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गुरुवार, 30 मार्च 2023

आराधना (26) / Understanding Worship (26)

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आराधना के लिए परिवर्तित (3) 


हमने अपने अध्ययन में देखा है कि परमेश्वर की आराधना करना नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी के जीवन में एक बहुत आशीष पूर्ण और फलदायी गतिविधि है; यदि उसे उस प्रकार से किया जाए, जैसे कि परमेश्वर चाहता है - आत्मा और सच्चाई से। लेकिन फिर भी कलीसियाओं और मण्डलियों में इस बहुत महत्वपूर्ण विषय के बारे में बहुत ही कम कोई शिक्षा दी जाती है। हमने यह देखा है कि यद्यपि परमेश्वर के लोग परमेश्वर की उस तरह से आराधना करने के बारे में, जैसी वह चाहता है, चाहे समझते और जानते न भी हों, लेकिन फिर भी परमेश्वर ने उन्हें इधर-उधर हाथ पैर मारने और जैसा भी उन्हें अच्छा लगा, उनकी इच्छा हो, उस प्रकार से करने के लिए असहाय नहीं छोड़ा है। परमेश्वर मनुष्य के साथ संपर्क और संगति रखना चाहता है, लेकिन ऐसे जिससे उसका आदर कम न होने पाए। इसीलिए, अपने वचन में, परमेश्वर ने पर्याप्त उदाहरण दिए हैं, जिनके द्वारा लोग देख तथा सीख सकें कि वे परमेश्वर के पास कैसे आएँ, उसकी आराधना किस प्रकार से करें। क्योंकि उसे अच्छे से पता है कि अधिकांश लोग अपने आप से वैसे आराधक नहीं बनने पाएँगे, जैसे वह चाहता है, इसलिए परमेश्वर ने इस बात के भी निर्देश दिए हैं कि लोग उसके सच्चे आराधक कैसे बनें। हमने 2 इतिहास 29 अध्याय में दिए गए राजा हिजकिय्याह के उदाहरण को लिया है, परिवर्तन की इस प्रक्रिया को देखने और समझने के लिए, जो चार क़दमों से होकर पूरी होती है। पहला कदम है कि प्रभु के पीछे चलने का आरंभिक निर्णय लेने के बावजूद, यदि विश्वासी खराई और पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ यह नहीं कर रहा है, तो सबसे पहले उसे प्रभु परमेश्वर के पीछे पूरे समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ चलने का दृढ़ निर्णय लेना चाहिए, और अपने व्यवहारिक जीवन के द्वारा उसके पालन को दिखाना भी चाहिए। दूसरा कदम, जिसे हमने पिछले लेख में देखा था, है कि विश्वासी को पवित्र आत्मा के मंदिर की देखभाल में लग जाना चाहिए, अर्थात अपने हृदय की आत्मिक दशा की देखभाल करने में, विश्वासी के मन में क्या जाता है और उससे क्या बाहर आता है उसे इस पर नियंत्रण रखना चाहिए, और उसे अपने आप को पवित्र आत्मा के आधीन कर देना चाहिए। आज हम इस प्रक्रिया के तीसरे कदम को देखेंगे।


3. 2 इतिहास 29:4-19 - अपने हृदय में परमेश्वर की बातों को स्वच्छ करके सही स्थान पर बहाल करना - इन पदों में हम देखते हैं कि परमेश्वर के घर के द्वार खोलने और उनकी मरम्मत करने के बाद, अगला कार्य जो हिजकिय्याह करता है, वे कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जिन्हें वह एक विशेष क्रम में करता है:

  • पद 4 - लेवियों और याजकों को एकत्रित करके एक स्थान पर लाता है।

  • पद 5 - उनसे पहले अपने आप को पवित्र करने को कहता है, और उसके बाद परमेश्वर के घर को साफ करके, उसके अन्दर के कूड़े को बाहर निकालने को कहता है। ध्यान कीजिए कि हिजकिय्याह ने उन्हें जो लेवी या याजक नहीं थे, परमेश्वर के घर को साफ़ और तैयार करने के लिए नहीं कहा। मंदिर की देखभाल करना, उसे व्यवस्थित रखना याजकों और लेवियों का कार्य था, और केवल उन्हें ही इसे करना था (पद 11)। साथ ही यह भी ध्यान कीजिए कि “पवित्र” शब्द का अभिप्राय है शुद्ध और समर्पित करके परमेश्वर के कार्य के लिए पृथक कर देना।

  • पद 6-9 - हिजकिय्याह अपने लोगों के पापों का अंगीकार करता है; उनके साथ परमेश्वर के व्यवहार को स्वीकार करता है कि वह सही था, और उन पर आया हुआ परमेश्वर का प्रकोप के सर्वथा उपयुक्त था।

  • पद 10-11 - हिजकिय्याह इस स्थिति के समाधान और निवारण की बात कहता है, किस प्रकार से परमेश्वर के प्रकोप से बाहर आया जाए।

  • पद 18-19 - लेवियों के नामों की सूची, याजकों द्वारा मंदिर की सफाई करने के पश्चात, फिर पद 18-19 में लिखा है कि लेवियों और याजकों ने हिजकिय्याह को बताया कि मंदिर स्वच्छ कर दिया गया है, और उसका सामन भी साफ़ करके पवित्र उपयोग के लिए उन के स्थानों पर रख दिया गया है।

    यह सब हो जाने के बाद ही फिर, 20 पद से आगे, मन्दिर में आराधना बहाल होती है; जिसके बारे में हम आने वाले लेखों में देखेंगे।


लेकिन हमारे आज के लिए इस से क्या शिक्षाएँ हैं, विशेषकर हमारे परमेश्वर को भावता हुआ आराधक होने और वैसी आराधना चढ़ाने के सन्दर्भ में, जैसी परमेश्वर चाहता है। इस बात को हम अपने अगले लेख में देखेंगे।


 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • न्यायियों 9-10           

  • लूका 5:17-39      


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English Translation


Being Transformed To Worship (3)


In our study we have seen that worshipping God is such a blessed, and fruitful activity in the life of a Born-Again Christian Believer; provided, it is done in the way God desires - in spirit and in truth. Yet there is hardly any teaching given on this important subject in the Churches or Assemblies. We have seen that though God’s people may not know or understand how to worship God in the manner He wants it done, yet God has not left them helpless to grope around and do things any which way they please, or suits their fancy. God wants to communicate and fellowship with man, but in a manner that would not in any way belittle Him. Therefore, in His Word, God has given ample examples to show and teach people how they should approach and communicate with Him, worship Him. Since He well knows that most people, on their own, will not be able to become the kind of worshippers He is looking for, therefore God has also placed instructions about how people can become His true worshippers. We have taken the example of King Hezekiah, as given in 2 Chronicles 29, for our study of this transformation which takes place through four steps. The first step is that despite his initial decision to follow the Lord, if he has not been sincerely, with full commitment doing so, the Believer should firmly resolve to become a true and committed follower of God, and practically demonstrate it in his life. The second step that we saw in the last article was for the Believer to get involved in looking after the Temple of the Holy Spirit, i.e., becoming concerned about the spiritual well-being of his heart, to regulate what goes in and comes out of the Believer’s heart, and to allow the Holy Spirit to take charge of him. Today we will look at the third step in this process.


3. 2 Chronicles 29:4-19 – Cleanse and Restore the things of God to their proper place in our hearts –  We see in these verses that having opened the House of God, and repaired its doors, the next thing that Hezekiah does are some important things, done in a particular order:

  • Verse 4 - Collects and brings in the priests and Levites, and gathers them together.

  • Verse 5 - Asks them to first sanctify themselves, and then to sanctify the house of God, cleanse it, and carry out the rubbish from inside. Take note, Hezekiah did not ask the non-Levites and those who were not priests to clean and make ready the house of God. Looking after and maintaining the things of the Temple was the job of the priests and the Levites, and only they were to do it (verse 11). Also note that the word ‘sanctify’ means to cleanse and set apart for a holy purpose.

  • Verses 6-9 - Hezekiah confesses the sins of his people; he acknowledges that God’s dealings with them were righteous and God’s wrath upon them is deserved.

  • Verses 10-11 - Hezekiah speaks of the remedy, the way to come out of being under God’s wrath.

  • Verse 18-19 - After giving the names of the Levites, mentioning the work of the priests to cleanse the Temple, finally in verses 18-19, the Levites and the priests reported to Hezekiah that the Temple had been cleansed and all its furnishings had been sanctified and restored to their respective places.

    It is after all of this has been done, that finally worship in the Temple is restored, from verse 20 onwards; which we will see about in the coming articles.


    But what are the lessons for us today, especially in context of becoming a God pleasing worshipper, and offering worship that God wants;  we will see in the next article. 


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.  


Through the Bible in a Year: 

  • Judges 9-10

  • Luke 5:17-39


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