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मंगलवार, 17 जनवरी 2023

प्रभु भोज – भाग लेने में गलतियाँ (17) / The Holy Communion - The Pitfalls (17)

Click Here for the English Translation


प्रभु की मेज़ - अनुचित भाग लेने के लिए न्याय (1)


हमने पहले के लेखों में देखा है कि बाइबल के अनुसार, पाप से व्यवहार करने के परमेश्वर के केवल दो ही तरीके हैं - या तो पाप क्षमा किया जाता है, अन्यथा उसका न्याय करके दण्ड दिया जाता है। दोनों, क्षमा तथा न्याय एवं दण्ड परमेश्वर ही के द्वारा हैं, उसके मानकों के अनुसार, उसकी विधि के द्वारा, और यह सब उसने अपने वचन बाइबल में पहले से दे दिया है। इससे पिछले लेख में हमने, पाप की क्षमा के बारे में अध्ययन करते समय देखा था कि परमेश्वर अपनी संतान, अर्थात नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों, की बहुत चिंता करता है, और उन्हें संसार के साथ समझौते तथा पथभ्रष्ट जीवन में बने नहीं रहने देता है। वह चाहता है कि वे खराई से अपने पापों का अंगीकार करें, और ईमानदारी से उनके लिए सच्चा पश्चाताप करें, जिससे कि वह उन्हें क्षमा कर सके। किन्तु यदि वे अपने पापों में बने ही रहते हैं, तो एक प्रेमी पिता के समान, वह अपने पथभ्रष्ट बच्चों की ताड़ना भी करता है। उसकी यह ताड़ना न केवल उनके प्रति उसके प्रेम का प्रमाण है, वरन इसका भी कि जिनकी ताड़ना की जाती है, वे परमेश्वर की संतान हैं। परमेश्वर द्वारा प्रदान की जाने वाली क्षमा मनुष्यों की किसी सिफारिश, हस्तक्षेप, मानकों, मनुष्यों द्वारा बनाई गाई किसी विधि, या मनुष्य के किन्हीं कार्यों पर आधारित नहीं है। परमेश्वर, जो प्रत्येक के मन की वास्तविक दशा को जानता है, वह अपने सभी निर्णय स्वयं लेता है, अपने मानकों के आधार पर। हमने पिछले लेख का समापन इस चेतावनी के साथ किया था कि जो अपने आप को परमेश्वर के लोग कहते हैं, उसके विश्वासी होने का दावा करते हैं, किन्तु संसार के साथ समझौते का तथा एक पथभ्रष्ट जीवन जीते रहने के बावजूद भी यदि प्रभु की ओर से उनकी ताड़ना नहीं होती है, तो उन्हें सचेत हो जाना चाहिए, अपने जीवनों को बड़े ध्यान से और बारीकी से जाँच लेना चाहिए, और आवश्यक सुधार कर लेने चाहिएं, क्योंकि उनकी ताड़ना न किया जाना, बाइबल के अनुसार इस बात को दिखाता है कि वास्तव में वे परमेश्वर की संतान, उसके लोग नहीं हैं। आज से हम परमेश्वर द्वारा पाप के साथ व्यवहार करने के दूसरे तरीके, पाप के लिए न्याय, के बारे में देखना आरंभ करते हैं।


प्रभु भोज और उसमें उचित रीति से भाग लेने की चर्चा के इस खण्ड के अन्त की ओर आते हुए, पवित्र आत्मा की अगुवाई में प्रेरित पौलुस, यह सिखाने के बाद कि प्रत्येक मसीही विश्वासी को अपने आप को जाँचना, अपने पापों का अंगीकार करके उनके लिए पश्चाताप करना, प्रभु से उनके लिए क्षमा माँगना अनिवार्य है तब ही वह उचित रीति से प्रभु भोज में भाग ले सकता है, अब पद 31-32 में पापों के न्याय के बारे में बात करता है। यहाँ पर न्याय के दो चरण दिए गए हैं; पहला चरण स्वयं भाग लेने वाले के द्वारा है, और दूसरा चरण परमेश्वर के द्वारा। यदि प्रभु की मेज़ में भाग लेने वाला अपने आप को उचित रीति से जाँच कर अपने पाप का न्याय नहीं करता है; यदि उसके पापों का अंगीकार, उनके लिए पश्चाताप, और उसे प्रभु से उनकी क्षमा मिलना नहीं हुआ है, तो फिर परमेश्वर उनका न्याय करेगा। इन दोनों पदों में इस बात पर ध्यान दीजिए कि पौलुस पहली बार प्रभु भोज से संबंधित इस खण्ड में शब्द “हम” का प्रयोग कर रहा है। शब्द “हम” के प्रयोग के द्वारा पौलुस अपने आप को भी उन लोगों में सम्मिलित कर लेता है जिन्हें ऐसा करने की आवश्यकता है; अर्थात, जब भी पौलुस को प्रभु की मेज़ में भाग लेना होता था, वह भी अपने आप को जाँचता था, जिससे कि परमेश्वर द्वारा उसका न्याय न हो। पौलुस इस बात को भी स्पष्ट कर देता है कि जब बात यहाँ तक पहुँच जाती है कि परमेश्वर को ही व्यक्ति, यहाँ पर प्रभु भोज में भाग लेने वाले प्रभु के जन, का न्याय करना पड़ता है, तो फिर वह अपने बच्चों को सही मार्ग पर लाने के लिए, साथ ही आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त ताड़ना भी करता है।

   

परमेश्वर के गुणों में उसका दयालु, अनुग्रहकारी, और धीरजवन्त होना भी हैं (निर्गमन 34:6-7; 2 पतरस 3:9)। मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्च रचना थी, उसने अपने हाथों से मनुष्य को बनाया और उसमें जीवन का श्वास फूँका था (उत्पत्ति 2:7)। इसीलिए, परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, उसे नाश होते हुए नहीं देखना चाहता है, और उसे बचाने तथा अपने पास बहाल करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक था वह सब कुछ करके दिया है। अदन की वाटिका में, जब पहला पाप हुआ, तब परमेश्वर ने आदम और हव्वा को तुरन्त ही दण्ड नहीं दिया, बल्कि उन्हें अवसर दिया कि वे अपने पाप को मान लें, पश्चाताप करें, और उससे क्षमा माँग लें। किन्तु उन्होंने अपने अवसर को एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में गँवा दिया, और उन्हें परमेश्वर की ताड़ना को सहना ही पड़ा। तब से ही परमेश्वर के लोगों का इतिहास, इस्राएल का इतिहास, इस बात के अनेकों उदाहरणों से भरा पड़ा है कि परमेश्वर उन्हें उनके पापों के बारे में सावधान करता रहा, धैर्य के साथ प्रतीक्षा करता रहा कि वे सही मार्ग पर आ जाएं, और उन्हें पापों से पश्चाताप करने की ओर लाने के लिए भिन्न प्रकार की ताड़नाओं को भी उनपर लाता रहा।

 

इसकी तुलना में, सामान्यतः, हम परमेश्वर को यह अन्य-जातियों के लिए करते हुए नहीं देखते हैं। इस बात के भी उदाहरण हैं कि परमेश्वर ने अन्य-जातियों को उनके पाप के लिए चेतावनी दी और उनसे भी पश्चाताप करने के लिए कहा, जैसे कि योना, ओबद्याह, और नहूम की पुस्तकें, तथा दानिय्येल के द्वारा राजा नबूकदनेस्सर और उसके पुत्र राजा बेलशस्सर को चिताना, इत्यादि। परन्तु जितनी बार और जिस प्रकार से परमेश्वर ने अपने लोगों, इस्राएलियों को ताड़ना देकर सुधारने का प्रयास किया है, वह उसने अन्य-जातियों के लिए नहीं किया। यह एक बार फिर से उस बात की पुष्टि करता है जिसे हमने पिछले लेख में देखा था कि परमेश्वर की ताड़ना उसके बच्चों के प्रति उसके प्रेम का प्रमाण है, तथा जिनकी ताड़ना होती है उनका परमेश्वर की संतान होने का प्रमाण है। और पथभ्रष्ट तथा संसार के साथ समझौते का जीवन जीते रहने के बावजूद परमेश्वर से ताड़ना नहीं होना परमेश्वर की संतान न होने का प्रमाण है, चाहे कोई अपने बारे में कुछ भी कहता रहे, कोई भी दावा करता रहे।


यहाँ 1 कुरिन्थियों 11:31 में, पवित्र आत्मा पौलुस प्रेरित में होकर मसीही विश्वासियों को बचने का मार्ग दिखा रहा है - परमेश्वर अपनी दया, अनुग्रह, और धैर्य में होकर प्रभु की मेज़ में भाग लेने वालों को अवसर दे रहा है कि वे अपने आप को सही कर लें और फिर उचित रीति से भाग लें। उन लोगों को, जिनमें पौलुस भी सम्मिलित था, पहले अपने आप को जाँचना  है, और तब ही भाग लेना है; ऐसा करने के द्वारा वे अपने आप को परमेश्वर द्वारा जाँचे जाने से बचा लेंगे। लेकिन एक बार फिर, यह ध्यान रखना है कि व्यक्ति द्वारा अपने आप को जाँचना कोई ऊपरी और हल्के में किया गया, निष्ठा रहित, निरर्थक, मात्र औपचारिकता निभाने वाला कार्य न हो, जिसका उद्देश्य केवल परमेश्वर के निर्देश के शब्दों का पालन करना हो न कि उन शब्दों के भावार्थ का निर्वाह करना। एक बार फिर ध्यान कीजिए, कोई भी परमेश्वर का मूर्ख नहीं बना सकता है; परमेश्वर अपने निर्णय स्वयं लेता है, अपने मानकों के अनुसार, अपनी विधियों के द्वारा, न कि किसी मनुष्यों की बनाई विधि अथवा कसौटी के या सिफारिश के अनुसार। जो कोई भी परमेश्वर का मूर्ख बनाने का प्रयास करता है, वह अपनी पापी दशा को और भी बिगाड़ लेता है, उसमें एक पाप और जोड़ लेता है - परमेश्वर का ठट्ठा करने का पाप।

 

अगले लेख में हम परमेश्वर के न्याय और परमेश्वर द्वारा पश्चाताप न करने वाले उसके लोगों के साथ उनके पापों के लिए व्यवहार करने के बारे में और आगे देखेंगे। प्रभु भोज और उसमें उचित रीति से भाग लेने से संबंधित इस खण्ड के अंत की ओर आते हुए, पवित्र आत्मा की अगुवाई में, प्रेरित पौलुस मसीही विश्वासियों के द्वारा प्रभु भोज में भाग लेने से पहले अपने आप को जाँचने, विशेषकर नाम लेकर पापों का अंगीकार करने और उनके लिए पश्चाताप करने, प्रभु से उनके लिए क्षमा माँगने, और फिर योग्य रीति से मेज़ में भाग लेने की शिक्षा देने के पश्चात, पद 31-32 में, पापों के न्याय के बारे में बात करता है। यहाँ पर न्याय के दो स्तरों का उल्लेख किया गया है; पहला स्तर है भाग लेने वाले के द्वारा स्वयं को जाँचना, और दूसरा स्तर है परमेश्वर द्वारा जाँचा जाना। यदि प्रभु की मेज़ में भाग लेने वाला अपने आप को योग्य रीति से जाँच कर अपने पाप का न्याय नहीं करता है, यदि उसके पापों का अंगीकार नहीं किया जाता है, उनके लिए पश्चाताप करकए क्षमा प्राप्त नहीँ की जाती है, तो फिर परमेश्वर उनका न्याय करेगा। ध्यान दीजिए कि यहाँ पर इन दो पदों में पौलुस “हम” शब्द का प्रयोग कर रहा है, जो इससे पहले उसने प्रभु भोज से संबंधित इस खण्ड में कभी प्रयोग नहीं किए हैं। शब्द “हम” के प्रयोग के द्वारा, पौलुस अपने आप को भी उनमें सम्मिलित कर लेता है जिन्हें यह करना है; इसलिए जब भी पौलुस प्रभु भोज में भाग लेता था, अपने आप को जाँचता था जिससे कि परमेश्वर को उसका न्याय न करना पड़े। पौलुसइस बात को भी स्पष्ट कर देता है कि जब बात इस सीमा तक आ जाती है कि परमेश्वर को किसी को जाँचना और न्याय करना पड़ता है, अभी यहाँ पर प्रभु भोज में भाग लेने वाले लोग, तो फिर अपने बच्चों को सुधारने के लिए वह वह आवश्यकता के अनुसार अपने बच्चों की ताड़ना भी करेगा। 


परमेश्वर के गुणों में उसके दयालु, अनुग्रहकारी, और धीराजवन्त होना भी हैं (निर्गमन 34:6-7; 2 पतरस 3:9)। मनुष्य परमेश्वर की उत्कृष्ट सृष्टि है, उसे परमेश्वर नए अपने हाथों से बनाया और स्वयं उसमें जीवन का श्वास फूँका (उत्पत्ति 2:7)। इसलिए, परमेश्वर मनुष्य से बहुत प्रेम करता है, उसे नाश होते हुए नहीं देखना चाहता है, मनुष्य को बचाने और अपने पास लौटा कर लाने, बहाल करने के लिए जो भी चाहिए था, परमेश्वर ने वह सब उसके लिए किया है। आदान की वाटिका में जब पहला पाप हुआ, तब परमेश्वर ने आदम और हव्वा को तुरन्त ही दण्ड नहीं दिया, परंतु अवसर दियाकि वे अपने एप को मान लें, उसके लिए पश्चाताप करें, उससे क्षमा माँग लें। लेकिन उन्होंने इस अवसर को व्यर्थ कर दिया, वे एक-दूसरे पर ही दोष लगाते रह गए, और फिर उन्हें पाप के लिए परमेश्वर की ताड़ना को सहना पड़ा। तब से लेकर आज तक, परमेश्वर के लोगों का इतिहास, इस्राएल का इतिहास, अनेकों उदाहरणों और घटनाओं से भरा पड़ा है कि जब परमेश्वर ने उन्हें उनके पापों के विषय चिताया, और धैर्य के साथ उनके पापों के लिए पश्चाताप करने की प्रतीक्षा करता रहा, और आवश्यक होने पर अलग-अलग प्रकार से उनकी ताड़ना भी की जिससे कि वे अपने पापों के लिए पश्चाताप कर लें। इसकी तुलना में, सामान्यतः हम परमेश्वर को यही बात अन्य-जातियों के लिए करते हुए नहीं देखते हैं। 


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु की मेज़ में भाग लेते रहे हैं, तो कृपया अपने जीवन को जाँच कर देख लें कि आप वास्तव में पापों से छुड़ाए गए हैं तथा आप ने अपना जीवन प्रभु की आज्ञाकारिता में जीने के लिए उस को समर्पित किया है। आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को जानने के द्वारा एक परिपक्व विश्वासी बनें, तथा सभी शिक्षाओं को वचन की कसौटी पर परखने, और बेरिया के विश्वासियों के समान, लोगों की बातों को पहले वचन से जाँचने और उनकी सत्यता को निश्चित करने के बाद ही उनको स्वीकार करने और मानने वाले बनें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्यथा शैतान द्वारा छोड़े हुए झूठे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता मसीह के सेवक बन कर (2 कुरिन्थियों 11:13-15) अपनी ठग विद्या और चतुराई से आपको प्रभु के लिए अप्रभावी कर देंगे और आप के मसीही जीवन एवं आशीषों का नाश कर देंगे।

  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 41-42          

  • मत्ती 12:1-23     


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English Translation


The Lord’s Table - Judgment for Unworthy Participation (1)


In the earlier articles we had seen that Biblically, there are only two ways in which sin is dealt with by God - it is either forgiven, or else it is judged and punished. Both, forgiveness and judgment are by God, based on His criteria, through His method, all of which He has already given in His Word the Bible. In the previous article, while studying about the forgiveness of sins, we have seen that God is very concerned about His children, i.e., the Born-Again Christian Believers, and does not let them remain in their state of compromise with the world, in their wayward life. He wants them to genuinely confess their sins, and sincerely repent of them, so that He can forgive them. But if they persist in their sins, like a loving Father, He even chastens His wayward children. This chastening is a proof of not only God’s love for His children, but also of those being chastened, being the children of God. God’s forgiveness is not based on any human recommendation, intervention, criteria, man-made process, or any person’s works. God, who knows the actual state of the hearts of everyone, takes His own decisions, on basis of His own standards. We had concluded the last article with the caution that those who claim to be the people of God, His Believers, but receive no chastening from the Lord despite persisting in their wayward and worldly life, they should beware, closely evaluate, and correct themselves, since not being chastened by God is a Biblical indicator of their not actually being the children of God, His people. Today, we will begin to study about the second way that God deals with sin, judgment for sin.


Coming towards the conclusion of this section on the Holy Communion and worthily participating in it, the Apostle Paul, under the guidance of the Holy Spirit, after teaching about the necessity of a Believer to examine himself, confess and repent of his specific sins, ask for the Lord’s forgiveness for them, and then worthily participate in the Holy Communion, in verse 31-32 talks about judgment for sins. There are two stages of judgment mentioned here; the first is by the participant himself, and the second is by God. If the participant in the Lord’s Table does not properly examine himself and judge his sin, if his sin is not acknowledged, repented of, and forgiven, then it will be judged by God. Notice here in these two verses, Paul uses the word “we”, which he has not used so far in this section of the Holy Communion. Through the use of “we” Paul is including himself amongst those who have to do this; so, Paul too, whenever he participated in the Lord’s Table, examined himself, so that he is not judged by God. Paul also makes it clear that when it reaches to the point of God having to examine and judge a person, here, the people of God participating in the Holy Communion, then He will also chasten as required, to correct His children.


Amongst the characteristics of God are that He is merciful, gracious and longsuffering (Exodus 34:6-7; 2 Peter 3:9). Man was His supreme creation, made by His own hands, and brought to life by breathing the breath of life into him (Genesis 2:7). Therefore, God loves man, is not willing to see him perish, has done everything possible to save him, and restore him back to Him. In the Garden of Eden, when the first sin was committed, God did not straightaway punish Adam and Eve, but gave them the opportunity to confess their sin, repent and ask for His forgiveness. But they frittered away their opportunity by passing the blame from one to another, and had to suffer God’s chastening for sin. Since then, the history of God’s people, the history of Israel, is replete with numerous examples and instances where God warned them about their sins, patiently waited for them to correct themselves, and chastened them to varying degrees to get them to repent for their sins.

 

In comparison, generally speaking, we do not see God doing this for the Gentiles. There are instances of God warning the Gentiles too for their sins and asking them to repent, e.g., the books of Jonah, Obadiah, and Nahum, and Daniel warning King Nebuchadnezzar and his son King Belshazzar, etc. But the way and the number of times God has chastened and tried to correct His people, the Israelites, He has not done for the Gentiles. Which once again affirms what we had seen in the previous article that God’s chastening is a proof of His love for His children, and of those being chastened being the children of God; whereas those not being chastened by God despite their ungodly life, should beware, that whatever they may say or assume for themselves, they are actually not the children of God.


Here in 1 Corinthians 11:31, the Holy Spirit, through Paul is showing the escape route to the Christian Believers - God in His mercy, grace, and longsuffering, is giving an opportunity to the partakers in His Table to correct themselves and partake worthily. They, including Paul, should first judge themselves, and only then participate; by doing this, they will spare themselves God’s judging them. But again, this cannot be a superficial, insincere, meaningless, perfunctory exercise, meant more to fulfill the letter rather than the spirit of the Lord’s instructions. Again, take heed, no one can fool God; He decides on His own, by His own standards and methods, and not according to any man-made methods or criteria. Anyone trying to fool God on this will only compound his already sinful state, by adding another sin - of mocking God, to his already existing list.


In the next article we will see some more about God’s judgment and God’s dealing with His unrepentant people for their sin. If you are a Christian Believer and have been participating in the Lord’s Table, then please examine your life and make sure that you are actually a disciple of the Lord, i.e., are redeemed from your sins, have submitted and surrendered your life to the Lord Jesus to live in obedience to Him and His Word. You should also always, like the Berean Believers, first check and test all teachings that you receive from the Word of God, and only after ascertaining the truth and veracity of the teachings brought to you by men, should you accept and obey them (Acts 17:11; 1 Thessalonians 5:21). If you do not do this, the false apostles and prophets sent by Satan as ministers of Christ (2 Corinthians 11:13-15), will by their trickery, cunningness, and craftiness render you ineffective for the Lord and cause severe damage to your Christian life and your rewards.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours. 


Through the Bible in a Year: 

  • Genesis 41-42

  • Matthew 12:1-23



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