Monday, August 9, 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 5


5. सत्यवादी और स्पष्टवादी होने में अनुपम

            सुप्रसिद्ध और विश्व-विख्यात बाइबल कॉलेज, डैलस बाइबल सेमीनरी के संस्थापक तथा भूतपूर्व अधिपति, ल्यूइस एस. शेफर ने कहा था, “बाइबल ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे कोई मनुष्य, यदि वह लिखना चाहता, तो वैसा लिख पाता जैसी वह है; और न ही यह ऐसी पुस्तक है जिसे यदि वह वैसे लिख पाता जैसी वह है, तो फिर वह उसे लिखना चाहता।” उनकी यह बात बहुत अटपटी लगती है, और तुरंत समझ में नहीं आती है ; किन्तु बिलकुल सटीक और सही है, क्योंकि उन्होंने यह बात बाइबल के पूर्णतः सत्यवादी और स्पष्टवादी होने के संदर्भ में कही थी।

            बाइबल के परमेश्वर के लिए, उसके इस सत्य-वचन में लिखा गया है: "सृष्टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है वरन जिस से हमें काम है, उस की आंखों के सामने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं" (इब्रानियों 4:13); तथा बाइबल के लिए लिखा गया है, "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17); "तेरा सारा वचन सत्य ही है; और तेरा एक एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है" (भजन 119:160)। यह केवल कहने की बात नहीं है, वरन बाइबल का के परम-सत्यों में से एक है। बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो अपने पात्रों, प्रमुख लोगों, नायकों, और बाइबल के लेखकों तक के भी जीवन, व्यवहार, और पापों को बड़ी स्पष्टता तथा पूर्ण सत्यता के साथ प्रकट करती है और बताती है। चाहे वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग ही क्यों न हों, और उनके उस व्यवहार या बात से लोगों को उँगली उठाने और लांछन लगाने के अवसर ही क्यों न मिले, किन्तु बाइबल कभी भी सत्य कहने और स्पष्टता से कहने से बचती नहीं है।

            बाइबल अपने किसी भी पात्र की किसी भी कमज़ोरी, पाप की प्रवृत्ति, झूठ, छल, शारीरिक भावनाओं, आदि को छुपाने, या उनके लिए बहाने बनाने, अथवा उन्हें किसी भक्ति अथवा धार्मिक आवरण में ढाँप कर उन्हें उचित और स्वीकार्य ठहराने के प्रयास कदापि नहीं करती है; वरन गलत और अनुचित को दो टूक गलत और अनुचित बताकर उसके प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण और न्याय को भी साथ ही बताया देती है। बाइबल परमेश्वर का वचन है, उसकी हर बात सत्य पर केंद्रित है, किसी कल्पना, धारणा, अवसरवादिता, अथवा छल पर नहीं। उसमें सत्य और असत्य, भला और बुरा, उत्तम और निकृष्ट, आशा और निराशा, जीवन का आनंद और पीड़ा, सभी कुछ साफ, स्पष्ट, सत्य वचनों में लिखा और बताया गया है। बाइबल के इस सत्यवादी और स्पष्टवादी होने के दावे को आज तक कभी भी, कोई भी, कितने ही प्रयासों के बावजूद कभी गलत प्रमाणित नहीं करने पाया है; इसलिए बाइबल की हर बात की सत्यता को बिना किसी संशय के स्वीकार किया जा सकता है, परख कर देखा जा सकता है

            बाइबल की इस अभूतपूर्व तथा अनुपम सत्यवादिता एवं स्पष्टवादिता के कुछ उदाहरणों को, बाइबल के कुछ पात्रों, घटनाओं, और लेखों में से देखते हैं:

·        बाइबल के प्रमुख नायकों, वंशों के कुल-पिताओं, के पाप स्पष्ट लिखे गए हैं:

o   उत्पत्ति 9:20-21 – नूह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ,  और अनुचित दशा में व्यवहार किया।

o   उत्पत्ति 12:11-13 – अब्राहम ने अपनी जान बचाने के लिए अपनी पत्नी से झूठ बोलने को कहा तथा उसे अन्य पुरुषों द्वारा भ्रष्ट किए जाने के जोखिम में डाला।

o   उत्पत्ति 27:21-27 – याकूब ने अपने अंधे पिता से झूठ बोलकर तथा उसको धोखा देकर अपने भाई की आशीषों को प्राप्त किया।

·        परमेश्वर के लोगों, इस्राएल, के पापों को सार्वजनिक करके उनकी भर्त्सना की गई – व्यवस्थाविवरण 9:7, 24; भजन 78:8; 1 शमूएल 8:8; प्रेरितों 7:51-53; आदि।

·        राजा दाऊद ने अपने वफादार सेनापति ऊरिय्याह की पत्नी के साथ व्यभिचार किया, तथा उसके गर्भवती होने पर अपने पाप को छुपाने के लिए ऊरिय्याह को धोखे से मरवा डाल; जिसके लिए परमेश्वर ने उसे उसी के भरे दरबार में दोषी ठहराया और दंडित किया (2 शमूएल 11 और 12 अध्याय)।

·        सुसमाचार लेखक तथा प्रचारक अपनी कमियों और पापों का अंगीकार अपने द्वारा लिखे गए वचनों में लिखते हैं:

o   मत्ती 26 :31-56 – शिष्यों ने प्रभु के साथ बने रहने के दावे किए, किन्तु संकट आते ही उसे छोड़ कर भाग गए, पतरस ने तो तीन बार, एक दासी लड़की के सामने भी, प्रभु को जानने से भी इनकार कर दिया।

o   मरकुस 6:52; 8:18 – शिष्यों ने प्रभु द्वारा सिखाए और समझाने के बाद भी अपने मन की कठोरता के कारण अविश्वास के साथ व्यवहार किया।

o   लूका 8:24-25 – शिष्यों ने प्रभु यीशु को जानते और उसके साथ रहते हुए भी अविश्वास के साथ व्यवहार किया।

o   मरकुस 9:33-35 – प्रभु द्वारा दीनता और नम्रता का जीवन जीने के बारे में सिखाए जाने के बावजूद शिष्यों में एक-दूसरे से बड़ा बनने की चाह रहती थे, और वे इसके लिए प्रभु से छिपकर आपस में विवाद भी करते थे।

o   मरकुस 10:35-37 – प्रभु के चुने हुए बारह में से दो शिष्यों, याकूब और यूहन्ना, ने स्वार्थी होकर अपने लिए स्वर्ग में औरों से उत्तम आशीष का स्थान सुनिश्चित करने का प्रयास किया।

o   1 कुरिन्थियों 1:11 – प्रभु के विश्वासी लोगों की मंडली में परस्पर झगड़े होते थे; मंडलियों के लोगों के ऐसे व्यवहार से पौलुस प्रेरित दुखी था (1 कुरिन्थियों 4:21; 2 कुरिन्थियों 2:3-4; गलातियों 3:1)।

 

            ये बाइबल के पात्रों, और उनके जीवन के केवल कुछ उदाहरण हैं। किन्तु परमेश्वर ने इन्हीं दुर्बल, बारंबार गलती करते रहने वाले, संसार की दृष्टि में अयोग्य लोगों को लेकर उन्हें अद्भुत रीति से परिवर्तित कर दिया, और अपनी महिमा का कारण बना लिया। प्रभु यीशु मसीह में होकर आज भी परमेश्वर सारे संसार के सभी लोगों में यही करने में लगा हुआ है। जो कोई भी, वह चाहे कैसे भी पाप करने वाला, कैसी भी पृष्ठभूमि से, कोई भी भिन्न दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति क्यों न हो, जो कोई स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करके अपने पापों के लिए उससे क्षमा माँग लेता है, अपना जीवन उसे समर्पित कर देता है, प्रभु परमेश्वर उसे स्वीकार करके, उसका जीवन बदल देता है, उसे अपनी समानता में ढालने लगता है।

 

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 1:17-31

1 कुरिन्थियों 1:17 क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे।

1 कुरिन्थियों 1:18 क्योंकि क्रूस की कथा नाश होने वालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ्य है।

1 कुरिन्थियों 1:19 क्योंकि लिखा है, कि मैं ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करूंगा, और समझदारों की समझ को तुच्छ कर दूंगा।

1 कुरिन्थियों 1:20 कहां रहा ज्ञानवान? कहां रहा शास्त्री? कहां इस संसार का विवादी? क्या परमेश्वर ने संसार के ज्ञान को मूर्खता नहीं ठहराया?

1 कुरिन्थियों 1:21 क्योंकि जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने ज्ञान से परमेश्वर को न जाना तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करने वालों को उद्धार दे।

1 कुरिन्थियों 1:22 यहूदी तो चिन्ह चाहते हैं, और यूनानी ज्ञान की खोज में हैं।

1 कुरिन्थियों 1:23 परन्तु हम तो उस क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह का प्रचार करते हैं जो यहूदियों के निकट ठोकर का कारण, और अन्यजातियों के निकट मूर्खता है।

1 कुरिन्थियों 1:24 परन्तु जो बुलाए हुए हैं क्या यहूदी, क्या यूनानी, उन के निकट मसीह परमेश्वर की सामर्थ्य, और परमेश्वर का ज्ञान है।

1 कुरिन्थियों 1:25 क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है; और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है।

1 कुरिन्थियों 1:26 हे भाइयों, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए।

1 कुरिन्थियों 1:27 परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे।

1 कुरिन्थियों 1:28 और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्‍छों को, वरन जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया, कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए।

1 कुरिन्थियों 1:29 ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के सामने घमण्ड न करने पाए।

1 कुरिन्थियों 1:30 परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा।

1 कुरिन्थियों 1:31 ताकि जैसा लिखा है, वैसा ही हो, कि जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 77 -78
  • रोमियों 10