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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

सोच-विचार करने वाले

डेविड मैक्कल्लो द्वारा लिखित अमेरिका के संस्थापकों और आरंभिक राष्ट्रपतियों में से एक, जौन एडम्स, की जीवनी में उन्हें "दोनो, एक धर्मपरायण मसीही विश्वासी तथा स्वतंत्र विचारक, और जिनमें दोनो गुणों से कोई अन्तःकलह न हो" कहा गया है। मुझे इस राय ने विचिलित किया, क्योंकि इसमें इस बात पर आश्चर्य निहित है कि एक मसीही विश्वासी में ये दोनो गुण एक साथ हैं। साधारण्तः लोग मसीही विश्वासी को सीधा-सादा और बिना सोच-समझ वाला समझते हैं। लोगों के लिये सोच-विचार करने वाला मसीही विश्वासी होना संभव नहीं है।

यह बिलकुल निराधार और गलत धारणा है। उद्धार का एक बड़ा लाभ है कि उस के कारण विश्वासी के मन में परमेश्वर की शांति रहती है (फिलिप्पियों ४:७), जिससे जीवन की हर बात का वह स्पष्ट विचार, विवेकशीलता और समझ-बूझ के साथ विशलेषण कर सकता है। पौलुस ने इसका वर्णन कुरिन्थुस के विश्वासियों को लिखी अपनी दूसरी पत्री में किया। उसने उन्हें स्मरण दिलाया कि मसीह में हमें क्षम्ता मिली है कि "हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्‍डन करते हैं, और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।" (२ कुरिन्थियों १०:५)

किसी तर्क का बुद्धिमानी से विशलेषण करना, परमेश्वर के ज्ञान को स्पष्टता से समझ लेना और अपने मन को मसीह के मन के अनुरूप ढाल लेना बहुत मूल्यवान कौशल हैं, ऐसे संसार में जीने के लिये जहां भले बुरे की पहचान रखना कठिन रहता है। ये कौशल हमें मसीह का प्रतिनिधी होकर रहने के योग्य भी करते हैं।

प्रत्येक मसीही विश्वासी को सोच-विचार करने वाला होना चाहिये - क्या आप हैं? - बिल क्राउडर


विश्वास करना, कभी भी बुद्धिमता एवं विचारशीलता को अनुपयोगी करना नहीं है।

सो हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्‍डन करते हैं, और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं। - २ कुरिन्थियों १०:५


बाइबल पाठ: २ कुरिन्थियों १०:१-११

मैं वही पौलुस जो तुम्हारे साम्हने दीन हूं, परन्‍तु पीठ पीछे तुम्हारी ओर साहस करता हूं, तुम को मसीह की नम्रता, और कोमलता के कारण समझाता हूं।
मैं यह बिनती करता हूं, कि तुम्हारे साम्हने मुझे निर्भय होकर साहस करना न पड़े जैसा मैं कितनों पर जो हम को शरीर के अनुसार चलने वाले समझते हैं, वीरता दिखाने का विचार करता हूं।
क्‍योंकि यद्यपि हम शरीर में चलते फिरते हैं, तौभी शरीर के अनुसार नहीं लड़ते।
क्‍योकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।
सो हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्‍डन करते हैं, और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं।
और तैयार रहते हैं कि जब तुम्हारा आज्ञा मानना पूरा हो जाए, तो हर एक प्रकार के आज्ञा न मानने का पलटा लें।
तुम इन्‍हीं बातों को दखते हो, जो आंखों के साम्हने हैं, यदि किसी का अपने पर यह भरोसा हो, कि मैं मसीह का हूं, तो वह यह भी जान ले, कि जैसा वह मसीह का है, वैसे ही हम भी हैं।
क्‍योंकि यदि मैं उस अधिकार के विषय में और भी घमण्‍ड दिखाऊं, जो प्रभु ने तुम्हारे बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये हमें दिया है, तो लज्ज़ित न हूंगा।
यह मैं इसलिये कहता हूं, कि पत्रियों के द्वारा तुम्हें डराने वाला न ठहरूं।
क्‍योंकि कहते हें, कि उस की पत्रियां तो गम्भीर और प्रभावशाली हैं, परन्‍तु जब देखते हैं, तो वह देह का निर्बल और वक्तव्य में हल्का जान पड़ता है।
सो जो ऐसा कहता है, कि समझ रखे, कि जैसे पीठ पीछे पत्रियों में हमारे वचन हैं, वैसे ही तुम्हारे साम्हने हमारे काम भी होंगे।

एक साल में बाइबल:
  • नीतिवचन २७-२९
  • २ कुरिन्थियों १०

1 टिप्पणी:

  1. महान पुस्तकों के वचनों में शान्ति तो मिलती ही है ,मसीही क्यों न विचारक हो, विचार शांत दिमाग में ही तो आते हैं

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