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रविवार, 13 मार्च 2022

कलीसिया की, तथा मसीही जीवन में उन्नति

 

उन बातों को देखने के पश्चात जिनके कारण मसीही जीवन तथा कलीसिया की उन्नति बाधित होती है, मसीही विश्वासी अपरिपक्व ही बने रहते हैं, आज हम व्यक्तिगत मसीही जीवन में, तथा प्रभु की कलीसिया के द्वारा, उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होने के बारे में देखेंगे। इफिसियों 4:15 में लिखा है कि “वरन प्रेम में सच्चाई से चलते हुए, सब बातों में उस में जो सिर है, अर्थात मसीह में बढ़ते जाएं”; अर्थात मसीही जीवन में उन्नति का, बढ़ोतरी का तरीका है प्रेम, और सच्चाई से रहना तथा व्यवहार करना, और जीवन की हर बात में मसीह यीशु का अनुकरण करना। इन्हीं शिक्षाओं को पवित्र आत्मा ने अन्य कलीसियाओं के लिए भी पौलुस के द्वारा लिखवाया है। वास्तव में, वचन के अनुसार, प्रेम और सच्चाई प्रभु यीशु ही के विभिन्न स्वरूप या उपनाम हैं; इसलिए जो प्रभु यीशु मसीह का अनुकरण करेगा, वह स्वतः ही प्रेम और सच्चाई का व्यवहार भी रखेगा। साथ ही, यह हमको अपने आप को जाँचने का तरीका भी देता है, कि यदि हम में प्रेम और सच्चाई नहीं हैं, तो हम बाहर से चाहे जो भी दिखाते और करते रहें, हम प्रभु यीशु का अनुकरण नहीं कर रहे हैं, इसलिए हमारी अन्य हर बात व्यर्थ है, निष्फल है, यदि प्रेम और सच्चाई हमारे जीवन में नहीं हैं। प्रेम की परिभाषा और प्रेम से चलने या व्यवहार करने के क्या गुण हैं, यह 1 कुरिन्थियों 13 अध्याय में लिखवाया गया है; और इस अध्याय के अंतिम पद, पद 13 में यहाँ तक लिखा है कि “पर अब विश्वास, आशा, प्रेम थे तीनों स्थाई है, पर इन में सब से बड़ा प्रेम है”। प्रेरित यूहन्ना ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में लिखा कि परमेश्वर प्रेम है और जो इस प्रेम को नहीं जानता है, वह परमेश्वर को भी नहीं जानता है (1 यूहन्ना 4:8, 16)। यूहन्ना ने ही इस प्रेम के कलीसिया में व्यावहारिक प्रकटीकरण के विषय लिखा, (1 यूहन्ना 4:20-21) और इस संदर्भ में “भाई” शब्द के अर्थ को भी बताया - प्रभु यीशु की मण्डली के हमारे साथी, सह-विश्वासी (1 यूहन्ना 3:14)।


प्रभु यीशु मसीह ने अपने विषय कहा था, “यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता” (यूहन्ना 14:6)। और मसीह यीशु का अनुकरण करने के विषय पौलुस ने लिखा, “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूं” (1 कुरिन्थियों 11:1)। कुलुस्सियों 2 अध्याय, प्रभु यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए उसके वचन और सच्चाई के साथ चलते रहने के बारे में है। पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इस 2 अध्याय लिखवाया है:

  • पद 1-2 - उसका कलीसियाओं में परिश्रम करते रहने का एक उद्देश्य था कि कलीसियाओं को प्रेम में गठे तथा शांति से रहने वाला बनाए, उन्हें परमेश्वर पिता तथा प्रभु यीशु के पहचान में स्थापित और दृढ़ करे। अर्थात, प्रेम में गठना, शांति से रहना, और पिता परमेश्वर तथा प्रभु यीशु की पहचान में स्थापित और दृढ़ होना संबंधित हैं, एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं। 

  • पद 3-8 - प्रभु यीशु मसीह ही में बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हैं; इसलिए जो मसीह यीशु की पहचान और ज्ञान में स्थापित और दृढ़ होगा, वह मनुष्यों की लुभाने वाली बातों से भरमाया भी नहीं जाएगा। जब भी कोई शंका हो, प्रभु यीशु मसीह और उसकी शिक्षाओं की ओर लौट आएं, और गलत शिक्षा तथा भरमाए जाने से बच जाएंगे। 

  • पद 9-15 - मसीह यीशु ही परमेश्वर का सदेह प्रतिरूप है, और पूर्णतः परमेश्वर भी है। जो मसीह यीशु में, अर्थात उसके वचन और उसकी शिक्षाओं में बने रहते हैं, उनका पालन करते रहते हैं, वे उसकी भरपूरी के भी संभागी होते हैं। मसीह यीशु में हमारे लिए व्यवस्था की विधियों की सभी बातें पूरी कर दी गई हैं, और उन्हें पूरा करके उसने उनका हमारे द्वारा फिर से उनका पालन किए जाने को हटा दिया है, व्यवस्था के पालन से मुक्त कर दिया है। मसीह यीशु में होकर अब हम परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरते हैं। इसलिए फिर से व्यवस्था की बातों के पालन में जाना, कर्मों द्वारा धर्मी बनने के प्रयास करना, प्रभु यीशु मसीह के कार्य को व्यर्थ करना, उसका अपमान करना है। 

  • पद 16-23 - उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, अब किसी भी मसीही विश्वासी को किसी भी प्रकार के कर्मों की धार्मिकता के द्वारा अपने आप को धर्मी दिखाने और ठहराने की आवश्यकता नहीं है। इन पदों में कही गई विभिन्न बातें देखने और सुनने में अच्छी और सही लगती हैं, किन्तु किसी का भी जीवन नहीं बदल सकती हैं, उसे पापों से मुक्ति प्रदान नहीं कर सकती हैं; जो केवल और केवल पापों से पश्चाताप करने और प्रभु यीशु मसीह से उनके लिए क्षमा माँगकर उसे अपना जीवन समर्पित करने के द्वारा मिलती है। जैसा इस अध्याय के अंतिम पद में, अंतिम वाक्य में लिखा है, विभिन्न कर्मों और अनुष्ठानों की ये सारी बातें तो शारीरिक लालसाओं को भी नहीं रोकने पाती हैं, तो फिर उन पर विजयी कैसे बनाने पाएंगी?


इसलिए प्रेम, सच्चाई और प्रभु यीशु में बढ़ते जाना, प्रभु यीशु को “सिर” अर्थात नियंत्रण करने और मार्गदर्शन करने वाला मानकर उसकी तथा उसके वचन की अधीनता में बने रहना ही व्यक्तिगत रीति से मसीही जीवन में, और कलीसिया के जीवन की उन्नति और सुरक्षा का मार्ग है। 


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप प्रेम, सच्चाई और प्रभु यीशु मसीह के अनुकरण में निरंतर न केवल बने रहें, वरन बढ़ते भी जाएं। यही आपके मसीही जीवन को और उन्नत बनाने, सुधारने, और परमेश्वर के लिए उपयोगी बनाने का मार्ग है, तथा साथ ही आपको अपने स्वयं की जाँच करते रहने का एक माप-दण्ड भी प्रदान करता है, जिससे आप मसीही जीवन में अपनी प्रगति और उन्नति को जाँचते तथा देखते रहें। इसलिए अपने जीवन में इन तीन बातों के व्यावहारिक उपयोग को कभी कम न होने दें, उनमें बढ़ते ही रहने के प्रयास में लगे रहें। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

   

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 20-22          

  • मरकुस 13:21-37      


शनिवार, 12 मार्च 2022

भ्रामक शिक्षाओं का संक्षिप्त पुनःअवलोकन

     पिछले लेखों में हमने देखा है कि प्रभु ने अपनी कलीसिया और अपने विश्वासियों की आत्मिक उन्नति के लिए उन में विभिन्न प्रकार की वचन की सेवकाई करने वालों को नियुक्त किया है (इफिसियों 4:11-12)। इन सेवकों की सेवकाई से होने वाली उन्नति और परिपक्वता की चरम सीमा है सभी मसीही विश्वासियों और पृथ्वी की सभी स्थानीय कलीसियाओं का इफिसियों 4:13 के अनुरूप हो जाना; इस 13 पद के संदर्भ में, जैसा हम पहले 9 फरवरी के लेख में देख चुके हैं, यहाँ मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद “सिद्ध” किया गया है, उसका शब्दार्थ होता है “पूर्णतः सुसज्जित” होना, अर्थात किसी भी कार्य या ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए पूरी तरह से तैयार और आवश्यक संसाधनों एवं उपकरणों तथा समझ-बूझ से लैस होना। 

फिर हमने इफिसियों 4:14 से बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की पहचान देखी थी कि वे बहुत सरलता से शैतान द्वारा मनुष्यों में होकर प्रयोग की जाने वाली ठग-विद्या का शिकार हो जाते हैं; भ्रम की युक्तियों में फंस जाते हैं; और भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं। इस संदर्भ में हमने देखा है कि इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं, जो उनके गलत और अस्वीकार्य होने तथा उनसे सचेत रहने की प्रमुख पहचान हैं। इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार, जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता।” किन्तु साथ ही इसी पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बेरिया के विश्वासियों के समान (प्रेरितों 17:11) बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 


फिर हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, इन तीनों विषयों से संबंधित गलत शिक्षाओं और बाइबल की सही शिक्षाओं को देखा था। 


हमने पहले तो प्रेरितों के काम में से प्रभु यीशु से संबंधित शिक्षाओं को देखा, वे संक्षेप में यह हैं:

  • प्रभु यीशु पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य हैं। 

  • उनके और उनकी सेवकाई के विषय पुराने नियम की सभी पुस्तकों में पहले से लिखा गया है। 

  • प्रभु यीशु कलवरी के क्रूस पर मारे गए, गाड़े गए, और तीसरे दिन मृतकों में से जी भी उठे।

  • उद्धार केवल प्रभु यीशु मसीह के द्वारा है, अन्य किसी के द्वारा नहीं। 

  • प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाने वालों के जीवन बदल जाते हैं, वे निडर और परमेश्वर के प्रभावी जन बन जाते हैं, उन में होकर परमेश्वर अपनी अद्भुत सामर्थ्य संसार पर प्रकट करता है। 

  • जगत के अन्त के समय, प्रभु यीशु ही के द्वारा सभी का न्याय किया जाएगा, और उन्हें उनके जीवन और कार्यों के अनुसार प्रतिफल अथवा दण्ड दिए जाएंगे। 

    

    यद्यपि प्रभु यीशु के विषय यह सूची अंतिम या पूर्ण नहीं है, किन्तु प्रभु यीशु के विषय जिस भी प्रचार में ये बातें नहीं हैं, या इन बातों को बदलकर बताया जाता है, वह प्रचार गलत है, झूठा है, अस्वीकार्य है। 


फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सही शिक्षाओं को तथा सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से विस्तार से देखा; जो संक्षेप में ये हैं:

  • यह बाइबल का तथ्य है कि किसी भी व्यक्ति के पापों से पश्चाताप करके प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण करते ही, तुरंत और उसी क्षण से परमेश्वर पवित्र आत्मा उसमें आकर निवास करने लगता है। इसके बाद पवित्र आत्मा उस व्यक्ति में से कभी नहीं जाता है, सर्वदा उसके साथ बना रहता है। इसलिए पवित्र आत्मा को प्राप्त करने के लिए किसी को भी कोई भी अलग से प्रयास या प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है; ऐसा करना व्यर्थ है, वचन के अनुसार नहीं है। 

  • बाइबल यह भी सिखाती है कि पवित्र आत्मा से भर जाना, और पवित्र आत्मा से (“का” नहीं “से”) बपतिस्मा, मसीही विश्वास में आने के समय पवित्र आत्मा प्राप्त करने की ही अभिव्यक्तियाँ हैं, कोई अतिरिक्त या “दूसरा” अनुभव नहीं। पवित्र आत्मा कोई वस्तु नहीं है जो टुकड़ों में या अंश-अंश कर के दी जा सके, वह परमेश्वर है, और एक व्यक्ति के समान जब भी जहाँ भी होगा अपनी संपूर्णता में, अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ होगा; अभी कुछ कम और बाद में और अधिक नहीं मिलेगा। 

  • प्रेरितों 2 अध्याय में जिन अन्य भाषाओं के बोलने का उल्लेख हुआ है वे पृथ्वी के ही अन्य स्थानों की भाषाएं और बोलियाँ थीं, कोई अलौकिक भाषाएं नहीं। मुँह से निरर्थक उच्चारण और आवाज़ें निकालने के द्वारा “अन्य-भाषाएं” बोलने का दावा करना बाइबल के अनुसार गलत है। 

  • बाइबल बिलकुल स्पष्ट सिखाती है कि “अन्य-भाषाएं” बोलना पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण नहीं है, और न ही उद्धार पाने का प्रमाण है। 

  • बाइबल में कहीं इस बात का कोई संकेत अथवा प्रमाण है कि ये निरर्थक “अन्य-भाषाएं” प्रार्थना की भाषाएं हैं, इनमें की गई प्रार्थना अधिक प्रभावी होती है, या शैतान से प्रार्थना गुप्त रखने के लिए इनका प्रयोग आवश्यक है। ये सभी बाइबल से बाहर की शिक्षाएं हैं, गलत हैं। 

  • “अन्य-भाषा” में बोलना परमेश्वर से बोलना नहीं है; यह दावा करना भी गलत शिक्षा है; एक ही पद को उसके संदर्भ और सही अर्थ के बाहर लेकर उसकी गलत व्याख्या करने के कारण है। 

  • पवित्र आत्मा की निन्दा का पाप वह नहीं है जो आम तौर से ये गलत शिक्षाएं देने वाले बताते हैं। पवित्र आत्मा के बारे में प्रश्न करना, जिज्ञासा रखना, और जानकारी प्राप्त करने की इच्छा रखना, आदि वो क्षमा न होने वाले पाप नहीं हैं, जैसा गलत शिक्षाओं में दावा किया जाता है। वास्तव में यह निन्दा और क्षमा न किया जाने वाला पाप, प्रभु यीशु की ईश्वरीय वास्तविकता को जानते हुए भी उसे शैतान की सामर्थ्य से कार्य करने वाला मनुष्य कहकर, जान-बूझकर उसे बदनाम करना, उसके विषय लोगों को भरमाना, और उसके विषय झूठा प्रचार करना है। 


और अन्त में हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं के बारे में देखा, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। संक्षेप में ये शिक्षाएं है:

  • सुसमाचार के संदर्भ में हमने पहले तो सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाओं को पहचानने के आधार को देखा; 

  • फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने के लिए प्रयोग की जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा; 

  • फिर हमने गलातीयों 1 और 2 अध्याय से वास्तविक सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखा, 

  • और उसके बाद असली सुसमाचार के मानने से व्यक्ति के जीवन में होने वाले 7 प्रभावों को देखा जिससे हम असली और नकली सुसमाचार के मध्य पहचान कर सकें। 


परमेश्वर पवित्र आत्मा, इफिसियों 4:14 में यह बताने के बाद कि किन बातों से बचकर रहना है, अगले पद इफिसियों 4:15 में बताता है कि किन बातों को करते रहना है, जिन्हें हम अगले लेख में देखेंगे।


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर पवित्र आत्मा, तथा संपूर्ण जगत के समस्त लोगों के लिए पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं अथवा धारणाओं में न पड़े हों। उपरोक्त बातों के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं, और परमेश्वर पवित्र आत्मा के चलाए चल रहे हैं। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

      

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 17-19          

  • मरकुस 13:1-20 

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (27)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (8) - सही सुसमाचार के 7 प्रभाव (2)  

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा; फिर हमने गलातीयों 1 अध्याय से वास्तविक सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखा है, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें; और उसके बाद गलातीयों 1 और 2 अध्याय से असली सुसमाचार के मानने से व्यक्ति के जीवन में होने वाले 7 प्रभावों को देखना आरंभ किया। पिछले लेख में हमने अध्याय 1 में से इनमें से पहले दो प्रभाव देखे हैं। शेष पाँच प्रभाव अध्याय 2 में हैं, जिन्हें हम आज के लेख में देखेंगे।

असली सुसमाचार के 7 प्रभाव:

पिछले लेख में हम गलातीयों 1 अध्याय से असली या सही सुसमाचार के द्वारा प्रभु यीशु के सच्चे विश्वासी जन और उसकी वास्तविक कलीसिया में आने वाले पहले दो प्रभावों को देख चुके हैं। इनमें से पहला प्रभाव है कि सही या वास्तविक सुसमाचार व्यक्ति को मनुष्यों के नहीं परमेश्वर के भय और आज्ञाकारिता में चलने, हर परिस्थिति और हर कीमत पर केवल परमेश्वर ही को प्रसन्न करने की मनसा में बने रहने की सामर्थ्य और मार्गदर्शन देता है, और मनुष्यों के एहसान, नियंत्रण, तथा अधीनता में रहने के स्वभाव से मुक्त करता है। और दूसरा प्रभाव है कि सही या असली सुसमाचार परमेश्वर के लोगों के मध्य परस्पर प्रेम, मेल-मिलाप, सहभागिता, सहिष्णुता को बढ़ावा देता है, एक दूसरे के लिए परमेश्वर की महिमा करने को प्रेरित करता है, न कि विभाजन, बैर, अलगाव और विरोध तथा एक-दूसरे से ऊँचा-नीचा होने की भावनाओं को। आज हम यहाँ से आगे, सही या असली सुसमाचार के शेष पाँच प्रभाव, गलातीयों 2 अध्याय से देखेंगे:

3. गलातीयों 2:1-2 - सही सुसमाचार का तीसरा प्रभाव हम पौलुस की सेवकाई के उदाहरण में देखते हैं। पौलुस को परमेश्वर ने अन्य-जातियों में सुसमाचार सुनाने के लिए ठहराया था (प्रेरितों 9:15)। परमेश्वर की अगुवाई में चौदह वर्ष तक अन्य-जातियों में सेवकाई के बाद परमेश्वर ने उसे यरूशलेम जाने के लिए कहा, और वह बरनबास तथा तीतुस के साथ यरूशलेम को गया। तीसरा प्रभाव है कि सही सुसमाचार के पालन और सेवकाई से परमेश्वर की सहायता, उस का मार्गदर्शन मिलता है, और परमेश्वर का जन औरों के साथ मिलकर, औरों को भी आदर और अवसर देते हुए अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभाता है
 
4. चौथा प्रभाव भी हम गलातीयों 2:1-2 में ही देखते हैं। यहाँ दो पद बताता है कि ईश्वरीय प्रकाशन के अनुसार पौलुस यरूशलेम को गया, इस उद्देश्य से कि उन्हें अपनी सेवकाई और प्रचार के बारे में बताए - उन्हें सिखाने या उन्हें प्रभावित करने के लिए नहीं, वरन यरूशलेम में कलीसिया में बड़े समझे जाने वाले लोगों के द्वारा जाँचे जाने के लिए कि कहीं उसका परिश्रम व्यर्थ तो नहीं है (पद 2 का अंतिम वाक्य देखिए)। सही सुसमाचार का चौथा प्रभाव है कि उसके अनुसार चलने वाला व्यक्ति विनम्र और इस सेवकाई में लगे अन्य वरिष्ठ लोगों द्वारा जाँचे तथा सुधारे जाने के लिए तैयार रहता है; उसमें घमण्ड और अपनी सेवकाई में सिद्ध होने की भावना नहीं होती है
 
5. गलातीयों 2:3-5 - सही सुसमाचार के अनुसार चलने और कार्य करने के द्वारा प्रभु का जन और कलीसिया, “झूठे भाइयों”, मण्डली में गलत शिक्षाओं को लाने और फैलाने वाले लोगों पहचानने पाते हैं, और उनका सामना करने, उनके आगे न झुकने की समझ और सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। सही सुसमाचार का पाँचवां प्रभाव है सही और गलत का आँकलन करने और सही पर बने रहने तथा गलत का प्रतिरोध करने की सामर्थ्य प्राप्त करना 

6. गलातीयों 2:6-10 - हम यहाँ 6 पद के आरंभ से ही देखते हैं कि यरूशलेम में कलीसिया के अगुवों के द्वारा पौलुस को कोई भी नई बात सीखने को नहीं मिली; उसके सुसमाचार प्रचार और सेवकाई में कोई त्रुटि नहीं थी। लेकिन फिर भी प्रभु उसे यरूशलेम लेकर आया था, उसे अपनी सेवकाई को उन अगुवों के सामने रखने के लिए कहा था। लेकिन 9 पद में हम उसके आने से हुए लाभ को देखते हैं - जब यरूशलेम के अगुवों ने उसकी सेवकाई के बारे में जान और समझ लिया, तो उसे अपने साथ सम्मिलित भी कर लिया, प्रोत्साहित भी किया और अपना सहकर्मी भी स्वीकार कर लिया; और 10 पद में सेवकाई में ध्यान रखने वाली मूल बातों के विषय स्मरण करवाया। पौलुस का यरूशलेम आना हमारी शिक्षा के लिए भी था - कि हम उसके जीवन और व्यवहार से सेवकाई और सुसमाचार के प्रभावों को सीख सकें। सही सुसमाचार के पालन का छठवाँ प्रभाव है वह अन्य स्थानों तथा लोगों के मध्य लगे लोगों के प्रति भी सहभागिता और सहायता के लिए प्रोत्साहित करता है, उन्हें भी सेवकाई के लिए मार्गदर्शन करता है 

7. गलातीयों 2:11-14 - पौलुस के यरूशलेम से वापस लौट जाने के कुछ समय बाद अब पतरस उसके पास अन्‍ताकिया गया। किन्तु वहाँ पर पतरस के व्यवहार को लेकर एक परिस्थिति उत्पन्न हो गई और पतरस दोगलेपन में गिर गया। यह आज हमको सचेत करता है कि प्रभु के बड़े से बड़े सेवक भी गलती में पड़ सकते हैं, मनुष्यों को दिखाने के लिए अपना व्यवहार बदल सकते हैं, जो औरों के लिए ठोकर का कारण भी बन सकता है। इसलिए व्यक्ति की शारीरिक और आत्मिकआयुके अनुसार या कलीसिया में उसके ओहदे के अनुसार नहीं, वरन उसके व्यवहार के अनुसार, हर बात के लिए आँकलन करते रहना चाहिए। लेकिन पौलुस ने पतरस को इस दोगलेपन में बने नहीं रहने दिया, वरन तुरंत ही उसका सामना किया, और उसे सुधारा। पतरस ने भी इस बात का बुरा नहीं माना, इससे अपने अहं पर ठेस नहीं आने दी, और आगे चलकर अपनी पत्री में पौलुस को अपनाप्रिय भाईकहा और उसके दर्शन एवं सेवकाई के लिए उसकी प्रशंसा की (2 पतरस 3:15-16)। सही सुसमाचार के पालन ने पतरस को भी विनम्र और सुधार के लिए तत्पर बना दिया था। किन्तु पौलुस की प्रतिक्रिया पतरस के विनम्र होने पर आधारित नहीं थी; पौलुस की बात के लिए पतरस उसे जो भी प्रतिक्रिया देता, पौलुस उसे सुनने और सहने के लिए तैयार था; किन्तु मण्डली में किसी गलत व्यवहार और उदाहरण को सहन करने के लिए तैयार नहीं था। सही सुसमाचार का सातवाँ प्रभाव है कि वह व्यावहारिक मसीही जीवन में होने वाली गलतियों को पहचानने और उन्हें सुधारने के लिए औरों का सामना करने की हिम्मत और सामर्थ्य देता है; उनके ओहदे या स्तर के भय कारण गलतियों के प्रति आँख मूँद लेने, और प्रभु के जन को उन में बने ही रहने देने वाला नहीं होने देता है 

सही और असली सुसमाचार से संबंधित इन लेखों का सारांश यही है कि सही और सच्चा सुसमाचार परमेश्वर की ओर से, उसके अनुग्रह, उसकी शांति, और उसकी समझ और बुद्धि और ज्ञान और सामर्थ्य के साथ आता है। सही सुसमाचार पूर्णतः प्रभु यीशु मसीह द्वारा समस्त मानव जाति को उनके किन्हीं कर्मों के द्वारा नहीं परंतु अपनी क्षमा और अनुग्रह के द्वारा पापों से छुटकारा देने के लिए क्रूस पर दिए गए बलिदान के बारे में है; इसमें किसी भी मनुष्य के कैसे भी कोई भी योगदान या काम का कोई भी स्थान नहीं है - लेश-मात्र भी नहीं। सही सुसमाचार का निर्वाह संसार की बुराइयों से छुड़ाता है, मसीही विश्वासियों में प्रेम, एक-मनता, सहभागिता, संगति, एक-दूसरे को उभारने, उठाने और सुधारने को प्रोत्साहित करता है; विभाजन और अलगाव नहीं मेल-मिलाप लाता है। सही सुसमाचार के प्रचार और निर्वाह के द्वारा प्रभु परमेश्वर की महिमा होती है। जिस भी सुसमाचार में, सुसमाचार की सेवकाई और प्रचार में, ये स्वभाव और प्रभाव नहीं हैं, वहकोई अन्य ही सुसमाचारहै, गलत और झूठा है, उसका तिरस्कार करके सही को अपनाना अनिवार्य है। 

अभी तक हम इफिसियों 4:14 के अनुसार प्रभु की कलीसिया और उसके अपरिपक्व अनुयायियों के शैतान के द्वारा प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर पवित्र आत्मा, और सुसमाचार से संबंधित फैलाई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं और उन शिक्षाओं के कारण प्रभु के लोगों केमनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से उन के भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक बयार से उछाले, और इधर-उधर घुमाएजाने, तथा उन्हें पहचानने और उससे बचने के वचन में दिए गए उपायों के बारे में देखते आ रहे थे। अगले लेख से हम इफिसियों 4:15-16 से कलीसिया और मसीही विश्वासी के परिपक्व होने, उस परिपक्वता में बढ़ने के बारे में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

   

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 14-16          
  • मरकुस 12:28-44  

गुरुवार, 10 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (26)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (7) - सही सुसमाचार के 7 प्रभाव (1)  

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा। पिछले लेख में हमने गलातीयों 1 अध्याय से वास्तविक सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखा है, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें; और आज हम गलातीयों 1 और 2 अध्याय से असली सुसमाचार के मानने से व्यक्ति के जीवन में होने वाले 7 प्रभावों को देखना आरंभ करेंगे। इनमें से पहले दो प्रभाव अध्याय 1 में हैं, जिन्हें हम आज देखेंगे, और शेष पाँच प्रभाव अध्याय 2 में हैं, जिन्हें हम इससे अगले लेख में देखेंगे। साथ ही आज हम सबसे पहले भ्रष्ट सुसमाचार के कारण होने वाले दुष्प्रभाव, और उसे अपने आप को जाँचने के लिए प्रयोग करने को भी देखेंगे। 

भ्रष्ट सुसमाचार का दुष्प्रभाव:

परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित ने गलातीयों 1:8-9 में लिखा कि प्रभु यीशु के मूल और वास्तविक सुसमाचार को यदि कोई भ्रष्ट करता है, या उसे बिगाड़ता है, तो वह श्रापित है - वह चाहे स्वर्गदूत हो या फिर चाहे स्वयं पौलुस ही क्यों न हो। सुसमाचार में किसी भी प्रकार की मिलावट करना, उसे बिगाड़ना, और भ्रष्ट करना है, और ऐसा करना परमेश्वर की आशीषों को हटा कर उनके स्थान पर परमेश्वर से श्राप ले आता है। इसलिए यदि किसी मसीही विश्वासी के जीवन में अथवा कलीसिया में आशीषों का आना रुक गया है, श्राप और आत्मिक पतन दिखाई देने लगा है, किन्तु ऐसा होने का कोई कारण प्रकट नहीं है, तो उस व्यक्ति अथवा कलीसिया को रुक कर अपने व्यावहारिक मसीही जीवन और कार्यों का पुनःअवलोकन कर लेना चाहिए कि उन्होंने कहीं किसी सिद्धांत (doctrine), विश्वास (belief), या व्यवहार (practice) में कुछ ऐसा तो नहीं किया है जिससे उनके द्वारा प्रचार किया जाने वाले और जिए जाने वाले सुसमाचार में कोई मिलावट या सांसारिकता की बात घुस आई है, किसी रीति से संसार के साथ कोई समझौता हो रहा है, और सुसमाचार अपने मूल स्वरूप से भ्रष्ट हो रहा हो, जिससे परमेश्वर की आशीष के स्थान पर उन्हें उसके श्राप का सामना करना पड़ रहा है। सुसमाचार को अप्रभावी करने वाली शैतान की आम तौर से प्रयोग की जाने वाली बातों को हम 8 मार्च के लेख में देख चुके हैं। यदि इन बातों में से कोई, या कोई और बात जिससे कहीं पर भी कोई भी मिलावट, समझौता, या किसी भी अन्य बात के द्वारा सुसमाचार में कोई भी बिगाड़ पता चलता है, तुरंत उस बात के लिए पश्चाताप और क्षमा माँगकर उसे ठीक कर लें (1 यूहन्ना 1:9), इससे पहले कि किसी भारी ताड़ना या हानि में पड़ जाएं।   

असली सुसमाचार के 7 प्रभाव:

  1. गलातीयों 1:10-19 : जैसा हमने पिछले लेख में इस अध्याय के पहले पद से देखा था, पौलुस इस बात में स्पष्ट और दृढ़ था कि उसकी मसीही सेवकाई, उसका प्रेरित होना प्रभु परमेश्वर की ओर से था, किसी मनुष्य की ओर से नहीं, जैसा वह यहाँ 13-15 पद में कहता है। और उसके द्वारा प्रचार किया जाने वाला सुसमाचार संदेश भी उसे परमेश्वर ही से मिला था न कि किसी मनुष्य से (पद 11-12)। इसलिए उसकी सेवकाई का उद्देश्य किसी मनुष्य को प्रसन्न करना नहीं, केवल और केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना था, चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े (पद 10)। एक बार जब वह प्रभु परमेश्वर की ओर से अपनी नियुक्ति के विषय स्पष्ट और स्थापित हो गया, और उसने प्रचार के लिए सुसमाचार संदेश परमेश्वर से प्राप्त कर लिया, फिर इसके लिए उसने किसी भी मनुष्य की, वह चाहे कोई भी हो, सलाह लेना और उसके अनुसार कार्य करना स्वीकार नहीं किया (पद 16-19)असली सुसमाचार का पहला प्रभाव है कि उसका पालन करने वाला, मनुष्यों को नहीं वरन हर कीमत पर परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला होता है; और मनुष्यों के नहीं वरन परमेश्वर के परामर्श और मार्गदर्शन के अनुसार परमेश्वर द्वारा सौंपी गई सेवकाई का निर्वाह करता है। 
  2. गलातीयों 1:20-24 : इन पदों में हम असली सुसमाचार का दूसरा प्रभाव देखते हैं। जैसा पौलुस ने अपने विषय यहाँ पद 13-14 में लिखा, प्रभु यीशु का अनुयायी बनने से पहले वह प्रभु की कलीसिया को सताने वाले के रूप में जाना जाता था, और उसकी यह ख्याति दूर-दूर तक पहुँच चुकी थी (पद 23)। किन्तु साथ ही अब उन्हीं स्थानों पर उसकी यह ख्याति भी पहुँच चुकी थी कि अब वह प्रभु के लोगों को सताने वाला नहीं वरन प्रभु के सुसमाचार का प्रचार करने वाला बन गया था। इन पदों में जिनका उल्लेख है, उन स्थानों के वे लोग उससे कभी मिले नहीं थे, उन्होंने बस उसके बारे में सुना ही थी - पिछला बुरा व्यवहार भी और अब परिवर्तन के बाद का भला व्यवहार भी। किन्तु उससे न मिलने के बावजूद, पद 24 में लिखा है कि वे कलीसियाएं अबमेरे विषय में परमेश्वर की महिमा करती थींयही असली सुसमाचार का दूसरा प्रभाव है - उसके पालन करने से विभाजन और बैर या दूरियाँ नहीं आतीं, किसी दूसरे की सेवकाई को लेकर ईर्ष्या या जलन उत्पन्न नहीं होती है; वरन आपस में प्रेम, मेल-मिलाप, और एक दूसरे के लिए आनन्दित होने तथा परमेश्वर की महिमा करने का भाव आता है। दूसरा प्रभाव है कि असली सुसमाचार विभिन्न कलीसियाओं या विभिन्न व्यक्तियों के मध्य में विभाजन की दीवारें खड़ी नहीं करता है, एक-दूसरे से पृथक रहने के बहाने नहीं प्रदान करता है, वरन दीवारों को गिरा देता है, एक-दूसरे के दिलों तक मार्ग बना देता है, मेल करवा देता है। 

अगले लेख में हम गलातीयों 2 अध्याय से असली सुसमाचार के शेष पाँच प्रभावों को देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 11-13          
  • मरकुस 12:1-27

बुधवार, 9 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (25)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (6)

सही सुसमाचार के 7 गुण 

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा। आज हम वास्तविक सुसमाचार के गुणों को देखेंगे, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें।

कलीसिया के आरंभ से ही शैतान ने गलत शिक्षाओं और झूठे प्रचारकों के द्वारा सुसमाचार को बिगाड़ना, उसे अप्रभावी बनाने वाली बातों के साथ मिलाकर लोगों में फैलाना आरंभ कर दिया था। उसका उद्देश्य यही था कि लोगों को भ्रामक बातों में फँसा कर, उन्हें धर्मी, वचन का पालन करने वाले, और प्रभु के खोजी होने के, आदि भ्रम में फँसाए रखे, और सच्चे सुसमाचार से दूर रखे। ऐसा होने से वे उद्धार से वंचित रह जाएंगे, यद्यपि उन्हें यही लगता रहेगा कि वे भी उद्धार पाए हुए हैं, स्वर्ग में जाने के योग्य हैं। किन्तु साथ ही परमेश्वर पवित्र आत्मा ने अपनी प्रेरणा से प्रभु के शिष्यों द्वारा उन बातों को भी लिखवा दिया तथा उपलब्ध करवा दिया, जो शैतान के इस झूठ को प्रकट करती हैं, और असली सुसमाचार की पहचान करवाती हैं, जिससे जो भी वचन को सच्चे समर्पित मन से, पवित्र आत्मा से सीखने का इच्छुक होगा, वह इस असली-नकली की पहचान को जान लेगा। पवित्र आत्मा की प्रेरणा से पौलुस प्रेरित ने गलातीयों की मण्डली को लिखी पत्री का आरंभ करते हुए कहा:मुझे आश्चर्य होता है, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं” (गलातियों 1:6-7)। गलातीयों की पत्री, इसी विषय, अर्थात सही सुसमाचार, गलत सुसमाचार, सुसमाचार से भटकना आदि बातों पर ही लिखी गई है, और इस पत्री के 1 और 2 अध्याय, वास्तविक सुसमाचार की पहचान करवाते हैं, प्रभु यीशु के असली सुसमाचार के गुण या स्वभाव, और प्रभावों का यहाँ पर वर्णन किया गया है।

हर नकली उत्पाद को बनाने वाले उस नकली को उसके असली मूल उत्पाद के समान ही दिखने वाला बनाते हैं, साथ ही उस नकली के असली के समान ही कार्य करने और प्रभावी होने के बात करते हैं। अर्थात उस के गुण यास्वभाव”, और उसकेप्रभावहमें असली और नकली की पहचान करवाते हैं। यही असली और नकली सुसमाचार के लिए भी सही है। आज हम असली सुसमाचार के गुणों, अर्थात उसके स्वभाव के बारे में देखेंगे। 

असली सुसमाचार के 7 गुण या स्वभाव:

  1. पौलुस इस पत्री का आरंभ अपनी सेवकाई और बुलाहट से आरंभ करता है। वह गलातीयों 1:1 में अपने पाठकों को यह स्पष्ट कर देता है कि उसकी नियुक्ति परमेश्वर के द्वारा है, न कि मनुष्यों की ओर से। क्योंकि यह उसके मसीही जीवन का दृढ़ सत्य था, इसीलिए उसकी वफादारी भी केवल और केवल प्रभु परमेश्वर के ही प्रति थी, अन्य किसी के प्रति नहीं। सच्चे सुसमाचार के प्रचारक का पहला गुण है कि वह न केवल परमेश्वर की ओर से अपनी सेवकाई के लिए नियुक्त होने का दावा भी करेगा, वरन उस दावे को जी कर के भी दिखाएगा। सही सुसमाचार का प्रचार करने वाले प्रचारक के व्यवहारिक जीवन में परमेश्वर के प्रति वफादारी और जवाबदेही, तथा सांसारिकता की बातों, संसार से प्रशंसा, बड़ाई, यश आदि से अलगाव भी दिखाई देगा।
  2. गलातियों 1:2 से प्रकट है कि सही सुसमाचार के प्रचारकों में बड़े-छोटे की भावना नहीं होगी; वह अपने सभी सहकर्मियों को, प्रभु की सेवकाई में लगे लोगों को समान आदर के साथ रखता है, सभी के साथ मेल-मिलाप रखते हुए, उन्हें भी अपनी सेवकाई का महत्वपूर्ण भाग बताता है, केवल अपने आप को ही बड़ा या मुख्य दिखाने के प्रयास नहीं करता है। 
  3. गलातियों 1:3 में पौलुस सही सुसमाचार का तीसरा गुण या स्वभाव लिखता है - वास्तविक सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह की शांति और अनुग्रह के साथ आता है। अर्थात उस संदेश और उसके पालन से अनबन, विभाजन, फूट, बैर, टकराव, आदि नहीं होते; वरन वह हमेशा प्रेम, मेल-मिलाप, क्षमा, एकता, दीनता, नम्रता आदि मसीही गुणों के साथ आता है, जबकि नकली इसके विपरीत बातों के साथ आता है।
  4. गलातीयों 1:4 में वास्तविक सुसमाचार का चौथा स्वभाव दिया गया है, वह हमारे पापों से छुटकारे के लिए प्रभु यीशु के द्वारा दिए गए बलिदान का प्रचार करता है न कि मनुष्यों के अपने किसी कार्य या कर्मों के अनुसार भला बनने और उद्धार पाने का। साथ ही वह सांसारिक बातों, धन-संपत्ति, भौतिक समृद्धि, शारीरिक चंगाइयों, आदि का नहीं, और मसीह यीशु में विश्वास के द्वारा पापों की क्षमा पर बल देता है, उसे ही मुख्य विषय बनाए रखता है। साथ ही वह प्रभु यीशु मसीह के जीवन से परमेश्वर के प्रति मृत्यु सहने तक आज्ञाकारी होने के लिए भी सिखाता है (इब्रानियों 12:1-4; प्रकाशितवाक्य 2:10) 
  5. गलातियों 1:5 में सही सुसमाचार के प्रचार और प्रचारक का पाँचवां गुण दिया गया है, उसके द्वारा सदा ही प्रभु यीशु मसीह की स्तुति और बड़ाई, उसी की प्रशंसा, महिमा और गुणगान का प्रचार होगा, किसी मनुष्य का नहीं।
  6. गलातियों 1:6 सचेत करता है कि कोई भी सच्चा मसीही विश्वासी अपने आप को आवश्यकता से अधिक सिद्ध या स्थिर न समझ ले, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 10:12 में भी लिखा गया है। यहाँ ध्यान कीजिए, कोई अविश्वासी नहीं अपितु, गलातिया की मसीही मण्डली के लोग, प्रभु के विश्वासी जन हीऔर ही सुसमाचारमें अर्थात गलत सुसमाचार में बहकाए और भरमाए गए थे। सही सुसमाचार का छठवाँ स्वभाव है कि वह सदा ही मनुष्य को उसकी दुर्बलता के बारे में, और प्रभु के सच्चे विश्वासी जन को सदा हर बात के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने, परमेश्वर के वचन से जाँचते रहने, और उसी के अनुसार चलने के लिए कहेगा। वह कभी किसी को भी अपने आप पर, अपनी बुद्धि और युक्ति पर भरोसा रखने और अपनी समझ या संसार की सलाह, संसार को सही लगने वाली बात के अनुसार करने को नहीं कहेगा।
  7. सही सुसमाचार का सातवाँ गुण है कि उससे लोगों में डर या घबराहट नहीं आती; ऐसा करना सुसमाचार को बिगाड़ने वालों का काम है। गलत सुसमाचार वाले लोग विभिन्न प्रकार के डर-भय दिखा कर लोगों को अपनी बातों का पालन करने के लिए बाध्य करते हैं। जब कि असली सुसमाचार लोगों को परमेश्वर की संतान होने के लिए प्रेरित करता है (यूहन्ना 1:12-13), पापों के दंड उठाने से मुक्ति पाने (रोमियों 8:1-2), और आशीषित अनन्त जीवन की बात करता है (मत्ती 19:19; 1 कुरिन्थियों 2:9), तो फिर उससे घबराहट या भय क्यों आएगा? नाहक ही भय और घबराहट उत्पन्न करना, लोगों को बाध्य करना, शिक्षाओं की जाँच-पड़ताल करने से रोकना शैतान और उसकी बातों का गुण है, प्रभु और उसके सुसमाचार का नहीं। 

सच्चे सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखने के बात, हम उसके प्रभाव को अगले लेख में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 8-10          
  • मरकुस 11:20-33