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बुधवार, 22 मार्च 2023

आराधना (18) / Understanding Worship (18)

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आराधना में बाधाएँ (1) - आराधना को न जानना


आराधना के बारे में ज़ारी हमारे अध्ययन में हमने देखा है कि आराधना क्या है, मसीही विश्वासी के लिए यह क्यूँ अनिवार्य है, मसीही जीवन और सेवकाई पर इससे आने वाले विभिन्न प्रभाव क्या हैं, और इससे मसीही विश्वासी को क्या लाभ - दोनों, आत्मिक एवं भौतिक, होते हैं। आज से हम देखना आरंभ करेंगे कि हमें सच्ची आराधना करने से बाधित करनी वाली क्या-क्या बातें हैं; जिन के कारण हम सच्ची आराधना नहीं करने पाते हैं, जिससे फिर परमेश्वर के लिए उतने उपयोगी नहीं होते हैं, और न ही अपने मसीही जीवन में उतने उन्नत तथा लाभान्वित होने पाते हैं, जितना होना चाहिए।


हम देख चुके हैं परमेश्वर की आराधना करना, परमेश्वर के साथ हमारे संबंधों का एक अनिवार्य और आशीषित भाग है, ऐसा जो हमारे जीवनों को इस लोक तथा परलोक के लिए परमेश्वर की बहुतायत की आशीषों से भर देता है। किन्तु फिर भी परमेश्वर की आराधना तथा महिमा करना ऐसी बात है जो अकसर न तो ठीक से समझी जाती है, और न ही की जाती है। पहली बात जो लोगों को सच्ची आराधना करने से बाधित करती है, वह है यह नहीं जानना कि सच्ची आराधना है क्या। इस जानकारी का न होना उनमें विभिन्न प्रकार से प्रकट होती है, और अब हम इस बात को देखना आरंभ करेंगे।


सामान्यतः आराधना को गीत गाना और प्रार्थना करना समझ लिया जाता है। लगभग सभी डिनॉमिनेशंस की कलीसियाओं की सभाओं में सामूहिक गीत गाने का प्रचालन है, और इसे ही सामूहिक आराधना के समान स्वीकार कर लिया जाता है। यद्यपि गीत गाना आराधना करने का स्वरूप है, किन्तु यदि यह परम्परागत रीति से तथा रटे हुए गीत गाना मात्र ही है, या, यदि गाने वाले का मन और हृदय उस गीत और उसे गाने में नहीं है, तो फिर यह निरर्थक आराधना “आत्मा और सच्चाई” की वह आराधना नहीं है जो परमेश्वर चाहता है, और व्यर्थ आराधना है। न केवल कलीसिया के रूप में सामूहिक आराधना, किन्तु व्यक्तिगत आराधना, परमेश्वर की संतान होने के नाते व्यक्ति का स्वर्गीय पिता के पास आना, उसकी महिमा तथा गुणानुवाद करना, प्रत्येक मसीही विश्वासी के जीवन में बहुत आवश्यक है, और परमेश्वर यही चाहता भी है। यह बहुत आम रीति से देखा जाता है कि व्यक्तिगत आराधना करते समय, धन्यवाद के कुछ शब्दों को कहने के पश्चात अधिकांश लोग प्रार्थना करने लग जाते हैं, परमेश्वर से माँगने लग जाते हैं - चाहे वह औरों के लिए आशीष ही क्यों न हो। इस  मूल भिन्नता को, कि परमेश्वर से कुछ माँगना प्रार्थना है, और परमेश्वर को कुछ देना आराधना है अकसर लोगों द्वारा स्पष्टता से समझा नहीं जाता है, उसे ध्यान में नहीं रखा जता है, इसीलिए उसका पालन भी नहीं किया जाता है।


परमेश्वर की आराधना करना, रीति के अनुसार धार्मिक परंपराओं और गतिविधियों का पालन करना नहीं है, और न ही यह औपचारिक रीति से कुछ निर्धारित धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति करना है। हम यशायाह 1:11-20 में देखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों को फटकार लगाता है, क्योंकि वे अब उसके आज्ञाकारी नहीं रहे थे, उनमें उसके प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं थी; वे केवल रीति के अनुसार, औपचारिक तरीके से निर्धारित पर्व, भेंट और बलिदानों का निर्वाह कर रहे थे। किन्तु यह परमेश्वर को स्वीकार्य नहीं था; यशायाह 1:13-14 में परमेश्वर इन के लिए ‘व्यर्थ अन्नबलि’, ‘घृणा’, ‘बुरा लगना’, ‘अनर्थ’, ‘सहा नहीं जाता’, ‘बैर’, ‘बोझ’, ‘सहना’, ‘उकताना’ जैसे शब्दों का प्रयोग करता है, और उनका पूर्णतः तिरस्कार कर देता है। मलाकी 1:10 में परमेश्वर किसी ऐसे जन की लालसा कर रहा है जो आराधना के स्थान के दरवाज़ों को बन्द कर दे जिससे लोग आकर व्यर्थ आराधना न चढ़ाने पाएं। ऐसी ही परिस्थिति प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में भी व्याप्त थी। मंदिर में, रीति के अनुसार औपचारिक आराधना की जाती थी, किन्तु उसमें परमेश्वर के प्रति न तो समर्पण था और न ही सच्ची श्रद्धा। प्रभु ने दो बार मंदिर को ऐसे व्यर्थ के कर्मकांड से स्वच्छ किया, एक बार अपनी सेवकाई के आरंभ में (यूहन्ना 2:14-16), और फिर अपनी पृथ्वी की सेवकाई के अन्त के निकट, और उस मंदिर को, जहाँ पर यह सब हो रहा था, डाकुओं की खोह भी कहा (मरकुस 11:15-17)। साथ ही, क्योंकि उस समय के धार्मिक अगुवों ने अपनी सुविधा के लिए परमेश्वर के वचन की गलत व्याख्याएं की हुई थीं और उसका दुरुपयोग करते थे, उन्हीं गलत बातों को सिखाते तथा पालन करवाते थे, इसलिए प्रभु ने उनकी इस आराधना को “व्यर्थ आराधना” कहा (मत्ती 15:8-9)।


अगले लेख में हम इसी विषय पर कुछ और बातों को देखेंगे कि क्या करना सच्ची आराधना नहीं है।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहोशू 10-12           

  • लूका 1:39-56      


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English Translation


Obstacles to Worship (1) - Not Knowing Worship


In our on-going study about worship, we have seen what worship is, why it is necessary for a Christian Believer, its effects on various aspects related to Christian life and ministry, and how it benefits the Christian Believer - both materially and spiritually. From today we will see what are the things that keep us from truly worshipping God; and, therefore, from growing in our spiritual lives, from being useful for God, and from being benefitted in our lives of faith.

 

We have seen that worshiping and glorifying God is such an essential and blessed part of our relationship with God, one that fills our life with God’s abundant blessings, in this world as well as the next. Yet worshiping and glorifying God is something that is usually neither well understood nor done. The first obstacle that keeps people from truly worshipping God is their not knowing what worship actually is. This deficiency manifests in various forms, and we will begin looking at them now.


Worshiping is often taken to be the same as either singing songs, or praying. Congregational singing of songs, with or without a choir is often seen and accepted as congregational worship in nearly all the denominational Churches. While singing songs is a way of worshipping God, but if it is done by rote and ritualistically, or with the person’s heart not being in it, then such meaningless worship does not qualify as the “worship in spirit and in truth” that God is looking for, and is vain. Not just congregational, but personal worship, as an individual, as a child of God coming before the heavenly father to praise and exalt Him is essential in every Believer’s life, and is what God mainly desires. It is not unusual to find that during individual worship, i.e., after a few words of thanksgiving, many people start praying i.e., asking for things - even blessings upon others. The basic difference that asking from God is praying, and giving to God is worshiping is often not well understood, therefore it is neither kept in mind nor practiced.


Worshipping God is not a mere ritualistic fulfillment of religious traditions and procedures, it is not the perfunctory carrying out of some prescribed religious activities. We see in Isaiah 1:11-20 that God castigates His people, because they had fallen away from being obedient and reverential to God and slipped into ritualistically carrying out the prescribed feasts, offerings, and sacrifices. But this was not acceptable to God; in Isaiah 1:13-14 God calls these ‘futile sacrifices’, ‘abominations’, ‘hateful’, ‘troublesome’, ‘things that weary Him’ and rejects them altogether. In Malachi 1:10 God yearns for someone who would close the doors of the places of worship so that people can no longer offer any vain worship. A similar situation was prevailing during the time of the Lord’s earthly ministry; ritualistic worship was being carried out in the Temple, without any reverence and commitment to God. The Lord cleansed the Temple twice - at the beginning of His ministry (John 2:14-16), and towards the end of His earthly ministry, even called the Temple, where all this was happening, a den of thieves instead of being a house of worship (Mark 11:15-17). Moreover, since the religious leaders had misinterpreted and misused God’s Word, to suit their convenience, and used their misinterpretations to teach and practice wrong things about following and worshipping God. The Lord Jesus called their worship of God as “vain worship” (Matthew 15:8-9).


In the next article we will look at some more things, and continue about not knowing what true worship actually is.

 

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.  


Through the Bible in a Year: 

  • Joshua 10-12

  • Luke 1:39-56



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