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मंगलवार, 28 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 94 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 23


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पवित्र आत्मा से सीखना – 3

 

    परमेश्वर द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी को, उसका सहायक, साथी, मार्गदर्शक, और शिक्षक होने के लिए प्रदान किए गए परमेश्वर पवित्र आत्मा का भण्डारी होने के नाते, यह प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी है कि वह पवित्र आत्मा के बारे में सीखे। यह करना पवित्र आत्मा की सहायता को सही रीति से उपयोग कर पाने के लिए अनिवार्य है, ताकि विश्वासी अपने जीवन और सेवकाई के द्वारा परमेश्वर की सेवा कर सके। यह करना इस लिए भी अनिवार्य है ताकि विश्वासी पवित्र आत्मा के बारे में फैली हुई गलत शिक्षाओं से भ्रमित न हो जाए, और न ही उस के बारे में कोई भी मन-गढ़न्त धारणा बना ले, और शैतान द्वारा किसी गलत मार्ग पर न डाल दिया जाए।


    पिछले कुछ लेखों से हम यूहन्ना 14:17 से से अध्ययन करते आ रहे हैं। आरंभ में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, और फिर सीखा था कि सँसार उन्हें नहीं जान सकता है, किन्तु विश्वासी जान सकता है, और वह विश्वासी में निवास करता है। व्यक्ति में पवित्र आत्मा के विद्यमान होने का प्रमाण वे बदलाव हैं जो पवित्र आत्मा उस व्यक्ति में लाता है, अर्थात, उन की उपस्थिति के कारण उस व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव। इन प्रभावों में से एक है विश्वासी का पवित्र आत्मा से परमेश्वर के वचन को सीख पाना। लेकिन अधिकांश विश्वासी यहाँ पर आ कर समस्या का सामना करते हैं, अपने आप को सही रीति से परमेश्वर का वचन सीख पाने में असमर्थ पाते हैं, और इसलिए वे मनुष्यों और पुस्तकों से वचन को सीखने की ओर मुड़ जाते हैं, बजाए पवित्र आत्मा से सीखने के प्रयासों में लगे रहने के।


    तीन मुख्य कारण हैं जिन के कारण विश्वासी पवित्र आत्मा से परमेश्वर का वचन नहीं सीखने पाता है, यद्यपि वह प्रत्येक विश्वासी में निवास करता है। हमने पिछले लेख में इन तीन में से पहले कारण को देखा था – विश्वासी में परमेश्वर के वचन का पर्याप्त संग्रह या भण्डार उपलब्ध न होना जिससे कि पवित्र आत्मा उसे परमेश्वर के वचन में लिखी हुई बातों को याद दिला सके। हमने यूहन्ना 14:26 और यूहन्ना 16:14-15 से देखा था कि पवित्र आत्मा द्वारा सिखाए जाने का तरीका है विश्वासी जिस परिस्थिति का सामना कर रहा है उसके अनुसार परमेश्वर के वचन के भाग उसे याद दिलाना। इसलिए, पवित्र आत्मा से सीखने के लिए, विश्वासी को यत्न के साथ परमेश्वर के वचन को पढ़ना और अध्ययन करना है; उसे प्रार्थना के साथ नियमित, योजनाबद्ध रीति से क्रमवार पढ़ना है और अपने अन्दर वचन को भर लेना है। आज से हम दूसरे कारण को देखना आरंभ करेंगे, विश्वासी का परमेश्वर के वचन को पढ़ने और अध्ययन करने के लिए पर्याप्त और उचित समय न लगाना, और सामान्यतः यह तब होता है, जब विश्वासी का पवित्र आत्मा के निर्देशों को जानने और मानने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होता है।


    यदि अधिकांश नहीं तो बहुतेरे विश्वासियों के लिए, नया-जन्म पा लेने के बाद परमेश्वर और साँसारिक धन के मध्य संघर्ष रहता है (मत्ती 6:24)। प्रभु यीशु मसीह ने जो मत्ती 6:25-34 में कहा है, वे उस पर भरोसा नहीं करने पाते हैं, और अपने जीवन में सही प्राथमिकताओं को नहीं रखते हैं। उनके जीवनों में सँसार तथा सँसार की बातें ही प्राथमिकता रखती हैं, और उसके बाद ही, यदि समय बचा तो वे परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य के बारे में सोचते हैं। सामान्यतः पालन किया जाने वाला नमूना है, मिल सकने वाले धन और लाभ के आधार पर प्रस्ताव, नौकरी, और अवसर कितने अच्छे हैं, उसके अनुसार स्वयं ही अपने लिए निर्णय ले लेना, विशेषकर कमाई और पारिवारिक बातों के बारे में। पहले अपने ही आँकलन के आधार पर स्वयं ही काम को कर लेने का निर्णय ले लेने के पश्चात, फिर एक औपचारिकता को पूरी करने के लिए वे उसके लिए प्रार्थना और परमेश्वर की आशीष मांगते हैं। लेकिन कुछ समय के बाद उन्हें यह एहसास होता है कि जो साँसारिक धन-संपत्ति और समृद्धि के लिए बहुत लाभदायक है, वही उनके आत्मिक जीवन के लिए एक फँदा बन गया है। उस ने उन्हें परमेश्वर और आत्मिक जीवन से दूर कर दिया है; अब उनके पास परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के काम के लिए न तो इच्छा है, न ही समय या सामर्थ है; और अब वे केवल औपचारिकता निभाने वाले ‘इतवार के मसीही’ से अधिक और कुछ नहीं रह गए हैं। वह विश्वासी याकूब 4:3 और 1 यूहन्ना 2:15-17 की अनदेखी करने के जाल में फँस गया है। वह विश्वासी उस जाल में फँसा हुआ नाशमान साँसारिक बातों के लिए कार्य करने और उन्हें एकत्रित करने में पड़ गया है, जो अन्ततः नष्ट हो जाएँगी, उसे अनन्त काल के लिए छूछे हाथ छोड़ देंगी (1 कुरिन्थियों 3:13-15)।


    विश्वासी यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर के राज्य में नया-जन्म लेने के पल से ही, उनमें निवास करने वाले पवित्र आत्मा का मंदिर होने के नाते, वे अब अपने नहीं रहे हैं, परमेश्वर के हो गए हैं (1 कुरिन्थियों 6:19)। उस पल के बाद से उन्हें प्रभु के अनुसार और प्रभु के लीए जीना है (2 कुरिन्थियों 5:15), उन के लिए परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई ज़िम्मेदारी (इफिसियों 2:10) के बारे में जानना और सीखना है तथा उसे निभाना है, क्योंकि उनके जीवन की सफलता और आशीष उसी पर निभर करती है। जब विश्वासी परमेश्वर के लिए काम करता है, तब परमेश्वर भी उसके लिए काम करता है (1 कुरिन्थियों 5:58; 2 इतिहास 15:2, 7), और उसे समृद्ध बनाता है, भौतिक रीति से भी (व्यवस्थाविवरण 8:18; व्यवस्थाविवरण 15:4-5; व्यवस्थाविवरण 26:11; नीतिवचन 10:22; सभोपदेशक 5:19)। एक मसीही विश्वासी की समृद्धि उसकी आत्मिक उन्नति के प्रयास करने के साथ जुड़ी है और उसी के अनुपात में है (3 यूहन्ना 1:2)। वह अपनी आत्मा की उन्नति के लिए, परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य को समय और प्राथमिकता देने के द्वारा जितना अधिक प्रयास करेगा, उतना ही अधिक परमेश्वर उसे इस सँसार में तथा आने वाले सँसार में आशीषित करेगा (मरकुस 10:29-30)।


    शैतान भी साँसारिक लाभ और समृद्धि के द्वारा मसीही विश्वासी को बहका कर परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के कार्य से दूर कर सकता है। तो फिर यह कैसा पहचान जा सकता है कि कौन सी समृद्धि परमेश्वर से है, और कौन सी शैतान से? परमेश्वर जब ये भौतिक आशीषें देता है तो उनके साथ कोई दुःख नहीं मिलाता है (नीतिवचन 10:22)। जब समृद्धि परमेश्वर की ओर से होती है, तब परमेश्वर की सँतान, मसीही विश्वासी, अपनी साँसारिक ज़िम्मेदारियाँ भी पूरी कर सकता है, और साथ ही उसके पास परमेश्वर के लिए सक्रीय बने रहने की लालसा, समय, और अवसरों का सदुपयोग करने की प्रवृत्ति भी रहेगी, और वह परमेश्वर की निकटता में बढ़ता रहेगा। किन्तु जो साँसारिक समृद्धि शैतान उपलब्ध करवाता है, उसका उद्देश्य होता है विश्वासी को परमेश्वर की सेवा और उसके कार्यों से दूर करना और रखना। इसलिए, शैतानी समृद्धि में हमेशा ही परमेश्वर और उसके कार्यों के प्रति अनिच्छा, समय का अभाव, और अवसरों का परमेश्वर के लिए सदुपयोग नहीं करने की प्रवृत्ति होगी। वरन, ऐसा विश्वासी प्रभु के लिए काम करने से कतराता रहेगा, उसके पास वचन के अध्ययन के लिए समय नहीं होगा, और परमेश्वर के काम में जुड़ने से बचने के लिए वह बहाने बनाता रहेगा। लेकिन, इसकी तुलना में, उसके पास हमेशा ही साँसारिक कार्यों, जिम्मेदारियों, मौज-मस्ती, और अन्य बातों के लिए इच्छा, समय, समझ-बूझ, और अवसरों का उपयोग करने की प्रवृत्ति होगी। साथ ही या तो उसके व्यक्तिगत जीवन में, या परिवार में, या कार्य और व्यवसाय के जीवन में, या इन सभी में अथवा किसी न किसी में, कोई न कोई विरोध या अशान्ति बनी रहेगी; वह अपने जीवन में, किसी न किसी बात के कारण, कभी भी शान्ति से नहीं होगा।


    विश्वासी को इसका भी एहसास रखना चाहिए कि परमेश्वर, परमेश्वर है, सर्वोच्च हस्ती; वह कभी भी कहीं भी कोई निचला स्तर स्वीकार नहीं करेगा, अपने मंदिर – मसीही विश्वासी में तो कदापि नहीं। या तो वह विश्वासी के जीवन में हर बात के लिए प्राथमिक स्थान रखने वाला परमेश्वर रहेगा, (मत्ती 22:37; लूका 14:26-27; फिलिप्पियों 3:7-9), नहीं तो वह कोई अन्य स्थान ग्रहण नहीं करेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि, तब वह एक ओर हट जाएगा और विश्वासी को उसकी ही युक्तियों और मार्गों पर चलने के लिए छोड़ देगा, उड़ाऊ पुत्र के समान, वह जो करना चाहे उसे कर लेने देगा, जब तक कि वह कठोर दुःखदायी अनुभवों से होकर जीवन की शिक्षाओं को सीख नहीं लेगा, और पूरे समर्पण के साथ मुड़कर वापस नहीं आ जाएगा। इसलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा से सीखने के लिए, विश्वासी को पहले उसे जीवन में प्राथमिकता देना सीखना होगा, उसका आज्ञाकारी बनना होगा, अर्थात, उसे ‘आत्मा के अनुसार चलना’ (गलतियों 5:16, 25) सीखना पड़ेगा। अगले लेख में हम इस से आगे देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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English Translation

Learning from the Holy Spirit – 3

 

    As stewards of the Holy Spirit given by God to every Born-Again Christian Believer, to be his Helper, Companion, Guide, and Teacher it is the responsibility of every Believer to learn about the Holy Spirit. This is necessary or him to be able to worthily utilize the Holy Spirit’s services, and thereby to serve God through their lives and ministry. It is also necessary to avoid being carried away into wrong teachings, or assuming things about the Holy Spirit, and being misled by Satan.


    For the past few articles, we have been studying from John 14:17. Initially we had seen that the Holy Spirit is the Spirit of truth, and then learnt how the world cannot know Him, but the Believer can, and he dwells in the Believer. The evidence of the Holy Spirit being in a person are the changes He brings in that person, i.e., the effects of His presence in him. One of the effects is the Believer being able to learn God’s Word from the Holy Spirit. But this is where most Believers face a problem, find themselves being unable to learn God’s Word properly, and therefore they turn to learning form persons and books, instead of striving to learn from the Holy Spirit.


    There are three main factors that do not allow the Believer to learn God’s Word from the Holy Spirit, though He resides in the Believer. We have seen the first of these factors in the last article – the Believer not having a ‘stock’ or repository of God’s Word in him, for the Holy Spirit to be able to bring things written in God’s Word to the Believer’s remembrance. We have seen from John 14:26 and John 16:14-15 that the Holy Spirit’s method of teaching is by bringing to the remembrance of the Believer, portions of God’s Word appropriate to the situation the Believer is facing. Hence, to learn from the Holy Spirit, the Believer has to diligently read and study God’s Word; do it prayerfully, regularly, systematically and sequentially, to fill himself up with God’s Word. From today we will take up the second factor, the Believer’s lack of giving adequate time to read and study God’s Word; and this usually is due to the Believer’s not being committed enough to follow and obey the instructions of the Holy Spirit.


    For many, if not most of the Believers, after being Born-Again, there is a struggle between God and mammon (Matthew 6:24). They fail to trust what the Lord Jesus said in Matthew 6:25-34, and do not maintain the correct priorities in their lives. The world and things of the world still get the first priority in their lives, and then if time permits, they think about God, God’s Word, and God’s Work. The usual pattern is to take one’s own decisions, especially for earnings and family matters, depending upon how lucrative or beneficial the offer, job, or opportunity seems. First having accepted based on their own assessment, they then perfunctorily pray and ask for God’s blessings upon what they have already decided to do. Only to realize after some time that what is very rewarding in terms of worldly wealth and prosperity, has become a snare for their spiritual lives. It has drawn them away from God and spiritual living; now they simply do not have the will, the time, or the energy to give to God, His Word, and His work; and they are unable to rise above fulfilling the formality of being a “Sunday Christian”. The Believer has fallen into the trap of going contrary to James 4:3 and 1 John 2:15-17. The Believer has got himself ensnared in working for and accumulating temporary things of the world, which will eventually perish, leaving him empty-handed for eternity (1 Corinthians 3:13-15).


    The Believer forgets that from the moment of his being Born-Again into the Kingdom of God, as the temple of the Holy Spirit residing in him, he is no longer his own, but belongs to God (1 Corinthians 6:19). From that moment onwards he has to live for and according to the Lord (2 Corinthians 5:15), learn about and fulfil his God determined responsibility (Ephesians 2:10), because his blessings and success in life are dependent on it. When the Believer works for God, God works for him (1 Corinthians 15:58; 2 Chronicles 15:2, 7), and prospers him even materially (Deuteronomy 8:18; Deuteronomy 15:4-5; Deuteronomy 26:11; Proverbs 10:22; Ecclesiastes 5:19). A Believer’s physical prosperity is linked to, and proportional to his laboring to prospering his soul (3 John 1:2). The more he labors to prosper his soul, by giving God, God’s Word, and God’s work the first priority, the more God will bless and prosper him in this world and the next (Mark 10:29-30).


    Satan can also entice the Believers through worldly gains and prosperity, to draw them away from God, His Word, and from working for God. How can one discern whether prosperity is from God or from Satan? When God gives these material blessings, He gives no sorrow with them (Proverbs 10:22). When the prosperity is from God, God’s child, the Believer can fulfil his secular responsibilities, and also have the will, the time, and opportunities to stay active for the Lord, and grow in the Lord. But the worldly prosperity Satan provides is primarily to draw the Believer away from serving God and being useful in God’s work. Hence in the satanic prosperity there will always be a lack of willingness, of time, and of utilizing opportunities to serve the Lord. Rather, the Believer will keep shying away from working for the Lord, spending time with God’s Word, and will keep finding excuses for not being involved in God’s work. But, in contrast, he will always have the willingness, time, mind, and desire of capitalizing on opportunities related to worldly works, responsibilities, pleasures, and other things. Moreover, either his personal, or family, or his work life, any or all of them, will always have some discord or the other going on; he will never be at peace in his life, because of one thing or the other.


    The Believer should also realize that God being God, the Supreme personality, He will never take a secondary place anywhere, least of all in His temple – the Believer. Either He will be God, having the primary place in the Believer’s lives for everything (Matthew 22:37; Luke 14:26-27; Philippians 3:7-9), or He will take no place in our lives. That is to say, He will step aside and leave the Believer to his own ways and devices, to do what he feels like; till like the Prodigal Son, he learns the bitter lessons the hard way, and turns back to Him whole-heartedly. So, to learn from God the Holy Spirit, the Believer has to learn and be willing accord Him the first priority in his life, has to submit fully to Him, become obedient to Him, i.e., he has to learn to ‘walk in the Spirit’ (Galatians 5:16, 25). We will carry on from here in the next article.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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