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मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 168 – Stewards of The Church / कलीसिया के भण्डारी – 50

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कलीसिया से बहिष्कृत करना – 6

 

    परमेश्वर की कलीसिया नया-जन्म पाए हुए उसके विश्वासियों से, जो परस्पर सहभागिता में रहते हैं, मिलकर बनी है। प्रत्येक विश्वासी को प्रभु की कलीसिया में और एक-दूसरे के साथ सहभागिता में लाकर केवल प्रभु परमेश्वर ही ने रखा है, न कि यह उसके अपने किसी प्रयास के द्वार हुआ है, और न ही किसी अन्य मनुष्य द्वारा, या किसी रीति-रिवाज़ अथवा अनुष्ठान की पूर्ति करने के द्वारा उसे वहाँ रखा गया है। इसलिए प्रत्येक मसीही विश्वासी परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए इन प्रावधानों और विशेषाधिकारों के लिए परमेश्वर का भण्डारी है; और अपने भण्डारी होने के उचित निर्वाह के लिए परमेश्वर को जवाबदेह है। परमेश्वर का भण्डारी होने के नाते, विश्वासी को कलीसिया की बढ़ोतरी तथा अन्य विश्वासियों की आत्मिक उन्नति में योगदान देना है। इस बढ़ोतरी और उन्नति के लिए कलीसिया में और विश्वासियों के बीच अनुशासन होना बहुत आवश्यक है। हाल के लेखों में हम इस अनुशासन से सम्बन्धित एक पक्ष पर विचार कर रहे थे, अर्थात ढीठ और अपश्चातापी होकर गलती में बने रहने वाले किसी विश्वासी को कलीसिया से पृथक और बहिष्कृत करना। हमने इसे मत्ती 5:23-24 और मत्ती 18:15-17 से देखा है, जो कि मुख्यतः विश्वासियों में परस्पर मतभेदों और कलह से सम्बन्धित है, जिस में विश्वासियों के कलीसिया का नेतृत्व करने वाले लोगों से मतभेद और कलह भी सम्मिलित हैं। हमने देखा है कि प्रभु ने इस बात के समाधान के लिए एक प्रक्रिया स्थापित कर के दी है, जिसका क्षमा और मेल-मिलाप की आत्मा में, और बात को सारी कलीसिया के समक्ष लाने के द्वारा ही निर्वाह किया जाना है। साथ ही, किसी भी मनुष्य को, वह चाहे कोई भी क्यों न हो और कलीसिया में उसका कोई भी ओहदा और प्रतिष्ठा क्यों न हो, यह अधिकार और अनुमति नहीं है कि वह इस पृथक और बहिष्कृत करने के लिए निर्णय ले और उसकी आज्ञा ज़ारी करे, औरों को यह करने के लिए बाध्य करे। हर किसी को केवल प्रभु के द्वारा उसके वचन में दिए गए को कार्यान्वित करना है और उसी का पालन करना है।

    परमेश्वर के वचन में निर्देशों का एक अन्य वर्ग भी है, जो पवित्र आत्मा की अगुवाई में लिखी गई पत्रियों में छितराया हुआ है, जो कि एक विश्वासी को कुछ बातों के कारण अपने आप को किसी अन्य दुराचारी विश्वासी से अलग कर लेने के लिए कहता है। अभी तक जो हमने देखा है वह एक ढीठ और अपश्चातापी विश्वासी के गलती में बने ही रहने के कारण उसे पृथक और बहिष्कृत किए जाने के बारे में था; अब, ये अन्य निर्देश विश्वासियों को स्वयं को उन विश्वासियों से अलग कर लेने के बारे में हैं जिनकी जीवन-शैली में, जीवन में, परमेश्वर के वचन में इसके लिए बताई गई कुछ बातें पाई जाती हैं। ये खण्ड, जब हम इन्हें पढ़ते हैं, तो काफी स्पष्ट और अपनी व्याख्या स्वयं कर देने वाले हैं। जिस क्रम में वे नए नियम में दिए गए हैं, विश्वासियों को अपने आप को उन विश्वासियों से अलग कर लेना है, जिन विश्वासियों में ये बातें पाई जाती हैं:

  • रोमियों 16:17 – जो कलीसियाओं में फूट पड़ने और ठोकर खाने का कारण बनते हैं, और जो परमेश्वर के वचन में विश्वासियों को सिखाई गई शिक्षाओं से विपरीत बातें सिखाते हैं।

  • 1 कुरिन्थियों 5:11 – जो व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देने वाले, या पियक्कड़, या अन्धेर करने वाले हों।

  • 2 थिस्सलुनीकियों 3:6-15 – जो जो शिक्षाएँ पौलुस और उसके साथ के लोगों ने दी हैं उनके अनुसार नहीं करते वरन अनुचित चाल चलते हैं; जो अपने जीवनयापन के लिए स्वयं कुछ काम नहीं करते हैं बल्कि औरों के कामों में हाथ डालते हैं, दखलंदाज़ी करते हैं।

  • 1 तीमुथियुस 6:3-5 – जो प्रेरितों तथा प्रभु यीशु द्वारा सिखाई गई भक्ति के अनुसार की बातों को नहीं, वरन और ही बातों को सिखाते हैं; जो अभिमानी हैं, विवादों और शब्दों पर तर्क करते हैं, जिनके कारण डाह, झगड़े, निंदा की बातें, बुरे-बुरे संदेह, व्यर्थ रगड़े-झगड़े उत्पन्न होते हैं, जो इस बात का चिह्न हैं कि उस व्यक्ति की बुद्धि बिगड़ गई है और वे सत्य से विहीन हो गए हैं।

  •  2 यूहन्ना 1:9-11 – जो मसीह की शिक्षा में, अर्थात उद्धार के केवल परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा, प्रभु यीशु के समस्त मानव-जाति के पापों के निवारण के लिए कलवरी के क्रूस पर दिए गए बलिदान और उसके मृतकों में से पुनरुत्थान पर विश्वास करने से मिलता है, पर बने नहीं रहते हैं और न ही इस शिक्षा को औरों को सिखाते हैं।

    लेकिन एक बार फिर से, जैसे कि हमने पृथक और बहिष्कृत किए जाने के पिछले अध्ययन में देखा है, और जैसा पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा 2 थिस्सलुनीकियों 3:14-15 में लिखवाया है, ऐसे लोगों से इस प्रकार से अलग हो जाने का उद्देश्य गलती करने वाले विश्वासी को लज्जित करना, उसे उसकी गलतियों का एहसास दिलाना है जिससे कि वह उनके लिए पश्चाताप कर सके; अलग रहते हुए भी उस से बैरी के समान नहीं वरन प्रभु में एक भाई के समान व्यवहार करना है। किसी अन्य के प्रति आलोचनात्मक और कठोर होने से पहले, सभी को इस शिक्षा, “हे भाइयों, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा भी जाए, तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता के साथ ऐसे को संभालो, और अपनी भी चौकसी रखो, कि तुम भी परीक्षा में न पड़ो। तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो। क्योंकि यदि कोई कुछ न होने पर भी अपने आप को कुछ समझता है, तो अपने आप को धोखा देता है। पर हर एक अपने ही काम को जांच ले, और तब दूसरे के विषय में नहीं परन्तु अपने ही विषय में उसको घमण्ड करने का अवसर होगा। क्योंकि हर एक व्यक्ति अपना ही बोझ उठाएगा” (गलतियों 6:1-5), का ध्यान रखना चाहिए और उस पर विचार करना चाहिए।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Excommunication From the Church – 6

 

The Church of the Lord Jesus is made up of His Born-Again Believers, living in fellowship with each other. Each Believer has been placed in the Lord’s Church and in mutual fellowship of His Believers neither by his own efforts of any kind, nor by any other human being through a person’s fulfilling of some prescribed rituals and practices, but only by the Lord God. Therefore, every Believer is God’s steward for this provision and privilege granted to him by God; and is accountable to God for worthily fulfilling his stewardship. As God’s steward, the Believer has to contribute to the growth of the Church and spiritual progress of other Believers. For this growth and progress, discipline in the Church and in the fellowship is essential. In the recent articles we have been considering one aspect of ensuring this discipline, i.e., exclusion and excommunication of an errant, stubborn, and unrepentant Believer. We have considered this from Matthew 5:23-24 and Matthew 18:15-17, which mainly relate to personal differences and conflicts amongst Believers, which include differences and conflicts amongst lay Believers and Church leaders. We have seen that the Lord has set out a procedure to handle this situation, it is to be fulfilled in a spirit of forgiveness and reconciliation, and only after having brought the matter to the whole Church. Moreover, no human being, whoever he may be and whatever may be his status and standing in the Church or Assembly, can decide to decree this exclusion or excommunication, and enforce it upon others. Everyone has to only implement and practice what the Lord has given in His Word.

In God’s Word, there is another set of instructions, interspersed in the letters written under the guidance of the Holy Spirit, that instruct about a Believer separating himself from other immoral and unrighteous Believers. While what we have seen so far has to do with excluding or excommunicating a stubbornly errant and unrepentant Believer; these other instructions have to do with Believers withdrawing themselves from other Believers who have a certain life-style, as is defined in these passages from God’s Word. These passages, as one reads through them, are quite clear and self-explanatory in themselves. In the order given in the New Testament, the Believers are to withdraw themselves from other Believers, or avoid them if they find the following things in their lives:

  • Romans 16:17 – Those who cause divisions and offenses in the Church and practice doctrines contrary to what has been taught to the Believers in God’s word.

  • 1 Corinthians 5:11 – Believers who are sexually immoral, or covetous, or idolater, or one who reviles, or a drunkard, or an extortioner

  •  2 Thessalonians 3:6-15 – Those who walk disorderly and not according to the traditions taught and given by Paul and his co-workers; those who refuse to work for a living and interfere in other’s lives, are busybodies in the congregation.

  • 1 Timothy 6:3-5 – Those who teach doctrines and practices other than those taught by the Apostles and given by the Lord Jesus, those who are proud, obsessed with disputes and arguments over words which lead to envy, strife, reviling, evil suspicions and useless wranglings, and those who use godliness for gain; for these things in a person indicate his having a corrupt mind and being destitute of truth.

  • 2 John 1:9-11 – Those who neither abide in nor share the doctrine of Christ, i.e., of salvation not by any works but only through the grace of God because of faith in the Lord Jesus’s sacrifice on the cross and His resurrection from the dead for the forgiveness of sins of mankind.

    But once again, as we have seen in the previous study on exclusion and excommunication, as the Holy Spirit through Paul has had written in 2 Thessalonians 3:14-15, the purpose of this segregation is to cause the errant Believer to be ashamed, realize his wrongs, and repent of them; he is not to be treated as an enemy but as a brother in the Lord. Before being judgmental and harsh towards another, everyone should ponder over and bear in mind, “Brethren, if a man is overtaken in any trespass, you who are spiritual restore such a one in a spirit of gentleness, considering yourself lest you also be tempted. Bear one another's burdens, and so fulfill the law of Christ. For if anyone thinks himself to be something, when he is nothing, he deceives himself. But let each one examine his own work, and then he will have rejoicing in himself alone, and not in another. For each one shall bear his own load” (Galatians 6:1-5).

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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