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बुधवार, 12 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - परमेश्वर का परिवार

    

प्रभु यीशु की कलीसिया संबंधी रूपकों में होकर कलीसिया के लिए प्रभु के प्रयोजन समझें

       हमने पिछले लेखों में मत्ती 16:18 से देखा है कि प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया को, अपने मानकों और निर्धारित गुणों एवं प्रक्रिया के द्वारा बना रहा है; वही उसका स्वामी है, उसकी देखभाल कर रहा है; और वर्तमान में, उसकी कलीसिया निर्माणाधीन है। हम यह भी देख चुके हैं कि कलीसिया कोई भवन अथवा स्थान नहीं है, वरन ऐसे लोगों का समूह है जो प्रभु यीशु को जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करके, अपने पापों से पश्चाताप करके, अपना जीवन उसे समर्पित कर चुके हैं; केवल इसी एकमात्र आधार पर प्रभु के साथ जुड़कर प्रभु की कलीसिया का अंग बने हैं। अन्य जो कोई भी किसी भी अन्य मान्यता, आधार या धारणा के अनुसार जुड़ने का प्रयास करता है, उसकी वास्तविकता को प्रकट करके प्रभु उसे अपनी कलीसिया से या तो बाहर निकाल देता है, या अभी उसकी पहचान करके जगत के अंत के समय की छंटनी में उसे बाहर निकाल दिया जाएगा। प्रभु यीशु बहुत बारीकी से हर एक बात का ध्यान रखते हुए स्वयं ही यह कार्य कर रहा है। प्रभु शैतान द्वारा पाप में गिराए और फँसाए गए, और परिणामस्वरूप परमेश्वर से संगति एवं सहभागिता से दूर हो गए लोगों को अपनी धार्मिकता के द्वारा धर्मी बनाकर, उन्हें ईश्वरीय धार्मिकता में लौटा लाकर, परमेश्वर की संगति एवं सहभागिता में बहाल कर रहा है (रोमियों 5 अध्याय पढ़िए), उन्हें अनन्तकाल के उनके स्वर्गीय निवास एवं कार्यों के लिए तैयार कर रहा है (यूहन्ना 14:3)

प्रभु यीशु द्वारा कलीसिया में किए जा रहे इस धर्मी और पवित्र बनाए जाने तथा परमेश्वर की संगति एवं सहभागिता में बहाली के कार्य को, कलीसिया के लोगों के जीवनों में उसके उद्देश्यों एवं उनके परिणामों को, और उन के विभिन्न पहलुओं को हम उन विभिन्न रूपकों (metaphors) के द्वारा सीख और समझ सकते हैं, जो परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खंड में प्रभु के लोगों, उसकी कलीसिया के लिए प्रयोग किए गए हैं। ये रूपक हैं: प्रभु का परिवार या घराना; परमेश्वर का निवास-स्थान; मन्दिर या भवन; परमेश्वर की खेती; प्रभु की देह; प्रभु की दुल्हन; परमेश्वर की दाख की बारी, इत्यादि। प्रत्येक रूपक, प्रभु यीशु और पिता परमेश्वर के साथ एक सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी मसीही विश्वासी के संबंध, जीवन, और दायित्व के विभिन्न पहलुओं को दिखाता है। साथ ही प्रत्येक रूपक यह भी बिलकुल स्पष्ट और निश्चित कर देता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के किसी भी मानवीय प्रयोजन, कार्य, धारणा आदि के द्वारा परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य बन ही नहीं सकता है; वह चाहे कितने भी और कैसे भी प्रयास क्यों न कर ले। अगर व्यक्ति प्रभु यीशु की कलीसिया का सदस्य होगा, तो वह केवल प्रभु की इच्छा, उसके माप-दंडों के आधार पर, उसकी स्वीकृति से होगा, अन्यथा कोई चाहे कुछ भी कहता रहे, वह वास्तविकता में प्रभु की कलीसिया का सदस्य हो ही नहीं सकता है, और न कभी होने पाएगा। और यदि वह अपने आप को समझता या कहता भी है, तो उसकी वास्तविकता देर-सवेर प्रकट हो जाएगी, और वह अनन्त विनाश के लिए पृथक कर दिया जाएगा। इसलिए अपने आप को मसीही विश्वासी कहने वाले प्रत्येक जन के लिए अभी समय और अवसर है कि अपनी वास्तविक स्थिति को भली-भांति जाँच-परख कर, उचित कदम उठा ले और प्रभु के साथ अपने संबंध ठीक कर ले।  

इन रूपकों में होकर हम उसकी कलीसिया के लिए प्रभु के प्रयोजन एवं उद्देश्यों को समझने का प्रयास करेंगे। इन रूपकों को किसी विशेष क्रम में नहीं लिया अथवा रखा गया है, सभी रूपक समान ही महत्वपूर्ण हैं, सभी में मसीही जीवन से संबंधित कुछ आवश्यक शिक्षाएं हैं।  

(1) प्रभु का परिवार:

प्रभु यीशु ने, और परमेश्वर पिता तथा पवित्र आत्मा ने प्रभु के लोगों को, उसकी कलीसिया को, प्रभु का परिवार कहा है। इस संदर्भ में बाइबल के कुछ पद देखिए:

  • प्रभु यीशु ने कहा:और कौन है मेरे भाई? और अपने चेलों की ओर अपना हाथ बढ़ा कर कहा; देखो, मेरी माता और मेरे भाई ये हैं। क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई और बहिन और माता है” (मत्ती 12:49-50)
  • परमेश्वर पिता कहता है:इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और अशुद्ध वस्तु को मत छूओ, तो मैं तुम्हें ग्रहण करूंगा। और तुम्हारा पिता होऊंगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियां होगे: यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर का वचन है” (2 कुरिन्थियों 6:17-18) 
  • परमेश्वर पवित्र आत्मा ने लिखवाया: 
    • परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं” (यूहन्ना 1:12) 
    • आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं” (रोमियों 8:16-17)  
    • इसलिये तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के घराने के हो गए” (इफिसियों 2:19)

 

उपरोक्त पदों से हम सीखते हैं कि प्रभु की कलीसिया के सदस्य होने का एक परिणाम है कि मसीही विश्वासी परमेश्वर की संतान, उसके परिवार के अंग भी बन जाते हैं। उन्हें यह आदर उनके किसी कार्य अथवा योग्यता के आधार पर नहीं, वरन केवल उनके द्वारा किए गए पापों से पश्चाताप, और प्रभु पर विश्वास के कारण उन्हें परमेश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है (यूहन्ना 1:12; इफिसियों 2:19)। परमेश्वर की संतान बनने पर यह मसीही विश्वासी का कर्तव्य है कि वह संसार की अशुद्धता से अपने आप को पृथक रखे; और परमेश्वर उनसे एक पिता के समान (2 कुरिन्थियों 6:17-18); तथा प्रभु यीशु अपने परिवार के सदस्यों के समान (मत्ती 12:49-50) उससे व्यवहार करता है।

प्रकट है कि कोई भी अपने आप को तब तक परमेश्वर की संतान, प्रभु के परिवार का सदस्य नहीं बना सकता है, जब तक परमेश्वर स्वयं उसे यह आदर प्रदान न करे। किसी भी मानवीय योजना अथवा विधि से यह कर पाना संभव नहीं है। इस प्रकार से परमेश्वर की संतान होने के इस रूपक से हम कलीसिया के लिए परमेश्वर के प्रयोजन, उसके उद्देश्य के विषय क्या सीखते हैं? थोड़ा थम कर, रोमियों 8:16-17 पर कुछ ध्यान से विचार, और इसके निहितार्थ पर गंभीरता से मनन कीजिए। क्या आप कभी कल्पना भी कर सकते हैं कि परमेश्वर आपको आपकी किसी भी योग्यता, गुण, अथवा कार्य के लिए मसीह यीशु का संगी वारिस, उसकी महिमा का संभागी बना सकता है? किन्तु आपके द्वारा अपने पापों से पश्चाताप करने, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने और अपना जीवन उसे समर्पित करने के द्वारा परमेश्वर आपको कैसा अद्भुत, कल्पना से भी कहीं बढ़कर आदर देना चाहता है - आपको, अर्थात, उसकी कलीसिया के सदस्य को, अपने स्वर्गीय राज्य में मसीह यीशु का संगी वारिस और मसीह की महिमा का संभागी बनाना चाहता है।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपके अपने आप को जाँचने के लिए कुछ बातें इस रूपक से सामने आती हैं: क्या आप परमेश्वर की संतान, उसकी कलीसिया के सदस्य, पापों से पश्चाताप और प्रभु में विश्वास के द्वारा बने हैं; या किसी अन्य मानवीय प्रक्रिया के निर्वाह अथवा आधार पर अपने आप को प्रभु की कलीसिया का सदस्य समझते हैं? परमेश्वर की संतान होने के नाते क्या आप स्वर्गीय पिता परमेश्वर की इच्छा पर चलते हैं? क्या आप ने अपने आप को संसार और संसार की बातों से पृथक किया है? परमेश्वर के घराने का व्यक्ति होने के नाते आपको अपने दायित्वों का निर्वाह करना भी अनिवार्य है, अन्यथा संसार के लोगों के समान आपका जीवन और व्यवहार आपके वास्तविक मसीही विश्वासी होने पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न लगाता है, तथा आपके स्वर्गीय प्रतिफलों के लिए बहुत हानिकारक होगा।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 29-30     
  • मत्ती 9:1-17      

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - उद्देश्य


प्रभु यीशु की कलीसिया में होकर पाप से पूर्व की स्थिति बहाल कर रहा है

  पिछले लेखों में हमने मत्ती 16:18 में प्रभु के कहे वाक्य - “...मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...” से देखा है कि कलीसिया कोई स्थान अथवा भवन नहीं है, वरन उन लोगों का समूह है जो प्रभु यीशु को जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं, और इस आधार पर, उन्होंने प्रभु यीशु से पापों की क्षमा और उद्धार प्राप्त करके अपने आप को पूर्णतः प्रभु को समर्पित किया है। प्रभु यीशु कहे गए इस वाक्यांश से हमने प्रभु की इस कलीसिया के विषय तीन बातें देखीं - पहली प्रभु यीशु ही अपने लोगों को एकत्रित कर रहा है, और उसके लोगों में किसी अन्य आधार पर कोई भी व्यक्ति सम्मिलित नहीं रह सकता है, प्रभु उन्हें पृथक कर देता है, या कर देगा। दूसरी बात उसके लोगों की देखभाल और रख-रखाव के लिए प्रभु की इस कलीसिया का संपूर्ण स्वामित्व प्रभु यीशु ही के पास है; प्रभु ने कुछ लोगों को कलीसिया की कुछ ज़िम्मेदारियां अवश्य दी हैं, किन्तु स्वामी वह स्वयं ही है, और अपने लोगों की जरा से भी हानि या उनके प्रति कोई भी लापरवाही उसे स्वीकार नहीं है। और तीसरी बात है कि प्रभु की कलीसिया अभी निर्माणाधीन है, प्रभु यीशु ही उसे बना रहा है; उसकी कलीसिया में कौन कहाँ पर किस प्रकार से उपयोग होगा, यह केवल प्रभु यीशु ही निर्धारित एवं कार्यान्वित करता है। अर्थात प्रभु यीशु की कलीसिया से संबंधित हर बात पूर्णतः प्रभु ही के नियंत्रण में है, किसी भी मनुष्य या मानवीय संस्था का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है, चाहे इस संसार में उस मनुष्य अथवा संस्था का कोई भी स्थान आया सम्मान क्यों न हो। 

प्रभु यीशु ने अपने स्वर्गारोहण से पहले अपने शिष्यों को जो महान आज्ञा दी (मत्ती 28:18-20; मरकुस 16:15-19; लूका 24:47; प्रेरितों 1:8), वह सारे संसार के सभी लोगों, सभी जातियों में जा कर पापों से पश्चाताप करने और यीशु को प्रभु स्वीकार करने के द्वारा प्रभु यीशु में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार प्रचार करने के लिए थी।  अर्थात, प्रभु का दृष्टिकोण केवल किसी एक स्थान विशेष के लोगों के लिए नहीं है, वरन सारे संसार के सभी लोगों के लिए है, इसलिए प्रभु यीशु की कलीसिया किसी स्थान अथवा जाति विशेष तक ही सीमित नहीं है, वरन विश्वव्यापी है। प्रभु संसार के सभी स्थानों और लोगों में से अपने विश्वासियों को एकत्रित करके अपनी विश्वव्यापी कलीसिया बनाने में लगा हुआ है। हम मसीही विश्वासी सुसमाचार प्रचार के द्वारा प्रभु के इस कार्य में उसके सहायक हैं - सुसमाचार प्रचार के द्वारा लोगों को प्रभु के पास लाते हैं, प्रभु से जोड़ते हैं; और जो सच्चे मन तथा पूर्ण समर्पण से प्रभु के साथ जुड़ता है, उसे अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करता है और अपना जीवन उसे समर्पित करता है, प्रभु उसे अपनी कलीसिया में उसके लिए उपयुक्त और उचित स्थान निर्धारित करके, उसे उस स्थान और दायित्व के निर्वाह के लिए तैयार करता है, प्रयोग करता है। किन्तु साथ ही प्रभु यीशु प्रत्येक व्यक्ति के पापों से पश्चाताप और उसके प्रति उस व्यक्ति के समर्पण की वास्तविक मनोदशा भी भली-भांति जानता है। इसलिए उसकी कलीसिया में वही बना रह सकता है, और उपयोगी हो सकता है जो प्रभु के मानकों पर सही होता है; अन्य सभी लोग देर-सवेर, अथवा जगत के अंत के समय के पृथक किए जाने में कलीसिया से बाहर निकाल कर अनन्त विनाश में भेज दिए जाएंगे। इसलिए हम सभी के लिए अभी यह अवसर है कि कलीसिया में अपने होने के विषय अपनी सही जाँच-परख कर लें, और यदि कोई सुधार लाना है तो उसे अभी समय रहते कर लें, क्योंकि किसके पास समय और अवसर कब तक है कोई नहीं जानता है; इस निर्णय को टालना बहुत हानिकारक, अनन्तकाल के लिए पीड़ादायक हो सकता है (इब्रानियों 3:7-19) 

इस कलीसिया को बनाने का, हम मनुष्यों को अपने साथ इतनी बारीकी से जाँच-परख कर, जोड़ने के पीछे, प्रभु यीशु का क्या उद्देश्य है, क्या उपक्रम है? इसे समझने के लिए हमें सृष्टि के आरंभ के समय में, अदन की वाटिका में घटित हुई पहले पाप की घटना पर जाना पड़ेगा, जब शैतान ने हव्वा को बहका कर आदम और हव्वा से परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करवाई, और पाप को सृष्टि में प्रवेश मिल गया, पाप के दुष्प्रभाव ने सारी सृष्टि को बिगाड़ दिया (रोमियों 8:19-22)। इस दुखद घटना से पूर्व, मनुष्य निष्पाप दशा में परमेश्वर के साथ संगति और सहभागिता रखता था, जो पाप के कारण टूट गई। मनुष्य के साथ इसी संगति और सहभागिता को पुनः स्थापित करने, शैतान द्वारा मनुष्यों में बोए गए पाप केबीजको निकाल बाहर करने, और मनुष्य को उसका वह आदर और स्थान बहाल करने के लिए जो परमेश्वर ने उसकी रचना करने के समय उसे दिया था (उत्पत्ति 1:28), प्रभु परमेश्वर अपने लोगों अपने साथ एकत्रित कर रहा है। इसीलिए वह इतनी बारीकी से देखभाल कर, स्वयं ही इस पूरी प्रक्रिया को पूरा कर रहा है, जिससे शैतान का कोई अंश भी उसमें न रह जाए। उसके इस उद्देश्य और कार्य-विधि को हम बाइबल के नए नियम मेंकलीसियाके लिए दिए गए विभिन्न रूपकों (metaphors) के द्वारा समझ सकते हैं; जिन्हें हम अगले लेख से देखना आरंभ करेंगे।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो एक बार फिर आप से आग्रह है कि अभी समय रहते अपनी वास्तविक स्थिति को जाँच-समझ लें। किसी भी परिवार विशेष में जन्म लेने, किसी भी डिनॉमिनेशन के नियम, रीतियाँ, प्रथाएं, और त्यौहार-व्यवहार आदि का निर्वाह करने, अपने परिवार के लोगों के कितनी भी पीढ़ियों से मसीही या ईसाई होने या अभी वर्तमान में भी किसी मसीही सेवकाई में लगे होने, आदि बातों के द्वारा कोई भी प्रभु की कलीसिया का अंग नहीं बनता है। यह केवल व्यक्तिगत रीति से, समझते-बूझते हुए, अपने पापों से पश्चाताप करने और यीशु को प्रभु स्वीकार करके अपना जीवन उसे समर्पित कर देने, और फिर केवल उसी की आज्ञाकारिता में जीवन जीने से होता है (प्रेरितों 17:30-31; रोमियों 10:9-10)। यदि जरा सा भी संदेह है, तो आपसे विनम्र निवेदन है कि अभी इस कार्य को कर लें, कदापि कोई आनाकानी न करें, इस निर्णय को टालें नहीं।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 27-28     
  • मत्ती 8:18-34

सोमवार, 10 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - निर्माणाधीन


प्रभु यीशु की कलीसिया प्रभु ही के द्वारा बनाई जा रही है 

    पिछले लेखों में हम मत्ती 16:18 में प्रभु के कहे वाक्य - “...मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...”; की तीन बहुत महत्वपूर्ण को देखते आ रहे हैं। इनमें से पहली बात है, कि प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया बनाएगा, यानि कि, प्रभु यीशु अपनी कलीसिया, अर्थात, उन लोगों को जो उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं, स्वयं ही एक समूह में एकत्रित कर रहा है। किसी की भी वास्तविक मनोदशा, और प्रभु के प्रति उसकी निष्ठा और समर्पण की वास्तविक स्थिति को कोई भी मनुष्य नहीं जान सकता है, किन्तु प्रभु की दृष्टि से कुछ छिपा नहीं है। इसीलिए वह समय-समय पर शैतान द्वारा कलीसिया में घुसाए हुए लोगों को प्रकट और पृथक करता रहता है, तथा मत्ती 13:24-30 के अनुसार अंत के समय एक बड़ा पृथक करना होगा और कलीसिया में घुसाए गए दुष्ट के सारे लोग निकाल कर अनन्त विनाश में भेज दिए जाएंगे, प्रभु की कलीसिया में प्रभु के चुने हुए लोगों के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं बचेगा। 

दूसरी बात जो हमने कल के लेख में कुछ विस्तार से देखी, वह है कि प्रभु अपनी कलीसिया का स्वामी है और अपने स्वामित्व में कोई हस्तक्षेप नहीं होने देता है। वह अपने इस स्वामित्व को बहुत गंभीरता से लेता है, अपनी कलीसिया, यानि अपने लोगों का पूरा ध्यान रखता है। वह स्वयं ही कलीसिया की देखभाल के लिए उचित दासों को उनकी योग्यता के अनुसार नियुक्त करता है और फिर उन से उन्हें सौंपे गए दायित्व का पूरा हिसाब भी लेता है। प्रभु को अपनी कलीसिया, अपने लोगों की जरा सी भी हानि, उनके प्रति थोड़ी सी भी लापरवाही कतई स्वीकार नहीं है। 

तीसरी, जिसे हम आज देखेंगे है कि प्रभु ने कहा कि वह स्वयं ही अपनी इस कलीसिया कोबनाएगा’; प्रभु के इस कथन में भी दो महत्वपूर्ण बातें हैं, जिन्हें कलीसिया के लिए प्रयोग किए गए रूपकों में से एक, “परमेश्वर के निवास के लिए एक मन्दिर” (इफिसियों 2:21-22) के संदर्भ में अधिक सरलता से समझा जा सकता है:

  • उन दोनों बातों में से एक बात तो यह कि जैसे पहली दो बातों में हमने कलीसिया से संबंधित हर बात में प्रभु की सार्वभौमिकता को देखा है, कि वही अपने लोगों को चुनता और बुलाता है, अनुचित लोगों को अपने लोगों में से पृथक करता है; और यह कि कलीसिया का संपूर्ण स्वामित्व प्रभु के ही हाथों में है, ठीक उसी प्रकार से यह बात भी है कि वह स्वयं ही अपनी कलीसिया को बनाता भी है। हर एक निवास-स्थान या मंदिर का हर अंश, हर पत्थर का अपना निर्धारित स्थान होता है। जिस पत्थर का जो स्थान है उसे वहीं पर लगाया और उपयोग किया जाता है। उसी प्रकार से प्रभु ही अपने लोगों को, उसके द्वारा उनके निर्धारित कार्यों एवं कलीसिया या मण्डली में उपयोग के अनुसार व्यवस्थित करके उन्हें कलीसिया में उनके सही स्थान पर स्थापित भी करता है। यह निर्णय न तो किसी मसीही विश्वासी का अपना होता है, न किसी अन्य मनुष्य, अगुवे, अध्यक्ष, डिनॉमिनेशन, अथवा संस्था आदि का है; इसे केवल प्रभु ही निर्धारित और कार्यान्वित करता है। 
  • और, उन दोनों बातों में से दूसरी बात के लिए ध्यान कीजिए कि यहाँ प्रयुक्त शब्द हैबनाएगा’ - भविष्य काल; जब प्रभु ने यह बात कही कलीसिया उस समय वर्तमान नहीं थी, बनाई जानी थी। प्रभु द्वारा कही गई यह बात प्रेरितों 2 अध्याय में पतरस के प्रचार और उस प्रचार द्वारा हुई प्रतिक्रिया के साथ कलीसिया के अस्तित्व में आने से आरंभ हुई थी। किसी वस्तु कोबनानेमें समय और प्रयास लगता है, उसे उसके पूर्ण और अंतिम स्वरूप में लाने या ढालने के लिए एक प्रक्रिया से होकर निकलना पड़ता है। प्रभु की कलीसिया भी प्रभु के द्वाराबनाईजा रही है, उसमें अभी भी संसार भर से हर प्रकार के लोग जोड़े जा रहे हैं। साथ ही यह भी ध्यान कीजिए कि प्रभु की कलीसिया का प्रत्येक सदस्य, उसका प्रत्येक जननया जन्मपाने के द्वारा प्रभु के साथ जुड़ता है।नया जन्मपाने के साथ ही वह एक आत्मिक शिशु के समान कलीसिया में, प्रभु की संगति में प्रवेश करता है। उसे शिशु अवस्था से उन्नत होकर परिपक्व स्थित में आने में समय और विभिन्न अनुभवों एवं शिक्षाओं से होकर निकलना पड़ता है। इसलिए कलीसिया के सभी सदस्य अलग-अलग आत्मिक स्तर और परिपक्वता की स्थिति में देखे जाते हैं; प्रभु उन्हें उनके कलीसिया में सही स्थान के लिए अभी तैयार कर रहा है। इसीलिए कहा गया है कि अभी कलीसिया पूर्ण नहीं हुई है, निर्माणाधीन है; उसमें कार्य ज़ारी है। यही कारण है कि आज हमें प्रभु की कलीसिया में, अर्थात प्रभु के लोगों के समूह में कुछ कमियाँ, दोष, अपूर्णता, और सुधार के योग्य बातें दिखती हैं। प्रभु उसे बना भी रहा है और जितनी बन गई है, उसे प्रभु निष्कलंक, बेझुर्री भी बनाता जा रहा है, जिससे अन्ततः अपने पूर्ण स्वरूप में वह तेजस्वी, पवित्र और निर्दोष होकर उसके साथ खड़ी हो (इफिसियों 5:27)

       इन बातों का एक उत्तम उदाहरण राजा सुलैमान द्वारा परमेश्वर की आराधना के लिए बनवाया गया प्रथम मंदिर का निर्माण कार्य है। परमेश्वर के इस मंदिर के लिए लिखा गया है, “और बनते समय भवन ऐसे पत्थरों का बनाया गया, जो वहां ले आने से पहिले गढ़कर ठीक किए गए थे, और भवन के बनते समय हथौड़े सूली या और किसी प्रकार के लोहे के औजार का शब्द कभी सुनाई नहीं पड़ा” (1 राजा 6:7)। इस पद की बातों पर ध्यान कीजिए - मंदिर के निर्माण के लिए जो पत्थर तैयार किए गए, वे, निकाले जाने के बाद, और मंदिर में लगाए जाने से पहले, एक अलग स्थान पर गढ़कर, तराश कर, काट-छाँट कर ठीक कर लिए जाते थे। जब वे अपने स्थान पर बैठाए जाने के लिए तैयार हो जाते थे, तो उन्हें ला कर उनके निर्धारित स्थान पर स्थापित कर दिया जाता था। हर पत्थर का अपना निर्धारित स्थान था, जिसके आधार पर उसे गढ़, तराश और काट-छाँट कर तैयार किया जाता था। न तो वह पत्थर किसी अन्य का स्थान ले सकता था, और न ही कोई अन्य पत्थर उसका स्थान ले सकता था; और न ही वह पत्थर यह निर्धारित करता था कि वह कहाँ पर लगाया जाना पसंद करेगा। भवन बनाने वाले ने जिसे जहाँ के लिए निर्धारित और तैयार किया था, वह वहीं पर लाकर स्थापित किया जाता था। एक और बहुत अद्भुत बात थी कि उस पत्थर को बस लाकर उसके स्थान पर स्थापित कर दिया जाता था; उसे फिर गढ़ने, तराशने और काटने-छाँटने की, अर्थात अन्य के साथ ताल-मेल बैठाने के लिए सही करने की कोई आवश्यकता नहीं होती थी; वहाँ पर, मंदिर में, किसी भी औज़ार का शब्द सुनाई नहीं देता था। इसी प्रकार से प्रभु भी हमें इस संसार में, विभिन्न परिस्थितियों और अनुभवों के द्वारा गढ़कर, तराश कर, काट-छाँट कर तैयार कर रहा है। वह यह कार्य हमें अपने सुरक्षित स्थान, अपनी कलीसिया में लाकर करता है, जहाँ हम निरंतर उसकी निगरानी, उसकी देखभाल में रहते हैं। प्रभु के नियुक्त सेवकों के द्वारा हमें तैयार किया जाता है, प्रभु उन सेवकों के कार्य पर भी दृष्टि बनाए रखता है; और अन्ततः जब वह मसीही विश्वासी उसके द्वारा निर्धारित स्थान के लिए तैयार हो जाता है, प्रभु उसे वहाँ पर स्थापित कर देता है। इस प्रकार प्रभु द्वारा परमेश्वर के निवास के लिए यह मंदिर बनाया जा रहा है, निर्माणाधीन है। 

ध्यान कीजिए, जिस पहाड़, या खदान से ये पत्थर निकाले जाते थे, वहाँ पर छोटे-बड़े, विभिन्न आकार और प्रकार के अनेकों अन्य पत्थर भी होंगे; किन्तु हर पत्थर मंदिर में लगाए जाने के लिए उपयुक्त एवं उचित नहीं था। केवल वही पत्थर जो मंदिर में लगाए जाने के लिए उपयुक्त एवं उचित थे, उन्हें ही फिर गढ़ने, तराशने, और काटने-छाँटने के लिए लिया गया, और अन्ततः मंदिर में स्थापित किया गया। प्रभु के द्वारा कलीसिया के बनाए जाने में भी केवल वहीपत्थरया लोग सम्मिलित होंगे जो वास्तव में प्रभु की कलीसिया के हैं, जो उसेमसीहयानिजगत का एकमात्र उद्धारकर्तास्वीकार करके उस पर विश्वास रखते हैं, उसी के आज्ञाकारी रहते हैं। अन्य कोई भी, जो किसी भी अन्य आधार पर कलीसिया से जुड़ने का प्रयास करता है, अन्ततः उसका तिरस्कार कर दिया जाएगा, उसे कलीसिया से बाहर निकाल दिया जाएगा, और अनन्त विनाश के लिए भेज दिया जाएगा। मत्ती 13:24-30 के दृष्टांत पर ध्यान कीजिए; बुरे पौधों के खेत में बने और बढ़ते रहने, खेत के स्वामी द्वारा उनकी भी देखभाल होने, उन्हें भी पानी और खाद मिलने, पक्षियों और जानवरों से उनकी भी सुरक्षा किए जाने के द्वारा वे खेत के स्वामी को स्वीकार्य नहीं बन गए थे। उनका अन्तिम स्थान तो पहले से निर्धारित था, और वे फिर वहीं भेज भी दिए गए। इसी प्रकार, प्रभु की कलीसिया में जो प्रभु के मानकों और निर्धारण के द्वारा नहीं है, वह अभी अपने आप को कितना भी सुरक्षित और स्वीकार्य क्यों न समझता रहें, अन्ततः उन की वास्तविकता तथा अंतिम दशा अनन्त विनाश ही की होगी, वह स्वर्गीय मंदिर या कलीसिया का भाग कभी नहीं ठहरेंगे।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो अपने आप को जाँच-परख कर सुनिश्चित कर लीजिए कि आप प्रभु के मानकों और बुलाए जाने के द्वारा अपने आप को मसीही विश्वासी मानते हैं, या आप किसी अन्य रीति द्वारा प्रभु की कलीसिया से जुड़ने के कारण अपने आप मसीही विश्वासी समझते हैं। खेत में उगने वाले बुरे पौधों के लिए तो अपनी अंतिम दशा बदलना संभव नहीं था, किन्तु आपके पास अभी अवसर भी है, और प्रभु की क्षमा भी आपके लिए अभी उपलब्ध है, आप अभी भी अपनी अंतिम दशा बदल कर ठीक कर सकते हैं। अभी सही आँकलन करके सही निर्णय ले लीजिए; बाद में यदि अवसर न रहा, तो फिर अनन्त विनाश ही हाथ लगेगा। दूसरे, पृथ्वी पर प्रभु की कलीसिया में सम्मिलित होने के बाद, प्रभु आपको गढ़कर, तराश कर, काट-छाँट कर ठीक करता है कि आप उसकी स्वर्गीय कलीसिया में आपके उचित स्थान पर स्थापित किए जा सकें। यह प्रक्रिया अवश्य ही पीड़ादायक होती है, इसके द्वारा हमारे जीवन की कई बातें जो व्यर्थ और आत्मिक उन्नति एवं परिपक्वता के लिए बाधक हैं, निकाल दी जाती हैं। इसे कोई विलक्षण, अनहोनी, या अनुचित बात न समझें (प्रेरितों 14:22; 2 तिमुथियुस 3:12; इब्रानियों 12:5-12; 1 पतरस 4:1-2, 12-19)); हमारे तैयार किए जाने का ये बातें एक अनिवार्य भाग हैं

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 25-26     
  • मत्ती 8:1-17

रविवार, 9 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - स्वामित्व


प्रभु यीशु की कलीसिया का केवल प्रभु ही स्वामी है  

  पिछले लेख में हमने देखा था कि मत्ती 16:18 में लिखे प्रभु के कहे वाक्य - “...मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...”; में तीन बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं। इनमें से पहली, कि प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया बनाएगा पर हमने कल विचार किया था, और देखा था कि प्रभु यीशु ने अपनी कलीसिया, अर्थात, उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करने वाले लोगों को, वह स्वयं ही एक समूह में एकत्रित कर रहा है। उसने यह दायित्व अन्य किसी पर नहीं छोड़ा है, स्‍वर्गदूतों पर भी नहीं। मनुष्य और शैतान प्रभु की आँखों में धूल झोंक कर किसी को भी प्रभु की कलीसिया में सम्मिलित नहीं कर सकते हैं। प्रभु की कलीसिया या मण्डली में केवल प्रभु ही के लोग रह सकते हैं। हमने मत्ती 13:24-30 के दृष्टांत से देखा था कि यद्यपि शैतान ने प्रभु के लोगों के मध्य में अपने लोग घुसाने के प्रयास किए हैं, किन्तु समय-समय पर प्रभु उन्हें प्रकट और पृथक करता रहता है। इसी दृष्टांत की शिक्षा से हम अंत के समय पर होने वाली उस बड़ी छंटनी को भी सीखते हैं, जिसमें प्रभु के लोगों और उनमें शैतान द्वारा मिलाए गए दुष्टों को पृथक कर दिया जाएगा, और शैतान के लोग, उसके साथ अनन्त विनाश में चले जाएंगे, यद्यपि वे इस पृथ्वी पर प्रभु के लोगों के साथ ही प्रभु की भलाई और देखभाल का आनन्द लेते रहे थे। साथ ही अपने लोगों के प्रति प्रभु के प्रेम और संलग्न होने को, इस दृष्टांत में 28 और 29 पदों में देखिए; उस किसान ने, अर्थात प्रभु परमेश्वर ने, बुरे पौधों को अच्छों के साथ इसलिए पलने-बढ़ने दिया, उसके संसाधनों और देखभाल का इसलिए लाभ उठाने दिया, उन्हें कटनी से पहले इसलिए नहीं निकाला, कि कहीं उन बुरों को निकालने के प्रयास में उसके अच्छे पौधों की कोई हानि न हो जाए। प्रभु को अपने लोगों की जरा सी भी हानि बिलकुल स्वीकार नहीं है।  

मत्ती 16:18 में प्रभु द्वारा कहे इस वाक्य में दूसरी बात थी कि प्रभु ही अपनी कलीसिया का स्वामी है, वह उसेअपनी कलीसियाकह कर संबोधित करता है। उस वास्तविक, सच्ची कलीसिया का बनाने वाला भी प्रभु है, और उसका स्वामी भी प्रभु ही है; प्रभु ने कलीसिया को किसी अन्य के स्वामित्व में नहीं छोड़ दिया है। नए नियम में हम देखते हैं कि लगभग सभी स्थानों पर विभिन्न स्थानों की कलीसियाओं कोपरमेश्वर की कलीसियाया इसके समान वाक्यांश के द्वारा संबोधित किया गया है (प्रेरितों 20:28; 1 कुरिन्थियों 1:2; 2 कुरिन्थियों 1:1; गलातीयों 1:13; 1 तिमुथियुस 3:5, 15; इत्यादि); कुछ स्थानों पर उस स्थान के नाम से, जहाँ पर प्रभु के लोग निवास करते थे, भी संबोधित किया गया है (कुलुस्सियों 4:16; 1 थिस्सलुनीकियों 1:1; 2 थिस्सलुनीकियों 1:1; प्रकाशितवाक्य 2:1; आदि)। किन्तु कहीं पर भी उस स्थान की उस मंडली के किसी अगुवे के नाम से, अथवा किसी प्रेरित या प्रचारक के नाम से, जिसके परिश्रम के द्वारा वहाँ लोगों ने प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण किया, संबोधित नहीं किया गया है। संपूर्ण बाइबल में कलीसिया कभी प्रभु को छोड़, किसी अन्य व्यक्ति अथवा संस्था की बताई या दिखाई ही नहीं गई है। जब लोगों ने अपने मध्य प्रचारकों, प्रेरितों, और अगुवों के नाम से गुट बनाने का प्रयास किया, तो तुरंत ही परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इसकी तीव्र भर्त्सना की, और इस प्रवृत्ति को अंत करवाया (1 कुरिन्थियों 1:12-13); ध्यान कीजिए, यहाँ यह नहीं लिखा है कि कुरिन्थुस की मण्डली के लोग उन अगुवों के नाम से अलग मण्डलियां बनाने के प्रयास कर रहे थे। मण्डली तो वही एक ही थी, उसी में अलग-अलग गुट बनाने के प्रयास हो रहे थे; किन्तु प्रभु की कलीसिया में यह भी अस्वीकार्य था। प्रभु को छोड़ किसी अन्य के नाम से मसीही विश्वासियों को पहचाने जाने की प्रवृत्ति को तुरंत ही समाप्त करवा दिया गया। 

मत्ती 25 अध्याय में प्रभु ने अपने दूसरे आगमन से संबंधित दृष्टान्तों में, पद 14-30 में स्वामी द्वारा परदेश जाते समय, उनकी सामर्थ्य के अनुसार, अपनी संपत्ति अपने दासों को सौंपने का दृष्टांत दिया गया है, जिसके अंत में उन दासों से उन्हें सौंपी गई ज़िम्मेदारी का हिसाब लेने और उनके द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने या नहीं निभाने के अनुसार प्रतिफल देने का वर्णन है। ध्यान कीजिए, दास भी स्वामी ने ही चुने, और किसे क्या ज़िम्मेदारी देनी है यह निर्णय भी स्वामी ने ही किया, और स्वामी ने एक निर्धारित समय के लिए ही अपने निर्धारित दासों को उनकी योग्यता के अनुसार संपत्ति की ज़िम्मेदारी सौंपी, संपत्ति को छोड़ या त्याग नहीं दिया, और फिर आकार उन से हिसाब भी लिया। इसी के अनुरूप, इफिसियों 4:11-12 में प्रभु यीशु द्वारा कलीसिया के लिए लिखा गया है, “और उसने कितनों को भविष्यद्वक्ता नियुक्त कर के, और कितनों को सुसमाचार सुनाने वाले नियुक्त कर के, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त कर के दे दिया। जिस से पवित्र लोग सिद्ध हों जाएं, और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाएस्पष्ट है कि ये ज़िम्मेदारियाँ, प्रभु द्वारा की गईनियुक्तियाँहैं, अर्थात एक निर्धारित समय के लिए सौंपे गए दायित्व; उन्हें दी गई विरासत नहीं हैं। साथ ही इन नियुक्तियों का उद्देश्य भी दिया गया है - कलीसिया की उन्नति, सिद्धता, और मसीही सेवकाई। 

इसीलिए प्रेरितों 20:28 में प्रेरित पौलुस, और 1 पतरस 5:1-4 में प्रेरित पतरस कलीसिया के अगुवों से उन्हें सौंपे गए कलीसिया की देखभाल के इस दायित्व के बहुत ध्यान और लगन से निर्वाह करने के लिए आग्रह करता है। प्रभु के लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले, उन्हें अपने स्वार्थ और भौतिक लाभ के लिए प्रयोग करने वाले, सौंपी गई जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह रहने वाले दास का क्या परिणाम होगा, यह आप प्रभु के दूसरे आगमन से संबंधित एक अन्य दृष्टांत में, मत्ती 24:45-51 में पढ़ सकते हैं। पुराने नियम में भी परमेश्वर के लोगों के प्रति ऐसा ही दुर्व्यवहार करने वाले इस्राएल के चरवाहों के लिए भी परमेश्वर द्वारा ऐसी ही तीव्र प्रतिक्रिया और दण्ड की आज्ञा दी गई है - यहेजकेल 34 अध्याय इसका एक उत्तम उदाहरण है। तात्पर्य यह कि प्रभु अपनी कलीसिया का स्वामी है और अपने स्वामित्व में कोई हस्तक्षेप सहन नहीं करता है। वह अपने इस स्वामित्व को बहुत गंभीरता से लेता है, उसका पूरा ध्यान और हिसाब रखता है, कलीसिया की देखभाल के लिए स्वयं ही दासों को उनकी योग्यता के अनुसार नियुक्त करता है, और अपने लोगों की जरा सी भी हानि, उनके प्रति थोड़ी सी भी लापरवाही कतई सहन नहीं कर सकता है। उसके लोगों के प्रति लापरवाही या दुर्व्यवहार करने वाले को बहुत भारी और बहुत दुखद परिणाम भोगना पड़ेगा, ऐसा सेवक किसी भी रीति से अपने इस अनुचित व्यवहार के लिए बचेगा नहीं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं; विशेषकर यदि प्रभु की मण्डली में आपको इफिसियों 4:11 तथा 1 कुरिन्थियों 12:28 में उल्लेखित जिम्मेदारियों के समान, या अन्य किसी भी ज़िम्मेदारी का कोई पद दिया गया है, तो आप से विनम्र निवेदन है कि यहेजकेल 34 अध्याय तथा मत्ती 24:45-51 को प्रतिदिन, बेहतर हो कि अपने दिन और जिम्मेदारियों को आरंभ करते समय प्रातः के समय, कम से कम एक बार अवश्य पढ़ा करें। एक मसीही विश्वासी होने के नाते अपने आप को जाँच कर भी देख लें कि आप प्रभु यीशु के स्वामित्व की अधीनता में होकर कार्य कर रहे हैं, या किसी मनुष्य, अगुवे, अध्यक्ष, डिनॉमिनेशन, या संस्था की अधीनता में होकर और प्रभु के स्वामित्व को नजरंदाज करते हुए कार्य कर रहे हैं। पवित्र आत्मा ने पौलुस से लिखवाया, “यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता” (गलातियों 1:10); आप परमेश्वर के वचन की इस चेतावनी के अनुसार कहाँ खड़े हैं?  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 23-24     
  • मत्ती 7

शनिवार, 8 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - स्वयं प्रभु ही के द्वारा

 

प्रभु यीशु अपनी कलीसिया स्वयं ही बना रहा है  

मसीही विश्वासियों की मण्डली, या प्रभु की कलीसिया के विषय इस अध्ययन में हम मत्ती 16:18 से, जहाँकलीसियाशब्द बाइबल में सबसे पहले प्रयोग हुआ है, कलीसिया के विषय वचन में दी गई बातों को देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डलीइस पत्थर”, जो मत्ती 16:16 में पतरस को परमेश्वर से मिले दर्शनतू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह हैपर आधारित है। हमने यह भी देखा कि पतरस को मिले इस ईश्वरीय दर्शन मेंयीशुकी बजाएमसीह”, अर्थात “परमेश्वर द्वारा नियुक्त और अभिषिक्त जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता” शब्द के प्रयोग का क्या महत्व है; और फिर पिछले लेख में हमने समझा था कि प्रभु यीशु मसीह के जगत काएकमात्र उद्धारकर्ताहोने का क्या तात्पर्य है। संभव है कि कुछ लोगों को यह विश्लेषण नाहक हीबाल की खाल निकालने’, शब्दों से खेलने, के समान लगता हो। किन्तु अनन्तकाल के दृष्टिकोण और मसीही विश्वासी होने के उद्देश्य की ठीक समझ रखने के लिए इन बातों को जानना और समझना अत्यावश्यक है, अनिवार्य है। 

मत्ती 16:18 में लिखे प्रभु के कहे वाक्य पर ध्यान कीजिए - “...मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...”; प्रभु के इस वाक्य में तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं:

  • पहली, प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया, अर्थात उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता मानने वालों के समूह को एकत्रित करेगा; वह यह कार्य किसी और से नहीं करवाएगा, यह ज़िम्मेदारी किसी और को नहीं सौंपेगा, वरन इस स्वयं ही पूरा करेगा। यही इस बात को दिखाता है कि यह कार्य कितना महत्वपूर्ण है, और इसे ठीक से करना कितना आवश्यक है; इसमें किसी भी प्रकार की कोई भी त्रुटि होने, कमी रहने का कोई स्थान, कोई गुंजाइश ही नहीं है। इसलिए वह सिद्ध, सर्वज्ञानी, सर्वशक्तिमान, सार्वभौमिक प्रभु परमेश्वर इसे स्वयं ही पूरा करेगा।  
  • दूसरी, वह कलीसिया प्रभु यीशु की अपनी होगी; उसे किसी व्यक्ति या स्थान, या किसी अन्य भौतिक, नश्वर, नाशमान के नाम या गुण के आधार पर नहीं जाना जाएगा; वह केवलप्रभु यीशु की कलीसियाप्रभु यीशु द्वारा बुलाए और एकत्रित किए गए लोगों का और उस ही के नाम से पहचाने जाने वाले लोगों का समूह होगा। 
  • तीसरी, प्रभु ने कहा कि वह ही अपनी इस कलीसिया कोबनाएगा’ - भविष्य काल; जब प्रभु ने यह बात कही कलीसिया उस समय वर्तमान नहीं थी, बनाई जानी थी। प्रभु द्वारा कही गई यह बात प्रेरितों 2 अध्याय में पतरस के प्रचार और उस प्रचार द्वारा हुई प्रतिक्रिया के साथ आरंभ हुई थी। किसी वस्तु कोबनानेमें समय और प्रयास लगता है, उसे उसके पूर्ण और अंतिम स्वरूप में लाने या ढालने के लिए एक प्रक्रिया से होकर निकलना पड़ता है। प्रभु की कलीसिया भी प्रभु के द्वाराबनाईजा रही है, उसमें अभी भी संसार भर से लोग जोड़े जा रहे हैं। अभी वह पूर्ण नहीं हुई है। प्रभु उसे बना भी रहा है और जितनी बन गई है, उसे प्रभु निष्कलंक, बेझुर्री भी बनाता जा रहा है, जिससे अन्ततः अपने पूर्ण स्वरूप में वह तेजस्वी, पवित्र और निर्दोष होकर उसके साथ खड़ी हो (इफिसियों 5:27)। अभी प्रभु उसे बनाने में कार्यरत है, कलीसिया निर्माणाधीन है, इसीलिए आज हमें उसमें कुछ कमियाँ, दोष, अपूर्णता, और सुधार के योग्य बातें दिखती हैं।

हम इन तीनों बातों को, परमेश्वर के वचन बाइबल के आधार पर, बारी-बारी से कुछ और विस्तार से देखेंगे। 

पहली बात, प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया को बना रहा है। उसने यह कार्य किसी और पर, यहाँ तक कि उसके मानवीय शिष्य तो दूर, इस स्‍वर्गदूतों के हाथों में भी नहीं छोड़ा है। यही प्रभु परमेश्वर के लिए इस बात के महत्व और बड़े ध्यान तथा बारीकी से किए जाने की अनिवार्यता को दिखाता है। कलीसिया के आरंभ होने, और आरंभिक विस्तार के बारे में बाइबल में लिखी बातों को देखिए:

  • सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए। और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (प्रेरितों 2:41-42)। पतरस द्वारा किए गए प्रचार, और पापों से पश्चाताप के आह्वान (प्रेरितों 2:38) से कायल होकर उनभक्त यहूदियों” (प्रेरितों 2:5) में से तीन हज़ार ने प्रभु के वचन पर विश्वास किया, बपतिस्मा लिया, औरउनमेंअर्थात प्रभु के उन चुने हुए शिष्यों में मिल गए। साथ ही उनके जीवनों, प्रभु के प्रति उनके दृष्टिकोण, और उनकी प्राथमिकताओं में एक आधारभूत परिवर्तन आ गया; अब वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, संगति रखने, प्रभु की मेज़ में सम्मिलित होने, और प्रार्थना करने में लौलीन रहने लगे। यह कलीसिया का, और सच्चे मसीही विश्वासियों की पहचान और उनके मन तथा जीवन में होने वाले परिवर्तन आरंभ था 
  • और परमेश्वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उन से प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उन को प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता था” (प्रेरितों 2:47)। इसके बाद जो लोग उद्धार पाते थे, उन्हें न तो प्रभु के शिष्य या प्रेरित, और न ही इन प्रथम 3000 विश्वासियों में से कोई व्यक्ति, वरन स्वयं प्रभु ही अपने शिष्यों को अपनी कलीसिया में मिला देता था।
  • और प्रेरितों के हाथों से बहुत चिन्ह और अद्भुत काम लोगों के बीच में दिखाए जाते थे, (और वे सब एक चित्त हो कर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे हुआ करते थे। परन्तु औरों में से किसी को यह हियाव न होता था, उन में जा मिलें; तौभी लोग उन की बड़ाई करते थे। और विश्वास करने वाले बहुतेरे पुरुष और स्त्रियां प्रभु की कलीसिया में और भी अधिक आकर मिलते रहे।) (प्रेरितों 5:12-14)। कलीसिया के आरंभिक समय से ही प्रेरितों के द्वारा बहुत चिह्न और अद्भुत काम लोगों के मध्य होने लगे; लोग उन सभी की बड़ाई करते थे; किन्तु फिर भी किसी में स्वतः ही उनमें मिल जाने का साहस नहीं होता था। न ही यह लिखा है कि प्रेरित या शिष्य लोगों को अपने में मिला लेते थे - यद्यपि वे पवित्र आत्मा से भरे हुए थे, सामर्थ्य से पापों से पश्चाताप और उद्धार का सुसमाचार सुना सकते थे, चिह्न और अद्भुत कार्य तो कर सकते थे, किन्तु किसी को भी मण्डली या कलीसिया में सम्मिलित नहीं कर सकते थे।प्रभु की कलीसियामें स्वयं प्रभु ही लोगों को जोड़ता था; अन्य कोई भी नहीं। प्रथम कलीसिया, “प्रभु की कलीसियाथी; किसी प्रेरित की, या किसी स्थान की बनाई अथवा स्थापित की हुई कलीसिया नहीं थी। 

और जब प्रभु का काम बढ़ने लगा, तो प्रभु द्वारा मत्ती 13:24-30 में दिए दृष्टांत, और 13:37-43 में दी गई उसकी व्याख्या के अनुसार, शैतान ने भी प्रभु के लोगों में अपने दुष्ट लोग मिलाना आरंभ कर दिया। किन्तु वर्तमान में प्रभु ने स्‍वर्गदूतों को भी उन दुष्ट लोगों को हटाने की अनुमति नहीं दी है, वरन, इस पृथक करने के कार्य को अंत के लिए रखा है, कहीं दुष्टों को हटाने में प्रभु के लोगों की हानि न हो जाए (13:28-30) - प्रभु स्‍वर्गदूतों को भी अपनी कलीसिया के साथ छेड़-छाड़ नहीं करने देता है। किन्तु समय-समय पर प्रभु अपने लोगों को सचेत करता रहता है, उन दुष्टों को प्रकट तथा अलग करता रहता है (प्रेरितों 20:29-31; 2 तिमुथियुस 4:10, 14; 1 यूहन्ना 2:18-19; 4:1-6; 3 यूहन्ना 1:9-10)। प्रभु की कलीसिया में केवल प्रभु के ही लोग रहने पाएंगे, प्रभु अन्य किसी को नहीं रहने देगा; और यह कलीसिया के लोगों को जाँचने, परखने, सही को गलत से पृथक करने का कार्य प्रभु स्वयं ही करता रहता है; किसी अन्य से कदापि नहीं करवाता है, कहीं गलती से उसका एक भी विश्वासी जन कोई हानि न उठाए। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अपने आप को जाँच कर देखिए कि आप किस आधार पर अपने आप को मसीही विश्वासी कहते हैं, और किस प्रक्रिया के द्वारा कलीसिया से जुड़े हैं? जिस कलीसिया से आप जुड़े हैं, क्या वह वास्तव में प्रभु की कलीसिया है, या किसी मनुष्य, डिनॉमिनेशन, या संस्था की स्थापित की हुई, उनके नियमों और धारणाओं के अनुसार संचालित की जाने वाली कलीसिया है? इस जाँचने और पहचानने का एक चिह्न है प्रथम कलीसिया की स्थापना के साथ कलीसिया के सदस्यों के जीवनों में आया परिवर्तन और उनका प्रेरितों 2:42 की बातों में लौलीन रहना। क्या 2:42 की वे चार बातें, आपके जीवन का भी अनिवार्य और सर्वोपरि भाग हैं; क्या आप भी उनमें लौलीन रहते हैं?

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 20-22     
  • मत्ती 6:19-34  

शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - “एकमात्र उद्धारकर्ता” पर बनी हुई

 प्रभु यीशु केएकमात्र उद्धारकर्ताहोने का अर्थ

पिछले लेखों में हम मत्ती 16:18 के आधार पर प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया या मण्डली, अर्थात उसके द्वारा चुने और बुलाए गए लोगों का समूह होने के बारे में देखते आ रहे हैं। हम देख चुके हैं कि प्रभु ने अपने इन चुने हुए लोगों पतरस पर आधारित करके नहीं बुलाया और स्थापित किया; वरन उन्हें अपने तथा अपने वचन की शिक्षाओं पर आधारित एवं स्थापित किया है। साथ ही हमने पिछले लेख में यह भी देखा था कि प्रभु की कलीसिया, अर्थात उसके बुलाए हुए लोग वे हैं जो उसेमसीहअर्थात परमेश्वर द्वारा नियुक्त और निर्धारित जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं। 

मसीहीकहलाना या समझे जाना, और वास्तविकता में वह सच्चामसीहीहोना जिसकी बात प्रभु यीशु ने मत्ती 16:18 में की है, व्यवहारिक रीति से दो बिलकुल भिन्न बातें हैं। यद्यपि सामान्यतः यही समझा और माना जाता है कि किसी परिवार विशेष में जन्म लेने के आधार पर, या किसी डिनॉमिनेशन, अथवा संस्था, याचर्चका सदस्य होने और उसकी प्रथाओं के निर्वाह, और कुछ अनुष्ठानों की पूर्ति, आदि के द्वारा व्यक्ति ईसाई या मसीही जन्म से ही होता है या फिर बन जाता है। किन्तु इस आम लेकिन गलत धारणा के विपरीत, परमेश्वर के वचन बाइबल की वास्तविकता यही है कि ऐसा करने से वह व्यक्ति समाज, कुछ लोगों, अथवा उसचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था के द्वारा तोमसीहीमाना और कहा जा सकता है; किन्तु अनिवार्य नहीं है कि वह वास्तव में प्रभु की दृष्टि में भीमसीहीहो, प्रभु की कलीसिया या बुलाए हुए लोगों में सम्मिलित हो। क्योंकि जो कोई भी अपने परिवार, अपनी धार्मिकता, अपने कर्मों, अपनीचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था की सदस्यता, अपने द्वारा प्रथाओं के निर्वाह और अनुष्ठानों की पूर्ति आदि पर आधारित होकर प्रभु की कलीसिया का सदस्य होना चाहता अथवा समझता है, वह इस प्राथमिक आधारभूत बात की वास्तविकता की उपेक्षा कर देता है कि वह फिर प्रभु यीशु के जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता होने पर नहीं, वरन प्रभु परमेश्वर के अतिरिक्त उसचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था की अन्य बातों पर भरोसा रख कर और उनका पालन करके ऐसा करना चाहता है, और यह प्रभु की कलीसिया में होने की मूल शर्त की अवहेलना करना है। क्योंकि प्रभु को परमेश्वर कामसीहस्वीकार करना, पापों से पश्चाताप और मसीह यीशु को अपने जीवन के पूर्ण समर्पण के द्वारा होता है (रोमियों 10:9-10), वंश या कर्मों, या अनुष्ठानों के द्वारा नहीं। 

ध्यान कीजिए, जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने प्रभु के आगमन के लिए लोगों को तैयार करना आरंभ किया तो उसके प्रचार का प्रथम और मुख्य विषय पश्चाताप करना था (मत्ती 3:1-2); यही प्रभु यीशु की सेवकाई का भी प्रथम और मुख्य विषय था (मरकुस 3:1-2); तथा प्रभु द्वारा शिष्यों को दिए गए अंतिम निर्देश का भी विषय था (लूका 24:47); यही शिष्यों के द्वारा किए गए पहले प्रचार का मुख्य विषय था (मरकुस 6:12); और पश्चाताप करना ही पतरस के द्वारा किए गए पहले प्रचार का प्रथम और मुख्य विषय था (प्रेरितों 2:38), जिससे प्रथम कलीसिया की स्थापना हुई थी; यही पौलुस के द्वारा किए गए प्रचार का मुख्य विषय था (प्रेरितों 20:21); और पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं की सेवकाई का विषय भी यही था (यिर्मयाह 25:4-5)। इसलिए जब प्रभु ने उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करने के आधार पर लोगों को बुलाने और अपने साथ एकत्रित करने, कलीसिया को बनाने की बात की, तो कोई अनूठा या नया विषय सामने नहीं रखा। प्रभु ने वही दृढ़ता से दोहराया और उसी की पुष्टि की जो पुराने नियम में भविष्यद्वक्ताओं की सेवकाई का विषय था, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की सेवकाई का विषय था, प्रभु की अपनी सेवकाई का, और शिष्यों द्वारा की गई पहली सेवकाई का विषय था; और जो भविष्य में अन्य शिष्यों द्वारा की जाने वाली सेवकाई का भी विषय होना था। बिना अपने पापों से पश्चाताप किए और प्रभु यीशु को अपना जीवन पूर्णतः समर्पण करके जीवन में परिवर्तन किए (रोमियों 12:1-2) उद्धार पाने या परमेश्वर को स्वीकार्य प्रभु का जन हो जाने की कोई शिक्षा बाइबल में कहीं नहीं दी गई है। प्रभु का जन बनना प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से और स्वेच्छा से अपने पापों के लिए किए गए पश्चाताप, उन पापों की क्षमा और निवारण के लिए प्रभु यीशु द्वारा क्रूस पर किए गए कार्य को स्वीकार करने, और अपना जीवन पूर्णतः प्रभु को समर्पित करने के द्वारा होता है, चाहे उस व्यक्ति का जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, और चाहे उसने कितनी भी “ईसाई या मसीहीरीतियों और अनुष्ठानों को निभाया हो (प्रेरितों 17:30-31)। प्रभु कोमसीहया परमेश्वर द्वारा नियुक्त जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता होना स्वीकार करने का यही अभिप्राय है। प्रभु की कलीसिया या मण्डली उन ही लोगों से मिलकर बनी है जो इस मूल सिद्धांत को स्वीकार करके इसका पालन करते हैं; इसमें कुछ और जोड़ते-घटाते नहीं हैं, मनुष्यों की और उनके समझ-बुद्धि-ज्ञान की बातों को या बाइबल के बाहर की किसी अन्य बात को इसके साथ या इसके अतिरिक्त मानने या मनवाने का प्रयास नहीं करते हैं। 

हम अगले लेख में देखेंगे कि क्यों ये बातें केवल शब्दों का खेल या भिन्न समझ रखने की बात नहीं है; क्यों ये इतनी महत्वपूर्ण हैं; अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए समझे और माने जाने के लिए अनिवार्य हैं। 

यदि आप मसीही हैं, तो अपने आप को जाँचिए और परखिए कि कहीं आप अपने परिवार, अपने कार्यों, अपने द्वारा रीतियों और अनुष्ठानों को निभाने, आदि बातों के आधार पर तो अपने आप को मसीही और प्रभु की कलीसिया का सदस्य तो नहीं समझ रहे हैं, या समझते आ रहे हैं? यदि ऐसा है तो आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं, और अभी समय रहते अपने पापों के लिए सच्चा पश्चाताप और प्रभु यीशु को संपूर्ण समर्पण कर के इसे सुधार लीजिए। कहीं आप किसी भ्रम में जीते रह जाएं, और अंततः जब सच्चाई समझ में आए, आँख खुले, तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 18-19     
  • मत्ती 6:1-18