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गुरुवार, 25 जनवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 149 – Stewards of The Church / कलीसिया के भण्डारी – 31

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व्यावहारिक निहितार्थ – 1 

    प्रभु परमेश्वर ने प्रत्येक नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी को अपनी कलीसिया का सदस्य बनाया है तथा उसे अपनी अन्य सन्तानों की सहभागिता में रखा है। हमने मत्ती 16:18 से देखा है कि बाइबल के अनुसार प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया वास्तव में क्या है – वह कोई भवन नहीं है, न ही कोई डिनॉमिनेशन अथवा कोई संस्था है, वरन सारे सँसार के सभी उन बुलाए हुए लोगों का समूह है जिन्होंने अपने पापों से पश्चाताप किया है, प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता मान कर उसे अपना जीवन समर्पित किया है, उसके अनुयायी बनकर जीने, उसकी आज्ञाकारिता में रहने, और सँसार तथा मानवजाति के लिए उसके उद्देश्यों की पूर्ति में प्रयासरत रहने का निर्णय किया है। हमने यह भी देखा था कि किस तरह से बाइबल में कलीसिया के लिए उपयोग किए गए विभिन्न रूपक हमें उसके विभिन्न पक्षों को दिखाते हैं, और यह भी देखा है कि क्यों प्रभु यीशु स्वयं ही अपनी कलीसिया को बना रहा है, उसने इस कार्य को किसी और को नहीं सौंपा है। आज से हम परमेश्वर की कलीसिया का भण्डारी होने के नाते, कलीसिया के प्रति विश्वासी की जिम्मेदारियों को देखना आरंभ करेंगे।

    हम पहले देख चुके हैं कि केवल वे ही जिन्हें परमेश्वर बुला कर अपनी कलीसिया से जोड़ता है, उसकी कलीसिया के अंग बन सकते हैं। कोई भी मनुष्य, या डिनॉमिनेशन, या संस्था, कभी भी, किसी भी रीति से, किसी को भी परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य नहीं बना सकती है। लोग औरों को कुछ रीतियों और परंपराओं के निर्वाह के द्वारा अपनी कलीसिया, डिनॉमिनेशन, या संस्था का सदस्य तो बना सकते हैं, और बनाते भी हैं; किन्तु इस से परमेश्वर कदापि बाध्य नहीं होता है कि वह उन्हें अपनी कलीसिया का भी अंग बना ले – ऐसा केवल परमेश्वर द्वारा स्थापित मानकों के आधार पर ही हो सकता है, और केवल उस ही के द्वारा किया जा सकता है। इस तथ्य में दो महत्वपूर्ण बातें निहित हैं:

    पहली, क्योंकि कोई भी मनुष्य किसी को भी परमेश्वर की कलीसिया में जोड़ नहीं सकता है, इसलिए कोई भी मनुष्य किसी को भी परमेश्वर की कलीसिया से बाहर नहीं निकाल सकता है। साथ ही, क्योंकि परमेश्वर के द्वारा दिया गया उद्धार हमेशा के लिए है, वह न तो कभी वापस लिया जाता है, और न कभी पलटा या खोया जा सकता है, और परमेश्वर केवल नया-जन्म अर्थात उद्धार पाए हुए लोगों को ही अपनी कलीसिया का अंग बनाता है, इसलिए उद्धार पा लेने के बाद परमेश्वर की कलीसिया का अंग होना भी न तो पलटा जा सकता है, और न ही वापस लिया जा सकता है, न उससे इनकार किया जा सकता है। हम इसके बारे में कुछ और विवरण बाद में, कलीसिया के अनुशासन के बारे में देखते समय देखेंगे।

    दूसरी, क्योंकि परमेश्वर ने ही विश्वासियों को बुलाया और एक स्थानीय कलीसिया या मण्डली में रखा है, इसलिए, जब तक कि प्रभु ही उन्हें कलीसिया या मण्डली बदलने के लिए न कहे, किसी भी विश्वासी को उस कलीसिया या मण्डली को छोड़ कर कदापि नहीं जाना चाहिए, जिस के साथ परमेश्वर ने उसे जोड़ा है, उस कलीसिया या मण्डली से किसी भी बात के कारण असन्तुष्ट होने के कारण तो कभी भी नहीं। परमेश्वर ने यह कभी नहीं कहा है कि वह विश्वासियों को कलीसियाओं या मण्डलियों में उन्हें अन्य सदस्यों से आदर, महिमा, और उच्च स्तर दिलवाने के लिए रख रहा है।

    इन दोनों बातों का निहितार्थ है कि क्योंकि कोई भी मनुष्य किसी विश्वासी को परमेश्वर के कलीसिया से निकाल नहीं सकता है, और क्योंकि विश्वासी को जिस कलीसिया के साथ परमेश्वर ने जोड़ा है, स्वयं ही उसे उसको बदलना नहीं है, जब तक कि परमेश्वर ही उसे ऐसा करने के लिए न कहे, इसलिए किसी भी मसीही विश्वासी को कभी भी, कैसे भी, परमेश्वर की कलीसिया को विभाजित करने, उसमें दल या गुट बनाने का किसी भी प्रकार का कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। सम्पूर्ण नए नियम में न तो ऐसा कोई उदाहरण है, और न ही कोई लेख है कि किसी मसीही विश्वासी ने किसी भी कारण से कलीसिया को बदला हो या कलीसिया अथवा मण्डली में कोई विभाजन किया हो। यद्यपि इस बात के तो लेख और उदाहरण हैं कि लोगों ने कलीसिया या मण्डली में दल या गुट बनाने के प्रयास किए, किन्तु उनकी भर्त्सना की गई और निर्देश दिए गए कि वे उन दलों या गुटों का अन्त करें और कलीसिया की एकता को फिर से स्थापित करें। जैसा हमने कलीसिया के रूपकों में देखा है, कलीसिया प्रभु की देह और दुल्हन होने के नाते, कभी भी टुकड़ों में विभाजित नहीं की जा सकती है; ऐसा करने का प्रयास करना प्रभु यीशु को ही दुःख और हानि पहुँचाने के समान है।

    परमेश्वर ने प्रत्येक विश्वासी को एक विशेष कलीसिया अथवा मण्डली में एक उद्देश्य के अंतर्गत रखा है, चाहे वह उद्देश्य उस विश्वासी पर प्रकट हो अथवा नहीं। जहाँ पर उसने उस विश्वासी को रखा है, उस स्थान और वहाँ के लोगों के बारे में परमेश्वर पहले से ही सब कुछ जानता है; उन की सकारात्मक और नकारात्मक बातें, वहाँ के लोगों की मानसिकता, वहाँ पर वे किन बातों का आनंद लेंगे, क्या पसन्द करेंगे, क्या ना पसन्द करेंगे, और वहाँ पर उन्हें क्या कुछ सहना पड़ेगा, किन अनुभवों में से होकर निकालना पड़ेगा, उस कलीसिया या मण्डली के अगुवों के हाथों भी और सदस्यों के हाथों भी। चाहे उनकी अवहेलना भी की जाए, निरादर किया जाए, मसीही विश्वासी को जहाँ परमेश्वर ने उन्हें रखा है, उस स्थान को नहीं छोड़ना है। उनका शान्ति के साथ अवहेलना को सहना, या अगुवों अथवा सदस्यों से दुःख उठाना, सभी बातें चुपचाप उनके परमेश्वर के प्रति समर्पित और आज्ञाकारी होने की, उसका आज्ञाकारी होने की, उनकी बुलाहट के प्रति उनके प्रतिबद्ध और निष्ठावान होने की गवाही देती हैं, उनके विश्वास की परिपक्वता को दिखती हैं। जब वे अपने आप को एक किनारे या अपमानित किया गया अनुभव करते हैं, तब सबसे उचित बात है कि शान्त बने रहें और परमेश्वर द्वारा उन्हें उसके समय पर ऊँचे पर उठाए जाने की प्रतीक्षा करें (याकूब 4:6; 1 पतरस 5:5-6), जैसे उसने यूसुफ को उठाया था। याद रखिए कि परमेश्वर ही ऊँचे पर उठाता है, अपने समय में, और अपनी विधि द्वारा, जैसे उसने तय की है। कलीसिया या मण्डली में पहचान न होना, आदर न मिलना, कभी भी छोड़ने के कारण नहीं होने चाहिएं, और किसी अन्य सदस्य को कलीसिया से तोड़ने के तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसी किसी भी गतिविधि में सम्मिलित होना केवल विश्वासी और उसकी आशीषों की ही हानि करेगा – पार्थिव की भी तथा स्वर्गीय की भी।

    हम अगले लेख में भी कलीसिया में विश्वासियों की जिम्मेदारियों और व्यवहार के बारे में देखना ज़ारी रखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation

Practical Implications – 1

 

    The Lord God has made every Born-Again Christian Believer a member of His Church and placed him in fellowship with His other children. We have seen, Biblically from Matthew 16:18, what the Church of the Lord Jesus Christ actually is – not any building, nor any denomination or organization, but the universally called out group of people who have repented of their sins, submitted themselves to the Lord Jesus accepting Him as their personal Lord and Savior, and decided to follow Him, obey Him, strive to fulfill His purposes for this world and mankind. We also saw how the various metaphors for the Church used in the Bible show its various aspects, and that why it is the Lord who is building His Church, has not left this to anyone else. From today, we will start considering the Believer's responsibilities towards God’s Church, as stewards of this God given privilege.

    We have seen earlier that only those whom God calls and joins to His Church can be a part of God's Church. No man, or denomination, or organization can ever, through any means, make anyone a member of God’s Church. People can, and do make others members of their own churches, denominations, and organizations, through some rituals and practices; but this does not in any way compel God to accept them as members of His Church as well – which can only be done on the basis of His established criteria and only by Him alone. Inherent in this fact are two very important implications:

    Firstly, since no man can join anyone to God’s Church, therefore no man can cast out anyone from God’s Church either. Moreover, since God’s salvation is eternal, is never revoked or lost, and God makes only the Born-Again or saved the members of His Church and family, therefore after salvation being a part of God’s Church is also irrevocable, can never be lost, or denied, or taken away; we will see some more details about this later, while considering Church discipline.

    Secondly, since it is God who has called and placed the Believers in a particular local Assembly, therefore, unless it is the Lord who asks them to change the Assembly, the Believers should not leave or go away from the Church or Assembly where God has put them, not in the least because of feeling dissatisfied in that Assembly or Church for any reason. God has never said that He is placing the Believers in particular Assemblies so that they may receive honor, glorification and exaltation, from the other members.

    The inherent implication in these two points is, that since the Believers cannot be removed from God’s Church by any man, and since the Believer is not to change His God assigned Church or Assembly for any reason, other than God instructing him to do so, therefore, no Christian Believer is to try to break up or divide God’s Church, encourage factionalism and divisions in the Church where God has placed him, in any manner or for any reasons, by any means. Throughout the New Testament, there is no record, no example of any Christian Believer ever changing their Assembly, or of causing a breaking up an Assembly, despite there being records of factionalism in assemblies, which were denounced, and instructions were given to break up the factions and restore unity in the Church. As we have seen through the metaphors, the Church being the body and the bride of Christ, it cannot be broken up into bits and pieces; trying to do so is hurting and harming the Lord Jesus.

    God has put every Believer in a particular Church or Assembly for a purpose, whether or not the purpose is apparent to him. God knows beforehand all the things about the place where He has put him, it's positive and negative things, it's people and their mentality; and the things that they will enjoy, like, dislike, and will have to suffer and go through in that Church, Assembly and it's congregation. Even if they have to suffer being ignored, and undergo humiliation, the Christian Believers are not to leave the place God has placed them in. Even their silently putting up with being ignored, or their suffering hurtful things from the Elders and/or the congregation, everything serves to silently witness to their commitment and obedience to God, their trust in Him, their commitment and their sincerity towards their calling, demonstrating the maturity of their faith. During the times they feel being side-lined or humiliated, the best course of action is to stay silent and wait for the Lord to exalt them in due time (James 4:6, 10; 1 Peter 5:5-6), as He exalted Joseph. Remember, it is the Lord who exalts, in His time, and in the manner He decides about it. Lack of recognition and respect should never be the reasons to break away or leave the Church, far less, to break off the other members as well. Indulging in any such activity will only harm the Believer and his blessings – temporal as well as eternal.

    We will continue to consider the Believer’s responsibilities and behavior in the Church in the next article.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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