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रविवार, 3 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 3

 

मसीही में विश्वास (1)

       मसीही विश्वास एवं शिष्यता से संबंधित बातों को देखते हुए, हम पिछले दो लेखों से जान चुके हैं कि न तो मसीही विश्वास कोई धर्म है, और न ही किसी धर्म परिवर्तन की बात है, वरन आरंभिक मसीही विश्वासी स्वेच्छा से प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता को स्वीकार करने वाले लोग थे। पिछले लेख में हमने आरंभिक मसीही विश्वास और विश्वासियों के इतिहास के बारे में बाइबल में की पुस्तक प्रेरितों के काम से देखा था कि आरंभिक मसीही विश्वासीपंथ के लोग”, अर्थात सामान्य लोगों और संसार की जीवन शैली से पृथक एक विशिष्ट जीवन शैली जीने वाले लोग जाने जाते थे (प्रेरितों 9:2)। और कुछ समय के बाद वे जो प्रभु यीशु मसीह के शिष्य थे, उन्हें संसार के लोगों ने मसीही कहना आरंभ कर दिया (प्रेरितों 11:26)। निष्कर्ष यह कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार मसीही वह है जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य है, और जो संसार से पृथक प्रभु यीशु द्वारा दिखाए मार्ग के अनुसार जीवन जीता है। मसीही विश्वास से संबंधित इन आधारभूत तथ्यों में एक और आधारभूत बात निहित है कि मसीही विश्वासी होना किसी भी व्यक्ति के अपने लिए समझ-बूझकर निर्णय लेने की आयु का होने से पहले हो पाना संभव नहीं है। अर्थात मसीही होना किसी परिवार विशेष में जन्म लेने के द्वारा या किसी धर्म के पालन के द्वारा नहीं है, वरन स्वेच्छा और सच्चे समर्पण के द्वारा प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता को ग्रहण करने, उसे अपना उद्धारकर्ता स्वीकार के उसका अनुयायी हो जाने के द्वारा है। 

       बहुत से लोग, विशेषकर ईसाई धर्म का पालन करने वाले, यह कहते हैं कि वे प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करते हैं; तो क्या अपने इस दावे या धारणा के कारण वे उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी कहलाए जा सकते हैं? प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करने का, बाइबल के आधार पर, क्या अर्थ है? क्या हर कोई व्यक्ति जो अपने ही किसी भी आधार पर प्रभु यीशु पर विश्वास करने का दावा करता है, वह उद्धार पाया हुआ मसीही विश्वासी है? इस बात को समझने के लिए हमें बाइबल के दो पदों का अध्ययन करना आवश्यक है। इनमें से पहला पद हमें स्पष्ट करेगा कि कैसे प्रभु यीशु पर विश्वास के द्वारा उद्धार या नया जन्म मिलता है; और दूसरा पद समझाएगा कि बाइबल के अनुसार मसीह यीशु में विश्वास करने का अर्थ क्या है। ये दोनों ही पद प्रभु यीशु मसीह के जन्म और पृथ्वी पर सेवकाई से पहले के समय के हैं, अर्थात इन पदों में व्यक्त बात परमेश्वर के वचन का वह आधार है जिसके अनुसार उद्धार, मसीही जीवन, और सुसमाचार प्रचार की सेवकाई प्रतिपादित की गई। आज हम इनमें से पहले पद को देखेंगे, और संबंधित दूसरे पद पर कल विचार करेंगे। ये दोनों पद हैं:

1. “वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21) 

2. “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूहन्ना 1:12-13)

आज के विचार के लिए, उसके संदर्भ सहित, प्रथम पद हैजब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्वप्न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:20-21)। प्रभु यीशु मसीह का सांसारिक पिता, यूसुफ, अपनी पत्नी मरियम को अपने घर लाने से घबरा रहा था, क्योंकि वह विवाह से पहले ही गर्भवती पाई गई थी। यूसुफ मरियम को छोड़ देने के बारे में विचार कर रहा था, ऐसे में उसे परमेश्वर की ओर से स्वप्न में स्वर्गदूत ने उसे आश्वस्त किया कि मरियम ने कुछ गलत नहीं किया है, वह अभी भी कुँवारी ही है, और यूसुफ बिना उस पर कोई संदेह किए उसे निःसंकोच अपने घर ला सकता है। फिर स्वर्गदूत यूसुफ को मरियम के गर्भ में जो पल रहा है, उसके बारे में बताता है, “वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21), अर्थात, मरियम से एक पुत्र उत्पन्न होगा, और यूसुफ को उसका नाम यीशु रखना होगा, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा। इस पद के पहले अर्ध-भाग - पुत्र जनने और उसका नाम यीशु रखे जाने को हम कल इससे संबंधित दूसरे पद के साथ देखेंगे। आज हम इस पद के दूसरे अर्ध-भागक्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगापर विचार करेंगे।

यह पद प्रभु यीशु मसीह के जन्म लेने के उद्देश्य को व्यक्त कर रहा है - लोगों को उनके पापों से उद्धार प्रदान करना। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादउद्धारकिया गया है, उसका शब्दार्थ होता हैछुड़ा लेना या सुरक्षित कर लेना। अर्थात, मरियम से जन्म लेना वह पुत्र जिसका नाम यीशु रखा जाएगा, वह लोगों को उनके पापों से छुड़ा लेगा या सुरक्षित कर देगा। यह अपने आप में एक अति-विलक्षण और अभूत-पूर्व आश्वासन था; क्योंकि यह मनुष्यों का व्यावहारिक अनुभव था कि सभी धर्म-कर्म करने, सारे पर्व मनाने, विधि-विधानों को पूरा करने के बाद भी उनके जीवनों से पाप की उपस्थिति समाप्त नहीं होती थी; उन्हें फिर भी पाप के साथ संघर्ष करना पड़ता था, अपने पापों के दुष्परिणामों को झेलना होता था। अब प्रभु यीशु मसीह में संसार के लोगों को परमेश्वर की ओर से यह प्रावधान उपलब्ध करवाया जा रहा था, जो उन्हें उनके पापों की समस्या से छुड़ा कर सुरक्षित करेगा। 

किन्तु साथ ही इस पद में परमेश्वर की ओर से यह भी बताया गया था कि किन लोगों को उनके पापों से छुड़ाया और सुरक्षित किया जाएगा; जैसा यूसुफ से, उसे मिले दर्शन में, कहा गया और बाइबल में लिखा गया है, प्रभु यीशुअपने लोगों कोउनके पापों से छुड़ाएगा और सुरक्षित करेगा। अर्थात जिसे पाप से छुटकारा और सुरक्षा चाहिए, उसे प्रभु यीशु का जन बनना होगा; और जो प्रभु यीशु का जन बन जाएगा, उसे प्रभु यीशु ही उसके पापों से छुड़ाएगा और सुरक्षित करेगा। उपरोक्त दूसरे पद यूहन्ना 1:12-13 से हम देखते हैं कि प्रभु यीशु का जन बनना उसे ग्रहण करने, उसके नाम पर विश्वास करने के द्वारा होता है, जिसकी व्याख्या हम कल देखेंगे। इस पद, मत्ती 1:21 में, यह भी निहित है कि लोगों के पापों से छुड़ाया जाना प्रभु यीशु ही उन्हें करके देगा; उन लोगों का इसमें कोई योगदान नहीं होगा, वे केवल प्रभु के किए हुए को स्वीकार करने और उसे अपने जीवन में कार्यान्वित करने वाले होंगे। उद्धार केवल प्रभु यीशु मसीह के द्वारा है, मनुष्य केवल उसे एक भेंट, एक उपहार के समान स्वीकार ही कर सकता है।

अर्थात, पापों की क्षमा और उद्धार या नया जन्म पाने के लिए व्यक्ति को सर्व-प्रथम स्वेच्छा तथा सत्य-निष्ठा से प्रभु यीशु का जन बनना अनिवार्य है। यहबननाकिसी धर्म विशेष की बातों के निर्वाह अथवा किसी परिवार विशेष में जन्म ले लेने से स्वतः हो जाने वाली प्रक्रिया नहीं है। उपरोक्त यूहन्ना 1:12 के अनुसार, यह केवल प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करने, और उसके नाम पर विश्वास करने के द्वारा ही संभव है। 

यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

      

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 17-19  
  • इफिसियों 5:17-33 

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 2

 

आरंभिक मसीही विश्वासी 

मसीही विश्वास और शिष्यता पर इस नई शृंखला के पहले लेख में हमने कल परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए इस विषय से संबंधित कुछ मूल तथ्यों को देखा था। हमने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह ने न तो कोई धर्म बनाया, न अपने शिष्यों से बनवाया, न किसी धर्म के प्रचार के लिए कहा, और न ही किसी का कोई धर्म-परिवर्तन करने के निर्देश दिए। उन्होंने अपने शिष्यों से संसार भर में जाकर लोगों को प्रभु का चेला बनाने, और जो स्वेच्छा से चेला बनना स्वीकार करता है, उसे प्रभु की बातें सिखाने और केवल उसे ही बपतिस्मा देने के लिए कहा (मत्ती 28:18-20)। नए नियम की पाँचवीं पुस्तक, ‘प्रेरितों के कामप्रभु यीशु के मसीह के आरंभिक शिष्यों और उनके समूह - मसीही मण्डलियों का इतिहास है; अर्थात, कैसे सुसमाचार प्रचार आरंभ हुआ, कैसे लोगों में फैला, उसके क्या प्रभाव तथा प्रतिक्रियाएं हुईं - अनुकूल भी और प्रतिकूल भी, आदि। आरंभिक मसीही मण्डलियों के स्थापित होने, बढ़ने और फैलने का यह विवरण कई रोचक तथ्यों को प्रकट करता है; इनमें से कुछ तथ्य हैं:

  • सुसमाचार प्रचार और मण्डलियों की स्थापना परमेश्वर पवित्र आत्मा के शिष्यों पर उतर आने और उन्हें सामर्थ्य प्रदान करने के बाद ही होना था (प्रेरितों 1:8)। अर्थात, यह किसी मनुष्य द्वारा, या मनुष्यों के ज्ञान, बुद्धि और सामर्थ्य द्वारा किए जाने वाला कार्य नहीं था; यह केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से और उसकी अगुवाई में होकर हो सकने वाला कार्य था। 
  • सबसे पहला प्रचारभक्त यहूदियों’ (प्रेरितों 2:5) के मध्य किया गया जो धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वाह करने के लिए संसार भर से यरूशलेम में एकत्रित हुए थेउन यहूदियों ने जब प्रभु यीशु मसीह द्वारा पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार को सुना, तो उन भक्त यहूदियों केहृदय छिद गएऔर वे प्रभु के शिष्यों से अपनी स्थिति के समाधान का मार्ग पूछने लगे। तब पतरस ने उन्हें पश्चाताप करने और प्रभु यीशु की शिष्यता में आने, और बपतिस्मे के द्वारा अपने इस निर्णय की गवाही देने के लिए कहा (प्रेरितों 2:37-38)। अर्थात, उद्धार और परमेश्वर को स्वीकार्य होना मनुष्यों के भले या धार्मिक कार्यों से नहीं है, वरन प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्ता स्वीकार करने के द्वारा है। जब सुसमाचार ने उनके मन की वास्तविक स्थिति उन पर प्रकट कर दी, तो सुनने वालों को अपनी रीति-रिवाजों को मानने और मनाने की भक्ति की व्यर्थता, तथा पापों की क्षमा और उद्धार के लिए किसी अन्य वास्तव में कारगर उपाय की आवश्यकता का एहसास हो गया। 
  • आरंभ से ही मसीही विश्वासियों में चार गुण पाए जाते थे, जो आज भी व्यक्तिगत रीति से प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के जीवन के अभिन्न अंग हैंऔर वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (प्रेरितों 2:42)। आज भी मसीही विश्वासियों की मण्डली की स्थिरता और उन्नति का आधार यही चार बातें हैं – मण्डली के लोगों द्वारा परमेश्वर के वचन का अध्ययन और शिक्षा, परस्पर संगति रखना, प्रभु-भोज में नियमित सम्मिलित होते रहना, और प्रार्थना करते रहना। 
  • प्रभु ही अपनी मण्डली में उद्धार पाए हुए लोगों को जोड़ता जाता था, और लोग उन मसीही विश्वासियों से प्रसन्न रहते थेऔर परमेश्वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उन से प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उन को प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता था” (प्रेरितों 2:47) 
  • मसीही विश्वासियों के कार्यों और सुसमाचार प्रचार से धर्म के अगुवे और सरदार बहुत अप्रसन्न हुए, जिससे प्रभु की मण्डलियों की स्थापना के साथ ही उन मण्डलियों और मण्डलियों के लोगों का विरोध एवं उन पर सताव भी आरंभ हो गया (प्रेरितों 3:1-3), किन्तु इससे मसीही विश्वासियों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई। 
  • मसीही विश्वासियों के समूहों, मसीही मण्डलियों के आरंभ के समय से ही हम कहीं पर भी किसीईसाई धर्मयामसीही धर्मया ‘धर्म’ का कहीं कोई उल्लेख नहीं पाते हैं। प्रेरितों 2:42 की उपरोक्त चार आधारभूत शिक्षाओं के पालन के अतिरिक्त, मसीही विश्वासियों में और कोई प्रथा, अनुष्ठान, या रीति-रिवाज़ के पालन, अथवा किसी भी त्यौहार या दिन को मनाने का कोई उल्लेख नहीं है। 
  • गैर-मसीही लोगों ने मसीही विश्वासियों को एक नाम दिया थापंथ के लोग” (प्रेरितों 9:2), और यही संज्ञा उनके साथ इस सारी पुस्तक में जुड़ी हुई है। अर्थात, लोगे देखते, जानते और मानते थे कि मसीही विश्वासी एक विशिष्ट लोगों का समुदाय है, जो सामान्य सांसारिकता और धार्मिक मार्गों से बिलकुल पृथक, एक अन्य ही विशिष्ट मार्ग पर चलते हैं; किन्तु इसमार्गयापंथका कोई अलग से नामकरण नहीं किया गया है, और न ही उस ‘पंथ’ या मार्ग को कोई ‘धर्म’ कहा गया है – न मसीहियों और न ही गैर-मसीहियों के द्वारा। 
  • कुछ समय के बाद में मसीह यीशु के इन्हीं विश्वासियों, इन्हीं शिष्यों को एक अन्य स्थान पर समाज के अन्य लोगों द्वारामसीहीकहा गया “...और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत लोगों को उपदेश देते रहे, और चेले सब से पहिले अन्‍ताकिया ही में मसीही कहलाए” (प्रेरितों 11:26)। ध्यान कीजिए, एक बार फिर यह प्रकट है कि मसीही विश्वासियों को किसी धर्म को मानने वाले नहीं कहा गया, और न ही किसी धर्म के साथ उन्हें जोड़ा गया; साथ ही जो मसीह यीशु के शिष्य थे, वे ही मसीही कहलाए।  

 

            तो इस आरंभिक इतिहास से मसीही मण्डलियों और मसीही विश्वासियों के विषय में हम क्या शिक्षा लेते हैं? सर्वप्रथम - जो सच्चा मसीही विश्वासी होगा, उसमें प्रेरितों 2:42 की चारों आधारभूत बातें विद्यमान होंगी; वह उनके महत्व को समझेगा और मानेगा। दूसरे, मसीह यीशु का शिष्य होना, जीवनपर्यंत और हर परिस्थिति में एक ऐसी गवाही का जीवन जीना है कि समाज के लोग स्वतः ही पहचान जाएं कि प्रभु यीशु के ये अनुयायी अन्य सभी इसे भिन्न हैं, एक विशिष्टमार्गया जीवन शैली के अनुसार रहते और चलते हैं। तीसरे, बाइबल में दी गई परिभाषा के अनुसार मसीही वही है जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य है, न कि किसी धर्म का पालन करने वाला या किन्हीं धार्मिक विधि-विधानों का निर्वाह करने वाला। और यह सामान्य समझ एवं जानकारी की बात है कि कोई भी व्यक्ति किसी का शिष्य बनकर जन्म नहीं लेता है, वरन वयस्क होकर, स्वेच्छा से, जाँच-परख कर, किसी की शिष्यता को ग्रहण करता है, उसकी आज्ञाकारिता  में अपने आप को समर्पित करता है। यही बात मसीही विश्वासी होने पर भी ऐसे ही लागू होती है। जैसा हम पहले के लेखों में विस्तार से देख चुके हैं, बाइबल के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, कभी भी किसी परिवार विशेष में जन्म लेने से, या किसी धर्म विशेष के पालन करने से प्रभु यीशु का शिष्य नहीं हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करके, और उसकी शिष्यता में अपने आप को स्वेच्छा तथा सच्चे मन से समर्पित करने के द्वारा ही यह संभव होने पाता है; और इसी कोनया जन्मपाना, अर्थात नश्वर सांसारिक स्थिति से निकलकर अविनाशी आत्मिक जीवन में परमेश्वर की संतान बनकर जन्म लेना और प्रवेश करना कहते हैं। 

            कल हम मसीह यीशु में विश्वास करने के अर्थ को समझेंगे, उसका विश्लेषण करेंगे; और फिर उसके पश्चात बाइबल में दिए गए मसीही विश्वासी, या प्रभु यीशु मसीह के शिष्य के गुणों को कुछ विस्तार से देखना आरंभ करेंगे। यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो उनभक्त यहूदियोंके समान आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

           

बाइबल पाठ: प्रेरितों 2:21-24, 36-40  

प्रेरितों के काम 2:21 और जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वही उद्धार पाएगा।

प्रेरितों के काम 2:22 हे इस्राएलियों, ये बातें सुनो: कि यीशु नासरी एक मनुष्य था जिस का परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ्य के कामों और आश्चर्य के कामों और चिन्हों से प्रगट है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखलाए जिसे तुम आप ही जानते हो।

प्रेरितों के काम 2:23 उसी को, जब वह परमेश्वर की ठहराई हुई मनसा और होनहार के ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तो तुम ने अधर्मियों के हाथ से उसे क्रूस पर चढ़वा कर मार डाला।

प्रेरितों के काम 2:24 परन्तु उसी को परमेश्वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया: क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता।

प्रेरितों के काम 2:36 सो अब इस्राएल का सारा घराना निश्चय जान ले कि परमेश्वर ने उसी यीशु को जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, प्रभु भी ठहराया और मसीह भी।

प्रेरितों के काम 2:37 तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?

प्रेरितों के काम 2:38 पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।

प्रेरितों के काम 2:39 क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा।

प्रेरितों के काम 2:40 उसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 14-16  
  • इफिसियों 5:1-16  

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 1 - कुछ मूल तथ्य


मसीही विश्वास से संबंधित कुछ मूल तथ्य 

 

  पिछले लेखों में हम दो महत्वपूर्ण विषयों को देख चुके हैं कि (i) बाइबल को क्यों परमेश्वर का वचन कहा जाता है, तथा (ii) बाइबल के अनुसार पाप और उद्धार तथा इनमें निहित अभिप्राय क्या हैं, और इनसे जुड़ी हुई महत्वपूर्ण बातें क्या हैं। आज से हम इससे आगे का विषयमसीही विश्वास एवं शिष्यताको देखना आरंभ करेंगे, जो इन पिछले विषयों पर आधारित होगा तथा उनसे और आगे की बातों को प्रकट करेगा। इस शृंखला में विचार के लिए हम आज बाइबल के अनुसार उद्धार और नया जन्म पाने के लिए मसीही विश्वास से संबंधित कुछ मूल बातों को देखेंगे। 

  जैसा हम पहले के लेखों में देख चुके हैं, न तो परमेश्वर का कोई धर्म है, न परमेश्वर ने कभी कोई धर्म बनाया, और न ही प्रभु यीशु मसीह ने कभी अपने शिष्यों से उनके नाम पर कोई धर्म प्रतिपादित एवं स्थापित करने, किसी धर्म का प्रचार करने, या लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कभी कोई शिक्षा अथवा निर्देश दिया। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को संसार में इसी निर्देश के साथ भेजा कि वे सारे संसार में जाकर लोगों को इस उद्धार के सुसमाचार के बारे में बताएं, और उन्हें प्रभु यीशु मसीह के शिष्य बनाएंयीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं” (मत्ती 28:18-20)। साथ ही हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर ने संसार के सभी मनुष्यों के लिए जो पापों की क्षमा, उद्धार, और नया जन्म प्राप्त करने का प्रावधान किया है, वह न तो किसी धर्म के अंतर्गत किया, न उसे किसी धर्म विशेष से जोड़ा, और न ही उस समाधान में किसी धार्मिक रीति-रिवाज़ अथवा अनुष्ठान के निर्वाह की कोई भी भूमिका अथवा महत्व है, और न ही यह किन्हीं कार्यों अथवा कर्मों के द्वारा संपन्न अथवा लागू होता है। परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह निवारण पूर्णतः परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह पर स्वेच्छा तथा पूरे मन से किए गए विश्वास ही पर आधारित है, और बिना किसी भी अन्य मनुष्य के इसमें सम्मिलित हुए अथवा मध्यस्थ हुए, केवल अपने पापों से पश्चाताप करने वाले मनुष्य और प्रभु यीशु मसीह के मध्य संबंध से है। यह सभी के लिए समान रीति से मुफ़्त में उपलब्ध है, वे चाहे किसी भी देश, धर्म, जाति, सामाजिक स्थान और स्तर, समृद्धि, शिक्षा, रंग, लिंग, आदि के क्यों न हो। साथ ही, परमेश्वर का यह प्रावधान वंशागत नहीं है; प्रत्येक मनुष्य को समझ-बूझकर अपने जीवन में इसे कार्यान्वित करने के लिए आप ही इसके विषय निर्णय लेना होता है, तब ही यह उसके जीवन में लागू हो सकता है। इस प्रावधान को उपलब्ध परमेश्वर ने करवाया है, स्वीकार करना अथवा अस्वीकार करना, यह प्रत्येक मनुष्य का अपना निर्णय है।

इसीलिए, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना, और उसके साथ संबंध स्थापित कर के उस संबंध का निर्वाह करना, मसीही विश्वास कहलाता है, कोई धर्म नहीं। इस मसीही विश्वास को बिगाड़ कर इसेईसाई धर्मका नाम और रूप देना न तो परमेश्वर की ओर से है, न परमेश्वर ने करवाया, और न परमेश्वर को स्वीकार्य है। बाइबल के अनुसार व्यक्ति चाहे ईसाई धर्म को माने, या किसी अन्य धर्म को, किन्तु जब तक वह नया जन्म लेकर मसीही विश्वासी नहीं बन जाता है, प्रभु यीशु के साथ एक व्यक्तिगत संबंध स्थापित करके प्रभु यीशु का शिष्य नहीं हो जाता है, तब तक वह अपने पापों में ही रहता है; और जो बिना पापों की क्षमा प्राप्त किए मरेगा, उसे फिर उन पापों के दण्ड को भोगना होगा, परमेश्वर से दूर नरक में जाना होगा, चाहे वह ईसाई धर्म का मानने वाला और ईसाई धर्म के रीति-रिवाजों, त्यौहारों, अनुष्ठानों का कितनी भी निष्ठा के साथ पालन क्यों न करता रहा हो।  

हम कल बाइबल में प्रथम चर्च या कलीसिया, अर्थात आरंभिक मसीही विश्वासियों के समूह या मंडली की गतिविधियों के लेख - नए नियम में प्रेरितों के काम नामक पुस्तक में से मसीही विश्वास को कुछ और विस्तार से देखेंगे और समझेंगे। आप यदि अभी भी अपने धर्म, धार्मिकता, भले कार्यों और नेक कर्मों, आदि के द्वारा परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह से उद्धार और पापों की क्षमा के भ्रम में पड़े हुए हैं, तो मेरा आप से विनम्र निवेदन है कि परमेश्वर के वचन से इन बातों से संबंधित तथ्यों का अध्ययन कीजिए, और सही निर्णय कर लीजिए। आप पाप और उद्धार से संबंधित पहले के लेखों का अवलोकन करने के द्वारा भी इस विषय का अध्ययन कर सकते हैं। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपनी ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

बाइबल पाठ: इफिसियों 2:1-9 

इफिसियों 2:1 और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।

इफिसियों 2:2 जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।

इफिसियों 2:3 इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की मनसाएं पूरी करते थे, और और लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।

इफिसियों 2:4 परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उसने हम से प्रेम किया।

इफिसियों 2:5 जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।)

इफिसियों 2:6 और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।

इफिसियों 2:7 कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।

इफिसियों 2:8 क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।

इफिसियों 2:9 और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

·        यशायाह 11-13 

·        इफिसियों