Tuesday, January 19, 2021

प्रेम

 

          “जाराब टपैटियो”, या मैक्सिकन टोपी का नृत्य, रोमांस या प्रेम का नृत्य है। इस तेज़ लय और ताल वाले नृत्य में  पुरुष अपनी टोपी धरती पर रख देता है, और नृत्य के अन्त होने के समय उसकी महिला साथी उस टोपी को उठाती और दोनों उसके पीछे मुँह छिपा कर एक दूसरे से अपने प्रेम को चुम्बन के द्वारा व्यक्त करते हैं।

          यह नृत्य मुझे विवाह में विश्वासयोग्य बने रहने के महत्व को याद दिलाता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में नीतिवचन की पुस्तक के पाँचवें अध्याय में, अनैतिकता और व्यभिचार के कारण चुकाई जाने वाली बड़ी कीमत के बारे में लिखने के बाद हम पढ़ते हैं कि विवाह विशिष्ट है; “तू अपने ही कुण्ड से पानी, और अपने ही कुंए से सोते का जल पिया करना” (पद 15)। जाराब नृत्य में दस जोड़े एक साथ नृत्य कर रहे होते हैं, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपने ही साथी के साथ ही नृत्य करता है, केवल उसी पर अपना ध्यान लगाए रहता है। हमें अपने विवाहित साथी पर ही संपूर्ण और अविभाजित ध्यान लगाए रखना है (पद 18)।

          जैसे नृत्य करने वाले जोड़ों के प्रेम को लोग देख रहे होते हैं, और वे जोड़े भी जानते हैं कि उन पर दृष्टि लगी हुई है, वैसे ही हमारा अपने साथी के साथ संबंध किसी की दृष्टि में रहता है; “क्योंकि मनुष्य के मार्ग यहोवा की दृष्टि से छिपे नहीं हैं, और वह उसके सब मार्गों पर ध्यान करता है” (पद 21)। परमेश्वर हमारे वैवाहिक जीवन को सुरक्षित रखना चाहता है, इसलिए हम पर अपनी दृष्टि लगातार बनाए रखता है। अपने जोड़ीदार के साथ वफ़ादारी दिखाने के द्वारा, हम परमेश्वर को प्रसन्न रखें।

          जिस प्रकार से जाराब नृत्य में एक लय और ताल होती है, जिसके साथ उस नृत्य को करना होता है, वैसे ही जीवन की भी एक लय और ताल होती है जिसका पालन करना आवश्यक है। जब हम अपने सृष्टिकर्ता के द्वारा निर्धारित की गई हमारे जीवन की लय और ताल को निभाते हैं, उसके प्रति आज्ञाकारी और विश्वासयोग्य बने रहते हैं, तो चाहे हम विवाहित हों अथवा अविवाहित, हम उसके हमारे प्रति प्रेम में आनन्द और आशीष प्राप्त करते हैं। - कीला ओकोआ

 

वफादारी आनन्द और आशीष लाती है।


क्योंकि परमेश्वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्तु पवित्र होने के लिये बुलाया है। - 1 थिस्स्लुनीकियों 4:7

बाइबल पाठ: नीतिवचन 5

नीतिवचन 5:1 हे मेरे पुत्र, मेरी बुद्धि की बातों पर ध्यान दे, मेरी समझ की ओर कान लगा;

नीतिवचन 5:2 जिस से तेरा विवेक सुरक्षित बना रहे, और तू ज्ञान के वचनों को थामे रहे।

नीतिवचन 5:3 क्योंकि पराई स्त्री के ओठों से मधु टपकता है, और उसकी बातें तेल से भी अधिक चिकनी होती हैं;

नीतिवचन 5:4 परन्तु इसका परिणाम नागदौना सा कड़वा और दोधारी तलवार सा पैना होता है।

नीतिवचन 5:5 उसके पांव मृत्यु की ओर बढ़ते हैं; और उसके पग अधोलोक तक पहुंचते हैं।

नीतिवचन 5:6 इसलिये उसे जीवन का समथर पथ नहीं मिल पाता; उसके चालचलन में चंचलता है, परन्तु उसे वह आप नहीं जानती।

नीतिवचन 5:7 इसलिये अब हे मेरे पुत्रों, मेरी सुनो, और मेरी बातों से मुंह न मोड़ो।

नीतिवचन 5:8 ऐसी स्त्री से दूर ही रह, और उसकी डेवढ़ी के पास भी न जाना;

नीतिवचन 5:9 कहीं ऐसा न हो कि तू अपना यश औरों के हाथ, और अपना जीवन क्रूर जन के वश में कर दे;

नीतिवचन 5:10 या पराए तेरी कमाई से अपना पेट भरें, और परदेशी मनुष्य तेरे परिश्रम का फल अपने घर में रखें;

नीतिवचन 5:11 और तू अपने अन्तिम समय में जब कि तेरा शरीर क्षीण हो जाए तब यह कह कर हाय मारने लगे, कि

नीतिवचन 5:12 मैं ने शिक्षा से कैसा बैर किया, और डांटने वाले का कैसा तिरस्कार किया!

नीतिवचन 5:13 मैं ने अपने गुरुओं की बातें न मानी और अपने सिखाने वालों की ओर ध्यान न लगाया।

नीतिवचन 5:14 मैं सभा और मण्डली के बीच में प्रायः सब बुराइयों में जा पड़ा।

नीतिवचन 5:15 तू अपने ही कुण्ड से पानी, और अपने ही कुंए से सोते का जल पिया करना।

नीतिवचन 5:16 क्या तेरे सोतों का पानी सड़क में, और तेरे जल की धारा चौकों में बह जाने पाए?

नीतिवचन 5:17 यह केवल तेरे ही लिये रहे, और तेरे संग औरों के लिये न हो।

नीतिवचन 5:18 तेरा सोता धन्य रहे; और अपनी जवानी की पत्नी के साथ आनन्दित रह,

नीतिवचन 5:19 प्रिय हरिणी या सुन्दर सांभरनी के समान उसके स्तन सर्वदा तुझे संतुष्ट रखे, और उसी का प्रेम नित्य तुझे आकर्षित करता रहे।

नीतिवचन 5:20 हे मेरे पुत्र, तू अपरिचित स्त्री पर क्यों मोहित हो, और पराई को क्यों छाती से लगाए?

नीतिवचन 5:21 क्योंकि मनुष्य के मार्ग यहोवा की दृष्टि से छिपे नहीं हैं, और वह उसके सब मार्गों पर ध्यान करता है।

नीतिवचन 5:22 दुष्ट अपने ही अधर्म के कर्मों से फंसेगा, और अपने ही पाप के बन्धनों में बन्धा रहेगा।

नीतिवचन 5:23 वह शिक्षा प्राप्त किए बिना मर जाएगा, और अपनी ही मूर्खता के कारण भटकता रहेगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • उत्पत्ति 46-48
  • मत्ती 13:1-30