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सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - परमेश्वर की खेती / The Church, or, Assembly of Christ Jesus - God’s Field


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प्रभु यीशु की कलीसिया - परमेश्वर की खेती  

 

हम पिछले कुछ लेखों में हम प्रभु यीशु की कलीसिया के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खंड में प्रयोग किए गए विभिन्न रूपक (metaphors), जैसे कि - प्रभु का परिवार या घराना; परमेश्वर का निवास-स्थान या मन्दिर; परमेश्वर का भवन; परमेश्वर की खेती; प्रभु की देह; प्रभु की दुल्हन; परमेश्वर की दाख की बारी, इत्यादि के बारे में देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि किस प्रकार से इन रूपकों में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रभु द्वारा अपनी कलीसिया, अर्थात, अपने सच्चे और समर्पित शिष्यों का धर्मी और पवित्र किए जाना, परमेश्वर के साथ कलीसिया के संबंध, संगति, एवं सहभागिता की बहाली, तथा कलीसिया के लोगों के व्यवहार और जीवनों में परमेश्वर के प्रयोजन, उन से उसकी अपेक्षाएं, आदि को समझाया है।  इनमें से प्रत्येक रूपक, एक सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु और पिता परमेश्वर के साथ संबंध को, तथा उसके मसीही जीवन, और दायित्वों के विभिन्न पहलुओं को दिखाता है।

 

इन सभी रूपकों में सामान्य बात है कि प्रत्येक रूपक यह भी बिलकुल स्पष्ट और निश्चित कर देता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के किसी भी मानवीय प्रयोजन, कार्य, मान्यता या धारणा के निर्वाह आदि के द्वारा, अपनी अथवा किसी अन्य मनुष्य की ओर से परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य बन ही नहीं सकता है; वह चाहे कितने भी और कैसे भी प्रयास क्यों न कर ले। अगर व्यक्ति प्रभु यीशु की कलीसिया का सदस्य होगा, तो वह केवल प्रभु की इच्छा से, उसके माप-दंडों के आधार पर, उसकी स्वीकृति से होगा, अन्यथा कोई चाहे कुछ भी कहता रहे, वह चाहे किसी मानवीय कलीसिया अथवा किसी संस्थागत कलीसिया का सदस्य हो जाए, किन्तु प्रभु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य हो ही नहीं सकता है। और यदि वह अपने आप को प्रभु की कलीसिया का सदस्य समझता या कहता भी है, तो भी प्रभु उसकी वास्तविकता देर-सवेर प्रकट कर देगा, और अन्ततः वह अनन्त विनाश के लिए प्रभु की कलीसिया से पृथक कर दिया जाएगा। इसलिए अपने आप को मसीही विश्वासी कहने वाले प्रत्येक जन के लिए अभी समय और अवसर है कि अभी अपने ‘मसीही विश्वासी’ होने के आधार एवं वास्तविक स्थिति को भली-भांति जाँच-परख कर, उचित कदम उठा ले और प्रभु के साथ अपने संबंध ठीक कर ले। हर व्यक्ति को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वह किसी मानवीय कलीसिया अथवा किसी संस्थागत कलीसिया का नहीं, परंतु प्रभु यीशु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य है।


 पिछले लेखों में हम उपरोक्त सूची के पहले तीन रूपकों को देख चुके हैं। हमने यहाँ पर इन लेखों में रूपकों को किसी निर्धारित अथवा विशेष क्रम में नहीं लिया अथवा रखा है; सभी रूपक समान ही महत्वपूर्ण हैं, सभी में मसीही जीवन से संबंधित कुछ आवश्यक शिक्षाएं हैं। आज हम इस सूची के चौथे रूपक, परमेश्वर की खेती होने के संबंध में देखेंगे।

(4) परमेश्वर की खेती

परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में, पौलुस प्रेरित ने कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों की मण्डली को लिखी अपनी पहली पत्री में लिखा, “क्योंकि हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं; तुम परमेश्वर की खेती और परमेश्वर की रचना हो” (1 कुरिन्थियों 3:9); इसे इसके संदर्भ में पद 1 से देखना अधिक उचित है। संदर्भ के साथ देखने से स्पष्ट हो जाता है कि पवित्र आत्मा पौलुस में होकर कुरिन्थुस की मण्डली के लोगों को उलाहना दे रहा है क्योंकि उन्होंने अपने आप को एकता में रखने की बजाए, अपने आप को उनके मध्य सेवकाई करने वाले सेवकों के अनुसार विभाजित करना आरंभ कर दिया था। विभाजन की इस प्रवृत्ति की भर्त्सना करते हुए, पवित्र आत्मा ने लिखवाया कि न तो पौलुस कुछ है, और न ही अपुल्लोस कुछ है। वे केवल प्रभु के सेवक हैं जिन्हें प्रभु ने अपने लोगों के मध्य कार्य के लिए प्रयोग किया, किन्तु उनके कार्य को सफल और फलवंत करने वाला परमेश्वर है, जिसके कार्य के बिना उन सेवकों का परिश्रम व्यर्थ है। इस बात को समझाने के लिए पवित्र आत्मा ने खेती-किसानी से संबंधित बातों को रूपकों के समान प्रयोग किया। पद 6-8 में मजदूरों द्वारा खेत में बीज के बोने और उगने वाली फसल के पौधों को सींचने वाले को मात्र सेवक, जिन्हें उनके परिश्रम के अनुसार प्रतिफल दिया जाएगा कहा गया है। साथ ही यह बताया गया है कि परमेश्वर ही उनके परिश्रम को स्वामी के लिए फसल का प्रत्यक्ष स्वरूप एवं परिणाम देने वाला है। और तब पद 9 में मण्डली या कलीसिया को परमेश्वर की खेती, परमेश्वर की रचना बताया गया है।


इसी रूपक से संबंधित दो अलग-अलग दृष्टांत प्रभु यीशु ने मत्ती 13 अध्याय में भी दिए हैं; जिन्हें परस्पर एक समान लेकर भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए। इन में से पहला, बीज बोने वाले का दृष्टांत, चार प्रकार की भूमियों के बारे में है। उन चारों भूमियों पर एक ही बीज बोने वाले - प्रभु यीशु (मत्ती 13:37) ने एक ही समान गुणवत्ता के बीज - परमेश्वर का वचन (लूका 8:11) बोया। किन्तु इन चार प्रकार की “भूमि” में से केवल एक ही प्रकार की भूमि “अच्छी” है, जिसमें बोया गया बीज अन्ततः फलवंत हुआ (मत्ती 13:23)। दूसरा दृष्टांत दो भिन्न प्रकार के बीजों के विषय में है। इस दृष्टांत की व्याख्या करते समय, प्रभु यीशु ने बताया कि “खेत” संसार है (मत्ती 13:38), और इसमें दो प्रकार के बीज बो दिए गए हैं - अच्छे बीज, अर्थात, परमेश्वर के राज्य की सन्तान, और बुरे बीज, अर्थात, दुष्ट अर्थात शैतान की सन्तान या लोग (मत्ती 13:38 )। परमेश्वर ने अपने खेत में अच्छे बीज बोए, किन्तु शैतान ने आकर अपने बुरे बीज भी उसी खेत में बो दिए (मत्ती 13:39), जिन्हें फिर जगत के अन्त, कटनी के समय, पृथक करके, अपने-अपने स्थानों पर पहुँचा दिया जाएगा (मत्ती 13:40-42)।


प्रत्येक स्थानीय कलीसिया या मण्डली के लोग, प्रभु यीशु द्वारा दिए गए प्रथम दृष्टांत की चार प्रकार की भूमियों के समान हैं; जिन्हें परमेश्वर के द्वारा नियुक्त उसके सेवक प्रभु की ओर से, परमेश्वर के एक ही वचन से, एक ही समान शिक्षाएं देते हैं। किन्तु हर एक सदस्य उन शिक्षाओं को समान रीति से ग्रहण तथा अपने जीवन में उपयोग नहीं करता है, और परिणामस्वरूप, कलीसिया के विभिन्न लोगों में आत्मिकता के भिन्न स्तर पाए जाते हैं। यहाँ तक कि अन्त के समय जब प्रतिफल मिलने की बारी आएगी, तब ऐसे भी लोग होंगे जो परमेश्वर के राज्य में खाली हाथ प्रवेश करेंगे, क्योंकि उनका जीवन और कार्य किसी प्रतिफल के योग्य ही नहीं रहे; किन्तु उनका उद्धार या प्रभु की कलीसिया का जन होना उनसे कदापि नहीं छीना जाएगा (1 कुरिन्थियों 3:13-15)। किन्तु उस समय की उनकी दश की कल्पना कीजिए, उन्हें स्वर्ग में प्रवेश तो मिला, किन्तु अनन्त काल के लिए वे खाली हाथ ही रहेंगे, उनके पास स्वर्ग में उपयोग के लिए कोई प्रतिफल नहीं होंगे, और न ही कोई अवसर होगा कि अपनी इस स्थिति को सुधार सकें। वे परमेश्वर की खेती तो हैं, किन्तु “अच्छी भूमि” नहीं बने, पृथ्वी पर अपने समय और योग्यताओं को प्रभु के लिए प्रयोग करने के स्थान पर उन्हें नश्वर संसार और संसार के लोगों, अधिकारियों, तथा नाशमान बातों के लिए लगाते रहे, और प्रभु के खेती होते हुए भी अपने समय, अवसर, और वरदानों को व्यर्थ कर दिया (1 यूहन्ना 2:15-17)।

 

इसी प्रकार से, प्रभु द्वारा बताए गए दूसरे दृष्टांत के अनुरूप, प्रत्येक स्थानीय कलीसिया में प्रभु के लोग और उनके मध्य शैतान के द्वारा घुसा दिए गए लोग, अर्थात दोनों ही प्रकार के लोग होते हैं। और जैसा हम पहले 26 सितंबर के “प्रभु यीशु अपनी कलीसिया स्वयं ही बना रहा है” लेख में देख चुके हैं, प्रभु शैतान द्वारा उसकी कलीसिया या मण्डली में घुस आए शैतान के लोगों को अलग करता भी रहता है तथा जगत के अन्त के समय के अलग किए जाने के समय वे सभी जो प्रभु की वास्तविक कलीसिया के नहीं हैं, अनन्त विनाश में भेज दिए जाएंगे।


 यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो ध्यान कीजिए कि एक बार फिर यह रूपक स्पष्ट कर देता है कि कोई भी मनुष्य अपनी अथवा किसी अन्य मनुष्य या संस्था की बातों के निर्वाह के द्वारा प्रभु की खेती, उसकी रचना नहीं बन सकता है। और न ही कोई परमेश्वर के वचन की अवहेलना करके, संसार, संसार के लोगों, संसार की बातों और लालसाओं को अपने जीवन में प्राथमिकता देकर, प्रभु की कलीसिया का सदस्य होने पर भी, कोई प्रभु से कुछ प्रतिफल पा सकता है। प्रभु ही अपनी कलीसिया को बनाता है, उसकी देखभाल करता है, और उसमें से उनको जो उसके द्वारा सम्मिलित नहीं किए गए हैं, शैतान के लोगों को निकाल देता है। इसलिए ध्यान कीजिए कि आपकी प्रभु की कलीसिया में, और प्रभु के वचन की आज्ञाकारिता में तथा अपने जीवन में उसके वचन को दी गई प्राथमिकता की दशा क्या है? यदि कुछ सुधारे जाने की आवश्यकता है, तो अभी, समय और अवसर रहते यह कर लीजिए; विलंब या लापरवाही बहुत हानिकारक हो सकती है। प्रभु अपने विश्वासियों, अपनी वास्तविक कलीसिया के सच्चे सदस्यों को अपनी खेती, अपनी रचना के समान, अपने लिए भी, तथा उनके अनन्तकाल के लिए भी फलवन्त और आशीषित देखना चाहता है; यदि वे उसके वचन को अपने जीवनों में प्राथमिकता तथा आज्ञाकारिता का उचित स्थान प्रदान करते रहें।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 17-19
  • इफिसियों 5:17-33

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English Translation


Biblical Metaphors for the Church – Field of God


We have been considering the various metaphors given in the New Testament section of the Word of God the Bible, for the Church of God, e.g., the Family of the Lord; the Temple or Dwelling place of God; House of God; the Field of God; The Body of the Lord; the Bride of the Lord; the Vineyard of God, etc. We have seen how through these metaphors God the Holy Spirit has shown and explained about the Church of the Lord Jesus Christ, i.e., about those who are His truly surrendered and committed people being made pure and holy, their relationship with the Lord, the restoration of His people to fellowship with God, the life and behavior of the people of the Church, and God’s expectations from them, His work in their lives etc. We are not considering these metaphors in any particular order; all of them are equally important, and every one of them teaches some important thing or the other about Christian life.


Every metaphor shows different aspects of the relationship of a truly surrendered and committed Christian Believer with the Lord Jesus and God, and the related aspects of the Believer’s life and responsibilities. Every metaphor also makes it very clear and evident that no person can become a member of the Lord’s Church through any human works, criteria, notions etc., no matter who he may be or how much he may try to join the Lord’s Church. If anyone joins the Church of the Lord, it will only be according to the will, standards, criteria, and acceptance by the Lord. Other than this anyone may keep saying, doing, and claiming whatever they may; he will never actually be or become a member of the Lord’s Church. Even if he considers himself to be and claims his being a member, sooner or later his actual state will be exposed, and he will be separated out for eternal destruction. Therefore, for everyone who claims himself to be a Christian Believer, now is the time and opportunity to examine and evaluate their relationship with the Lord and its basis, and if there is any doubt, then have it rectified and come into the right relationship with the Lord.


From this list of metaphors, we have considered the first three metaphors in the previous articles. Today we will consider the fourth metaphor, being the Field of God.


(4) The Field of God

Under the guidance of the Holy Spirit, the Apostle Paul in his first letter to the Christian Believer’s Assembly in Corinth wrote, “For we are God's fellow workers; you are God's field, you are God's building” (1 Corinthians 3:9); it is better to consider this verse in its context, from verse 1 onwards. When seen in its context, it becomes clear that the Holy Spirit through Paul is admonishing the Church in Corinth, because instead of keeping themselves in unity, they had started to divide themselves into factions, according to the name of the ministers of God serving amongst them. Castigating their tendency of segregating themselves, the Holy Spirit had it written that neither Paul nor Apollos are anything in themselves. They are merely ministers of the Lord, whom He has used amongst His people for some works; but the power to make their works successful and fruitful came from God, and without Him those ministers could not have accomplished anything. To make them understand this concept, the Holy Spirit used an activity related to farming and working in the fields as a metaphor. In verses 6-8 it says that those who plant the seeds in the field, and those who water the plants, take care of them, are all servants of the master, and each will receive his reward according to their diligence and labor from God. It is also written in verse 9 that the Church or the Assembly is the “field of God.”


The Lord Jesus had given two parables related to this metaphor in Matthew 13; these two parables, their contents, and their implications should not be confused with each other. The first one of these parables, the parable of the “Sower of the Seed”, is about the four kinds of soils. One and the same ‘Sower’ - the Lord Jesus (Matthew 13:37) sowed seed of the same quality - the Word of God (Luke 8:11) in all four soils. But of these four kinds of soils, only one kind was the good soil, in which the sown seed brought much returns (Matthew 13:23). The second parable is about two different kinds of seed. While explaining this parable, the Lord Jesus said that the “field” is the world (Matthew 13:38), and in this ‘field’ two kinds of seed have been sown - the good seed, i.e., the ‘sons of the kingdom’ of God, and Satan has come and sown his tares also amongst the good seed (Matthew 13:39). The results of these two kinds of seeds will be segregated at the end and each will be sent to its assigned place (Matthew 13:40-42).


The members of every local Church or assembly are like the four soils of the first parable given by the Lord; everyone is given the same teachings from the same Word of God, by the same appointed minister of God to work amongst them. But not every member accepts and utilizes the teachings in a similar manner, therefore, in the local Church people of differing Spiritual maturity and growth are found in the Church. Even so, that at the end time, when it is time to give out the rewards to each one, there will be some who will enter the Kingdom of God empty handed, because their life and works were not worthy of any rewards; but their status of being a part of the Church of God, a saved person, will never be taken away from them (1 Corinthians 3:13-15). But just imagine their plight at that time, they will be allowed into heaven, but they will be empty-handed for eternity, they will have no rewards to utilize in heaven, and no opportunity to rectify this situation. They were and are the ‘field of God’, but they never became the good soil. They had not utilized their time and opportunities on earth for the work of the Lord; rather, used their time, talents, and opportunities for the temporal gains of the perishing world, for the people of the world, to please their worldly authorities, and despite being the ‘field of God’ they wasted away their gifts, talents, time, and opportunity (1 John 2:15-17).


Similarly, in accordance with the second parable of the Lord, in every local Church, amongst the people of God, satanic people are also infiltrated, i.e., both kinds of people are found in every local Church. As we have seen in an earlier article of 26th September, "The Lord Is Building His Church", the Lord keeps exposing and separating out these satanic people, and at the end time, all those not actually a part of the true Church of the Lord Jesus Christ, will be sent to their eternal destruction.


If you are a Christian Believer, then take note that this metaphor too makes it very clear that no person can ever become a part of God’s field, through fulfilling any of his own, or any other person’s or institution’s contrived rules, regulations, and ceremonies. Neither can anyone by ignoring God’s Word, giving more importance to the world, things of the world, and the people of the world, gain any heavenly rewards, despite being a part of the Church of the Lord Jesus Christ. It is the Lord who is building His Church, is looking after it, and from time-to-time keeps weeding out those whom He has not planted, i.e., the satanic people infiltrated into His Church. Therefore, take note and do a careful evaluation - in the Church of the Lord Jesus, what is your status of faith and obedience to the Lord and His Word? Who or what has the primacy in your life, the things of the world or the work of the Lord? If there is something that needs to be corrected, then do it now while you have the time and opportunity; any delay or procrastination can have irreversible, eternally disastrous, and vry painful consequences. The Lord wants to see His ‘field’, His people, fruitful now and for eternity, both for Him as well as for themselves; which comes about by their giving Him and His Word the primary position and required obedience.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.



Through the Bible in a Year: 

  • Isaiah 17-19 

  • Ephesians 5:17-33




रविवार, 2 अक्तूबर 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - परमेश्वर का भवन / The Church, or, Assembly of Christ Jesus - God’s Temple


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प्रभु यीशु की कलीसिया - परमेश्वर का भवन

 

प्रभु यीशु की कलीसिया के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खंड में विभिन्न रूपक (metaphors) दिए गए हैं, जैसे कि - प्रभु का परिवार या घराना; परमेश्वर का निवास-स्थान या मन्दिर; परमेश्वर का भवन; परमेश्वर की खेती; प्रभु की देह; प्रभु की दुल्हन; परमेश्वर की दाख की बारी, इत्यादि। इन रूपकों में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रभु द्वारा अपनी कलीसिया, अर्थात, अपने सच्चे और समर्पित शिष्यों का धर्मी और पवित्र किए जाना, परमेश्वर के साथ कलीसिया के संबंध, संगति, एवं सहभागिता की बहाली, तथा कलीसिया के लोगों के व्यवहार और जीवनों में परमेश्वर के प्रयोजन, उन से उसकी अपेक्षाएं, आदि को समझाया है। हमने यहाँ पर इन लेखों में रूपकों को किसी निर्धारित अथवा विशेष क्रम में नहीं लिया अथवा रखा है; सभी रूपक समान ही महत्वपूर्ण हैं, सभी में मसीही जीवन से संबंधित कुछ आवश्यक शिक्षाएं हैं।


इन सभी रूपकों में सामान्य बात है कि इनमें से प्रत्येक रूपक, एक सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु और पिता परमेश्वर के साथ संबंध को, तथा उसके मसीही जीवन, और दायित्वों के विभिन्न पहलुओं को दिखाता है। साथ ही प्रत्येक रूपक यह भी बिलकुल स्पष्ट और निश्चित कर देता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के किसी भी मानवीय प्रयोजन, कार्य, मान्यता या धारणा के निर्वाह आदि के द्वारा, अपनी अथवा किसी अन्य मनुष्य की ओर से परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य बन ही नहीं सकता है; वह चाहे कितने भी और कैसे भी प्रयास क्यों न कर ले। अगर व्यक्ति प्रभु यीशु की कलीसिया का सदस्य होगा, तो वह केवल प्रभु की इच्छा से, उसके माप-दंडों के आधार पर, उसकी स्वीकृति से होगा, अन्यथा कोई चाहे कुछ भी कहता रहे, वह चाहे किसी मानवीय कलीसिया अथवा किसी संस्थागत कलीसिया का सदस्य चाहे हो जाए, किन्तु प्रभु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य हो ही नहीं सकता है। और यदि वह अपने आप को प्रभु की कलीसिया का सदस्य समझता या कहता भी है, तो भी प्रभु उसकी वास्तविकता देर-सवेर प्रकट कर देगा, और अन्ततः वह अनन्त विनाश के लिए प्रभु की कलीसिया से पृथक कर दिया जाएगा। इसलिए अपने आप को मसीही विश्वासी कहने वाले प्रत्येक जन के लिए अभी समय और अवसर है कि अभी अपने ‘मसीही विश्वासी’ होने के आधार एवं वास्तविक स्थिति को भली-भांति जाँच-परख कर, उचित कदम उठा ले और प्रभु के साथ अपने संबंध ठीक कर ले। हर व्यक्ति को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वह किसी मानवीय कलीसिया अथवा किसी संस्थागत कलीसिया का नहीं, परंतु प्रभु यीशु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य है।


पिछले लेखों में हम इस सूची के पहले दो रूपकों को देख चुके हैं। आज हम इस सूची के तीसरे रूपक, परमेश्वर का भवन होने के संबंध में देखेंगे, जो इससे पहले वाले रूपक, परमेश्वर का निवास स्थान या मन्दिर होने से मिलता-जुलता है।

(3) परमेश्वर का भवन

कलीसिया और उसके सदस्यों के परमेश्वर का भवन  होने से संबंधित परमेश्वर के वचन बाइबल में से कुछ पदों को देखिए:

  • परमेश्वर के उस अनुग्रह के अनुसार, जो मुझे दिया गया, मैं ने बुद्धिमान राज-मिस्री के समान नींव डाली, और दूसरा उस पर रद्दा रखता है; परन्तु हर एक मनुष्य चौकस रहे, कि वह उस पर कैसा रद्दा रखता हैक्योंकि उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता” (1 कुरिन्थियों 3:10-11)।

  • और प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है, बनाए गए हो। जिस में सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है” (इफिसियों 2:20-21)।

  • तुम भी आप जीवते पत्थरों के समान आत्मिक घर बनते जाते हो, जिस से याजकों का पवित्र समाज बन कर, ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ, जो यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्राह्य हों। इस कारण पवित्र शास्त्र में भी आया है, कि देखो, मैं सिय्योन में कोने के सिरे का चुना हुआ और बहुमूल्य पत्थर धरता हूं: और जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह किसी रीति से लज्जित नहीं होगा। सो तुम्हारे लिये जो विश्वास करते हो, वह तो बहुमूल्य है, पर जो विश्वास नहीं करते उन के लिये जिस पत्थर को राजमिस्त्रीयों ने निकम्मा ठहराया था, वही कोने का सिरा हो गया” (1 पतरस 2:5-7)।

    यह एक सामान्य एवं सर्व-विदित तथ्य है कि हर भवन एक नींव पर बनाया जाता है, जो दिखाई तो नहीं देती है किन्तु उस भवन की स्थिरता और स्थापना के लिए सबसे महत्वपूर्ण भाग है। नींव जितनी गहरी और दृढ़ होगी, भवन उतना ऊंचा और स्थिर बनेगा। साथ ही उस नींव का एक अति-महत्वपूर्ण अंश होता है उसके सिरे या कोने का पत्थर; इस पत्थर से ही भवन की दीवारों की सीध और दिशा देखी और नापी जाती है। यदि इस कोने के पत्थर में कुछ भी टेढ़ापन होगा, तो भवन का निर्माण और स्वरूप भी टेढ़ा होगा। नींव और भवन की स्थिरता से संबंधित तीसरी अति-महत्वपूर्ण बात है वह भूमि जिस पर भवन बनाया जा रहा है। यदि भूमि अस्थिर या रेतीली होगी, तो नींव भी अस्थिर रहेगी, और भवन कभी दृढ़ और स्थिर नहीं होगा; किसी परिस्थिति को सहन नहीं कर पाएगा, और विपरीत परिस्थितियों में बहुत शीघ्र ही ढह जाएगा। जब परमेश्वर का प्रथम मन्दिर, सुलैमान द्वारा बनवाया जा रहा था, तो उसकी नींव साधारण पत्थरों से नहीं डाली गई; वरन उसके लिए लिखा है “फिर राजा की आज्ञा से बड़े बड़े अनमोल पत्थर इसलिये खोदकर निकाले गए कि भवन की नेव, गढ़े हुए पत्थरों से डाली जाए” (1 राजाओं 5:17) - बड़े-बड़े और अनमोल पत्थर खोद कर निकाले गए, गढ़कर तैयार किए गए और तब परमेश्वर के मन्दिर की नींव में स्थापित किए गए।

  

इन बातों को ध्यान में रखते हुए, प्रभु की कलीसिया, जिसे परमेश्वर का भवन कहा गया है, प्रभु की शिक्षाओं रूपी दृढ़ चट्टान (मत्ती 7:24-25) पर तथा परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों में होकर पवित्र आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन में दी गई शिक्षाओं पर स्थापित है (1 कुरिन्थियों 3:10-11; इफिसियों 2:20-21), तथा इस नींव में भवन को सही स्वरूप देने के लिए प्रभु यीशु मसीह स्वयं ही नींव और भवन का कोने का पत्थर है। साथ ही हम 1 कुरिन्थियों 3:10 से यह भी सीखते हैं इस नींव पर भवन बनाने के लिए रद्दा, अर्थात निर्माण के लिए प्रयोग किए जाने वाले पत्थरों की एक के ऊपर दूसरी तह या परत, प्रभु के अन्य सेवक रखते जा रहे हैं। यह भवन अभी निर्माणाधीन है, और भवन जिन पत्थरों से बन रहा है वे जीवते पत्थर, अर्थात मसीही विश्वासी हैं (1 पतरस 2:5)। हम प्रभु की कलीसिया के वर्तमान में निर्माणाधीन होने वाले 28 सितंबर के लेख में 1 राजाओं 6:7 से तथा अन्य संबंधित पदों से इसके बार में विस्तार से देख चुके हैं। परमेश्वर के भवन के बनाने से संबंधित सामग्री में इन विशेषताओं के विद्यमान होने की अनिवार्यताओं को ध्यान में रखते हुए, एक बार फिर से यह बात प्रकट है कि परमेश्वर का भवन केवल प्रभु यीशु के प्रति सच्चे विश्वास, समर्पण, और निष्ठा रखने वालों से ही बनाया जा सकता है, कोई भी मनुष्य या संस्था इसमें अपनी ओर से कुछ नहीं कर सकते हैं। प्रभु की कलीसिया, प्रभु ही बनाता है, वह किसी मनुष्य द्वारा नहीं बनाई जाती है।

 

भवन बनाने से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य भी है, जिसका ध्यान रखा जाना चाहिए। हर भवन, अपनी नींव पर ही बनाया जाता है। यदि संपूर्ण नींव का प्रयोग नहीं किया जाएगा, तो भवन अधूरा रहेगा; और यदि नींव के बाहर बिना नींव के कुछ बनाया जाएगा तो वह अस्थिर होगा, और शीघ्र ही ढह भी जाएगा। प्रेरित पौलुस ने अपनी सेवकाई और शिक्षाओं के लिए कहा, “क्योंकि मैं परमेश्वर की सारी मनसा को तुम्हें पूरी रीति से बनाने से न झिझका” (प्रेरितों 20:27); और “हर एक पवित्र शास्‍त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है” (2 तीमुथियुस 3:16)। इसीलिए किसी मनुष्य को परमेश्वर के वचन की बातों में कोई भी काट-छाँट या बढ़ोतरी करना, कड़ाई से मना किया गया है; ऐसा करने वाले के लिए भारी दण्ड रखा गया है (व्यवस्थाविवरण 4:2; 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। प्रभु हम साधारण मनुष्यों, जगत के उन तिरस्कृत, अयोग्य, और मूर्ख लोगों (1 कुरिन्थियों 1:26-28) को लेकर, उनके द्वारा, जिन्होंने उस पर विश्वास किया, पापों से पश्चाताप करके, उसकी आज्ञाकारिता में चलने और बने रहने के लिए अपना जीवन उसे समर्पित कर दिया है, परमेश्वर के लिए ऐसे याजकों के पवित्र समाज को खड़ा कर रहा है, जो परमेश्वर को स्वीकार्य आत्मिक बलिदान यीशु मसीह में होकर चढ़ाने वाले हों, (1 पतरस 2:5); एक चुना हुआ वंश, व्यवस्था के याजकों से भी उच्च श्रेणी के “राजपद धारी याजकों” का समाज, परमेश्वर की निज प्रजा बना रहा है, जिससे कि हम उसके गुणों को संसार के सामने प्रकट करें (1 पतरस 2:9)। प्रभु की कलीसिया परमेश्वर का ऐसा भवन बनें जो परमेश्वर की भव्यता, महानता और महिमा को प्रकट करे। प्रभु की कलीसिया के सभी लोग साथ मिलकर परमेश्वर का निवास स्थान हों (इफिसियों 2:22)। यह ऐसी ईश्वरीय आशीष और स्वर्गीय आदर है जो कोई भी मनुष्य या मानवीय प्रयोजन कभी किसी मनुष्य को नहीं दे सकता है।

 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो, क्या आपका मसीही जीवन, चाल-चलन, और सामाजिक व्यवहार उस नींव की गवाही देता है जिस पर प्रभु ने आपको बनाया है? क्या परमेश्वर के वचन की शिक्षाएं आपके जीवन शैली का आधार हैं? जो प्रभु के द्वारा अपनी कलीसिया में जोड़ा गया होगा, वह प्रभु के समान और प्रभु की आज्ञाकारिता में चलने का भी प्रयत्न करता रहेगा (1 यूहन्ना 2:3-6)। किन्तु जो किसी मत, समुदाय, डिनॉमिनेशन, या संस्था के द्वारा, किसी मानवीय प्रक्रिया के द्वारा कलीसिया में जोड़ा गया होगा, वह उस मानवीय संस्थान की बातों का, उसके अधिकारियों एवं लोगों को प्रसन्न करने के प्रयास करेगा; उसके जीवन में बाइबल की नहीं, उस संस्थान के बातें प्राथमिकता पाएंगी। आपके जीवन में प्राथमिकता किस की है? आप से कौन प्रसन्न रहता है - प्रभु यीशु या कुछ मनुष्य? ध्यान कीजिए पौलुस ने अपनी सेवकाई और प्राथमिकताओं के विषय लिखा, “यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता” (गलातियों 1:10)। यदि आपको अपने प्रभु की कलीसिया का वास्तविक, प्रभु के द्वारा बनाया गया सदस्य होने पर जरा सा भी संदेह है, तो अभी, समय और अवसर रहते, इसे ठीक कर लीजिए। अन्यथा लापरवाही या विलंब बहुत भारी पड़ सकता है और अनन्तकाल के लिए कष्टदायक हो सकता है।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें: 

  • यशायाह 14-16 

  • इफिसियों 5:1-16


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English Translation


Biblical Metaphors for the Church – House of God


For the Church of God some metaphors have been given in the New Testament section of the Word of God the Bible, e.g., the family of the Lord; the temple or dwelling place of God; House of God; the Field of the God; The Body of the Lord; the Bride of the Lord; the Vineyard of God, etc. Through these metaphors God the Holy Spirit has shown and explained about the Church of the Lord Jesus Christ, i.e. those who are His truly surrendered and committed people made pure and holy, the relationship of the Lord with His Church, and the restoration of His people to fellowship with God, the life and behavior of the people of the Church, and God’s expectations from them, His work in their lives etc. We are not considering these metaphors in any particular order; all of them are equally important, and every one of them teaches some important thing or the other about Christian life.


Every metaphor shows different aspects of the relationship of a truly surrendered and committed Christian Believer with the Lord Jesus and God, and the related aspects of the Believer’s life and responsibilities. Every metaphor also makes it very clear and evident that no person can become a member of the Lord’s Church through any human works, criteria, notions etc., no matter who he may be or how much he may try to join the Lord’s Church. If anyone joins the Church of the Lord, it will only be according to the will, standards, criteria, and acceptance by the Lord. Other than this anyone may keep saying, doing, and claiming whatever they may; he will never actually be or become a member of the Lord’s Church. Even if he considers himself to be and claims his being a member, sooner or later his actual state will be exposed, and he will be separated out for eternal destruction. Therefore, for everyone who claims himself to be a Christian Believer, now is the time and opportunity to examine and evaluate their relationship with the Lord and its basis, and if there is any doubt, then have it rectified and come into the right relationship with the Lord.


From this list of metaphors, we have considered the first two metaphors in the previous articles. Today we will consider the third metaphor, being the House of God.


(3) The House or Building of God


Consider some verse from the Bible about the Church being the House of God:

  • According to the grace of God which was given to me, as a wise master builder I have laid the foundation, and another builds on it. But let each one take heed how he builds on it. For no other foundation can anyone lay than that which is laid, which is Jesus Christ” (1 Corinthians 3:10-11).

  • having been built on the foundation of the apostles and prophets, Jesus Christ Himself being the chief corner stone, in whom the whole building, being joined together, grows into a holy temple in the Lord” (Ephesians 2:20-21).

  • you also, as living stones, are being built up a spiritual house, a holy priesthood, to offer up spiritual sacrifices acceptable to God through Jesus Christ. Therefore, it is also contained in the Scripture, "Behold, I lay in Zion A chief cornerstone, elect, precious, And he who believes on Him will by no means be put to shame." Therefore, to you who believe, He is precious; but to those who are disobedient, "The stone which the builders rejected Has become the chief cornerstone,"” (1 Peter 2:5-7).


It is a common and well-known fact that every house or building is built on a foundation, which though is not visible, but is the necessary part of the building for its being steady and standing firm. The deeper and stronger the foundation, the higher can the building go, and be durable. An essential part of the foundation of the building is its ‘corner-stone’; it is from this corner-stone that the direction, being straight in lines, and extent of the rest of the foundation and the building is measured and determined. If this ‘corner-stone’ is not straight, if there is any error in it, the building also will not be straight and its appearance will be awkward. The third and very important part about the stability of any building is the soil in which it is being built. If the soil is loose or unsteady, then the building too will never be firm and steady; will not be able to withstand adverse situations, and will collapse very soon. When the first temple of God was being built by Solomon, then its foundation was not laid with ordinary stones; but it is written, “And the king commanded them to quarry large stones, costly stones, and hewn stones, to lay the foundation of the temple” (1 Kings 5:17) - large and precious stones were quarried and taken out, trimmed and prepared for the job, and then they were used to for the foundation of the temple.


Keeping these things in mind, the Church of the Lord Jesus, which has been called the house or building of God, has been built upon the rock of the teachings of the Lord Jesus (Matthew 7:24-25) and has been made firm on the teachings and Word given through the prophets and apostles of the Lord God (1 Corinthians 3:10-11; Ephesians 2:20-21), and the ‘corner-stone’ of the foundation and the building is the Lord Jesus Himself. From 1 Corinthians 3:10 we also learn that the various ministers of God are laying down the layers of the building materials, one on top of the other. This building is still ‘under-construction’ presently, and the stones being used in its construction are ‘living stones’, the Christian Believers (1 Peter 2:5). We have seen in some detail in a previous article of 28th September from 1 Kings 6:7 and other verses about the construction of the Church being ‘under-way’ presently. Bearing in mind the essential features required to be present in those being used to build the Church of the Lord Jesus, it is once again apparent and clear that the building or house of God can only be built through, and by those truly having come to faith in, and actually surrendered and committed to the Lord Jesus; no man or Organization, or Institution has any role in this; they cannot do anything through any of their efforts, whatever be their claims to the contrary. It is only the Lord Jesus who builds His Church, it cannot be nor is built by any human being.


Another very important thing has to be kept in mind while constructing any building or house; every house or building is constructed only on its foundation. If the whole foundation has not been used, then the building cannot be considered complete as per its design; and anything built outside of the foundation will be unstable, and will soon collapse. The apostle Paul said about his teachings and ministry “For I have not shunned to declare to you the whole counsel of God” (Acts 20:27); and “All Scripture is given by inspiration of God, and is profitable for doctrine, for reproof, for correction, for instruction in righteousness” (2 Timothy 3:16). Therefore, it has been strictly forbidden by the Lord God for any person to cut and trim anything from God’s Word or to add anything to it; a very strict and heavy punishment has been stated for those who alter God’s Word, add to it, or subtract from it (Deuteronomy 4:2; 12:32; Proverbs 30:6; Revelation 22:18-19). The Lord has taken the simple people of the world, the rejected, incapable, and foolish of the world (1 Corinthians 1:26-28), those who have repented of their sins, placed their faith in Him, and have surrendered their lives to Him to live in obedience to Him and His Word, and through such He is building up a holy priesthood who will offer spiritual sacrifices acceptable to God through the Lord Jesus Christ (1 Peter 2:5). He is preparing His chosen generation, royal priesthood having a status higher than the priesthood of the OT Law, God’s own people, so that His people can present His characteristics and qualities before the world (1 Peter 2:9); so that the Church of the Lord Jesus Christ will be a ‘house’ or ‘building’ that demonstrates the magnificence, greatness, and glory of God. All the people, collectively, will function as the dwelling place of God (Ephesians 2:22). This is a heavenly blessing and God given honor, that no person or human ingenuity and efforts can ever acquire on their own, or grant to anyone.


If you are a Christian Believer, then does your Christian life, walk and behavior, social living witness etc., for the foundation on which the Lord has built you? Are the teachings of the Word of God the basis of your living and life-style? The person who has been joined by the Lord Jesus in His Church, he will strive to live and behave like the Lord and in obedience to the Lord (1 John 2:3-6). But the one who has been joined by any sect, denomination, group, organization, or institution will do according to that man-made entity; will live and work to please the officials of that entity, not the Lord; in his life instead of the instructions and teachings of the Bible, the instructions and teachings of that entity will have the primary place. In your life, who and what has the primary place? Who remains pleased and happy with you - the Lord Jesus or some human beings? Remember what Paul wrote about his priorities regarding his ministry “For do I now persuade men, or God? Or do I seek to please men? For if I still pleased men, I would not be a bondservant of Christ” (Galatians 1:10). If you are in the slightest of doubts about being a true and actual member of the Church of the Lord Jesus, or about having been made a member not by men and man-made things but by the Lord Jesus, then now, while you have the time and opportunity, rectify this state of affairs; else carelessness, procrastination, or ignoring it can have disastrous and irreversible consequences which will be very painful for eternity.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.



Through the Bible in a Year: 

  • Isaiah 14-16 

  • Ephesians 5:1-16




शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - परमेश्वर का निवास स्थान, मन्दिर / The Church, or, Assembly of Christ Jesus - God’s Temple or Dwelling Place


Click Here for the English Translation

प्रभु यीशु की कलीसिया- परमेश्वर का निवास स्थान, मन्दिर 

 

हमने प्रभु यीशु द्वारा कलीसिया को धर्मी और पवित्र बनाए जाने तथा उसके परमेश्वर की संगति एवं सहभागिता में बहाली के कार्य को, कलीसिया के लोगों के जीवनों में प्रभु परमेश्वर के उद्देश्यों एवं उनके परिणामों, और परमेश्वर के बुलाए गए लोग होने के विभिन्न पहलुओं को, उन विभिन्न रूपकों (metaphors) के द्वारा सीखना और समझना आरंभ किया है, जो परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खंड में प्रभु के लोगों, उसकी कलीसिया के लिए प्रयोग किए गए हैं। ये रूपक हैं: प्रभु का परिवार या घराना; परमेश्वर का निवास-स्थान या मन्दिर; परमेश्वर का भवन; परमेश्वर की खेती; प्रभु की देह; प्रभु की दुल्हन; परमेश्वर की दाख की बारी, इत्यादि।

 

इनमें से प्रत्येक रूपक, एक सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु और पिता परमेश्वर के साथ संबंध को, तथा उसके मसीही जीवन, और दायित्वों के विभिन्न पहलुओं को दिखाता है। साथ ही प्रत्येक रूपक यह भी बिलकुल स्पष्ट और निश्चित कर देता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के किसी भी मानवीय प्रयोजन, कार्य, मान्यता या धारणा आदि के द्वारा परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य बन ही नहीं सकता है; वह चाहे कितने भी और कैसे भी प्रयास क्यों न कर ले। अगर व्यक्ति प्रभु यीशु की कलीसिया का सदस्य होगा, तो वह केवल प्रभु की इच्छा, उसके माप-दंडों के आधार पर, उसकी स्वीकृति से होगा, अन्यथा कोई चाहे कुछ भी कहता रहे, वह वास्तविकता में प्रभु की कलीसिया का सदस्य हो ही नहीं सकता है। और यदि वह अपने आप को समझता या कहता भी है, तो भी उसकी वास्तविकता देर-सवेर प्रकट हो जाएगी, और अन्ततः वह अनन्त विनाश के लिए पृथक कर दिया जाएगा। इसलिए अपने आप को मसीही विश्वासी कहने वाले प्रत्येक जन के लिए अभी समय और अवसर है कि अपनी वास्तविक स्थिति को भली-भांति जाँच-परख कर, उचित कदम उठा ले और प्रभु के साथ अपने संबंध ठीक कर ले। इन रूपकों को किसी विशेष क्रम में नहीं लिया अथवा रखा गया है, सभी रूपक समान ही महत्वपूर्ण हैं, सभी में मसीही जीवन से संबंधित कुछ आवश्यक शिक्षाएं हैं।


पिछले लेख में हम इस सूची के पहले रूपक, परमेश्वर का परिवार होने को देख चुके हैं। आज हम इस सूची के दूसरे रूपक, परमेश्वर का निवास-स्थान, या मन्दिर होने के संबंध में देखेंगे।

(2) परमेश्वर का निवास स्थान या मन्दिर 

 कलीसिया और उसके सदस्यों के परमेश्वर का निवास स्थान, उसका मन्दिर होने से संबंधित परमेश्वर के वचन बाइबल में से कुछ पदों को देखिए:

  • क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नाश करेगा तो परमेश्वर उसे नाश करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो” (1 कुरिन्थियों 3:16-17)।

  • क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो?” (1 कुरिन्थियों 6:19)। 

  • और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या सम्बन्‍ध? क्योंकि हम तो जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं; जैसा परमेश्वर ने कहा है कि मैं उन में बसूंगा और उन में चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्वर होऊंगा, और वे मेरे लोग होंगे” (2 कुरिन्थियों 6:16)।

  • कि यदि मेरे आने में देर हो तो तू जान ले, कि परमेश्वर का घर, जो जीवते परमेश्वर की कलीसिया है, और जो सत्य का खंभा, और नींव है; उस में कैसा बर्ताव करना चाहिए” (1 तीमुथियुस 3:15)।

  • पर मसीह पुत्र के समान उसके घर का अधिकारी है, और उसका घर हम हैं, यदि हम साहस पर, और अपनी आशा के घमण्‍ड पर अन्‍त तक दृढ़ता से स्थिर रहें” (इब्रानियों 3:6)।


उपरोक्त पदों में प्रभु की कलीसिया के लोगों, उसके वास्तविक मसीही विश्वासियों को परमेश्वर का, पवित्र आत्मा का और प्रभु यीशु का मन्दिर या निवास स्थान कह कर संबोधित किया गया है। किसी का ‘निवास स्थान’ होने के सामान्य और स्वाभाविक प्रयोग से यह प्रकट है कि उस का निवास स्थान वह स्थान होता है जहाँ वह निवास करता है, रहता है; जो उसका अपना होता है, जहाँ वह बिना किसी औपचारिकता के खुले दिल से रह सकता है, अपनापन और शांति महसूस कर सकता है। और, मन्दिर वह स्थान होता है जहाँ परमेश्वर की आराधना और उपासना की जाती है, उसे आदर और महिमा दी जाती है, तथा जो उससे मिलने का स्थान होता है। तात्पर्य यह कि प्रभु यीशु की वास्तविक कलीसिया का प्रत्येक सदस्य त्रिएक परमेश्वर का अपना निवास स्थान है, जहाँ पर वह बिना किसी औपचारिकता के, खुले दिल से रह सकता है, व्यवहार कर सकता है, अपनापन और शांति महसूस कर सकता है। एक ऐसा स्थान जहाँ त्रिएक परमेश्वर को, कलीसिया के उस सदस्य से जिसमें वह निवास कर रहा है, योग्य आदर और सम्मान मिलता है, जिसके मन से परमेश्वर की सच्ची आराधना आत्मा और सच्चाई से निकलती है (यूहन्ना 4:23-24), और जहाँ परमेश्वर अपनी उस संतान के साथ मिल सकता है, उससे संगति और सहभागिता रख सकता है (यूहन्ना 14:21, 23)।


इसी बात से स्पष्ट और प्रकट है कि परमेश्वर का निवास स्थान वही हो सकता है जिसे परमेश्वर अपना निवास स्थान, अपना मन्दिर बनाता है। किसी भी मनुष्य द्वारा अपने ऊपर “परमेश्वर का निवास स्थान; परमेश्वर का मन्दिर” लेबल लगा लेने से - चाहे यह लेबल कितना भी प्रमुख करके क्यों न लगाया जाए, या उसका कितना भी जोर-शोर से प्रदर्शन और प्रचार क्यों न किया जाए, वह व्यक्ति वास्तविकता में परमेश्वर का निवास स्थान या मन्दिर नहीं बन जाता है। उसके इस खोखले दावे की पोल देर-सवेर खुल ही जाएगी। जिसे परमेश्वर अपना निवास स्थान, अपना मन्दिर स्वीकार करे, वही इस आदर को प्राप्त करेगा, अन्य सभी तिरस्कृत कर दिए जाएंगे। वास्तविकता में प्रभु की कलीसिया का वही सदस्य हो सकता है जिसे प्रभु परमेश्वर सदस्य स्वीकार करे; और परमेश्वर मानवीय विधि-विधानों से बंधा हुआ नहीं है कि लोग अपने द्वारा स्थापित कुछ मान्यताओं और धारणाओं को, अपनी बनाई गई कुछ रीतियों को पूरा करें, और परमेश्वर उन्हें अपनी कलीसिया में सम्मिलित करने के लिए बाध्य हो जाए। परमेश्वर उन्हें ही स्वीकार करता है जो उसके मानकों, उसके निर्देशों के अनुसार उसके साथ जुड़ते हैं।

  

परमेश्वर का निवास स्थान, उसका मन्दिर होने से संबंधित ये पद हमें सिखाते हैं कि परमेश्वर अपने निवास स्थान की रक्षा करता है, उसे दूषित करने या हानि पहुँचाने वाले को परमेश्वर दण्ड देता है (1 कुरिन्थियों 3:16-17)। उसका निवास स्थान होने का आदर यह भी दिखाता है कि अब वह व्यक्ति अपना नहीं रहा है, वरन परमेश्वर के स्वामित्व की अधीनता में आ गया है (1 कुरिन्थियों 6:19)। परमेश्वर का निवास स्थान, उसका मन्दिर होने के नाते, परमेश्वर अपने लोगों से एक विशिष्ट व्यवहार, संसार से भिन्न जीवन शैली की अपेक्षा करता है (1 तीमुथियुस 3:15), जिसके लिए व्यक्ति को साहस और आशा को दृढ़ता से अंत तक थामे रहना होगा (इब्रानियों 3:6)। परमेश्वर द्वारा अपनी कलीसिया के प्रत्येक जन से रखी जाने वाली इन अपेक्षाओं, उन को इस महान स्तर और आदर के प्रदान किए जाने के साथ ही एक ऐसी भी बात भी साथ दे दी जाती है, जो कोई मनुष्य कभी भी अपने किसी भी प्रयास या प्रयोजन से कदापि नहीं कर सकता है - “...जैसा परमेश्वर ने कहा है कि मैं उन में बसूंगा और उन में चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्वर होऊंगा, और वे मेरे लोग होंगे” (2 कुरिन्थियों 6:16)। जरा कल्पना कीजिए, सर्वसामर्थी सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी कलीसिया के लोगों के अंदर बसेगा, उनके मध्य में, उनके साथ चला फिरा करेगा, और उन्हें अपने लोग बना कर रखेगा; “सो हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?” (रोमियों 8:31)।


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो क्या आप यह सच्चे मन और पूरी ईमानदारी से कह सकते हैं कि परमेश्वर आपके अंदर निवास करता है, और आपमें एक अपनापन और शांति महसूस करता है? क्या आपके जीवन और व्यवहार से आपका संसार से पृथक होकर परमेश्वर को आदर और महिमा देना सर्वदा प्रकट होता रहता है? क्या आपके मन से परमेश्वर की आराधना उस “आत्मा और सच्चाई” से निकलती है जिसकी वह लालसा रखता है, या वह एक औपचारिकता मात्र ही होती है? क्या आप बस उससे कुछ-न-कुछ माँगते ही रहते हैं, और किसी-न-किसी बात को लेकर कुड़कुड़ाते ही रहते हैं, या शिकायत ही करते रहते हैं; या फिर उसके साथ अपने दिल की बात खुल कर करते हैं, उससे एक घनिष्ठ मित्र के समान वार्तालाप करते हैं? क्या आप अपने आप को अपना नहीं, परमेश्वर का समझते हैं, और परमेश्वर की इच्छा तथा आपसे अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत रहते हैं? क्या आप अपनी मसीही गवाही को बनाए रखने के लिए, बिना कोई समझौता किए साहस और दृढ़ता से हर परिस्थिति को सहने के लिए तैयार रहते हैं? क्या इस दूसरे रूपक की शिक्षाओं के समक्ष आप अपने को प्रभु की सच्ची कलीसिया का वास्तविक सदस्य देखते हैं? यदि नहीं, तो प्रभु अभी आपको अवसर प्रदान कर रहा है कि अपनी गलतफहमी से निकलकर, उसके साथ अपने संबंधों को ठीक कर लें; वास्तविकता में परमेश्वर का निवास स्थान, उसका मन्दिर बन जाएं, और अपने अनन्तकाल को सुनिश्चित एवं आशीषित कर लें।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें: 

  • यशायाह 11-13 

  • इफिसियों 4


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English Translation

Biblical Metaphors for the Church – Temple or Dwelling Place of God


We have started to consider through the various metaphors used in the Bible for the Church, for the work of the Lord Jesus to reconcile people to God’s fellowship, for making the Church pure and holy, for the purposes and works of the Lord in the lives of the people of the Church, and for the other aspects of being the called-out people of God. These metaphors are: the family of the Lord; the temple or dwelling place of God; House of God; the field of the God; The Body of the Lord; the Bride of the Lord; the vineyard of God, etc.

 

Every metaphor shows different aspects of the relationship of a truly surrendered and committed Christian Believer with the Lord Jesus and God, and the related aspects of the Believer’s life and responsibilities. Every metaphor also makes it very clear and evident that no person can become a member of the Lord’s Church through any human works, criteria, notions etc., no matter who he may be or how much he may try to join the Lord’s Church. If anyone joins the Church of the Lord, it will only be according to the will, standards, criteria, and acceptance by the Lord. Other than this anyone may keep saying, doing, and claiming whatever they may; he will never actually be or become a member of the Lord’s Church. Even if he considers himself to be and claims his being a member, sooner or later his actual state will be exposed, and he will be separated out for eternal destruction. Therefore, for everyone who claims himself to be a Christian Believer, now is the time and opportunity to examine and evaluate their relationship with the Lord and its basis, and if there is any doubt, then have it rectified and come into the right relationship with the Lord.


From this list of metaphors, we have considered the first one, being the family of God in the previous article. Today we will consider the second metaphor, being the Temple or Dwelling Place of God.


(2) The Temple or Dwelling Place of God.


Consider some verses about the members of the Church, the Christian Believers being the dwelling place of God, His Temple:

  • Do you not know that you are the temple of God and that the Spirit of God dwells in you? If anyone defiles the temple of God, God will destroy him. For the temple of God is holy, which temple you are” (1 Corinthians 3:16-17).

  • Or do you not know that your body is the temple of the Holy Spirit who is in you, whom you have from God, and you are not your own?” (1 Corinthians 6:19).

  • but if I am delayed, I write so that you may know how you ought to conduct yourself in the house of God, which is the church of the living God, the pillar and ground of the truth” (1 Timothy 3:15).

  • but Christ as a Son over His own house, whose house we are if we hold fast the confidence and the rejoicing of the hope firm to the end” (Hebrews 3:6).


In the above Bible verses, the members of the Church of the Lord Jesus Christ, the true Christian Believers, have been addressed as the Temple of the Lord or the dwelling place of God. The common sense understanding regarding someone’s dwelling place is that is the place where that person resides, a place that belongs to him, where he can freely and openly live without any formalities, feel a sense of belonging and of the place being his own personal place, where he can be comfortable and at peace. Similarly, a temple is a place where God is worshipped, given honor and glory, a place to meet God. Therefore, the implication of these metaphors is that every actual member of the true Church of the Lord Jesus is the dwelling place of the Triune God, where God can reside freely and openly without any formalities, feel fully ‘at home’, feel comfortable and at peace. Every member of the Church is to be a temple of God, where God is given His due honor and glory and is worshipped in truth, from the heart (John 4:23-24), where God can meet with His child, have fellowship with Him (John 14:21, 23).


It is clear from this that only whom God wants to make His dwelling place, His temple, can be so. A person’s taking upon himself the name or label of being “The Dwelling Place of God, The Temple of God” does not actually make him that - no matter how prominently that label may be displayed, with whatever pomp and show that label may be advertised, and whatever seemingly pious and religious activities may have been associated with the taking up and proclamation of the label. Sooner or later, the empty claims of these vain self-acquired labels will lay exposed, and the facts will come out. Only the person whom the Lord God accepts as His dwelling place or Temple can actually be it; rest everyone else will be rejected and cast away. So, only the person whom God accepts as a member of His Church, can actually and truly be a member of the Church of the Lord Jesus Christ. God is not tied down to any man-made rites, rituals, and ceremonies, that people may fulfill, or to some contrived concepts and notions through which God would come under compulsion to accept them into His Church. God accepts only those, who join Him and His Church through the way given by Him, according to His standards and criteria.


The verses related to being the dwelling place and temple of God teach us that God protects His dwelling place, and punishes those who defile or harm it (1 Corinthians 3:16-17). Being given the honor of becoming the dwelling place of God also shows that henceforth that person is no longer his own, but fully belongs to the Lord God (1 Corinthians 6:19). From those who are God’s dwelling place, His temple, God expects a particular manner of living and behavior, a life lived differently from the people of the world (1 Timothy 3:15). Those who have been made God’s dwelling place and temple, are expected to hold fast to this confidence and hope firmly till the end (Hebrews 3:6). Along with these expectations of God from the people belonging to His Church, besides this great honor and privilege being granted to them, there is another thing that is granted to them, that no man can ever acquire for himself through any efforts of any kind - “...As God has said: I will dwell in them And walk among them. I will be their God, And they shall be My people” (2 Corinthians 6:16). Just imagine this high privilege, way beyond any human capability, that the omnipotent creator God will dwell amongst His people, will walk among them, and will keep them as His people; “What then shall we say to these things? If God is for us, who can be against us?” (Romans 8:31).


If you are a Christian Believer, then can you say with heartfelt conviction and with full honesty that God dwells in you, feels ‘at home’ in you, feels comfortable and at peace in you? Does your life and behavior always and continually demonstrate your being separate from the world, and living a life that honors God, glorifies Him? Does the worship of God that you offer, is really in “Spirit and truth”, as He desires it to be; or is it a mere formality? Do you always only keep asking and begging for things from Him; keep grumbling about one thing or the other before Him; keep complaining to Him about things in your life? Or, do you converse with Him as you do with a close friend and openly share whatever is on our heart with Him? Do you consider yourself as not your own, but belonging to the Lord, and strive to fulfill God’s will and His expectations from you? Are you willing to suffer any and all situations to live up to your Christian life and witness, without any compromise? Having considered the Bible verses related to this second metaphor, do you unhesitatingly consider yourself an actual member of the true Church of the Lord Jesus? If not, God is giving you the time and opportunity to come out of your contrived concepts and assumptions, rectify your relationship with Him and come into the right relationship with Him; to factually become God’s dwelling place and temple, and secure your eternity and eternal blessings.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.



Through the Bible in a Year: 

  • Isaiah 11-13 

  • Ephesians 4