रविवार, 23 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - अलगाव का जीवन

 

प्रभु यीशु की कलीसिया - प्रभु की आज्ञाकारी   

प्रभु यीशु की कलीसिया में, प्रभु यीशु द्वारा व्यक्ति के जोड़े जाने साथ ही, उस सच्चे और वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन में कुछ बातों की उपस्थिति भी अनिवार्य और आवश्यक हो जाती है। प्रभु का जन कहलाए जाने वाले व्यक्ति के जीवन में इन बातों की उपस्थिति यह दिखाती और प्रमाणित करती है कि वह प्रभु का जन है, प्रभु की कलीसिया में प्रभु द्वारा जोड़ा गया है। इन बातों के द्वारा वह जन अपने मसीही जीवन में बढ़ता जाता है, प्रभु की कलीसिया के लिए उपयोगी बना रहता है, और उसके द्वारा अन्य लोग भी प्रभु की निकटता में आने लगते हैं। प्रेरितों 2 अध्याय में प्रथम कलीसिया स्थापित हो जाने के साथ ही उन प्रथम विश्वासियों के जीवनों में भी ये सात बातें दिखने लगीं थीं, और तब से लेकर आज तक संसार के हर स्थान में प्रभु की कलीसिया के प्रत्येक सच्चे सदस्य में ये सात बातें होना ही उसके वास्तविक मसीही विश्वासी होने का प्रमाण रही हैं (प्रेरितों 2:39)। ये सात बातें हमें प्रेरितों 2:38-42 में मिलती है, और इनमें से पद 38 में दी गई पहली दो, पापों के लिए पश्चाताप और बपतिस्मे द्वारा मसीही विश्वास में आ जाने की सार्वजनिक गवाही देने से संबंधित कुछ बातों को हम पिछले लेखों में देख चुके हैं।

तीसरी बात प्रेरितों 2:40 में दी गई है -उसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ; अर्थात, बुरे और प्रभु विरोधी लोगों ही अलग होकर प्रभु के साथ और उसकी आज्ञाकारिता में बने रहो। एक सच्चे मसीही विश्वासी का जीवन, संसार और सांसारिकता से बच कर रहने, संसार की नश्वर बातों से हटकर परमेश्वर के वचन के अनुसार चलने का जीवन होता है। मसीही विश्वासी हर परिस्थिति में प्रभु को महिमा देता है, उसके कार्य को, सुसमाचार को औरों तक पहुँचाने में संलग्न रहता है। इस संदर्भ में बाइबल के कुछ पद देखते हैं:

  • जब पतरस और यूहन्ना को यहूदी धर्म के अगुवों ने प्रभु यीशु के बारे में कुछ भी कहने से मना किया, तब उनकी प्रतिक्रिया:तब उन्हें बुलाया और चितौनी देकर यह कहा, कि यीशु के नाम से कुछ भी न बोलना और न सिखलाना। परन्तु पतरस और यूहन्ना ने उन को उत्तर दिया, कि तुम ही न्याय करो, कि क्या यह परमेश्वर के निकट भला है, कि हम परमेश्वर की बात से बढ़कर तुम्हारी बात मानें। क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हम ने देखा और सुना है, वह न कहें” (प्रेरितों 4:18-20)
  • जब उनसे फिर भी प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रचार करते रहने के विषय पूछा गया, तो उनका उत्तर:क्या हम ने तुम्हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? तौभी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो। ​तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है” (प्रेरितों के काम 5:28-29)
  • और जब अपने इस उत्तर के लिए वे पीटे गए, तो उनकी प्रतिक्रिया:तब उन्होंने उस की बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना। वे इस बात से आनन्दित हो कर महासभा के सामने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य तो ठहरे। और प्रति दिन मन्दिर में और घर घर में उपदेश करने, और इस बात का सुसमाचार सुनाने से, कि यीशु ही मसीह है न रुके” (प्रेरितों के काम 5:40-42)
  • स्तिफनुस के मारे जाने के बाद उस प्रथम कलीसिया पर भारी क्लेश आया, और उन सताए गए मसीही विश्वासियों की प्रतिक्रिया थी, “उसी दिन यरूशलेम की कलीसिया पर बड़ा उपद्रव होने लगा और प्रेरितों को छोड़ सब के सब यहूदिया और सामरिया देशों में तित्तर बित्तर हो गए” “जो तित्तर बित्तर हुए थे, वे सुसमाचार सुनाते हुए फिरे” (प्रेरितों 8:1, 4) - जिस बात के लिए वे सताए और बेघर किए गए, तित्तर बित्तर हो गए, वे उस बात से - अपने मसीही विश्वास और उसके दायित्व से पीछे नहीं हटे, वरन जहाँ भी गए, सुसमाचार सुनाते हुए ही गए।

हम उपरोक्त उदाहरणों से देखते हैं कि उन प्राथमिक मसीही विश्वासियों के अन्दर तुरंत ही कितना भारी परिवर्तन, और अपने मसीही विश्वास के दायित्व के प्रति कितना गहरा समर्पण आ गया था। वे हर हाल, हर परिस्थिति में, सताव सह कर भी, संसार और संसार के लोगों के साथ समझौते का नहीं, वरन विपरीत हालात में भी प्रभु की आज्ञाकारिता का जीवन जीते थे; उसके लिए सब कुछ सहने के लिए तैयार थे। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इसके विषय मसीही विश्वासियों के लिए लिखवाया है:

  • और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15) 
  • तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा” (1 यूहन्ना 2:15-17)
  • हे व्यभिचारिणयों, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है” (याकूब 4:4)

       इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, “उसने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इनकार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले” (लूका 9:23)। आज प्रभु की खेती में शैतान द्वारा बोए गए झूठेमसीहीतरह-तरह की गलत शिक्षाओं का प्रचार और संसार के साथ समझौते का जीवन जीने की बातों को सिखाते और दिखाते हैं। जैसे जब इस्राएली मिस्र के दासत्व से छुड़ाए गए, तो उनके साथ एक मिली-जुली भीड़ भी निकल आई (निर्गमन 12:38)। ये भीड़ इस्राएलियों के साथ ही रहती और चलती थी; उन्हें भी मन्ना मिलता था, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा उन पर भी रहती थी। किन्तु यह मिली-जुली भीड़ इस्राएलियों के लिए दुख और पतन का कारण बन गई, उसने इस्राएलियों को परमेश्वर के कोप का भागी बना दिया (गिनती 11:4-6, 10, 33), और अन्ततः कनान में प्रवेश के समय उस मिली-जुली भीड़ का इस्राएलियों के साथ होने का कोई उल्लेख नहीं है; बलवाई इस्राएलियों के साथ वे भी जंगल में नाश हो गए, आशीष की भूमि तक नहीं पहुँच सके। 

       यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो हर परिस्थिति में प्रभु और उसके निर्देशों के प्रति सच्चे और आज्ञाकारी बने रहने में ही आपकी आशीष और सुरक्षित भविष्य है। आज के ईसाई या मसीही समाज में शैतान के द्वारा कलीसिया में घुसाए गए झूठेविश्वासियोंकी कमी नहीं है। ये झूठे विश्वासी हमेशा संसार के समान कार्य और व्यवहार करने, संसार के लोगों के साथ समझौते करने, परमेश्वर के वचन की अनदेखी और अनाज्ञाकारिता करने के लिए ही उकसाते रहते हैं, विश्वासियों के मसीही विश्वास और जीवन में अग्रसर होने को बाधित करते रहते हैं। प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के लिए प्रभु का निर्देश है, “अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:40)  

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 7-8     
  • मत्ती 15:1-20 

शनिवार, 22 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - बपतिस्मे द्वारा गवाही देना

प्रभु यीशु की कलीसिया में बपतिस्मे की भूमिका 

पिछले लेखों से हम देख चुके हैं कि प्रभु यीशु की कलीसिया में कोई भी, किसी भी रीति अथवा विधि के द्वारा स्वतः ही नहीं जुड़ सकता है। जिस प्रकार से प्रभु ने अपनी कलीसिया से संबंधित सभी बातों को स्वयं ही निर्धारित किया है, और स्वयं ही अपनी कलीसिया को प्रबंधित और संचालित भी करता है, उसी प्रकार से प्रभु अपनी कलीसिया में स्वयं ही लोगों को जोड़ता भी है (प्रेरितों 2:47), और उसके द्वारा जोड़े जाने से संबंधित प्रक्रिया और बातें भी प्रभु द्वारा ही निर्धारित कर दी गई हैं। प्रथम कलीसिया की स्थापना से लेकर आज तक, सारे संसार के सभी स्थानों में प्रभु की कलीसिया के साथ जुड़ने के लिए प्रभु द्वारा स्थापित इसी एक प्रक्रिया का निर्वाह किया जाता है। इस प्रक्रिया में सात बातें हैं, जिन्हें परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरितों 2:38-42 में लिखवाया है। इनमें से पहली बात, 2:38 में प्रभु की कलीसिया के साथ जुड़ने का आरंभ, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने पापों से पश्चाताप करना है, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं। उस लेख में हमने यह भी समझा है कि जिस पश्चाताप की यहाँ बात की गई है, वह वास्तविक पश्चाताप, ईसाई समाज और संस्थाओं में सामान्यतः देखे जाने वाले सांसारिक और औपचारिक पश्चाताप से, जो मृत्यु उत्पन्न करते हैं, बहुत भिन्न है। हमने उस वास्तविक पश्चाताप के गुणों, पहचान, और प्रभाव के बारे में बाइबल से समझा है जो प्रभु की कलीसिया से जुड़ने के लिए अनिवार्य है। हमने यह भी देखा है कि  इसी पद, 2:38 में दूसरी बात भी लिखी गई है - हर एक पश्चाताप करने वाले के द्वारा यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लेना।

परमेश्वर के वचन, बाइबल में जब भी बपतिस्मा लेने या देने की बात आई है, उसके साथ कुछ महत्वपूर्ण बातें भी जुड़ी हुई देखी जाती हैं, जिनकी अवहेलना करने के द्वारा बपतिस्मे को लेकर बहुत सी गलत शिक्षाएं बनाकर फैला दी गई हैं। इसलिए पहले यह समझना आवश्यक है कि बपतिस्मा क्यों लिया या दिया जाए; उसके बाद ही उसकी विधि, या नामों के प्रयोग, आदि का महत्व समझ में आ सकता है। पापों से पश्चाताप करने और प्रभु यीशु मसीह से पापों की क्षमा मांग लेने, उसे अपना जीवन समर्पित कर देने, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से उसकी अधीनता में जीवन जीने का निर्णय कर लेने के बाद, बपतिस्मा, व्यक्ति द्वारा किए गए अपने उस निर्णय की तथा उससे उसके जीवन में आए भीतरी परिवर्तन की केवल एक बाहरी सार्वजनिक गवाही मात्र है। 

मत्ती 28:18-20 में दिए गए क्रम को ध्यान से देखिए; यहाँ स्वयं प्रभु यीशु मसीह के शब्दों में, प्रभु ने पहले शिष्य बनाने को कहा, और फिर उन शिष्यों को बपतिस्मा देने के लिए कहा। प्रेरितों 2 में भी पतरस के प्रचार के बाद, जिन्होंने पश्चाताप किया और प्रभु को ग्रहण किया, केवल उन्हें ही बपतिस्मा दिया गया (प्रेरितों 2:41); दमिश्क के मार्ग में प्रभु का दर्शन पाने, और उसेप्रभुस्वीकार करने के बाद ही पौलुस (उस समय शाऊल) को बपतिस्मा दिया गया (प्रेरितों 9:5, 18); इसी प्रकार से प्रेरितों 19:1-5 के वार्तालाप में प्रकट है कि पौलुस जिन से बात कर रहा था, उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर लिया था। इन सभी उदाहरणों में वही क्रम दिया गया है - पहले प्रभु के शिष्य बनना, अर्थात उसे अपना उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेना, और तब प्रभु यीशु के उन शिष्यों को ही बपतिस्मा दिया जाना। 

  यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला यरदन नदी के आस-पास के क्षेत्र में बपतिस्मा देता था, और वहीं प्रभु यीशु का बपतिस्मा भी हुआ (यूहन्ना 1:28; 3:23; मत्ती 3:6, 13-16; मरकुस 1:5, 9-11; लूका 3:3)। प्रभु यीशु और उनके चेलों के द्वारा भी बपतिस्मा दिया जाने का उल्लेख है (यूहन्ना 3:22; 4:1-2), किन्तु यह नहीं लिखा गया है कि वे किस नदी अथवा जलाशय में बपतिस्मा देते थे। फिलिप्पुस ने सामरिया में बपतिस्मा दिया (प्रेरितों 8:12-13) किन्तु यह नहीं लिखा है कि किस नदी अथवा जलाशय में बपतिस्मा दिया गया। बाद में फिलिप्पुस ने कूश देश के खोजे को, मार्ग के किनारे के एक जलाशय में बपतिस्मा दिया (प्रेरितों 8:36-37)। तो बपतिस्मा बहते या खड़े पानी, दोनों में ही दिया जा सकता है, इसमें कोई अनिवार्यता नहीं है कि बपतिस्मा किसी नदी में ही दिया जाए। इन हवालों से यह बात भी स्पष्ट है कि बपतिस्मा जहाँ भी दिया गया, वहाँ इतना पानी अवश्य होता था कि लोग उसमें उतर कर पानी के अंदर जा सकें, और बाहर आ सकें। कहीं पर भी छिड़काव का या पानी में उँगली भिगोकर माथे अथवा सिर पर क्रूस का निशान बना देने के द्वारा बपतिस्मा दिए जाने का बाइबल में कोई उदाहरण या उल्लेख नहीं है। बाइबल में कहीं पर भी किसी शिशु अथवा बच्चे के बपतिस्मे का उल्लेख नहीं है; हमेशा ही वयस्कों को, उनकी स्वेच्छा के अनुसार बपतिस्मा दिया गया।  

  जो प्रभु के शिष्य बन गए, अर्थात जिन्होंने प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार कर लिया और अपना जीवन उन्हें समर्पित कर दिया, वे स्वतः ही, बपतिस्मा लेने से पहले ही प्रभु के अनुयायी, परमेश्वर की संतान, और स्वर्ग में जाने के अधिकारी हो गए। बपतिस्मा न तो उद्धार प्रदान करता है, और न ही व्यक्ति को परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी अथवा स्वीकार्य बनाता है – बपतिस्मा केवल प्रभु यीशु में लाए गए विश्वास के द्वारा बदले हुए जीवन की सार्वजनिक रीति से गवाही देने का एक माध्यम है। ध्यान कीजिए, क्रूस पर टंगे हुए डाकू ने पापों की क्षमा पाई, और स्वर्ग चला गया – बिना बपतिस्मा लिए। ऐसे न जाने कितने लोग होंगे जिन्होंने प्रभु पर विश्वास किया, पापों से पश्चाताप किया, किन्तु किसी-न-किसी कारण वश, कोई बाधा अथवा विपरीत परिस्थिति के कारण बपतिस्मा नहीं लेने पाए – किसी दुर्घटना के बाद, किसी युद्ध भूमि में घायल होने के बाद अंतिम साँसें लेते हुए; रेगिस्तान अथवा बर्फीले इलाके में प्रभु को ग्रहण करने पर भी बपतिस्मे की सुविधा न होने के कारण; किसी सुदूर एकांत के इलाके में रेडियो पर सुसमाचार सुनकर विश्वास करने किन्तु किसी अन्य विश्वासी जन के उनके पास या साथ न होने के कारण – ऐसी कितनी ही परिस्थितियाँ हो सकती हैं, जिनके अंतर्गत बपतिस्मा लेना कई बार संभव नहीं होता है, और मनुष्य चाह कर भी बपतिस्मा नहीं लेने पाता है। क्या ऐसे लोग केवल इसलिए स्वर्ग में प्रवेश नहीं पाएँगे, क्योंकि सांसारिक परिस्थितियों के कारण वे चाहते हुए भी बपतिस्मा नहीं लेने पाए? यदि क्रूस पर लटका हुआ डाकू पश्चाताप करके, बिना बपतिस्मा लिए स्वर्ग जा सकता है, तो अन्य कोई क्यों नहीं?

  साथ ही, ध्यान कीजिए, शमौन टोन्हा करने वाले के समान (प्रेरितों 8:9-13, 18-24), सभी कलीसियाओं में ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने रस्म के समान बपतिस्मा तो लिया, किन्तु उन्होंने सच्चा पश्चाताप कभी नहीं किया, उनके जीवनों में कोई परिवर्तन नहीं आया, वे अभी भी अपने पापों और सांसारिकता के जीवन में बने हुए हैं। वे प्रभु भोज में भी भाग लेते हैं, कलीसिया के सदस्य भी हैं, त्यौहार और पर्व भी मनाते हैं, किन्तु पाप और समझौते तथा सांसारिकता का जीवन भी जीते हैं। उनके बपतिस्मे से उन्हें क्या लाभ हुआ? क्या परमेश्वर उनके बपतिस्मे से मजबूर हो गया कि उसे अब उन्हें स्वर्ग में प्रवेश देना ही पड़ेगा, यद्यपि उनके जीवन दिखा रहे हैं कि उन्होंने उद्धार नहीं पाया है?

एक अन्य व्यर्थ बहस करने की बात बपतिस्मा प्रभु यीशु मसीह के नाम से दिया गया, यापिता, पुत्र और पवित्र आत्माके नाम से को लेकर उठाई जाती है। मत्ती 28:19 के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह के ही शब्दों में बपतिस्मापिता, पुत्र, और पवित्र आत्माके नाम से दिया जाना है – ये तीनों ही त्रिएक परमेश्वर के स्वरूप हैं और पूर्णतः एक समान हैं, कोई भी दूसरे से न तो भिन्न है और न किसी रीति से कम है। यहीत्रिएक परमेश्वरजब इस धरती पर अवतरित होकर सदेह आया, तो उसका नामयीशुरखा गया; अर्थातयीशुत्रिएक परमेश्वर ही का नाम है, जो उसके उद्धारकर्ता स्वरूप को दिखाता है (मत्ती 1:21)। इसलिए चाहे तीनों का नाम लो, या किसी एक का, अभिप्राय तो उसी एक परमेश्वर को आदर देने और उसकी आज्ञाकारिता को पूरा करना है। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता है कि केवल प्रभु यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा दिया/लिया जाए, या तीनों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से कहकर दिया/लिया जाए; बात एक ही है। यह शिक्षा, कि केवल यीशु के नाम में दिया गया बपतिस्मा ही सही है अन्यथा नहीं, विलियम ब्रैनहैम के Jesus Only समुदाय के द्वारा फैलाई जाती रही है; और ये लोग त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखते हैं। वे केवल यीशु ही को मानते हैं, इसलिए त्रिएक परमेश्वर के अस्तित्व और बातों पर जहाँ और जैसे संभव है, संदेह उत्पन्न करते हैं, उसके विरोध में धारणाएं उत्पन्न करते हैं। और उनके इसी प्रयास की एक कड़ी उनके द्वारा बपतिस्मे के बारे फैलाई जाने वाली यह शिक्षा है। 

   परमेश्वर के नाम, तथा पानी के स्थान के साथ बपतिस्मे को जायज़-नाजायज़ दिखाना, शैतान के द्वारा लोगों को गलत शिक्षाओं और व्यर्थ के वाद-विवादों में फंसा कर, उनका ध्यान कर्मों की धार्मिकता की ओर लगाने का प्रयास है, जिससे वे परमेश्वर के अनुग्रह से मिलने वाली क्षमा और धार्मिकता की सादगी और आशीष से निकलकर व्यर्थ के अनुचित कर्मों में फँसे रहें, आपस में विवाद करते, लड़ते रहें, पापों से पश्चाताप के स्थान पर विधि-विधानों के निर्वाह के चक्करों में पड़कर प्रभु के मार्गों से भटक जाएँ। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, यह प्रकट है कि महत्व बपतिस्मे को लेने का है, बपतिस्मे के समय किस या किन नामों का उच्चारण किया जाता है, उसे बहते पाने में दिया/लिया जाता है अथवा खड़े पानी में, इन बातों का नहीं। इसलिए बपतिस्मे को अनावश्यक रीति से ऐसा कोई महत्व नहीं देना चाहिए जो प्रभु ने उसके लिए नहीं कहा अथवा सिखाया है। बपतिस्मा लेना प्रभु की आज्ञा है, और आज्ञाकारिता में आशीष है। किन्तु बपतिस्मा न लेने से उद्धार नहीं चला जाता है; और बपतिस्मा ले लेने से उद्धार नहीं मिल जाता है।

     यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह बिलकुल स्पष्ट समझना बहुत आवश्यक है कि प्रत्येक उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी को, समय और अवसर के अनुसार, प्रभु की आज्ञा के अनुसार बपतिस्मा अवश्य ही लेना है – अनुग्रह से मिले उद्धार को स्थापित करने के लिए नहीं, वरन उस उद्धार की सार्वजनिक गवाही देने के लिए। यह बपतिस्मा व्यक्ति चाहे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से ले अथवा दे, या यीशु के नाम से; बहते पाने में ले या खड़े पानी में – इससे उसके उद्धार की दशा और परमेश्वर के साथ बने संबंध पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। किन्तु जैसे पश्चाताप के लिए, वैसे ही बपतिस्मे के लिए भी है - यह कोई रस्म का निर्वाह करना, एक औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इसका अपना महत्व और उद्देश्य है, जिसकी सीमाओं के अंतर्गत इसे देखना, समझना, और निभाना चाहिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।    

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 4-6     
  • मत्ती 14:22-36

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - पश्चाताप द्वारा जोड़े जाना

प्रभु यीशु की कलीसिया में जुड़ना - पश्चाताप को समझना  

हम पिछले लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर की अनन्तकालीन आशीषों और स्वर्गीय जीवन का संभागी होने का एकमात्र मार्ग है प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया का अंग, उसका सदस्य होना। प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया का अंग होने, उसमें जुड़ने की प्रक्रिया, कोई रहस्यमय या गुप्त बात नहीं है जो केवल कुछ विशिष्ट लोगों पर ही प्रकट की गई है, या जिसे हर किसी पर प्रकट नहीं किया जाता है। न ही यह किसी व्यक्ति अथवा संस्था या डिनॉमिनेशन आदि के द्वारा अपने लिए स्वतः ही निर्धारित कर लेने वाली कोई बात है। जिस प्रकार से परमेश्वर अपनी कलीसिया की हर बात के संबंध में बिलकुल निश्चित और सटीक है, हर बात को स्वयं निर्धारित करता है, उन बातों में किसी प्रकार के परिवर्तन या छेड़-छाड़ को स्वीकार नहीं करता है, उसी प्रकार से उसकी कलीसिया में सम्मिलित होने की भी परमेश्वर द्वारा एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसे उसने अपने वचन में सभी के लिए प्रकट कर दिया है। प्रभु की प्रथम कलीसिया की स्थापना के वृतांत, प्रेरितों 2 अध्याय में यह स्पष्ट वर्णित है। जिस रीति से वह प्रथम कलीसिया स्थापित हुई, और प्रभु द्वारा उसमें लोग जोड़े गए; उसी प्रकार से तब से लेकर आज तक भी, संसार के हर स्थान से, प्रभु यीशु के द्वारा उसकी कलीसिया के साथ लोग जोड़े जाते रहे हैं, और प्रभु के दूसरे आगमन तथा कलीसिया के उठाए जाने तक लोगों को कलीसिया में जोड़ते जाने के लिए उसी प्रक्रिया का निर्वाह होता रहेगा। 

पिछले लेख में हमने प्रेरितों 2 अध्याय से देखा था कि कोई अपने आप से प्रभु की कलीसिया में नहीं जुड़ सकता है, वरन प्रभु ही अपने लोगों को अपनी कलीसिया में जोड़ता है (प्रेरितों 2:47)। न तो जोड़े जाने वाले लोगों की भक्ति की, उनके द्वारा उनके धर्म के निर्वाह की, और न ही उन लोगों के परिवार या वंशावली की कलीसिया के साथ प्रभु की कलीसिया में जोड़े जाने में कोई भूमिका है। इस प्रक्रिया के दो पक्ष हैं - पहला प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार को लोगों तक पहुँचाने वाले, जन सामान्य को प्रभु के इस सुसमाचार के बारे में बताने वाले; और दूसरे वे लोग जो इस सुसमाचार को सुनकर, इसके प्रति स्वीकृति की, सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। जो सच्चे मन से यह सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, प्रभु की कलीसिया में जुड़ते हैं, उनके जीवनों में होने वाली सात बातें प्रेरितों 2:38-42 में लिखी गई हैं। इस प्रक्रिया का आरंभ पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से दिए गए सुसमाचार द्वारा लोगों के मनों कोछेदने”, या उन्हें उनके पापों के प्रति कायल करने और फिर उन कायल होने वालों में उनके पापों के समाधान की आवश्यकता के बोध के साथ होता है (2:37)। जो पवित्र आत्मा द्वारा सुसमाचार से पापों के लिए कायल किए जाते हैं, और पापों के समाधान के लिए कोई अपना अथवा किसी प्रकार का मानवीय या संस्थागत समाधान ढूँढने के स्थान पर परमेश्वर के समाधान के खोजी होते हैं, और उस समाधान को स्वीकार करते हैं, उसका पालन करते हैं, प्रभु की कलीसिया में उनके जुड़ने का कार्य पश्चाताप के साथ आरंभ होता है (2:38) 

प्रभु की कलीसिया के साथ किसी भी व्यक्ति के जुड़ने का आरंभ उस व्यक्ति द्वारा अपने पापों के लिए पश्चाताप करने के साथ होता है। इस विषय पर हम कुछ विस्तार से 7 जनवरी के लेख में देख चुके हैं। आज हम इस अति-महत्वपूर्ण शब्दपश्चातापयामन-फिराओको और उसके अभिप्राय को समझने का प्रयास करते हैं। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादपश्चातापयामन-फिराओकिया गया है, उसका शब्दार्थ होता है पहले से बिलकुल भिन्न, उससे उलट सोच-विचार, मान्यताएं, और धारणाएं रखना। अर्थात, जिस बात के लिए पश्चाताप किया जाए, या जिसके विषय मन फिराया जाए, वह वास्तविक तब ही होगा जब व्यक्ति उन बातों के विषय अपना सोच-विचार-व्यवहार पूर्णतः बदल कर भिन्न कर ले, ऐसा कर ले जो पहले वाले के विपरीत हो। इसीलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मसीही विश्वास में आने वाले व्यक्ति के लिए लिखवाया है, “सो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17)। प्रकट है, बाइबल की परिभाषा के अनुसार किया गयापश्चातापयामन-फिरावएक औपचारिकता, मुँह से कुछ शब्दों का दोहरा देना, और फिर वापस उसी पहले वाली सोच-विचार-व्यवहार की स्थिति में लौट जाना नहीं है। यदि व्यक्ति द्वारा किया गया यहपश्चातापयामन-फिराववास्तविक होगा, तो उस व्यक्ति में दिखने वाली दो बातों के द्वारा प्रकट एवं प्रमाणित हो जाएगा:

  1. रोमियों 12:2 “और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहोसच्चापश्चातापयामन-फिरावकरने के बाद, फिर उस व्यक्ति में संसार के सदृश्य रहने, सोचने, व्यवहार करने आदि बातों के निर्वाह की प्रवृत्ति नहीं रहेगी। उसका चाल-चलन बदल जाएगा, और निरंतर बदलता चला जाएगा। अब वह हर बात में परमेश्वर की इच्छा जानने और मानने वाला हो जाएगा, और इसी पथ पर अग्रसर बना रहेगा। यह एक आजीवन चलती रहने वाली प्रक्रिया है - परमेश्वर पवित्र आत्मा व्यक्ति को उसके पापों के विषय कायल करता रहता है, और व्यक्ति विनम्र एवं आज्ञाकारी होकर न पापों के लिए पश्चाताप के साथ अपने मसीही जीवन एवं चाल-चलन को सुधारता रहता है। इस प्रक्रिया का प्रभाव होता है कि व्यक्ति अंश-अंश करके प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप में ढलता चला जाता है (2 कुरिन्थियों 3:18; रोमियों 8:29)। सच्चे पश्चाताप का यह प्रथम प्रत्यक्ष एवं सर्व-विदित प्रभाव है, जिसके लिए किसी को दावा करने की आवश्यकता ही नहीं है; उसका बदला हुआ जीवन स्वयं ही उसके अंदर आए परिवर्तन को बताता है। 
  2. 2 कुरिन्थियों 7:10 “क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिस का परिणाम उद्धार है और फिर उस से पछताना नहीं पड़ता: परन्तु संसारी शोक मृत्यु उत्पन्न करता हैवास्तविक पश्चाताप या मन-फिराव, व्यक्ति के मन में परमेश्वर के सम्मुख उसके पापमय व्यवहार के लिए एक गहरा और गंभीर शोक भी उत्पन्न करता है। यह केवल दिखावे का या औपचारिकता का शोक नहीं है, इस शोक में परमेश्वर भक्ति भी सम्मिलित रहती है। अर्थात, सच्चा पश्चाताप व्यक्ति को संसार के लगाव से निकालकर संसार के प्रति अलगाव और परमेश्वर के प्रति लगाव की ओर ले जाता है। यह एक बड़ी स्वाभाविक बात है कि जिसने संसार और सांसारिकता की बातों के लिए सच्चा पश्चाताप किया है, अर्थात उस सोच-विचार-व्यवहार को वास्तव में छोड़ दिया है, उससे पलट गया है, वह उसी  सोच-विचार-व्यवहार में लिप्त कैसे रहेगा? अगर वह अभी भी लिप्त है, तो उसने उस सोच-विचार-व्यवहार के लिए वास्तविक पश्चाताप किया ही नहीं है। यही वह बनावटी या सांसारिक शोक है जिसके लिए इस पद में लिखा है कि वह मृत्यु उत्पन्न करता है; क्योंकि व्यक्ति शब्दों की औपचारिकता के निर्वाह के द्वारा यही सोचता रहता है कि उसनेवैधानिक”, या परंपरागत आवश्यकता को पूरा कर लिया है, और अब उसकी दशा ठीक और स्वीकार्य है, जबकि ऐसा होता नहीं है। अन्ततः जब तक उसे अपने उस औपचारिक पश्चाताप की वास्तविकता एवं व्यर्थता समझ में आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, और व्यक्ति अनन्त विनाश में चला जाता है।

प्रभु यीशु की कलीसिया के साथ जुड़ना सच्चे पश्चाताप के साथ आरंभ होता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पश्चाताप करने वाले उस व्यक्ति के जीवन में आया पूर्ण परिवर्तन, पश्चातापी जीवन, तथा अंश-अंश करके प्रभु यीशु के स्वरूप में ढलते चले जाना और पापमय जीवन एवं व्यवहार के लिए शोक में तथा ईश्वरीय भक्ति में बढ़ते चले जाना होता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो प्रभु यीशु की कलीसिया में अपने सम्मिलित होने को भली-भांति सुनिश्चित कर लीजिए। अपने जीवन को जाँच-परख कर देख लीजिए कि आप में उपरोक्त सच्चे पश्चाताप या मन-फिराव के गुण और प्रमाण विद्यमान हैं कि नहीं? यदि लेशमात्र भी संदेह हो, तो अभी समय और अवसर रहते स्थिति को ठीक कर लीजिए। कहीं थोड़ी सी लापरवाही, बात को गंभीरता से न लेना, अनन्तकाल की पीड़ा न बन जाए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 1-3     
  • मत्ती 14:1-21

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - जुड़ने की प्रक्रिया

 प्रभु यीशु की कलीसिया में जुड़ना - भक्ति या परिवार और वंशावली से नहीं!

       पिछले तीन सप्ताहों से हम प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया के विषय बाइबल से अध्ययन करते आ रहे हैं। हमने मत्ती 16:18 में दिए प्रभु यीशु के कथन से इसे देखना आरंभ किया था, जहाँ बाइबल में पहली बारकलीसियाशब्द का प्रयोग किया गया है। हमनेकलीसियाशब्द के अर्थ को समझा, और यह समझा कि कैसे यह पद कलीसिया को पतरस पर आधारित नहीं करता है। हमने यह देखा कि कलीसिया उन विश्वव्यापी लोगों का समूह है जो अपने परिवार, वंशावली, डिनॉमिनेशन, कार्यों, परंपराओं के निर्वाह, आदि के आधार पर नहीं, वरन अपने पापों से पश्चाताप करने, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा माँगने, उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करके, अपनी जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करके, प्रभु यीशु की अधीनता में और उसके वचन की आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करने का निर्णय लेते हैं। ये समर्पित लोग ही प्रभु की कलीसिया हैं, जिन्हें बाइबल में कई रूपकों (metaphors) के द्वारा भी संबोधित किया गया है। हमने देखा कि प्रभु यीशु ही स्वयं अपनी कलीसिया बना रहा है, वही उसका आधार है, वही अपने लोगों को स्वयं कलीसिया में जोड़ता है, और उसके हाथों में अभी कलीसिया निर्माणाधीन है। कोई भी मनुष्य किसी भी मानवीय अथवा किसी प्रकार की संस्थागत प्रक्रिया से प्रभु की कलीसिया में कदापि सम्मिलित नहीं हो सकता है; और जो कोई घुस भी आता है तो वह प्रभु द्वारा या तो अभी, नहीं तो जगत के अन्त के समय प्रभु की कलीसिया से पृथक कर दिया जाएगा, अनन्त विनाश में डाल दिया जाएगा। और पिछले लेख में हमने देखा था कि प्रभु का दूसरा आगमन, अपनी इसी कलीसिया को अपने पास उठा लेने और स्वर्ग में अपने साथ सुरक्षित कर लेने के लिए होगा।

प्रेरितों 2 अध्याय, प्रभु की प्रथम कलीसिया के स्थापित होने का वर्णन है; प्रेरितों 2:47 में लिखा है, “... और जो उद्धार पाते थे, उन को प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता थाइस प्रथम कलीसिया में सम्मिलित करने के लिए प्रभु ने जिस प्रक्रिया का प्रयोग किया, वही आज भी प्रभु की कलीसिया के साथ प्रभु द्वारा लोगों को जोड़े जाने के लिए प्रयोग की जाती है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए प्रेरितों 2 अध्याय का एक संक्षिप्त पुनःअवलोकन कर लेते हैं। प्रभु यीशु ने अपने स्वर्गारोहण से पहले अपने शिष्यों से कहा कि वे यरूशलेम में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त करने के प्रतीक्षा करते रहें, और जब वे सामर्थ्य प्राप्त कर लें तब उसके सुसमाचार के प्रचार की सेवकाई पर निकलें (प्रेरितों 1:4-8)। प्रेरितों 2 अध्याय का आरंभ शिष्यों द्वारा पवित्र आत्मा प्राप्त करने के साथ होता है; इस अद्भुत घटना को देखकर वहाँ पर्व मनाने के लिए एकत्रित हुएभक्त यहूदी” (प्रेरितों 2:5) विस्मित हो गए, और पतरस ने खड़े होकर उनके इस असमंजस का निवारण भी किया, और पुराने नियम के हवालों के साथ उन्हें दिखाया कि यह परमेश्वर की ओर से है, तथा साथ ही प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार का प्रचार भी किया। पतरस के इस प्रचार सेतब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)। उनके इस प्रश्न के उत्तर में पतरस उन्हें प्रेरितों 2:38-42 में सात बातें करने के लिए कहता है, जिनके होने से वे उद्धार पाएंगे प्रभु और उसकी कलीसिया के साथ जुड़ेंगे, और मसीही जीवन में अग्रसर तथा सुदृढ़ होंगे, प्रभु परमेश्वर के लिए उपयोगी होंगे। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उन लोगों का उद्धार उनके किन्हीं कार्यों के द्वारा था; वरन उनका इन सात बातों को मानना, प्रभु के उसके साथ जुड़ें के आह्वान को स्वीकार करके, उसकी सही प्रतिक्रिया देना था, प्रभु का आज्ञाकारी होना था। 

हम इन सात बातों को आने वाले दिनों में क्रमवार देखेंगे। आज हम इसकी पृष्ठभूमि पर एक दृष्टि डाल लेते हैं। ध्यान कीजिए, जिस दिन शिष्यों द्वारा पवित्र आत्मा को प्राप्त करने की घटना हुई, वह पिन्तेकुस्त के पर्व का दिन था (2:1), जो लैव्यव्यवस्था 23 अध्याय में दिए गए सात पर्वों में से एक था, जिसे मनाने के लिए यहूदी यरूशलेम में एकत्रित थे, और उन्हें 2:5 मेंभक्त यहूदीकहा गया है। इनभक्तयहूदियों को जब पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में होकर सुसमाचार सुनाया गया, तो जैसा 2:37 में लिखा है:

  • उनके हृदय छिद गए
  • उन्हें एहसास हुआ कि जो कुछ व्यवस्था में लिखा हुआ था उसे करने के बावजूद उनकी भक्ति अभी अपूर्ण है;
  • उनके सामने यह प्रकट हो गया कि उनके पास इस समस्या का समाधान उपलब्ध नहीं है;
  • उन्हें यह भी समझ आ गया कि उनके धार्मिक अगुवे उन्हें कोई समाधान नहीं देने पाएंगे, इसीलिए वे तुरंत ही प्रभु के शिष्यों की ओर समाधान पाने के लिए मुड़े, यहूदी धर्म-गुरुओं के पास नहीं गए;
  • उन में से जितनों ने पतरस द्वारा बताए गए समाधान को स्वीकार किया, उसका पालन किया, लगभग 3000 लोग उसी दिन प्रभु के शिष्यों के साथ जुड़ गए, प्रभु की कलीसिया स्थापित हो गई। 

       उपरोक्त तथ्यों पर थोड़ा विचार कीजिए। जिनके लिए लिखा गया है, वे सभी यहूदी - अर्थात, अब्राहम, इसहाक, याकूब के वंशज थे, परमेश्वर के लोग कहलाए जाते थे। वेभक्तथे; परमेश्वर के प्रति उनकी भक्ति और श्रद्धा पर यहाँ कोई प्रश्न नहीं उठाया गया है, कोई कटाक्ष नहीं किया गया है, वरन उनकी भक्ति को स्वीकार किया गया है, उसे मान्यता दी गई है। किन्तु यह सब  होते हुए भी, उनमें से किसी को भी पश्चाताप करने से पहले, प्रभु की कलीसिया का भाग नहीं माना गया। केवल जिन्होंने पतरस की बात मानी और उसके अनुसार पश्चाताप किया, उन्हें ही कलीसिया का अंग बनाया गया। अर्थात, उनकी भक्ति और वंशावली के बावजूद, वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से दूर थे; जैसा कि प्रभु ने नीकुदेमुस से भी कहा था (यूहन्ना 3:1-13) - उस उच्च ओहदा प्राप्त और आदरणीय यहूदी धर्म-गुरु को भी नया जन्म लेना, जल और आत्मा से जन्म लेना अनिवार्य था, तब ही वह परमेश्वर के राज्य को देखने पाता (यूहन्ना 3:3), उसमें प्रवेश करने पाता (यूहन्ना 3:5) 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अपने आप को जाँच परख लें कि कहीं आप भी इनभक्तयहूदियों के समान, अपनी भक्ति, परंपराओं के निर्वाह, परिवार और वंशावली आदि के आधार पर तो अपने आप को प्रभु की कलीसिया का अंग नहीं समझ रहे हैं? क्या आपने वास्तव में पापों के पश्चाताप और प्रभु यीशु से पापों की क्षमा माँगने, उसे अपना जीवन पूर्णतः समर्पित करने के द्वारा नया जन्म प्राप्त किया है? यदि नहीं, तो आप भी उनभक्तयहूदियों और नीकुदेमुस के समान एक ऐसी धार्मिकता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिसका अंतिम परिणाम बहुत दुखदायी होगा। अभी समय और अवसर रहते, अपनी स्थिति को ठीक कर लीजिए, उन 3000 के समान, अपने लिए सही निर्णय कर के अपने अनन्त भविष्य को सुरक्षित एवं आशीषित कर लीजिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 49-50    
  • मत्ती 13:31-58

बुधवार, 19 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - पहले पुनरुत्थान की भागी


प्रभु यीशु के दूसरे आगमन पर उसके पास कौन उठाया जाएगा?

पिछले कुछ लेखों में हम प्रभु यीशु की कलीसिया के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खंड में प्रयोग किए गए विभिन्न रूपक (metaphors), जैसे कि - प्रभु का परिवार या घराना; परमेश्वर का निवास-स्थान या मन्दिर; परमेश्वर का भवन; परमेश्वर की खेती; प्रभु की देह; प्रभु की दुल्हन; परमेश्वर की दाख की बारी, इत्यादि के बारे में देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि किस प्रकार से इन रूपकों में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रभु द्वारा अपनी कलीसिया, अर्थात, अपने सच्चे और समर्पित शिष्यों का धर्मी और पवित्र किए जाना, परमेश्वर के साथ कलीसिया के संबंध, संगति, एवं सहभागिता की बहाली, तथा कलीसिया के लोगों के व्यवहार और जीवनों में परमेश्वर के प्रयोजन, उन से उसकी अपेक्षाएं, आदि को समझाया है। यहाँ पर ये रूपक किसी विशिष्ट क्रम, आधार, अथवा रीति से सूची-बद्ध नहीं किए गए हैं। कलीसिया के लिए बाइबल में प्रयोग किए गए सभी रूपक समान रीति से, एक सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु और पिता परमेश्वर के साथ संबंध को, तथा उसके मसीही जीवन, और दायित्वों के विभिन्न पहलुओं को दिखाते हैं; सभी रूपक समान ही महत्वपूर्ण हैं, सभी में मसीही जीवन से संबंधित कुछ आवश्यक शिक्षाएं हैं। 

साथ ही, इन सभी रूपकों में एक और सामान्य बात है कि प्रत्येक रूपक यह भी बिलकुल स्पष्ट और निश्चित कर देता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के किसी भी मानवीय प्रयोजन, कार्य, मान्यता या धारणा के निर्वाह आदि के द्वारा, अपनी अथवा किसी अन्य मनुष्य की ओर से परमेश्वर की कलीसिया का सदस्य बन ही नहीं सकता है; वह चाहे कितने भी और कैसे भी प्रयास अथवा दावे क्यों न कर ले। अगर व्यक्ति प्रभु यीशु की कलीसिया का सदस्य होगा, तो वह केवल प्रभु की इच्छा से, उसके माप-दंडों के आधार पर, उसकी स्वीकृति से होगा, अन्यथा कोई चाहे कुछ भी कहता रहे, वह चाहे किसीमानवीय कलीसियाअथवा किसीसंस्थागत कलीसियाका सदस्य हो जाए, किन्तु प्रभु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य हो ही नहीं सकता है। और यदि वह अपने आप को प्रभु की कलीसिया का सदस्य समझता या कहता भी है, तो भी प्रभु उसकी वास्तविकता देर-सवेर प्रकट कर देगा, और अन्ततः वह अनन्त विनाश के लिए प्रभु की कलीसिया से पृथक कर दिया जाएगा। इसलिए अपने आप को मसीही विश्वासी कहने वाले प्रत्येक जन के लिए अभी समय और अवसर है कि अभी अपनेमसीही विश्वासीहोने के आधार एवं वास्तविक स्थिति को भली-भांति जाँच-परख कर, उचित कदम उठा ले और प्रभु के साथ अपने संबंध ठीक कर ले। हर व्यक्ति को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वह किसी मानवीय कलीसिया अथवा किसी संस्थागत कलीसिया का नहीं, परंतु प्रभु यीशु की वास्तविक कलीसिया का सदस्य है।

परमेश्वर के वचन बाइबल में दी गईकलीसियाशब्द की समझ और अभिप्राय जानना और समझना प्रत्येक उस जन के लिए जो अपने आप को ईसाई, या मसीही, या मसीही विश्वासी कहता है, अनिवार्य है। क्योंकि वह व्यक्ति इस पृथ्वी के किस मत, समुदाय, डिनॉमिनेशन से संबंध रखता है; या पृथ्वी पर उसकी सदस्यता किस मत, समुदाय, डिनॉमिनेशन में है, और उस मत, समुदाय, डिनॉमिनेशन के अगुवे और वहाँ उस व्यक्ति के साथ के अन्य लोग उस व्यक्ति के बारे में क्या राय रखते हैं, आदि बातों का उस व्यक्ति के परलोक के अनन्त जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जिस एकमात्र बात का प्रभाव पड़ेगा, और जो उस व्यक्ति के अनन्त काल के स्थान को निर्धारित करेगी वह है उस व्यक्ति का प्रभु यीशु मसीह के साथ व्यक्तिगत संबंध, जैसा हम पहले से कहते और बल देते चले आ रहे हैं। प्रभु यीशु मसीह ने मत्ती 22:1-16 में परमेश्वर के राज्य और अन्त के समय होने वाली छँटाई के विषय एक दृष्टांत कहा - एक राजा ने अपने पुत्र के विवाह के उपलक्ष्य में एक बड़ा भोज आयोजित किया, किन्तु निमंत्रित लोगों ने आने में आनाकानी की। तब राजा ने नगर के मार्गों, चौराहों, आदि स्थानों से सभी लोगों को भोज के लिए बुलाया। जब राजा भोज के स्थान पर आया तो देखा कि उन बुलाए गए लोगों में से एक ऐसा था, जो राजा द्वारा प्रदान किए गए भोज के वस्त्र को पहने बिना अंदर चला आया था। राजा की आज्ञा से इस व्यक्ति को बाहर निकाल दिया गया, अँधियारे में, पीड़ा के स्थान में डाल दिया गया। इस दृष्टांत के अन्त में प्रभु यीशु ने निष्कर्ष के रूप में कहा, “क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत परन्तु चुने हुए थोड़े हैं” (मत्ती 22:14)। उस व्यक्ति का भोज के भीतरी स्थान तक पहुँच जाने ने उसके लिए इस बात को निश्चित नहीं किया कि वह भोज में भाग भी लेने पाएगा। जब वह भोज के लिए उपयुक्त वस्त्रों के बिना पाया गया, तो उसे निकाल बाहर किया गया। 

       आज प्रभु यीशु का उसके पास आकार पापों की क्षमा और उद्धार प्राप्त करने का आह्वान संसार के सभी लोगों के लिए है, सभी उसके द्वारा बुलाए जा रहे हैं (प्रेरितों 17:30) ईसाई या मसीही समाज में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो ये समझते हैं कि उन्हें प्रभु यीशु द्वारा प्रदान की जाने वाली धार्मिकता रूपीवस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। वे अपनी ही पारिवारिक या पारंपरिक धार्मिकता के आधार पर, अपने  मत, समुदाय, डिनॉमिनेशन, आदि की सदस्यता के आधार पर, प्रभु के राज्य में प्रवेश कर लेंगे। किन्तु प्रभु यीशु द्वारा प्रदान किए जाने वाले धार्मिकता के वस्त्रों को पहने बिना, कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करने पाएगा। बाइबल से कुछ पद देखिए, कि प्रभु किन लोगों को लेने आएगा:

  • और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने दूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठे करेंगे” (मत्ती 24:31)
  • जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्ग दूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा। और सब जातियां उसके सामने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकिरयों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” (मत्ती 25:31-32) 
  • उस समय वह अपने दूतों को भेज कर, पृथ्वी के इस छोर से आकाश की उस छोर तक चारों दिशा से अपने चुने हुए लोगों को इकट्ठे करेगा” (मरकुस 13:27)
  • और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे। परन्तु हर एक अपनी अपनी बारी से; पहिला फल मसीह; फिर मसीह के आने पर उसके लोग” (1 कुरिन्थियों 15:22-23) 
  • क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्वर की तुरही फूंकी जाएगी, और जो मसीह में मरे हैं, वे पहिले जी उठेंगे” (1 थिस्स्लुनीकियों 4:16) 

       बाइबल इस बारे में कोई संदेह नहीं रहने देती है कि प्रभु के लोगों में और अन्य लोगों में भिन्नता है। जो प्रभु के लोगों में अपने आप से घुसने का प्रयास करते हैं, जो समय रहते प्रभु के लोग नहीं बने, प्रभु उन्हें अपने लोगों में से पृथक कर देगा (मत्ती 13:30; 25:31-32) और अनन्त विनाश में भेज देगा। वे लोग ही, जिन्होंने इस पृथ्वी पर, समय और अवसर रहते, प्रभु के लोग बनने का निर्णय और उसका निर्वाह कर लिया, वे ही प्रभु के दूसरे आगमन पर इस पहले पुनरुत्थान के भागी होंगे, “धन्य और पवित्र वह है, जो इस पहिले पुनरुत्थान का भागी है, ऐसों पर दूसरी मृत्यु का कुछ भी अधिकार नहीं, पर वे परमेश्वर और मसीह के याजक होंगे, और उसके साथ हजार वर्ष तक राज्य करेंगे” (प्रकाशितवाक्य 20:6)

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अभी समय और अवसर रहते प्रभु यीशु के साथ अपने संबंध के आधार को, तथा उसके साथ अपने संबंध को बारीकी से जाँच परख कर सुनिश्चित कर लीजिए कि आप वास्तव में प्रभु के जन हैं कि नहीं, और उस पहले पुनरुत्थान के भागी होंगे कि नहीं। जरा सी भी चूक, थोड़ी सी भी लापरवाही, समय रहते नहीं किया गया सुधार का कार्य, आपके अनन्त काल को अंधियारा और पीड़ादायक बना देगा।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 46-48     
  • मत्ती 13:1-30