ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 11


मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - यूहन्ना 16:8.

हम देख चुके हैं कि मसीही सेवकाई के निर्वाह के लिए मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति कितनी आवश्यक है, सहायक के रूप में पवित्र आत्मा की भूमिका मसीही सेवकाई के लिए अनिवार्य है, और बिना उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति के कोई यीशु को प्रभु भी नहीं कह सकता है (1 कुरिन्थियों 12:3)। इसीलिए स्वयं प्रभु परमेश्वर अपने प्रत्येक सच्चे विश्वासी, अपने प्रत्येक वास्तविक शिष्य को स्वतः ही, उसके उद्धार पाने के साथ ही तुरंत ही पवित्र आत्मा भी प्रदान कर देता है। प्रभु के किसी भी वास्तविक शिष्य को पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए न तो किसी मनुष्य की किसी सहायता की आवश्यकता है, और न ही वह मनुष्यों के द्वारा बताई अथवा बनाई गई किसी विधि या अनुष्ठान आदि के द्वारा पवित्र आत्मा को प्राप्त कर सकता है। 

किन्तु साथ ही प्रत्येक जन, विश्वासी अथवा अविश्वासी, को यह भी समझ लेना चाहिए कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है। वह हमारा सहायक अवश्य है, किन्तु न हमारा सेवक है, न हमारे हाथों की कठपुतली है जिसके साथ और जिसके नाम में मनुष्य अपनी इच्छा और समझ के अनुसार कुछ भी कहते और करते रहें। परमेश्वर पवित्र आत्मा को भी हमें वही आदर और श्रद्धा प्रदान करनी है जो पिता परमेश्वर को, प्रभु यीशु को, और उनके नाम के प्रयोग को देते हैं। हमें पवित्र आत्मा के नाम से अपनी समझ और इच्छा के अनुसार कुछ भी, कैसा भी बर्ताव, बात, और व्यवहार करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई है। जैसा व्यवहार परमेश्वर पिता तथा परमेश्वर पुत्र के प्रति आवश्यक एवं उचित है, बिलकुल वैसा ही परमेश्वर पवित्र आत्मा के लिए भी है। इसलिए वचन में कही गई और पहले से लिखवा दी गई बातों के अतिरिक्त परमेश्वर या पवित्र आत्मा के नाम से अन्य जो कुछ भी किया, बताया, और सिखाया जाता है, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है; वह सब मनुष्य द्वारा वचन में जोड़ना है - जो परमेश्वर द्वारा वर्जित किया गया है। वचन के बाहर की बातों को परमेश्वर पवित्र आत्मा पर थोप कर उनके नाम में विचित्र हाव-भाव एवं अनुचित व्यवहार करना और सिखाना, लोगों को ऐसी शिक्षाएं देना जिनका वचन में कोई समर्थन, उल्लेख, या उदाहरण नहीं है, वह सब परमेश्वर के वचन और बातों में मिलावट करना है, अस्वीकार्य है, दण्डनीय है।

व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित बातों को अपने शिष्यों को बताने के बाद, प्रभु यीशु ने उनकी सुसमाचार प्रचार और मसीही सेवकाई से संबंधित बातों में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को बताना आरंभ किया। इस सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित जो पहली शिक्षा प्रभु ने शिष्यों को दी, वह है, “और वह आकर संसार को पाप और धामिर्कता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा” (यूहन्ना 16:8) प्रभु के इस कथन को समझने के लिए प्रभु द्वारा यूहन्ना 14 अध्याय में प्रभु द्वारा कही गई इस बात को ध्यान रखना अति आवश्यक है, कि परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मसीही विश्वासियों में होकर ही अपनी सामर्थ्य को प्रकट करना था, उनमें होकर ही संसार के समक्ष कार्य करना था। क्योंकि प्रभु के इस कथन में यह निहित है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में होकर इस कार्य को करेगा; इसलिए यह स्वाभाविक निष्कर्ष है कि जो भी मसीही संसार से यूहन्ना 16:8 की बातों के बारे में बात करे, परमेश्वर के नाम से लोगों के सामने इन बातों का प्रचार करे, तो उसका अपना जीवन भी पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय में परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुरूप हो। अन्यथा उस मसीही का प्रचार और गवाही झूठी ठहरेगी, अप्रभावी होगी, उसके अपने तथा साथ ही परमेश्वर के भी उपहास और निन्दा का कारण ठहरेगी। यह बात एक बार फिर मसीही विश्वासी के जीवन में पहले पवित्र आत्मा की भूमिका और कार्य (यूहन्ना 14) द्वारा उचित सुधार और सही व्यवहार कर लेने, और तब सार्वजनिक सेवकाई (यूहन्ना 16) का निर्वाह करने की अनिवार्यता पर बल देता है, उसके महत्व को प्रमुख करता है।

आज मसीही विश्वास के प्रति लोगों के अविश्वास, लोगों की आलोचना, और संसार द्वारा मसीहियों से दुर्व्यवहार का एक बहुत बड़ा कारण मसीही या ईसाई कहलाने वाले लोगों के जीवनों में व्याप्त यही दोगलापन - उनके प्रचार और व्यक्तिगत व्यवहार में विद्यमान एवं सर्व-विदित भिन्नता है। वे संसार से जिस बात, बर्ताव, और व्यवहार का निर्वाह करने का प्रचार करते हैं, वह उनके अपने जीवनों में लोगों को दिखाई नहीं देता है। पवित्र आत्मा की जिस जीवन और मन बदलने वाली सामर्थ्य के बारे में लोगों को बताकर उन्हें प्रभु यीशु की ओर आने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं, व्यक्ति के विचार और व्यवहार बदलने वाली वह सामर्थ्य उनके स्वयं के जीवन में लोगों को दिखाई नहीं देती है। आज संसार के लोगों को मसीही या विश्वासी कहलाए जाने वाले बहुत से लोगों में पवित्र आत्मा के नाम से बहुत शोर-शराबा, उछल-कूद, विचित्र व्यवहार और शारीरिक क्रियाएं तथा हाव-भाव, शारीरिक चंगाइयों के दावे आदि तो दिखते हैं; किन्तु सांसारिकता और संसार की बातों तथा वस्तुओं के मोह को त्याग कर प्रभु की आज्ञाकारिता में जिया जाने वाला विनम्र, प्रेमपूर्ण, आत्मा के फलों से भरा व्यावहारिक जीवन दिखाई नहीं देता है। वरन, विडंबना तो यह है कि लोगों ने पवित्र आत्मा के नाम और काम को व्यक्तिगत कमाई का साधन बना लिया है; पवित्र आत्मा के नाम पर सांसारिक धन-संपत्ति, ज़मीन-जायदाद, विलासिता की बातों से भरे महल बना लिए हैं। फिर भी लोग ऐसे भ्रामक प्रचारकों के पीछे भागते हैं, उनकी बातों को बिना जाँचे-परखे ऐसे स्वीकार करते हैं, मानों स्वयं परमेश्वर बोल रहा हो। यदि उन ढोंगी प्रचारकों के ढोंग को लोगों के सामने लाने के प्रयास किए जाएं, तो प्रतिक्रिया अपमान और क्रोध होता है यद्यपि उन प्रचारकों के जीवनों और कार्यों में वचन से संगत और उचित कुछ भी देख पाना लगभग असंभव होता है; और उनके प्रचार में वचन की बातों को संदर्भ से बाहर लेकर, तोड़-मरोड़ कर, उनकी अपनी ही धारणाओं के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है। उनकी शिक्षाएं पापों की क्षमा, उद्धार, और आत्मिक उत्थान की बजाए भौतिक लाभ, शारीरिक बातों, सांसारिक उपलब्धियों आदि की प्राप्ति से संबंधित होती हैं; फिर भी लोग अंधे और निर्बुद्धि होकर प्रभु और उसके वचन का नहीं परंतु उन सांसारिक प्रचारकों का और उनकी गलत शिक्षाओं का बड़ी लगन और आदर के साथ अनुसरण करते हैं। 

प्रभु ने कहा कि परमेश्वर पवित्र आत्मा आकर संसार कोनिरुत्तरकरेगा। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का हिन्दी अनुवादनिरुत्तरकिया गया, मूल भाषा का उसका अर्थ हैडाँट लगाएगा”, याउलाहना देगा; और अँग्रेज़ी में इस शब्द का अनुवाद convict अर्थात दोषी ठहराना किया गया है, जो मूल यूनानी भाषा के अर्थ के साथ अधिक मेल रखता है। जिन बातों के विषय वह ऐसा करेगा, उनके बारे में आगे पद 8 से 11 में और विस्तार से लिखा गया है, और उन्हें हम उन पदों के अध्ययन के साथ ही देखेंगे। किन्तु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में निवास एवं उनमें होकर कार्य करने के द्वारामसीही विश्वासियों के जीवन, व्यवहार और बर्ताव, उनके जीवन में आए परिवर्तनों के द्वारा संसार के लोगों को उनके जीवन, उनके व्यवहार और बर्ताव, उनके अपरिवर्तित जीवनों के लिए दोषी ठहराएगा। 

यदि आप सच में मसीही विश्वासी हैं, वास्तविकता में प्रभु यीशु मसीह के शिष्य हैं, तो क्या आप में निवास करने वाला पवित्र आत्मा, आपके व्यवहार, बर्ताव, और बदले हुए जीवन के द्वारा, संसार के लोगों को उनके जीवन और व्यवहार के लिए दोषी ठहराता है? क्या आपके जीवन के साथ अपने जीवन की तुलना करने पर वे परमेश्वर की बातों और कार्यों को आपके जीवन में विद्यमान, और अपने जीवन से अनुपस्थित देखने या समझने पाते हैं? क्या आपकी उपस्थिति में लोग छिछोरी बातें और भद्दे मज़ाक करने, सांसारिकता की व्यर्थ बातें करने से हिचकिचाते हैं? या फिर संसार के लोग आप में भी वही बातें, विचार, व्यवहार, और बर्ताव देखते हैं जो उनमें विद्यमान है? क्या आपके मसीही विश्वासी होने के नाते, परमेश्वर पवित्र आत्मा आप में होकर यूहन्ना 16:8 की बात को पूरा करने पाता है? यदि नहीं, तो मसीही सेवकाई में हाथ डालने से पहले, अभी आप को पहले अपने आप में वह आवश्यक परिवर्तन करने और व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने वाले कार्य दिखाने अनिवार्य हैं, जो पवित्र आत्मा को आप में होकर संसार के समक्ष सार्वजनिक मसीही सेवकाई के कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 50 
  • इब्रानियों 8

बुधवार, 10 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 10

     

मसीही जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति - यूहन्ना 16:7.

मसीही सेवकाई के लिए मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को हमने पिछले लेखों में देखा है, कि वह कैसे प्रभु के शिष्य को उसकी सेवकाई के लिए सिखाता है, तैयार करता है, प्रभु की बातें स्मरण करवाता है, और उसे सुरक्षा प्रदान करता है। शिष्य तब ही संसार का औरसंसार के सरदार’, अर्थात शैतान, उसकी युक्तियों, उसके दूतों का सामना कर सकता है, मसीही सेवकाई में प्रभावी हो सकता है, जब वह स्वयं इस कार्य के लिए तैयार हो गया हो - और उसकी यह तैयारी उसे केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवा कर देता है। उस शिष्य की अपनी कोई योग्यता, कोई गुण, कोई शिक्षा, कोई प्रशिक्षण, कोई अनुभव, आदि तब तक किसी उपयोगिता का नहीं है, जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा उसके जीवन में कार्य करके उसे अपनी रीति से सक्षम न कर दे; तब ही उस शिष्य के अन्य कोई भी गुण, योग्यता, शिक्षा, प्रशिक्षण, और अनुभव आदि प्रभु के लिए उपयोगी और प्रभावी किए जा सकते हैं - जैसा हम पौलुस के जीवन से देखते हैं। परमेश्वर के वचन की बातों में सर्वोत्तम गुरु, गमलिएल, से वचन की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त करने, और फरीसी होने के लिए प्रशिक्षित किए जाने के बाद भी, वह प्रभु परमेश्वर के लिए उपयोगी नहीं था, वरन प्रभु के कार्य का विरोधी और नाशक था। किन्तु प्रभु यीशु में विश्वास लाने के बाद ही उसका वह सब प्रशिक्षण, अध्ययन, अनुभव, आदि पवित्र आत्मा के द्वारा प्रभु के लिए उपयोगी बनाया जा सका। प्रभु यीशु की वास्तविकता को समझने के बाद वह अपने पहले के सभी ज्ञान, समझ, प्रशिक्षण, अनुभव, कार्य आदि कोकूड़ाकहता है, और उसकी लालसा वचन के मानवीय ज्ञान में नहीं, वरन प्रभु यीशु मसीह की मृत्युंजय की सामर्थ्य को जानने और उसमें बढ़ने की हो जाती है (फिलिप्पियों 3:4-11)। इसी प्रकार से मूसा को भी मिस्र से मिला वहाँ का सर्वोत्तम मानवीय ज्ञान-बुद्धि-सामर्थ्य और योग्यता इस्राएलियों का कुछ भला करने के लिए उसके किसी काम नहीं आए। उसे वह सब छोड़ कर भागना पड़ा। जब वह जंगल में मूक और मूर्ख भेड़ों की देखभाल करते रहने से परमेश्वर के द्वारा प्रशिक्षित कर लिया गया, तब ही परमेश्वर ने उसे अपने लोगों की चरवाही करने के लिए सक्षम करके वापस मिस्र में भेजा, और उसमें होकर अभूतपूर्व कार्य किए, संसार के लोगों के लिए अपने वचन तथा व्यवस्था को दिया।

व्यक्तिगत रीति से तैयार करने के बाद, अब यूहन्ना 16 अध्याय में सार्वजनिक मसीही सेवकाई से संबंधित बातें प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों के सामने रखीं। इन बातों का आरंभ यूहन्ना 16:7 “तौभी मैं तुम से सच कहता हूं, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा, परन्तु यदि मैं जाऊंगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगासे होता है, जहाँ फिर यूहन्ना 13 अध्याय से आरंभ हुए इस वार्तालाप में चौथी बार प्रभु शिष्यों से कहता है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा उनके पास और उनमें रहने के लिए प्रभु के भेजे जाने के द्वारा ही आएगा; अर्थात प्रभु के शिष्यों के लिए प्रभु परमेश्वर के अतिरिक्त परमेश्वर पवित्र आत्मा को उपलब्ध करवाने का और कोई तरीका नहीं है। पवित्र आत्मा परमेश्वर है, और सार्वभौमिक, सर्वसामर्थी, सर्वज्ञानी, सृजनहार है; वह मनुष्य के वश या अधीनता में नहीं है कि मनुष्य के कहे के अनुसार कार्य और व्यवहार करे। प्रभु ने अपने महान अनुग्रह और प्रेम में होकर अपने शिष्यों की सहायता के लिए उसे अवश्य प्रदान किया है, किन्तु उसे शिष्यों का सेवक या दास नहीं बना दिया है कि वे अपनी ही इच्छा और समझ के अनुसार उससे, और उसके नाम में लोगों से कुछ भी उलटा-सीधा कार्य तथा व्यवहार करें। जिस दिन प्रभु हिसाब लेगा, उस दिन पवित्र आत्मा के नाम से किया जाने वाला यह सब बाइबल के वचनों से बाहर का व्यर्थ का और अनुचित व्यवहार, ऐसा करने और सिखाने वालों के लिए बहुत भारी पड़ेगा (मत्ती 12:36-37), किन्तु तब उनके पास बचने का कोई मार्ग नहीं होगा। उन्हें अपने द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा के प्रति किए गए अपमानजनक व्यवहार और व्यर्थ बातों के लिए दण्ड भोगना ही होगा।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, आपने अपने पापों से वास्तविक पश्चाताप करके प्रभु यीशु से उनके लिए सच्चे मन से क्षमा माँगी है, अपना जीवन प्रभु को समर्पित किया है, प्रभु की आज्ञाकारिता में जीवन जीने का निर्णय किया है, तो यह ध्यान रखिए कि आप अपने इस निर्णय के उचित और सही निर्वाह के लिए प्रभु के प्रति व्यक्तिगत रीति से उत्तरदायी हैं। और मसीही विश्वासी होने के नाते आप से भी स्वर्ग में आपके अनन्तकालीन प्रतिफल निर्धारित करने के लिए आपके व्यवहार, कार्य और बातों का सारा हिसाब अवश्य ही लिया जाएगा (1 कुरिन्थियों 3:13-15; 2 कुरिन्थियों 5:10; 1 पतरस 4:17)। उस समय आप अपने अनुचित, वचन की शिक्षाओं से अलग, वचन के उदाहरणों और बातों से भिन्न व्यवहार के लिए किसी अन्य मनुष्य, या मानवीय मत-समुदायों-डिनॉमिनेशंस के नियमों और रीतियों आदि पर बात नहीं टाल सकेंगे। परमेश्वर का वचन बाइबल आपके हाथ में होते हुए भी, और उसे सिखाने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा आपके साथ होते हुए भी, तथा परमेश्वर द्वारा अन्य विभिन्न साधन उपलब्ध करवाए जाने के बावजूद, क्यों आपने मनुष्यों की शिक्षाओं, व्यवहारों, बातों को वचन की शिक्षाओं और उदाहरणों से बढ़कर महत्व दिया - इसका उत्तर आप ही को देना होगा। प्रभु ने आपके लिए सब कुछ करके दिया है, उसके द्वारा दिए गए इन अद्भुत प्रयोजनों का सदुपयोग करना तो आपके हाथों में है। उसने आपके लिए उत्तम भोज सजा कर दिया है, सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है; फिर भी यदि आप व्यर्थ और हानिकारक भोजन खाकर हानि उठाएं, तो प्रभु को तो उसके लिए दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 48-49 
  • इब्रानियों 7

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 9

       

मसीही जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति - यूहन्ना 15:26; 16:7 

मसीही सेवकाई और मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका की बातों से संबंधित हमारे इस अध्ययन में अभी तक हमने देखा और सीखा है कि किस प्रकार परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी के जीवन कार्य करता है जिससे उसे उस सेवकाई के लिए जो परमेश्वर ने उसके लिए निर्धारित की है (इफिसियों 2:10) तैयार करे तथा प्रभावी बनाए। इस संदर्भ में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी को प्रभु यीशु मसीह की बातों को स्मरण करवाता है, सिखाता है, और उसे वह सुरक्षा तथा सहायता प्रदान करता है जिसकी सहायता से प्रभु का विश्वासी और उपयोगी जनसंसार का सरदार” (यूहन्ना 14:30), अर्थात शैतान का सामना कर सके। 

यूहन्ना रचित सुसमाचार के अध्याय 13 से 17 तक प्रभु यीशु मसीह के पकड़वाए जाने से ठीक पहले, फसह के पर्व का भोज खाते समय, अपने शिष्यों से किया गया अंतिम वार्तालाप है। प्रभु इस वार्तालाप और इसमें दी गई शिक्षाओं के द्वारा उन्हें आते समयों और परिस्थितियों के लिए तैयार कर रहा था। इसी वार्तालाप के दौरान प्रभु अपने शिष्यों से उन्हें आते समय में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त होने की बात समझाता है, जिसके बारे में 14 और 16 अध्याय में लिखा है। इन अध्यायों का अध्ययन करते समय, शिष्यों द्वारा पवित्र आत्मा प्राप्त करने से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आता है - अध्याय 14-16 में, चार बार लिखा गया है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा केवल प्रभु परमेश्वर की ओर से तथा उसके द्वारा ही, और प्रभु के शिष्यों को ही प्रदान किया जाता है (14:16-17, 26; 15:26; 16:7)। प्रभु क्यों शिष्यों से बारंबार यह बात कह रहा था? यह एक सामान्य व्यवहार और समझ की बात है कि यदि कोई शिक्षक अथवा अगुवा किसी एक ही बात को बारंबार दोहराए, बल देकर विभिन्न प्रकार से कहे, तो तात्पर्य यही है कि वह बात महत्वपूर्ण है, ध्यान रखने योग्य है, उसकी उपयोगिता है, और उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आज के अध्ययन के दोनों पदों को देखिए:

  • यूहन्ना 15:26 “परन्तु जब वह सहायक आएगा, जिसे मैं तुम्हारे पास पिता की ओर से भेजूंगा, अर्थात सत्य का आत्मा जो पिता की ओर से निकलता है, तो वह मेरी गवाही देगा
  • यूहन्ना 16:7 “तौभी मैं तुम से सच कहता हूं, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा, परन्तु यदि मैं जाऊंगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा

 

प्रभु ने उस समय के मौखिक वार्तालाप में तो पवित्र आत्मा को भेजने की बात दोहराई ही, साथ ही जब इस सुसमाचार को भावी विश्व-व्यापी मसीही विश्वासियों के लिए लिखा गया, तो उसमें भी लिखवा दिया; अर्थात, यह बात सारे संसार के सभी स्थानों और समयों के उन सभी विश्वासियों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी कि तब प्रभु के साथ उपस्थित उन शिष्यों के लिए थी। प्रभु ने संसार के सभी मसीही विश्वासियों से, वे चाहे किसी भी समय या स्थान के क्यों न हों, इस बात को बल देकर कहा है, जिससे कि वे कभी भी भरमाए न जाएं, गलत शिक्षा में न पड़ जाएं, वचन के सत्य से बहकाए न जाएं (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15)। आज सारे संसार भर में ऐसे मत, समुदायों, और डिनॉमिनेशंस का बोल-बाला है जो परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से और उन से संबंधित बहुत सी गलत शिक्षाएं लोगों को सिखाने में लगे हुए हैं। वे बाइबल के पदों, वाक्यांशों, शब्दों, और बातों को उनके संदर्भ से बाहर लेकर, उन्हें अपनी धारणाओं के अनुसार तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं, उनपर अपनी उन्हीं गलत धारणाओं से संबंधित अर्थ बैठाते हैं। ऐसे लोगों की गलत शिक्षाओं में एक प्रमुख शिक्षा मसीह यीशु पर विश्वास करने के बाद, अलग से पवित्र आत्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न करने के संबंध में होती है। वे लोगों के मनों में यह गलत शिक्षा बैठा देने के प्रयास करते हैं कि मनुष्य अपनी युक्तियों, विधियों, और प्रयासों से, या किसी व्यक्ति विशेष अथवा उनके मत के लोगों या उनके अगुवे द्वारा दिखाए और बताए गए निर्देशों का पालन करने से पवित्र आत्मा प्राप्त कर सकता है। और साथ ही वे मरकुस 16:18 का दुरुपयोग करते हुए बल देकर एक और गलत शिक्षा भी जोड़ देते हैं कि पवित्र आत्मा मिलने का प्रमाणअन्य भाषाएं बोलनातथा आश्चर्यकर्म करना है।

 ये लोग अपनी धारणाओं को बहुत बल देकर प्रस्तुत करते हैं। वे बहुत शोर-शराबे तथा विचित्र शारीरिक हाव-भाव और क्रियाओं के साथ अपनी बातों को यह कहकर प्रस्तुत करते हैं कि उनका यह शोर-शराबा, विचित्र शारीरिक क्रियाएं और हाव-भाव पवित्र आत्मा पा लेने और उनमें पवित्र आत्मा की सामर्थ्य विद्यमान होने के प्रमाण हैं। किन्तु उपरोक्त यूहन्ना 15:26 में देखिए, प्रभु यीशु मसीह ने पवित्र आत्मा के प्रभु के शिष्यों में आने के विषय क्या कहा, क्या प्रमाण दिया -वह मेरी गवाही देगा”; अर्थात शिष्य में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति, उस शिष्य के जीवन में प्रभु यीशु मसीह की गवाही विद्यमान होने से प्रमाणित होगी, न कि बाइबल से बाहर की बातों के द्वारा! वह शिष्य मसीह के समान जीना आरंभ कर देगा, प्रभु का गवाह होकर कार्य करने लगेगा, प्रभु यीशु की आज्ञाकारिता में किसी मनुष्य-मत-समुदाय-डिनॉमिनेशन को नहीं वरन परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन व्यतीत करेगा (1 कुरिन्थियों 11:1; 1 थिस्सलुनीकियों 4:1-2, 11)। शिष्यों को पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त होने से संबंधित प्रभु यीशु की शिक्षाओं के इन चारों हवालों में (यूहन्ना 14:16-17, 26; 15:26; 16:7) प्रभु ने अपने शिष्यों से ऐसी कोई बात नहीं कही जैसी ये पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले बताते और सिखाते हैं। वरन प्रभु यीशु ने आते समय की इन गलत शिक्षाओं से सचेत रहने के लिए ही पहले से ही अपने शिष्यों को समझा दिया, उनके लिए लिखवा दिया कि परमेश्वर पवित्र आत्मा किसी मनुष्य के तरीकों से नहीं, केवल और केवल प्रभु परमेश्वर की ओर से ही मिलता है, और प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी में, उसके उद्धार पाते ही तुरंत ही आकर निवास करने लगता है, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं (लिंक: उद्धार के साथ पवित्र आत्मा की प्राप्ति)। जिसका वास्तव में उद्धार नहीं हुआ है, उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा भी निवास नहीं करेगा, वह व्यक्ति चाहे जितने प्रयास, प्रार्थना, उपवास, आदि क्यों न कर ले। व्यक्ति में पवित्र आत्मा की उपस्थिति, उस व्यक्ति के प्रभु यीशु द्वारा ही उद्धार के सुसमाचार का गवाह होने से, प्रभु यीशु मसीह की गवाही रखने (यूहन्ना 15:26) और उस व्यक्ति के द्वारा शरीर की लालसाओं को त्याग कर जीवन में पवित्र आत्मा के फल दर्शाने (गलातीयों 5:22-24) के द्वारा प्रमाणित होती है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो ध्यान रखिए कि परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी का सहायक है, और केवल प्रभु यीशु मसीह तथा पिता परमेश्वर की ओर से आता है। वह मनुष्य के हाथ की कठपुतली नहीं है जिसे मनुष्य अपने प्रयासों और मन के अनुसार लेता-देता रहे, एक-दूसरे पर उतारता रहे, किसी पर उतर आने के लिए बाध्य करता रहे, और फिर उस से कुछ-कुछ तमाशे करवाता रहे। ऐसी भावना रखने वाले लोग शमौन जादूगर, जिसको दुष्टता से भरा हुआ कहा गया है, के समान हैं क्योंकि वह परमेश्वर पवित्र आत्मा को अपने वश में रखकर अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग करना चाहता था (प्रेरितों 8:18-23)। ऐसे लोगों और उनकी भ्रामक शिक्षाओं से बचकर रहिए; उनके बहकावे में न पड़िए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 46-47 
  • इब्रानियों 6

सोमवार, 8 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 8


व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (4) - यूहन्ना 14:30

 हम पिछले लेखों में देखते आ रहे हैं कि एक मसीही विश्वासी के मसीही सेवकाई के जीवन में उसे व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर पवित्र आत्मा किस प्रकार सहायता एवं मार्गदर्शन प्रदान करता है। पिछले लेख में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा अपनी ओर से कभी कुछ नया नहीं कहता है; वह मसीहियों को मसीह यीशु के वचन, प्रभु की शिक्षाएं स्मरण करवाता है, और सेवकाई तथा मसीही जीवन से संबंधित सभी बातें सिखाता है। सीखने में व्यक्ति के परिश्रम, प्रयास, और पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता की आवश्यकता होती है। पवित्र आत्मा ने पतरस प्रेरित के द्वारा 2 पतरस 1:3-4 में लिखवाया है कि जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें, प्रभु यीशु मसीह की पहचान में होकर हमें उपलब्ध करवा दी गई हैं; तथा साथ ही इस संसार की सड़ाहट से बचने और ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने का मार्ग भी दे दिया गया है। अर्थात पहली कलीसिया के उस युग में, जब परमेश्वर पवित्र आत्मा के अगुवाई में प्रेरित और प्रभु के जन उन पत्रियों की रचना कर रहे थे, जिन्हें संकलित करके नए नियम के रूप में बाइबल में रखा जाना था, उसी समय मसीही विश्वासी के लिए मसीही जीवन और सेवकाई से संबंधित जो कुछ भी आवश्यक था, वह उन्हें दे दिया गया था, लिखवा दिया गया था, और अब नए नियम के रूप में हमारे हाथों में विद्यमान है। तात्पर्य यह कि परमेश्वर का वचन आरंभिक कलीसिया के समय से ही पूर्ण हो चुका है, उसमें और कुछ जोड़ने, कुछ नया बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसा करना परमेश्वर के वचन की अनाज्ञाकारिता है, परमेश्वर द्वारा दण्डनीय है (व्यवस्थाविवरण 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। परमेश्वर को स्वीकार्य और उसे प्रसन्न करने वाला जीवन जीने के लिए मानवजाति के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह सब परमेश्वर पवित्र आत्मा ने लिखवा दिया है, उपलब्ध करवा दिया है। 

इसलिए आज के उननएदर्शनों, भविष्यवाणियों, शिक्षाओं, चमत्कारिक बातों, आदि का कोई औचित्य अथवा आवश्यकता नहीं है; और न ही परमेश्वर के वचन बाइबल से उनके लिए कोई समर्थन है, जिन्हेंपवित्र आत्मा की ओर सेप्राप्त करने का दावा आज बहुत से मत और समुदाय, या डिनॉमिनेशन के अनुयायी करते हैं, जिनके बारे में औरों को भी सिखाते हैं, तथा औरों को भी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यदि पवित्र आत्मा से संबंधित बाइबल की शिक्षाएं, प्रभु यीशु की कही बातें सही हैं, तो इन लोगों के ऐसे सभी दावे बेबुनियाद हैं, व्यर्थ हैं, झूठे हैं, और उनमें पड़ने या उन्हें स्वीकार करने का कोई आधार नहीं है। परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, वह न तो कभी झूठ कहेगा या करेगा, न झूठ बुलवाएगा या करवाएगा। वह वही कहेगा और करेगा जो परमेश्वर के वचन में उसने अपने विषय पहले ही लिखवा कर रखा है। इसलिए इन भ्रामक और वचन के विपरीत शिक्षाओं से बच कर रहें, उन्हें स्वीकार न करें। ऐसी सभी लुभावनी, चमत्कारिक, आकर्षक, किन्तु वचन से असंगत बातें परमेश्वर की ओर से कदापि नहीं हैं, और उनके निर्वाह से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता है। ऐसी बातों के संदर्भ में मत्ती 7:21-23 तथा 2 थिस्सलुनीकियों 2:9 को सदा स्मरण रखें और 1 थिस्सलुनीकियों 5:21 के अनुसार सभी शिक्षाओं को बारीकी से जाँच-परख कर ही स्वीकार करें। 

प्रभु ने यूहन्ना 14:30 में शिष्यों को इसी खतरे से सचेत किया, जब उन्होंने शिष्यों से कहा, “मैं अब से तुम्हारे साथ और बहुत बातें न करूंगा, क्योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं। प्रभु जानता था कि शिष्यों द्वारा मसीही सेवकाई पर निकलते ही, उनके द्वारा सुसमाचार प्रचार आरंभ होते ही, 'संसार का सरदार' अर्थात शैतान उन पर टूट कर पड़ने वाला था। और यूहन्ना ने अपनी पहली ही पत्री में अपने पाठकों को लिखा, “हे लड़कों, यह अन्तिम समय है, और जैसा तुम ने सुना है, कि मसीह का विरोधी आने वाला है, उसके अनुसार अब भी बहुत से मसीह के विरोधी उठे हैं; इस से हम जानते हैं, कि यह अन्तिम समय है” (1 यूहन्ना 2:18)। उस मसीह विरोधी का सामना करने और उसकी युक्तियों पर शिष्यों को जयवंत रखने के लिए (2 कुरिन्थियों 2:11), प्रभु ने शिष्यों के लिए उनमें व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर पवित्र आत्मा के सर्वदा निवास करते रहने का यह अद्भुत और अभूतपूर्व इंतजाम कर के दिया था कि वे कभी अकेले, निःसहाय न हों; भरमाए या भटकाए न जाएं, वरन हमेशा ईश्वरीय सामर्थ्य के द्वारा सुरक्षित रह सकें। किन्तु यह तब ही संभव है जब हम पवित्र आत्मा द्वारा कहे के अनुसार करें (गलातीयों 5:16-18, 25)। किन्तु यदि हम परमेश्वर द्वारा हमारे लिए निर्धारित की गई सीमाओं के बाहर जाएंगे, तो उसकी सुरक्षा के बाड़े के बाहर आ जाएंगे, और तब शैतान हमें डस लेगा, हमें मुसीबतों में डाल देगा (अय्यूब 1:10; सभोपदेशक 10:8) 

इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर के वचन, को जानने और मानने में अपना समय और ध्यान लगाइए; अपनी मन-मर्जी और पसंद के अनुसार नहीं, अपितु उसकी आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करें। प्रत्येक मसीही विश्वासी को व्यक्तिगत रीति से पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिए जाने का उद्देश्य यही है कि वह शैतान की युक्तियों को समझे, उनके प्रति सचेत रहे, और परमेश्वर के वचन को सीख समझ कर अपनी मसीही सेवकाई के लिए सक्षम, तत्पर, और तैयार हो जाए, उस सेवकाई में लग जाए।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 43-45
  • इब्रानियों 5

रविवार, 7 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 7

  

व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (3) - यूहन्ना 14:26

हम प्रभु यीशु मसीह के सच्चे, आज्ञाकारी, और समर्पित शिष्य द्वारा उसकी मसीही सेवकाई में सहायता और मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं, जो कि प्रत्येक मसीही विश्वासी में, उसके उद्धार पाते ही, तुरंत ही आकर निवास करने लगता है। हमने देखा है कि पवित्र आत्मा की यह भूमिका दो प्रकार की है, विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में, जो यूहन्ना 14 अध्याय में दी गई है; और उसकी सेवकाई के जीवन में, जो यूहन्ना 16 अध्याय में दी गई है। हम व्यक्तिगत जीवन में भूमिका को यूहन्ना 14:16-17 पदों से देख चुके हैं कि एक बार विश्वासी में आ जाने के बाद वह सर्वदा मसीही विश्वासियों के साथ आजीवन बना रहता है, मसीही जीवन के निर्वाह के लिए उनका सहायक होता है, सेवक नहीं। उसे किसी मनुष्य के प्रयास, विधियों, अथवा युक्तियों द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है, वरन परमेश्वर द्वारा स्वेच्छा से प्रदान किया जाता है। परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, कोई भी सांसारिक व्यक्ति, वह चाहे कितना भी “धर्मी” क्यों न हो, उसे ग्रहण नहीं कर सकता है; वह केवल वास्तविक मसीही विश्वासियों में ही रहता है। आज हम मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर का वचन सीखने से संबंधित परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को देखेंगे। 


प्रभु यीशु मसीह ने फसह के पर्व के भोज के समय में अपने शिष्यों से चर्चा करते समय उनसे परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय, जिसे वे निकट भविष्य में प्राप्त करने वाले थे, आगे कहा, “परन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” (यूहन्ना 14:26)। इस पद से हम परमेश्वर पवित्र आत्मा (जिसे, जैसा कि यहाँ भी लिखा गया है, कोई मनुष्य नहीं वरन पिता परमेश्वर ही प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों में भेजेगा), द्वारा मसीही विश्वासी को प्रभु का वचन सिखाने की कार्य-विधि को देखते हैं:

  • वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा” - पवित्र आत्मा ही 'तुम्हें' अर्थात प्रभु के शिष्यों को सब बातें सिखाता है। अर्थात वह बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के सभी शिष्यों को समानता से प्रभु की सभी बातें सिखाने के लिए है। ध्यान कीजिए यहाँ यह नहीं कहा गया है कि जो शिष्य अलग से कोई कार्य करेंगे या कोई रीति पूरी करेंगे उन्हें सिखाएगा; या उससे मिलने वाली वचन की यह शिक्षा कुछ विशेष चुने हुए शिष्यों ही के लिए है, अन्य के लिए नहीं। परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रभु के हर शिष्य को सभी बातें सिखाएगा। सीखना परिश्रम से, बारंबार अध्ययन करने और परस्पर चर्चा करने से ही होता है; पुस्तक हाथ में पकड़ लेने या उसका सिरहाना बना लेने, या लापरवाही से कभी-कभार पढ़ लेने से सीखना नहीं हो सकता है। बारंबार पढ़ना, लिखी बातों का पालन करना, दिए गए अभ्यास को करके शिक्षक को दिखाना और उसकी जाँच करवाना होता है। सीखना एक प्रक्रिया है, जिसका निर्वाह करना आवश्यक है; और इसके लिए पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों का शिक्षक है। सीखने में विद्यार्थियों द्वारा गलतियाँ होती हैं, उनके कार्य में कमी रह जाती है। तब शिक्षक उन गलतियों को सुधार कर संबंधित अध्ययन और निर्धारित कार्य को पुनः करने को देता है। इसमें समय और सतत प्रयास की आवश्यकता होती है; किन्तु इस प्रक्रिया से निकले बिना सीखना नहीं होने पाता है। ठीक इसी प्रक्रिया का निर्वाह पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से परमेश्वर के वचन के अध्ययन और मसीही सेवकाई से संबंधित बाइबल में दिए गए परमेश्वर के निर्देशों के पालन करने में भी किया जाता है। परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी में निवास करता है, और जब तक वह विश्वासी उसके साथ सहयोग करता है, उसका आज्ञाकारी रहता है, पवित्र आत्मा उसका मार्गदर्शन करता है, उसे सिखाता है, सुधारता है, सक्षम तथा उन्नत करता रहता है। 

  • जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” - आज बहुत से मत और डिनॉमिनेशंस में यह गलत शिक्षा और व्यवहार बहुत आम है कि उनके अनुयायी ये दावे करते हैं कि उन्हें पवित्र आत्मा ने कुछ विशिष्ट कहा है, या उन्हें कोई नई शिक्षा दी है, या उन्हें कोई नया दर्शन मिला है - ऐसी बातें और भविष्यवाणियाँ जो बाइबल में नहीं दी गई हैं, जिन्हें न प्रभु यीशु ने और न ही उनके शिष्यों अथवा प्रेरितों, या वचन की पुस्तकें लिखने वालों ने कहा और लिखा है। उनकी इन बातों से प्रभावित होकर बहुत से लोग भी ऐसे अनुभवों की लालसाएं करने लगते हैं, उनके समान करने के प्रयासों में लग जाते हैं। जबकि यह विचार, व्यवहार, और शिक्षा बाइबल के अनुसार सही नहीं है, सर्वथा अनुचित और गलत है। आज हमारे हाथों में जो परमेश्वर का वचन है वह अधूरा नहीं संपूर्ण है; हर स्थान, समय, और सभ्यता के लिए, सभी लोगों को जीवन और भक्ति से संबंधित सब कुछ सिखाने, संसार की सड़ाहट से बचाने, और ईश्वरीय स्वभाव का संभागी बनाने के लिए पर्याप्त है (2 पतरस 1:2-4)। उसमें और कुछ भी नया जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। वचन में चेतावनी है कि जो भी इसमें कुछ जोड़ेगा, या इस में से कुछ निकालेगा, उसे यह करने के लिए परमेश्वर के दंड का भागी होना पड़ेगा (व्यवस्थाविवरण 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। इस पद में प्रभु यीशु मसीह ने स्पष्ट कहा है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा की शिक्षा का तरीका केवल प्रभु द्वारा कही गई बातों को स्मरण करवाने का; उनके आधार पर सिखाने का है; इससे अतिरिक्त या इससे पृथक नहीं। प्रभु यीशु ने यह नहीं कहा कि वह अपनी ओर से शिष्यों को कोई नई शिक्षाएं, कोई नए दर्शन देगा, स्थापित वचन में अपने द्वारा कोई नई बात जोड़ेगा। इसकी पुष्टि में, प्रभु यीशु मसीह ने अपनी महान आज्ञा में, अपने स्वर्गारोहण के समय शिष्यों से कहा कि वे जाकर और शिष्य बनाएं, तथा जो शिष्य बनते हैं उन्हें प्रभु यीशु की बातें सिखाएं (मत्ती 28:18-20); न कि उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा नई शिक्षाएं, नए दर्शन और नई भविष्यवाणियाँ प्राप्त करने के लिए लालसा, परिश्रम, और प्रयास करने वाले बनना सिखाएं। 


तात्पर्य यह है कि पहले प्रभु की बातों को पढ़ो और मन में बसाओ (कुलुस्सियों 3:16)। जो और जितना मन में बसा हुआ है, पवित्र आत्मा उसे ही स्मरण करवाने के द्वारा सिखाएगा। इस पद से कुछ ऊपर यूहन्ना 14:21, 23 में प्रभु यीशु मसीह ने शिष्यों से कहा कि जो उसके वचन से प्रेम करता है, वही है जो वास्तविकता में प्रभु से प्रेम करता है, और प्रभु तथा पिता परमेश्वर ऐसे प्रेम करने वालों के साथ रहते हैं। यदि वचन अधिकाई से मन में बस हुआ होगा तो स्मरण करवाने और सिखाने के लिए अधिक सामग्री होगी, बेहतर सीखने पाएंगे। यदि वचन मन में कम होगा तो पवित्र आत्मा के पास स्मरण करवाने और सिखाने के लिए कम सामग्री होगी, और कम ही सीखने पाएंगे। जिस शिष्य ने वचन जितना अधिक अपने मन में बसा रखा है, समय, परिस्थिति, तथा आवश्यकता के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा को उसे उतना अधिक और अच्छा सिखाने, तथा उपयोग करवाने का अवसर रहेगा। 


इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर के वचन, बाइबल को अपने जीवन में प्राथमिकता दीजिए। वचन को केवल औपचारिकता निभाते हुए पढ़ने वाले ही नहीं, वरन लगन एवं गंभीरता से वचन का अध्ययन तथा पालन करने वाले बनिए। मसीही विश्वासी के अंदर निवास करने वाला पवित्र आत्मा प्रत्येक विश्वासी को वचन सिखाने के लिए ही दिया गया है। यदि आप उसके साथ मिलकर प्रयास और परिश्रम करने के लिए तैयार हैं तो वह अवश्य ही आपको भी सिखाएगा क्योंकि वह तो सभी को सिखाना चाहता है और सभी मसीही विश्वासियों को सिखाता है (1 कुरिन्थियों 2:10-15; 2 तिमुथियुस 3:16-17)। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; फिर आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे आपको आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 40-41

  • इब्रानियों 4


शनिवार, 6 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 6

   

व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (2) - यूहन्ना 14:17

परमेश्वर पवित्र आत्मा के मसीही विश्वासियों में आकर बस जाने से संबंधित बातों को देखते हुए, पिछले लेख में हमने देखा था इस विषय पर अपने शिष्यों के साथ सबसे विस्तृत चर्चा प्रभु ने अपने पकड़वाए जाने से ठीक पहले, फसह के पर्व के भोज के समय की, जो यूहन्ना 14 और 16 अध्याय में दी गई है। यूहन्ना रचित सुसमाचार के 14 अध्याय में दी गई पवित्र आत्मा से संबंधित बातें, मसीही विश्वासियों के व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका के बारे में है, और 16 अध्याय में दी गई बातें विश्वासियों की सेवकाई में भूमिका के बारे में हैं। साथ ही हमने यूहन्ना 14:16 से तीन बातों को देखा था - पवित्र आत्मा परमेश्वर द्वारा प्रभु के शिष्यों को दिया जाता है; एक बार मसीही विश्वासी में आकर बस जाने के बाद वह सर्वदा विश्वासियों के साथ बना रहता है; और परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों का सहायक है, सेवक नहीं - वह उन्हें सिखाता है, मार्गदर्शन करता है, सामर्थी बनाता है किन्तु विश्वासियों के स्थान पर उनकी निर्धारित सेवकाई को कर के नहीं देता है। आज हम यूहन्ना 14:17 से परमेश्वर पवित्र आत्मा की मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में भूमिका के बारे में कुछ और बातों को देखेंगे। 

यूहन्ना 14:17 -अर्थात सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगाइस पद में दिए गए परमेश्वर पवित्र आत्मा के गुण हैं:

1.   वह 'सत्य का आत्मा' है; इस वाक्यांश के दो अभिप्राय हैं। एक तो यह कि परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का स्वरूप है; वह किसी असत्य, छल, कपट, परमेश्वर के वचन से मेल न रखने वाली बात में न तो सम्मिलित होगा, न सहमत होगा, न उसकी सलाह देगा। और दूसरा, प्रभु यीशु मसीह ने कहा, “यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता” (यूहन्ना 14:6)। क्योंकि इस कथन के अनुसार प्रभु यीशु मसीह हीसत्यहैं, इसलिएसत्य का आत्माउनका आत्मा है। इन दोनों ही अभिप्रायों से यह स्पष्ट है कि जो भी शिक्षा परमेश्वर के वचन (यूहन्ना 1:1-2, 14), अर्थात प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाओं से पूर्णतः मेल नहीं रखती है, वह कदापि पवित्र आत्मा की ओर से नहीं हो सकती है। फिर चाहे वह शिक्षा किसी बहुत विख्यात व्यक्ति, या किसी बहुत नामी और प्रभावी प्रचारक के द्वारा ही क्यों न दी गई हो, तथा ऐसे व्यक्तियों और प्रचारकों के द्वारा चाहे कितने भी और कैसे भी आश्चर्यकर्म क्यों न किए गए हों - इस संदर्भ में मत्ती 7:21-23 तथा 2 थिस्सलुनीकियों 2:9-10 को कभी न भूलें। पौलुस ने गलातीयों 1:6-9 में गलातिया की मसीही मण्डली में फैलते जा रहे भ्रामक सुसमाचार प्रचार और गलत शिक्षाओं के विषय में लिखा, कि जो कोई मूल सुसमाचार से कुछ भी भिन्न सुसमाचार सुनाता है, वह श्रापित है, चाहे वहभिन्न सुसमाचारसुनाने वाला कोई स्वर्गदूत या फिर स्वयं पौलुस ही क्यों न हो:मुझे आश्चर्य होता है, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहिले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुम ने ग्रहण किया है, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता है, तो श्रापित हो। अब मैं क्या मनुष्यों को मनाता हूं या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूं?” हमें मसीही प्रचार को किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा अथवा किसी प्रचलित और आकर्षक मत या डिनॉमिनेशन की शिक्षाओं के आधार पर नहीं, वरन बेरिया के विश्वासियों के समान वचन से उस प्रचार और शिक्षा की सत्यता को परखने के बाद ही ग्रहण करना हैये लोग तो थिस्सलुनीके के यहूदियों से भले थे और उन्होंने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया, और प्रति दिन पवित्र शास्त्रों में ढूंढ़ते रहे कि ये बातें यों ही हैं, कि नहीं। सो उन में से बहुतों ने, और यूनानी कुलीन स्त्रियों में से, और पुरुषों में से बहुतेरों ने विश्वास किया” (प्रेरितों 17:11-12)  

2.   इस पद में दिया गया परमेश्वर पवित्र आत्मा का दूसरा गुण है, कोई सांसारिक व्यक्ति उसे ग्रहण नहीं कर सकता है, क्योंकि न ऐसा व्यक्ति उसे देखता है और न ही जानता है। अर्थात, जब तक व्यक्तिसांसारिकहै, यानि कि, उद्धार पाया हुआ नहीं है, वह पवित्र आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता है। सांसारिक व्यक्ति चाहे जितनी भी उपवास-प्रार्थनाएं कर ले, प्रतीक्षा कर ले, कुछ भी अन्य विधि अपना ले; परमेश्वर पवित्र आत्मा व्यक्ति में तब ही आकर निवास करेगा जब वह सांसारिक से स्वर्गीय जन, अर्थात उद्धार पाया हुआ व्यक्ति बन जाएगा - और तब वह उस व्यक्ति में तुरंत ही, स्वतः ही आकर बस जाएगा, उस व्यक्ति को अलग से कुछ नहीं करना पड़ेगा। अभिप्राय यह कि यदि कोई व्यक्ति अपने आप को उद्धार पाया हुआ कहे, और उसमें पवित्र आत्मा के गुण और फल न दिखाई दें, तो फिर वह चाहे जितने भी प्रयास कर ले, उसे पवित्र आत्मा तब तक नहीं मिलेगा, जब तक वह वास्तविकता में उद्धार नहीं पा लेगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति से पवित्र आत्मा पाने के लिए उपवास-प्रार्थना आदि करने के लिए नहीं, वरन सच्चे मन से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु पापों की क्षमा माँगकर, अपना जीवन वास्तविकता में प्रभु को समर्पित कर देने और प्रभु की आज्ञाकारिता में बने रहने का निर्णय करने के लिए कहना चाहिए। 

3.   सांसारिक व्यक्ति की उपरोक्त तुलना में, प्रभु ने अपने शिष्यों से पवित्र आत्मा के विषय कहा कि वह 'तुम्हारे' अर्थात प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों के साथ है भी और उनमें रहेगा भी। ध्यान कीजिए, प्रभु ने फिर यहाँ पर शिष्यों को पवित्र आत्मा के उनमें आकर बसने के लिए अलग से कोई प्रयास या कार्य करने के लिए नहीं कहा, वरन स्पष्ट कहा कि वह उन शिष्यों के साथ है, और बना भी रहेगा। बारंबार वचन यह स्पष्ट दिखाता है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा किन्हीं मानवीय उपायों या प्रयासों से नहीं, वरन पापों से पश्चाताप करने और उद्धार पाने से ही प्रभु के जन में आकर बस जाता है। इससे हम यह शिक्षा भी प्राप्त करते हैं कि जो लोग, या मत अथवा डिनॉमिनेशन पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए उद्धार पाने के बाद अलग से कुछ विशेष करने के लिए कहते हैं, वे कितनी गलत शिक्षाएं लोगों में फैला रहे हैं। और यद्यपि वेपवित्र आत्माके नाम पर और उसे महत्व देने के लिए ऐसा करते हैं, किन्तुसत्य का आत्मावाली उपरोक्त पहली शिक्षा के अनुसार, पवित्र आत्मा उनके साथ हो ही नहीं सकता है, क्योंकि पवित्र आत्मा प्रभु यीशु के वचन की पुष्टि ही करेगा, कभी उससे अलग या उसके विरुद्ध बात नहीं करेगा। ऐसी सभी शिक्षाएं भ्रामक हैं, और जैसा पौलुस ने गलातीयों को लिखा, श्रापित है वह व्यक्ति जो इन गलत शिक्षाओं को मानता और सिखाता है।

 

यदि आप उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी, प्रभु के जन हैं, तो क्या आपके जीवन में पवित्र आत्मा के फल (गलातीयों 5:22-23) और गुण दिखाई देते हैं? क्या उद्धार पाने के बाद आपके जीवन में निरंतर परिवर्तन आता चला जा रहा है (रोमियों 12:1-2)? क्या आप धीरे-धीरे, किन्तु निश्चय ही प्रभु की समानता में बदलते चले जा रहे हैं (2 कुरिन्थियों 3:18)? क्या परमेश्वर का वचन और आज्ञाकारिता आपके जीवन की प्राथमिकता बन गए हैं (यूहन्ना 14:21, 23; 1 पतरस 2:1-2)? यदि नहीं, तो आपको 2 कुरिन्थियों 13:5 के अनुसार अपने आप को जाँच कर देखने की आवश्यकता है कि क्या आप विश्वास में हैं या नहीं; क्या आपने वास्तव में उद्धार पाया है? या आप इस भ्रम में पड़े हैं कि आपने उद्धार पाया है, किन्तु वास्तविकता में नहीं पाया है। अवसर रहते जाँच लीजिए और यदि कोई गलती है तो उसे सुधार लीजिए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे, फिर आप में होकर अपने कार्य करे, जिससे आपको आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से पापों के लिए पश्चाताप करके प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

·        यिर्मयाह 37-39

·        इब्रानियों

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 5


व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (1) - यूहन्ना 14:16

हम पहले के लेखों में यह देख चुके हैं कि प्रभु ने शिष्यों के लिए यह अनिवार्य किया था कि वे बिना पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को प्राप्त किए, सेवकाई के लिए बाहर न निकलें। साथ ही प्रभु ने उन्हें यह भी स्मरण करवाया था कि पवित्र आत्मा के विषय वह उनसे पहले भी चर्चा कर चुका है। हमने पिछली बार प्रभु द्वारा अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दौरान, अपने क्रूस पर दिए गए बलिदान से पहले, शिष्यों के साथ विभिन्न समयों पर पवित्र आत्मा के बारे में की गई बातों को देखा था, जिनमें प्रभु ने बारंबार यही कहा था कि उन्हें आने वाले समय में पवित्र आत्मा प्राप्त होगा। प्रभु की इस विषय पर बाइबल में दर्ज की गई सबसे विस्तृत चर्चा, प्रभु के पकड़वाए जाने से ठीक पहले, फसह के पर्व के भोज के दौरान, शिष्यों से हुई बात-चीत में दी गई है, जिसका विवरण हमें यूहन्ना 14 तथा 16 अध्यायों में मिलता है। हम इन्हीं अध्यायों में प्रभु द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय दी गई शिक्षाओं से सीखते हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन, तथा सेवकाई में क्या कार्य करता है, और परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य क्यों मसीह यीशु के शिष्य की मसीही सेवकाई के लिए आवश्यक है।

 यूहन्ना 14: व्यक्तिगत उपयोगिता

प्रभु ने पहले शिष्यों को, उनमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की आवश्यकता और शिष्यों के जीवन में पवित्र आत्मा के द्वारा होने वाले कार्यों के बारे में बताया:

यूहन्ना 14:16 -और मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे।पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी का सहायक है, प्रभु द्वारा दिया गया एक भिन्न (एक 'और') सहायक; इस पद में हम पवित्र आत्मा के बारे में तीन मुख्य बातों को देखते हैं:

  1. वह प्रभु यीशु मसीह की परमेश्वर पिता से विनती के आधार पर, अर्थात प्रभु यीशु मसीह की ओर से परमेश्वर पिता द्वारा प्रभु यीशु के शिष्यों में भेजा या दिया जाता है; किसी अन्य विधि से नहीं। कोई मनुष्य त्रिएक परमेश्वर के इस सम्मिलित कार्य में न तो हस्तक्षेप कर सकता है, और न परमेश्वर को उस मनुष्य के कहे या उस मनुष्य की इच्छा के अनुसार कुछ करने के लिए बाध्य कर सकता है। तात्पर्य यह, कि परमेश्वर पवित्र आत्मा किसी मनुष्य के कहे अनुसार या मनुष्यों द्वारा बनाई और बताई जाने वाली विधियों से प्राप्त नहीं होता है, जैसा कि कुछ मत या डिनॉमिनेशन वाले बहुत जोर देकर अपने अनुयायियों को बताते और सिखाते हैं। और हम पहले देख चुके हैं कि आज इस अनुग्रह के समय में, प्रत्येक मसीही विश्वासी को उद्धार पाते ही परमेश्वर की ओर से पवित्र आत्मा दे दिया जाता है।
  2. उसे सर्वदा मसीही विश्वासी के साथ रहने के लिए दिया गया है। इसलिए उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी के लिए बार-बार पवित्र आत्मा मांगने की प्रार्थना करना या कहना अथवा गीतों में गाना और मांगना, प्रभु की शिक्षाओं और परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं है – उद्धार पाने के साथ जब एक बार दे दिया गया तो सदा साथ रहने के लिए दे दिया गया। वह मसीही विश्वासी को छोड़ कर कभी नहीं जाता है। 
  3. परमेश्वर पवित्र आत्मा 'सहायक' होने के लिए दिया गया है - उनका सेवक होने के लिए नहीं। वह मसीही विश्वासियों से कार्य करवाता है, उनका मार्गदर्शन करता है, उन्हें सिखाता है, उनके लिए निर्धारित सेवकाई के अनुसार उन्हें योग्य और सामर्थी करने के लिए उपयुक्त वरदान देता है (1 कुरिन्थियों 12:7, 11); किन्तु वह विश्वासियों के स्थान पर उनके लिए निर्धारित कार्य नहीं करता है। मसीही विश्वासी उस से कार्यों या जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए अपनी असमर्थता जता कर, अपना निर्धारित कार्य उससे नहीं करवा सकते हैं। यदि विश्वासी किसी कार्य को करने में असमर्थ हैं, तो पवित्र आत्मा उन्हें बताएगा, सिखाएगा, उनका मार्गदर्शन करेगा कि वो उस कार्य को कैसे करें; लेकिन उनके स्थान पर उस कार्य को कर के नहीं देगा। करना मसीही विश्वासी को ही होगा, पवित्र आत्मा की अगुवाई और सिखाए के अनुसार। 

       यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु परमेश्वर द्वारा आपके लिए निर्धारित सेवकाई को प्रभु की इच्छा के अनुसार, और प्रभु को स्वीकार्य रीति से पूरा करना चाहते हैं, प्रभु के लिए उपयोगी होना चाहते हैं, तो आपके जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति तथा भूमिका के प्रति आपको सजग और संवेदनशील होना अनिवार्य है। जब आप, आपके अंदर निवास करने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा की आवाज़ को पहचानने लगेंगे, उसकी आज्ञाकारिता में होकर, उसके कहे के अनुसार कार्य करने लगेंगे, तो आपकी मसीही सेवकाई स्वतः ही परमेश्वर की सामर्थ्य से परिपूर्ण, प्रभावी, उपयोगी, और परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाएगी। क्या इस बात की कल्पना भी करना आपके अंदर एक रोमांच नहीं भर देता है कि परमेश्वर प में होकर कार्य करना चाहता है, ताकि आपको आशीषित कर सके, अनन्तकाल के प्रतिफलों से परिपूर्ण कर सके? वह तो करना चाहता है, और उसने इसके लिए उपयुक्त संसाधन भी आपको उपलब्ध करवा दिए हैं; किन्तु क्या आप अपनी तथा अपने साथ के लोगों की बुद्धि-समझ-ज्ञान, और अपने डिनॉमिनेशन की मान्यताओं, धारणाओं, और विधि-विधानों आदि से निकलकर केवल परमेश्वर के कहे के अनुसार करने के लिए तैयार हैं, प्रतिबद्ध हैं (गलातीयों 1:10)। जब तक आप में यह निर्णय करने और उसे निभाने की हिम्मत नहीं होगी, परमेश्वर पवित्र आत्मा को आपके जीवन में खुलकर और प्रभावी रीति से कार्य करने की अनुमति और छूट नहीं होगी; और फिर न ही आप एक प्रभावी मसीही सेवकाई करने पाएंगे, और न ही अपने अनन्तकाल के लिए कोई विशेष प्रतिफल अर्जित करने पाएंगे। और फिर आपका मसीही जीवन और मसीही सेवकाई धर्म-कर्म-रस्म के बंधनों में बंधा मनुष्यों और संस्थाओं द्वारा निर्धारित औपचारिकताएं पूरी करते रहने मात्र का ही जीवन बनकर रह जाएगा।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में होकर कार्य करे, जिससे आपको आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ। प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 34-36
  • इब्रानियों 2