव देह को मरना भी होगा। जब प्रभु यीशु मसीह ने अपनी पाप के दोष से रहित देह पर सारे संसार के सभी लोगों का पाप ले लिया, तो उनकी उस देह को भी मृत्यु से होकर निकलना पड़ा। वर्तमान में, प्रभु यीशु के दूसरे आगमन तक, मसीही विश्वासियों की पार्थिव देह भी वह अविनाशी, उद्धार पाई हुई अलौकिक देह नहीं है जो प्रभु के पुनरुत्थान के बाद उनकी हो गई थी; और जो प्रभु यीशु के दूसरे आगमन पर उसके शिष्यों, मसीही विश्वासियों को प्रभु यीशु के समान मृत्यु से पार होने के बाद मिलेगी। पुनरुत्थान के पश्चात प्रभु यीशु केवल आत्मा नहीं थे, उन्होंने यह कहा और प्रमाणित किया था कि वे आत्मा नहीं देह में शिष्यों के समक्ष हैंमेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो” (लूका 24:39; देखिए लूका 24:36-43)। इसी प्रकार से प्रभु यीशु मसीह के शिष्य, मसीही विश्वासी भी प्रभु यीशु मसीह के दूसरे आगमन पर, जो मर गए हैं वे एक नई अलौकिक देह में जी उठेंगे, और जो उस समय जीवित होंगे वे उस नई देह में परिवर्तित हो जाएंगेऔर यह क्षण भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूंकते ही होगा: क्योंकि तुरही फूंकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएंगे, और हम बदल जाएंगे। क्योंकि अवश्य है, कि यह नाशमान देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले” (1 कुरिन्थियों 15:52-53); वह नई देह पाप के दोष और प्रभाव - मृत्यु, से मुक्त होगी। क्योंकि वर्तमान में मसीही विश्वासियों की देह में वे अलौकिक उद्धार पाई हुई अविनाशी देह के गुण विद्यमान नहीं हैं, इसीलिए मसीही विश्वासी अपनी देह से उत्पन्न हुई अपनी संतानों को भी वे अलौकिक गुण नहीं दे सकते हैं; केवल पाप के दोष वाली देह के गुण, जो वर्तमान में उनमें विद्यमान हैं, वे ही दे सकते हैं, और देते हैंअशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4)

प्रश्न: उद्धार पाने के पश्चात भी लोग पाप क्यों करते हैं, पवित्र और सिद्ध क्यों नहीं हो जाते हैं?

उत्तर: जैसा इससे पहले के प्रश्न में समझाया गया है, यद्यपि उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी अभी भी शारीरिक रीति से पाप के दोष और प्रभाव वाली देह में जीवित हैं। इसलिए उनका पाप करने का पुराना स्वभाव, उनके प्रभु यीशु का अनुसरण करने के नए स्वभाव के साथ संघर्ष करता रहता है, उन्हें वापस पाप में फँसाने और गिराने का प्रयास करता रहता हैक्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ” (गलातियों 5:17)। जब कभी शरीर की लालसाएँ आत्मा पर हावी हो जाती हैं, मनुष्य पाप में गिर जाता है। किन्तु मसीही विश्वासी पाप में बना नहीं रह सकता हैजो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उस में बना रहता है: और वह पाप कर ही नहीं सकता [मूल भाषा में लिखे वाक्य का अभिप्राय हैवह पाप में बना नहीं रह सकता है], क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है” (1 यूहन्ना 3:9)। उसमें विद्यमान परमेश्वर का आत्मा उसे उसके इस पाप में गिर जाने, पाप में होने की दशा के लिए कायल करता है, पश्चाताप के लिए उभारता है, और जब वह अपने पाप को मान लेता है, उसके लिए पश्चाताप करके परमेश्वर से क्षमा माँगता है, तो परमेश्वर का वायदा है कियदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9) 

दूसरी बात, उद्धार पाने के बाद, परमेश्वर हमें अंश-अंश करके प्रभु यीशु की समानता में परिवर्तित करता जा रहा है...तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18 )। इसलिए उद्धार पाए हुए प्रत्येक व्यक्ति में सदैव ही, जब तक वह इस शरीर और संसार में है, कुछ सांसारिक और शारीरिक तथा कुछ आत्मिक और स्वर्गीय गुण विद्यमान होंगे। मसीही विश्वास, तथा परमेश्वर के वचन और आज्ञाकारिता में परिपक्व होते जाने से उसमें से सांसारिक और शारीरिक बातें धीरे-धीरे कम होती चली जाएंगी, और स्वर्गीय तथा आत्मिक बातें बढ़ती चली जाएंगी। किन्तु पूर्ण पवित्रता और सिद्धता वह इस शरीर से निकल कर अविनाशी देह में आने के बाद ही पाएगा। इसलिए हर उद्धार पाए हुए व्यक्ति में, कोई न कोई अपूर्णता, सांसारिकता की बात, शरीर की लालसा देखी जाएगी। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह उद्धार पाया हुआ नहीं है; वरन यह कि वह अभीनिर्माणाधीन है, उसमें चल रहा परमेश्वर का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए कुछ कमियाँ, कुछ त्रुटियाँ दिख सकती हैं, और दिखती रहती हैं। किन्तु उसका अनन्तकालीन भविष्य स्वर्गीय सिद्धता, पवित्रता, और आशीषपूर्ण है। 

प्रश्न: जब प्रभु ने सब के पापों के लिए दंड सह लिया है, उनकी पूरी-पूरी कीमत चुका दी है, तो फिर सभी स्वर्ग के वारिस क्यों नहीं हैं? फिर क्यों लोगों को प्रभु यीशु मसीह में अलग से विश्वास करने की आवश्यकता है

उत्तर: इसका उत्तर समझने के लिए दो उदाहरण देखिए। मान लीजिए, मैं आपके लिए एक बहुत उत्तम और आपके जीवन के लिए बहुत लाभकारी उपहार लेता हूँ, और आपको उसे एक भेंट के रूप में मुफ़्त में देना चाहता हूँ। मैं आपको उसके लिए बारंबार बताता रहता हूँ कि मैंने आपके लिए एक बहुत उपयोगी उपहार ले कर रखा हुआ है, जब भी मन करे कभी भी आकर मुझ से उस उपहार को ले लें। किन्तु आप मुझ पर, मेरी मंशा पर, मेरे उस उपहार पर संदेह करते हैं, उन्हें अस्वीकार करते हैं, मेरे इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करते, मुझ से वह उपहार लेने के लिए नहीं आते हैं; तो क्या वह उपहार, जिसकी पूरी कीमत चुकाई जा चुकी है, जो आपको केवल मुझ से लेकर अपने लिए उपयोग भर ही करना है, आपको कोई लाभ दे सकता है? या मान लीजिए, आप उस उपहार को मुझ से ले भी लेते हैं, किन्तु उसकी गुणवत्ता पर, उसकी उपयोगिता पर, उसे आपको देने के पीछे मेरी मंशा पर, या अन्य किसी भी कारण से उस उपहार पर और मुझ पर संदेह करते हैं, उसे अपने लिए आवश्यक नहीं समझते हैं, अपने उपयोग में नहीं लाते हैं, तो क्या मेरे द्वारा उस उपहार की कीमत चुकाने और उसे आपको उपलब्ध करवा देने से आपको कोई लाभ होगा

यही बात प्रभु यीशु मसीह द्वारा उपलब्ध करवाए गए पापों की क्षमा और उद्धार के उपहार के लिए भी लागू है। यदि आप उसे अपनाएंगे ही नहीं; उसे अपने जीवन में कार्यकारी ही नहीं करेंगे तो फिर वह आपके जीवन में लाभकारी कैसे होगा? प्रभु यीशु कहते हैं किमैं तुम्हारे पाप अपने ऊपर लेता हूँ, और बदले में अपनी धार्मिकता तुम्हें देता हूँऔर आप कहें, नहीं मुझे यह स्वीकार नहीं है; मैं अपने पाप अपने पास रखूँगा, आप अपनी धार्मिकता अपने पास रखिए। मैं अपने पापों का समाधान और निवारण अपने तरीके से निकाल लूँगा और कर लूँगा, मुझे आपके समाधान और निवारण की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में प्रभु यीशु द्वारा क्रूस पर किए गए कार्य और उनके पुनरुत्थान का आपके जीवन में क्या उपयोगिता अथवा महत्व रहा? फिर प्रभु का वह बलिदान आपके लिए कैसे कार्यकारी और लाभकारी हो सकेगा? ऐसे में तो आप वहीं रहेंगे जहाँ हैं, जैसे हैं; और सब कुछ तैयार एवं उपलब्ध होने के बावजूद, उसका कोई लाभ नहीं उठाने पाएंगे। 

एक अन्य कारण से भी प्रभु द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह समाधान लोगों के जीवनों में कार्यकारी एवं उपयोगी नहीं होने पाता है। एक और उदाहरण से समझिए; हम सभी कंप्यूटर और मोबाइल फोन प्रयोग करते हैं। इसलिए हम यह भी जानते हैं कि हमारे कंप्यूटर अथवा फोन में डाले हुए प्रोग्राम या एप्प के बनाने वाले समय-समय पर उनके और उन्नत तथा बेहतर संस्करण, अर्थातअपडेटनिकालते रहते हैं, जिससे वह प्रोग्राम या एप्प और बेहतर कार्य कर सके। कभी-कभी कुछ अपडेट ऐसे भी आते हैं जिन्हें लागू करने के लिए पुराने संस्करण को मिटाना याअन-इंस्टालकरना होता है, और फिर उस पुराने के स्थान पर नए वाले कोइंस्टालकरना होता है। यदि आप नया संस्करण डाउनलोड भी कर लें, किन्तु पुराने कोअन-इंस्टालकरने की अनुमति न दें, पुराने कोअन-इंस्टालनहीं करें, तो वह नया फिर कैसे लागू होगा और आपके किस काम का होगा? ऐसे में उस प्रोग्राम या एप्प के बनाने वाले और उसे उपलब्ध करवाने वाले की मेहनत और प्रयास आपके लिए क्या लाभ देंगे? बहुत से लोग मसीही जीवन का लाभ तो उठाना चाहते हैं, किन्तु अपने पुराने सांसारिक जीवन और पुरानी शारीरिक बातों को छोड़ना नहीं चाहते हैं। जबकि प्रभु कहता है कि पुराने जीवन से पश्चाताप और छुटकारे के साथ ही मसीही विश्वास का नया जीवन कार्यान्वित, उपयोगी और लाभकारी हो सकता है। जब तक पुराना पापमय जीवन रहेगा तब तक नया कुछ काम नहीं कर सकेगा। लोगों को नए जीवन का पता है, वे उसे चाहते हैं, किन्तु नए को पुराने के साथ मिलाकर चलाना चाहते हैं, जो संभव नहीं है। इसलिए उनके जीवन में पापों की क्षमा और उद्धार का कार्य भी कार्यकारी नहीं रहता है।

शैतान तो सांसारिक ज्ञान, बुद्धि, समझ, धर्म, मत, विचारधारा, आदि के आधार पर मन में परमेश्वर के कार्य के प्रति संदेह उत्पन्न करता ही रहेगा; अनेकों प्रकार से प्रश्न उठाता ही रहेगा और उलझाता ही रहेगा - वह तो अदन की वाटिका के प्रथम पाप के समय से यह करता चला आ रहा है। उसके भ्रम, उसकी इस चालाकी में फँसने की बजाए, प्रभु यीशु पर, उसके जीवन, शिक्षाओं, कार्यों, और मानवजाति के लिए दिए गए बलिदान, तथा उनके मृतकों में से पुनरुत्थान की सामर्थ्य पर; वह आपको क्या देना चाहता है और आप से बदले में क्या चाहता है, आदि बातों पर ध्यान लगाइए, उन पर विचार कीजिए, तब सही बात तथा सही निर्णय आपके सामने स्वतः ही स्पष्ट एवं प्रकट हो जाएगा। फिर यीशु मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता स्वीकार करने में आपको कोई संकोच नहीं रहेगा। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ आपके द्वारा की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लेंआपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को आशीषित तथा स्वर्गीय जीवन बना देगा। अभी अवसर है, अभी प्रभु का निमंत्रण आपके लिए है - उसे स्वीकार कर लीजिए।

बाइबल पाठ: रोमियों 10:6-13

रोमियों 10:6 परन्तु जो धामिर्कता विश्वास से है, वह यों कहती है, कि तू अपने मन में यह न कहना कि स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा? अर्थात मसीह को उतार लाने के लिये!

रोमियों 10:7 या गहराव में कौन उतरेगा? अर्थात मसीह को मरे हुओं में से जिलाकर ऊपर लाने के लिये!

रोमियों 10:8 परन्तु वह क्या कहती है? यह, कि वचन तेरे निकट है, तेरे मुंह में और तेरे मन में है; यह वही विश्वास का वचन है, जो हम प्रचार करते हैं।

रोमियों 10:9 कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।

रोमियों 10:10 क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है।

रोमियों 10:11 क्योंकि पवित्र शास्त्र यह कहता है कि जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।

रोमियों 10:12 यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है; और अपने सब नाम लेने वालों के लिये उदार है।

रोमियों 10:13 क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।

 

एक साल में बाइबल:

· श्रेष्ठगीत 6-8 

· गलातियों 4