बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 20

 

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (4) - जाने को तैयार  

       जैसा हमने पिछले लेखों में मरकुस 3:13-15 से देखा है, प्रभु यीशु मसीह ने जब अपने बारह शिष्यों को चुना, तो उनके लिए तीन प्रयोजन भी रखे। इन तीन में से पहले प्रयोजन, शिष्य प्रभु के साथ बने रहने वाले हों के बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं। प्रभु के साथ बने रहना, हर बात में प्रभु की इच्छा जानना और हर बात के लिए प्रभु का आज्ञाकारी होना ही मसीही सेवकाई का आधार है। जैसे ही हम अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि के अनुसार काम करने लगते हैं, हम उत्पत्ति 3 में उल्लेखित घटना, हमारी आदि माता, हव्वा के समान स्थिति में आ जाते हैं, जब उसने अकेले ही शैतान की बातों को सुना, फिर परमेश्वर की आज्ञाकारिता में नहीं वरन अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार किया, और परिणामस्वरूप पाप को संसार और सृष्टि में प्रवेश मिल गया, जिसके परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। प्रभु हमें ऐसी स्थिति में पड़ने और शैतान द्वारा किसी भी बात में बहकाए और गिराए जाने से सुरक्षित रखना चाहता है, इसीलिए, अपने अनुयायियों के लिए प्रभु का पहला प्रयोजन है कि वे हर समय और हर बात के लिए प्रभु के साथ बने रहने को अपनी आदत, अपने जीवन की एक स्वाभाविक क्रिया बना लें।

       मरकुस 3:14 के अंतिम वाक्य में दिया गया अपने शिष्यों के लिए प्रभु का दूसरा प्रयोजन है कि, “वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करेंहम पहले देख चुके हैं कि इस दूसरे प्रयोजन के तीन भाग हैं:

  • वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें (पद 14)
    • भेजे जाने को तैयार हों
    • जहाँ और जब प्रभु कहे वहाँ और तब जाएं 
    • प्रभु के कहे के अनुसार प्रचार करने को तैयार हों

       जो कोई भी प्रभु का शिष्य बने, स्वेच्छा से अपने जीवन में उसके प्रभुत्व को स्वीकार करे, हर समय और हर बात के लिए प्रभु का आज्ञाकारी बने रहने का निर्णय ले, उसे उपरोक्त तीन बातों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। 

       सबसे पहली बात है भेजे जाने के लिए हर समय तैयार रहे। ऐसा न हो कि कहीं जाने के लिए जब प्रभु का बुलावा आए तो वह अपनी किसी बात या व्यस्तता के कारण प्रभु के कहे अनुसार जाने के लिए अपनी असमर्थता व्यक्त करे। जब प्रभु ने मत्ती को अपना शिष्य होने के लिए बुलाया तब वह अपने कार्य-स्थल में बैठा अपनी नौकरी का कार्य कर रहा था। प्रभु के आह्वान पर उसने तुरंत सब कुछ छोड़ दिया और प्रभु के पीछे हो लियावहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठ कर उसके पीछे हो लिया” (मत्ती 9:9)। इसी प्रकार से पतरस, अन्द्रियास, याकूब और यूहन्ना का भी प्रभु के आह्वान पर तुरंत उसके पीछे हो लेना था (मत्ती 4:18-22)। प्रभु द्वारा निर्धारित कार्य के प्रति भी शिष्यों का यही रवैया होना चाहिए। अपनी समझ से असंभव या कठिन लगने वाली बात के लिए भी प्रभु के कहे के अनुसार करने की प्रतिबद्धता। 

पकड़वाए जाने से पहले जब प्रभु ने यरूशलेम में प्रवेश करना था, तो अपने लिए एक गदही के बच्चे को मँगवाया, और शिष्यों से कहा कि अमुक स्थान पर वह बंधा हुआ मिल जाएगा, जाकर ले आओ; और यदि कोई पूछे तो कह देना कि प्रभु को इसका प्रयोजन हैकि अपने सामने के गांव में जाओ, वहां पहुंचते ही एक गदही बन्‍धी हुई, और उसके साथ बच्चा तुम्हें मिलेगा; उन्हें खोल कर, मेरे पास ले आओ। यदि तुम में से कोई कुछ कहे, तो कहो, कि प्रभु को इन का प्रयोजन है: तब वह तुरन्त उन्हें भेज देगा” (मत्ती 21:2-3); यह सुनने और समझने में असंभव सी बात लगती है, किन्तु हुआ वही जैसा प्रभु ने कहा था। अपने अंतिम भोज के लिए भी शिष्य फसह के भोज की तैयारी के विषय उससे पूछ रहे थे, परंतु प्रभु ने उन्हें पहले से तैयार स्थान के बारे में बताया और वहीं वह फसह का भोज भी खाया (मरकुस 14:12-16)। प्रभु ने जब स्वर्गदूत द्वारा फिलिप्पुस को कहा कि जंगल के एक मार्ग में जा, तो वह बिना किसी प्रश्न अथवा शंका के तुरंत चला गया, और कूश देश में प्रभु का वचन पहुँच गया (प्रेरितों 8:26-39)। अब्राहम से जब प्रभु ने कहा कि अपने देश और लोगों को छोड़कर उस स्थान को जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा, तो बिना कोई और विवरण पूछे वह परमेश्वर के कहे के अनुसार चल दियाविश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं; तौभी निकल गया” (इब्रानियों 11:8)

वचन में प्रभु के लोगों के प्रभु के कहे के अनुसार निकल पड़ने के अनेकों उदाहरण हैं। यह उनके जीवनों में प्रभु परमेश्वर का सर्वोपरि एवं प्राथमिक स्थान होने का सूचक है। प्रभु को सामर्थी, या कुशल एवं योग्य, या ज्ञानवान लोग नहीं चाहिएं। उसने तो जगत के निर्बलों, मूर्खों, और तुच्‍छों को अपने कार्य के लिए चुना है; वह ऐसों ही में होकर संसार के लोगों को अपनी सामर्थ्य को दिखाता हैहे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए। परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे” (1 कुरिन्थियों 1:26-27)। प्रभु को अपने प्रति समर्पित और आज्ञाकारी लोग चाहिएं, जो बिना प्रश्न किए, जो इस पूरे भरोसे के साथ जाकर प्रभु के कहे को करने के लिए तैयार हों, कि यदि प्रभु ने कहा और भेजा है तो फिर इसके लिए जो कुछ आवश्यक है उसे तैयार भी करके रखा है। किन्तु जो प्रभु के प्रति ऐसा समर्पण नहीं रखते हैं, वे प्रभु के लिए उपयोगी नहीं हो सकते हैंउसने दूसरे से कहा, मेरे पीछे हो ले; उसने कहा; हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं। उसने उस से कहा, मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे, पर तू जा कर परमेश्वर के राज्य की कथा सुना। एक और ने भी कहा; हे प्रभु, मैं तेरे पीछे हो लूंगा; पर पहिले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं। यीशु ने उस से कहा; जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं” (लूका 9:59-62)

आज प्रभु यीशु के प्रति आपकी स्थिति क्या है? पहला प्रश्न, क्या आपने प्रभु की शिष्यता को स्वीकार किया है? यदि नहीं, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी अपना निर्णय कर लीजिए। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

अब दूसरा प्रश्न, यदि आपने प्रभु यीशु का शिष्य होने का निर्णय ले लिया है तो उसके प्रति समर्पण, आज्ञाकारिता, और प्रतिबद्धता में आपकी स्थिति क्या है? प्रभु का जन बनना एक बात है किन्तु उसके लिए उपयोगी होना ही इस बात की पहचान है कि व्यक्ति का प्रभु की शिष्यता स्वीकार करने का उसका दावा सच्चा है कि नहीं। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो क्या आप जहाँ और जब प्रभु भेजे वहाँ पर और तब जाने के लिए भी तैयार हैं? “अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जांचो, क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो” (2 कुरिन्थियों 13:5) 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 59-61     
  • 2 थिस्सलुनीकियों 3

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 19


मसीही विश्वासी के प्रयोजन (3) 

       पिछले लेखों में हमने देखा है कि मसीही विश्वासी का जीवन प्रभु के लिए उपयोगी होने और प्रभु के लिए कार्यरत रहने में सक्रिय जीवन होता है। प्रभु का अपने सभी अनुयायियों के लिए कुछ-न-कुछ प्रयोजन है। प्रभु द्वारा प्रत्येक के लिए निर्धारित किए गए इन प्रयोजन तथा किसी के लिए निर्धारित अन्य किसी विशिष्ट प्रयोजन के अनुसार, उन्हें सक्षम करने और उस कार्य में सहायता प्रदान करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा ने सभी मसीही विश्वासियों को उचित आत्मिक वरदान भी प्रदान किए हैं, जिनके बारे में विवरण रोमियों 12 अध्याय, और 1 कुरिन्थियों 12 अध्याय में से पढ़ा जा सकता है। मरकुस 3:13-15 में हमने देखा कि प्रभु यीशु ने जब शिष्यों में से बारह प्रेरितों को चुना तो उनके लिए उसने तीन प्रयोजन निर्धारित किए। यही तीनों प्रयोजन सामान्यतः सभी मसीही विश्वासियों के लिए भी हैं; अर्थात प्रभु द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए निर्धारित किए गए किसी विशिष्ट कार्य का आधार यही तीन प्रयोजन हैं, और वह विशिष्ट कार्य इन्हीं तीनों के निर्वाह के द्वारा ही सफल और प्रभु को महिमा देने वाला होता है। 

कल हमने इन तीन में से पहले प्रयोजन - प्रभु के साथ-साथ रहने के बारे में देखना आरंभ किया था। निरंतर प्रभु के साथ बने रहना, और हर बात में, तथा हर बात के लिए प्रभु की इच्छा को जानकर कार्य करना ही मसीही विश्वासी की सही सेवकाई का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। जो प्रभु के साथ रहेगा, वही प्रभु के साथ घनिष्ठ संबंध में भी रहेगा; और जो प्रभु के साथ घनिष्ठ होगा उस पर ही प्रभु अपनी इच्छा प्रकट करेगा, और उसी का मार्गदर्शन करेगा। इससे वह जन यह भी पहचानने पाएगा कि उसकी अपनी तथा प्रभु की समझ, सोच-विचार, और बुद्धिमत्ता में कितना अंतर हैक्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है” (यशायाह 55:8-9)। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने अपने शिष्यों से कहा, “तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग हो कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली के समान फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं। यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा। मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे” (यूहन्ना 15:4-8)। यहाँ पर प्रभु द्वारा कही गई बात के प्रवाह और परिणाम पर ध्यान कीजिए। सच्चा शिष्य प्रभु में बना रहेगा, और उससे सामर्थ्य पाकर प्रभु के लिए फलवंत होगा, जो परमेश्वर की महिमा का कारण ठहरेगा, और उसके सच्चे शिष्य होने का प्रमाण भी। किन्तु जो प्रभु में बना नहीं रहता है, वह प्रभु के लिए फलवंत भी नहीं होता है, सूख जाता है, जो उसके प्रभु का सच्चा शिष्य नहीं होने का प्रमाण है, और उसे अलग हटाकर नाश कर दिया जाता है।  

यूहन्ना से लिए गए उपरोक्त उदाहरण में एक बहुत महत्वपूर्ण बात निहित है - जो प्रभु में बना रहेगा, वह स्वतः ही प्रभु द्वारा पोषित और विकसित भी होता रहेगा। कोई भी पौधा हर समय फल नहीं लाता है, किन्तु जो जीवन के जल से संबंध में रहेगा, वह कभी भी सूखेगा नहीं वरन अपने समय और अपनी ऋतु में फल भी लाएगावह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है। और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है” (भजन 1:3)। जो प्रभु में स्थापित रहता है, प्रभु के कहे के अनुसार करता है, प्रभु ही उसके कार्यों को सफल और फलवंत करता हैमैं ने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया। इसलिये न तो लगाने वाला कुछ है, और न सींचने वाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है” (1 कुरिन्थियों 3:6-7)। राजा सुलैमान ने कहा, “क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं” (नीतिवचन 2:6)। जब अपनी अक्षमता तथा प्रभु की सामर्थ्य और सक्षमता को ध्यान में रखते हुए मसीही विश्वासी प्रभु से अपने दायित्व के निर्वाह के लिए उपयुक्त बुद्धि एवं सामर्थ्य माँगता है, तो वह प्राप्त भी करता है। किन्तु जो प्रभु के निकट नहीं है, वह प्रभु और उसकी बातों और योजनाओं पर संदेह करेगा, प्रभु की कही गई बातों और दिए गए निर्देशों में अपने मन और समझ की बात मिलाना चाहेगा, और इसलिए प्रभु से कुछ प्राप्त नहीं कर सकेगा, जैसा कि याकूब ने लिखा है, “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी। पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा। वह व्यक्ति दुचित्ता है, और अपनी सारी बातों में चंचल है” (याकूब 1:5-8)

प्रभु के साथ यह घनिष्ठ संबंध प्रभु के वचन से प्रेम करने और उसके वचन में बने रहने से बनता है। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि यदि वे उसके वचन में बने रहेंगे, तो यही प्रभु के प्रति उनके प्रेम का प्रमाण होगा, और उससे वास्तविक प्रेम करने वाले के पास प्रभु और पिता परमेश्वर आएंगे, और उसके साथ रहेंगेजिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उस से प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूंगा। यीशु ने उसको उत्तर दिया, यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे” (यूहन्ना 14:21, 23)। इसलिए यदि आप अपना जीवन प्रभु यीशु मसीह के नाम में तो जी रहे हैं, किन्तु उसके साथ निरंतर एवं घनिष्ठ संबंध में स्थापित नहीं हैं, वरन अपनी अथवा अन्य मनुष्यों और मनुष्यों द्वारा बनाए गए मतों की ही सामर्थ्य, समझ, और शिक्षाओं अथवा युक्ति तथा योग्यता, के अनुसार जीते रहने का प्रयास करते रहें हैं, तो फिर आपको अपने जीवन में एक आमूल-चूल, एक मौलिक परिवर्तन करने की तात्कालिक आवश्यकता है। समय तथा अवसर के रहते आज ही, अभी ही, इस व्यर्थ एवं निष्फल धारणा एवं मान्यता से निकलकर प्रभु यीशु मसीह की वास्तविक शिष्यता में आ जाएं, और हर समय हर बात के लिए उसके साथ उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने को निभाना आरंभ कर लें। कहीं ऐसा न हो कि जब परलोक में आँख खुले तब पता लगे कि आप अपनी ही जिन धारणाओं और मान्यताओं का सारे जीवन बड़ी निष्ठा से निर्वाह करते रहे उससे आपको कोई लाभ नहीं हुआ है, और अब उस गलती को सुधारने का कोई अवसर पास नहीं है; अब तो केवल अनन्तकाल का दण्ड ही मिलेगा। 

किन्तु यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 56-58     
  • 2 थिस्सलुनीकियों 2

सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता – 18


मसीही विश्वासी के प्रयोजन (2) 

पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर का कोई कार्य कभी निरुद्देश्य नहीं होता है। वह स्वयं कार्यरत है, और अपने अनुयायियों से भी अपेक्षा करता है कि वे उसके लिए कार्यरत रहें। उसने अपने शिष्यों को उद्धार और मसीही विश्वास का जीवन व्यर्थ गँवाने और निठल्ले बैठने, औरों पर निर्भर होकर रहने के लिए नहीं दिया है। वरन, परमेश्वर ने प्रत्येक उद्धार पाए हुए व्यक्ति के लिए कुछ कार्य पहले से निर्धारित किए हैं (इफिसियों 2:10)। वह चाहता है कि प्रत्येक जन अपने उन दायित्वों को पूरे यत्न के साथ पूरा करे, जिसके लिए उसने अपने शिष्यों को उपयुक्त वरदान भी प्रदान किए हैंऔर जब कि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिस को भविष्यवाणी का दान मिला हो, वह विश्वास के परिमाण के अनुसार भविष्यवाणी करे। यदि सेवा करने का दान मिला हो, तो सेवा में लगा रहे, यदि कोई सिखाने वाला हो, तो सिखाने में लगा रहे। जो उपदेशक हो, वह उपदेश देने में लगा रहे; दान देनेवाला उदारता से दे, जो अगुआई करे, वह उत्साह से करे, जो दया करे, वह हर्ष से करे” (रोमियों 12:6-8); और प्रभु के लिए कार्यरत रहने में आलसी न हो, “प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरो रहो; प्रभु की सेवा करते रहो” (रोमियों 12:11)

हमने मरकुस 3:13-15 यह भी देखा था कि प्रभु ने जब अपने बारह शिष्य, जिन्हें प्रेरित कहा, नियुक्त किए, तो उनके लिए प्रभु के तीन प्रयोजन थे। प्रभु द्वारा दिए गए क्रम के अनुसार इन तीन प्रयोजनों में से पहला था कि वे शिष्य उसके साथ साथ रहें (मरकुस 3:14)। आज हम इस पहले प्रयोजन, प्रभु के साथ रहने, के बारे कुछ विस्तार से देखेंगे, और आते दिनों में शेष प्रयोजनों का अभी अध्ययन करेंगे।

हम पाप और उद्धार से संबंधित लेखों में देख चुके हैं कि पाप के साथ ही मृत्यु ने भी सृष्टि और मानव जीवन में प्रवेश किया। मृत्यु एक ऐसे और स्थाई अलगाव हो जाने को दिखाती है जो मानवीय सामर्थ्य एवं योग्यता से पूर्णतः अपरिवर्तनीय है। यह मृत्यु दो प्रकार से थी - आत्मिक, और शारीरिक। मनुष्य की आत्मिक मृत्यु के कारण वह तुरंत ही परमेश्वर की संगति से दूर हो गया; और शारीरिक मृत्यु के कारण वह मरनहार बन गया। जन्म लेते ही मनुष्य मरना आरंभ कर देता है, और अन्ततः एक समय पर आकर उसका शरीर भी क्षय हो जाता है। प्रभु यीशु ने संसार के सभी लोगों के पापों को अपने ऊपर लेकर, उनकी इस मृत्यु को सभी के लिए सह लिया, और अपने कलवरी के क्रूस पर मारे जाने, गाड़े जाने, और तीसरे दिन मृतकों में से पुनरुत्थान के द्वारा समस्त मानव जाति के हर जन के लिए न केवल पापों की क्षमा और उद्धार का मार्ग बनाकर उपलब्ध करवा दिया वरन उनके लिए मृत्यु को पराजित कर दिया। प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाते और उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता ग्रहण करते ही व्यक्ति का परमेश्वर से मेल-मिलाप हो जाता हैक्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?” (रोमियों 5:10); अर्थात आत्मिक मृत्यु या परमेश्वर से पृथक हो जाने का निवारण हो जाता है। साथ ही हम मसीही विश्वासियों के लिए परमेश्वर की यह भी प्रतिज्ञा है कि हमारे पुनरुत्थान के समय अथवा प्रभु के दूसरे आगमन के समय हमारे मरनहार शरीर पल भर में प्रभु के अविनाशी शरीर के समान हो जाएंगेदेखे, मैं तुम से भेद की बात कहता हूं: कि हम सब तो नहीं सोएंगे, परन्तु सब बदल जाएंगे। और यह क्षण भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूंकते ही होगा: क्योंकि तुरही फूंकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएंगे, और हम बदल जाएंगे” (1 कुरिन्थियों 15:51-52); अर्थात शारीरिक मृत्यु का अभी निवारण तो किया जा चुका है, बस उसका कार्यान्वित किया जाना शेष है, जो प्रभु के निर्धारित समय पर हो जाएगा।

निष्कर्ष यह कि मसीही विश्वास में प्रवेश करते ही, मसीही विश्वासी की परमेश्वर के साथ संगति बहाल हो जाती है। प्रभु की यह कदापि इच्छा नहीं है कि यह संगति फिर से कभी टूटे। इसीलिए वह चाहता है कि उसका प्रत्येक शिष्य, हर अनुयायी उसके साथ ही बना रहे। जब तक हम प्रभु के साथ बने रहेंगे, शैतान द्वारा हानि पहुंचाए जाने से सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि शैतान प्रभु द्वारा उसके लोगों के चारों ओर बनाए गए बाड़े को लांघ नहीं सकता है, प्रभु द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक प्रभु के जन को छू नहीं सकता हैशैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बान्धा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, ​और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुंह पर तेरी निन्दा करेगा। यहोवा ने शैतान से कहा, सुन, जो कुछ उसका है, वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना। तब शैतान यहोवा के सामने से चला गया” (अय्यूब 1:9-12)। किन्तु जो इस बाड़े को लाँघेगा, शैतान उसे डस लेगाजो गड़हा खोदे वह उस में गिरेगा और जो बाड़ा तोड़े उसको सर्प डसेगा” (सभोपदेशक 10:8)। और प्रभु अपने हर जन को शैतान की युक्तियों से सुरक्षित रखना चाहता है। इसीलिए प्रभु चाहता है कि उसके शिष्य उसके साथ ही रहें। इसीलिए प्रभु ने हमें आश्वासन दिया हैतुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है: और परमेश्वर सच्चा है: वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)  

प्रभु के साथ बने रहने के और भी लाभ हैं। प्रभु ने कहा हैहे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है” (मत्ती 11:28-30)जुआया yoke वह उपकरण होता है जो किसान दो बैलों के द्वारा खेत जोतने के लिए प्रयोग करते हैं; जिसके अगले सिरे पर दो बैलों को साथ जोता जाता है और पिछला सिरे के निचले भाग में हल होता है और ऊपरी भाग किसान के हाथ में नियंत्रण के लिए रहता है। मत्ती 11:28-30 के इस आह्वान के साथ प्रभु अपने विश्वासी जन के साथ, सांसारिकता के भारी जुए के स्थान पर अपने हल्के जुए में होकर जुतना चाह रहा है कि उसके साथ मिलकर, उसकी सहायता करते हुए उसके जीवन भर चल सके। जो प्रभु के साथ जुता रहेगा, वह प्रभु से जीवन की हर बात के लिए शांति, मार्गदर्शन, समाधान, और सहायता भी पाता रहेगा। समस्या तब ही होगी जब मसीही विश्वासी या तो प्रभु के हलके जुए को उतार कर फिर से सांसारिकता के उस भारी जुए में जाकर जुत जाए, जिसमें प्रभु उसके साथ नहीं जुत सकता है, या फिर प्रभु को साथ लिए बिना अकेला ही जुए में लगकर अपनी ही शक्ति और युक्ति से कार्य करने का प्रयास करे।

इसीलिए प्रभु ने अपने शिष्यों से कहातुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग हो कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:4-5)। जब तक हम प्रभु के साथ जुड़े रहेंगे, प्रभु से जीवनदायक सामर्थ्य, बुद्धि और समझ पाते रहेंगे, और उसके कार्यों को भली-भांति करते रहेंगे। जैसे ही हम अपनी सामर्थ्य, बुद्धि और समझ का सहारा लेंगे, अपनी योग्यता पर भरोसा रखने लगेंगे, प्रभु के कहे के अनुसार नहीं, वरन अपनी समझ और इच्छा अथवा किसी अन्य मनुष्य के कहे के अनुसार करने लगेंगे, तभी हम कठिनाइयों और समस्याओं में पड़ने लगेंगे, और हमें हताशाओं तथा कुंठित होने का सामना करना पड़ेगा। प्रभु की अगुवाई में, इस्राएलियों के लाल समुद्र पार करने के समान (निर्गमन 14 अध्याय), असंभव प्रतीत होने वाली बात भी संभव और सहज हो जाएगी; और बिना प्रभु की अगुवाई तथा सहायता के सरल और साधारण लगने वाली बात भी भारी पराजय बन जाएगी, जैसे यहोशू 7 अध्याय में इस्राएलियों के ऐ नगर में पराजय।

नए अथवा पुराने नियम के किसी भी परमेश्वर के जन या भविष्यद्वक्ता, या प्रेरित के जीवन और कार्यों को देख लें; सभी में आपको यही बात मिलेगी - जब तक वे प्रभु की अगुवाई में, प्रभु के कहे के अनुसार, प्रभु की सामर्थ्य और समझ के सहारे कार्य करते रहे, वे हमेशा ही हर परिस्थिति में हर बात पर जयवंत ही रहे; किन्तु जब भी उन्होंने अपनी या किसी अन्य मनुष्य की इच्छा या सलाह के अनुसार कार्य किया, उन्हें अन्ततः पराजय और समस्याएं ही हाथ लगीं, उनके सभी कार्य, सभी योग्यताएं और युक्तियाँ विफल हो गए, कुछ स्थाई और फलदायी नहीं रहा। प्रभु ने हमारी अगुवाई करते रहने की प्रतिज्ञा की हैमैं तुझे बुद्धि दूंगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूंगा; मैं तुझ पर कृपा दृष्टि रखूंगा और सम्मत्ति दिया करूंगा” (भजन 32:8)  इसीलिए प्रभु अपने शिष्यों से चाहता है कि वे सब से पहले उसके साथ बने रहने के पाठ को सीखें, और अपनी समझ का सहारा न लें, तब ही शिष्यों के मार्ग सफल होंगे “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण कर के सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा” (नीतिवचन 3:5-6)। उसके साथ-साथ, धैर्य और विश्वास के साथ चलते रहें - न उससे आगे भागने का प्रयास करें और न आलसी होकर उससे पीछे रह जाएं। प्रभु के लिए उपयोगी और आशीषित होने के लिए मसीही विश्वासी को सबसे पहले उसके साथ बने रहने, और प्रभु को निर्देश देने की बजाए प्रभु के कहे के अनुसार करते रहने वाला बनना है। तब ही वह विश्वासी अपने मसीही जीवन में आगे बढ़ने और कार्यकारी तथा परिपक्व होने पाएगा। 

इसलिए यदि आप अभी तक अपना जीवन प्रभु यीशु मसीह के नाम में, किन्तु अपनी अथवा अन्य मनुष्यों की ही सामर्थ्य, समझ, और शिक्षाओं अथवा युक्ति तथा योग्यता, के अनुसार जीते रहने का प्रयास करते रहें हैं, तो फिर आपको अपने जीवन में एक आमूल-चूल, एक मौलिक परिवर्तन करने की तात्कालिक आवश्यकता है। समय तथा अवसर के रहते आज ही, अभी ही, इस व्यर्थ एवं निष्फल धारणा एवं मान्यता से निकलकर प्रभु यीशु मसीह की वास्तविक शिष्यता में आ जाएं, और हर समय हर बात के लिए उसके साथ उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने को निभाना आरंभ कर लें। कहीं ऐसा न हो कि जब परलोक में आँख खुले तब पता लगे कि आप अपनी ही जिन धारणाओं और मान्यताओं का सारे जीवन बड़ी निष्ठा से निर्वाह करते रहे उससे आपको कोई लाभ नहीं हुआ है, और अब उस गलती को सुधारने का कोई अवसर पास नहीं है; अब तो केवल अनन्तकाल का दण्ड ही मिलेगा। यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 53-54     
  • 2 थिस्सलुनीकियों 1  

रविवार, 17 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 17

 

मसीही विश्वासी के प्रयोजन (1) 

हमने पिछले लेखों में देखा है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार प्रभु यीशु का अनुयायी होना किसी धर्म का निर्वाह करना नहीं है; और न ही यह वंशागत - किसी परिवार विशेष में जन्म ले लेने के द्वारा स्वाभाविक रीति से और स्वतः ही प्राप्त हो जाने वाला कोई विशेषाधिकार है। न तो प्रभु यीशु मसीह ने कभी कोई धर्म बनाया; न कभी अपने नाम से किसी धर्म के बनाए जाने की शिक्षा अथवा निर्देश दिए; न ही कभी लोगों के धर्म परिवर्तन करने के लिए कहा; और न ही कभी ऐसा कोई आश्वासन अथवा ऐसी कोई प्रतिज्ञा दी कि जो उसके अनुयायी हो जाएंगे, उनकी संतान और भावी पीढ़ियाँ भी स्वतः ही यह विशेषाधिकार प्राप्त करती चली जाएंगी। जिसे भी मसीह यीशु का अनुयायी होना है, उसे व्यक्तिगत रीति से, स्वेच्छा तथा सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु मसीह से अपने पापों की क्षमा माँगकर, पापों की क्षमा के लिए प्रभु यीशु द्वारा कलवरी के क्रूस पर दिए गए बलिदान - उनके मारे जाने, गाड़े जाने और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठाने को स्वीकार करना होगा, और यीशु को प्रभु मानकर अपने आप को उन्हें समर्पित कर देना होगा; इसे ही उद्धार या नया जन्म प्राप्त करना कहते हैं, जिसके बिना कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तो दूर, उसे देख भी नहीं सकता है (यूहन्ना 3:3, 5, 7)। यह उस व्यक्ति के मसीही जीवन का आरंभ है, इस विशिष्ट जीवन यात्रा में उठाया गया पहला कदम है। इस बिन्दु से लेकर फिर उसके शेष जीवन भर वह प्रभु यीशु के वचन और आज्ञाकारिता से सीखता रहता है, प्रभु तथा उस व्यक्ति में निवास करने वाले पवित्र आत्मा के चलाए चलता रहता है, और प्रभु उसे अंश-अंश करके अपने स्वरूप में बदलता चला जाता है (2 कुरिन्थियों 3:18)।

प्रभु यीशु मसीह ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में अपने पीछे चलने वाले लोगों की भीड़ में से बारह लोगों को चुना, जिन्हें उसने प्रेरित कहा (लूका 6:13)। प्रभु ने भविष्य में सारे संसार भर में जाकर प्रभु में उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार के प्रचार और प्रसार करने का दायित्व इन्हीं को सौंपा, और इस महान एवं महत्वपूर्ण कार्य के लिए इन्हें लगभग साढ़े-तीन वर्ष तक प्रशिक्षित किया। यहूदा इस्करियोती के अलग हो जाने के बाद इस सेवकाई में आगे चलकर पौलुस को जोड़ दिया गया, उसे भी प्रेरित कहा गया। जब प्रभु ने उन बारह शिष्यों को चुना था, तो उनके लिए प्रभु यीशु का एक विशेष प्रयोजन था, जिसके अंतर्गत वह उन्हें उनकी सेवकाई और कार्य के लिए, तथा उसके गवाह होने के लिए तैयार करने जा रहा था। उसके इस प्रयोजन को हम मरकुस 3:13-15 में देखते हैं:फिर वह पहाड़ पर चढ़ गया, और जिन्हें वह चाहता था उन्हें अपने पास बुलाया; और वे उसके पास चले आए। तब उसने बारह पुरुषों को नियुक्त किया, कि वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें। और दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखेंमरकुस के इस खंड में प्रभु ने तीन प्रयोजन अपने शिष्यों के लिए रखे हैं; और वे जिस क्रम में रखे हैं, वह भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम देखते हैं कि क्रम के पहले से तीसरे को बढ़ते जाने तक, परिपक्वता में बढ़ने के साथ, दायित्व एवं कौशल भी बढ़ता जाता है। पद 14 और 15 में दिए गए ये तीन प्रयोजन हैं:

1.   वे उसके साथ साथ रहें (पद 14)

2.   वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें (पद 14)

2.1. भेजे जाने को तैयार हों

2.2. जहाँ और जब प्रभु कहे वहाँ और तब जाएं 

2.3. प्रभु के कहे के अनुसार प्रचार करने को तैयार हों 

3.   दुष्टात्माओं के निकालने का अधिकार रखें (पद 15)

 

       यह हमारे प्रभु परमेश्वर के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य भी प्रकट करता है - परमेश्वर का कोई कार्य, कोई बात निरुद्देश्य नहीं होती है। जैसा प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि सृष्टि करने के हजारों वर्ष बाद भी जिस प्रकार परमेश्वर अभी भी कार्य कर रहा है, उसी प्रकार प्रभु यीशु भी काम में लगा हुआ हैइस पर यीशु ने उन से कहा, कि मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूं” (यूहन्ना 5:17); और हम देख चुके हैं कि प्रभु आज भी हमारे सहायक के रूप में कार्य कर रहा है “हे मेरे बालकों, मैं ये बातें तुम्हें इसलिये लिखता हूं, कि तुम पाप न करो; और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात धार्मिक यीशु मसीह” (1 यूहन्ना 2:1), और हमारे लिए स्थान भी तैयार कर रहा हैमेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं” (यूहन्ना 14:2)। इसी प्रकार से प्रभु परमेश्वर ने प्रत्येक मसीही विश्वासी के करने के लिए भी पहले ही से कुछ-न-कुछ कार्य निर्धारित कर के रखा हुए हैंक्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)। अर्थात मसीही विश्वासी होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति परिश्रम न करे, और केवल परमेश्वर या मण्डली से ही अपेक्षा रखे कि उनके द्वारा उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे। 

       प्रेरित पौलुस ने अपने जीवन के उदाहरण से दिखाया कि वह परिश्रम करके अपनी आजीविका कमाता था जिससे वह किसी पर भी बोझ न हो, और मसीही सेवकाई में भी लगा रहता था और अपने ही हाथों से काम कर के परिश्रम करते हैं। लोग बुरा कहते हैं, हम आशीष देते हैं; वे सताते हैं, हम सहते हैं(1 कुरिन्थियों 4:12); “क्योंकि, हे भाइयों, तुम हमारे परिश्रम और कष्ट को स्मरण रखते हो, कि हम ने इसलिये रात दिन काम धन्‍धा करते हुए तुम में परमेश्वर का सुसमाचार प्रचार किया, कि तुम में से किसी पर भार न हों(1 थिस्स्लुनीकियों 2:9); “और किसी की रोटी सेंत में न खाई; पर परिश्रम और कष्ट से रात दिन काम धन्‍धा करते थे, कि तुम में से किसी पर भार न हो(2 थिस्स्लुनीकियों 3:8); अपनी उस कमाई से औरों की सहायता भी करता था परन्तु जिस तरह माता अपने बालकों का पालन-पोषण करती है, वैसे ही हम ने भी तुम्हारे बीच में रह कर कोमलता दिखाई है(1 थिस्स्लुनीकियों 2:7);मैं तुम्हारी आत्माओं के लिये बहुत आनन्द से खर्च करूंगा, वरन आप भी खर्च हो जाऊंगा...(2 कुरिन्थियों 12:15)। उसने ऐसा ही करने की शिक्षा मसीही विश्वासियों को भी दी और जैसी हम ने तुम्हें आज्ञा दी, वैसे ही चुपचाप रहने और अपना अपना काम काज करने, और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो(1 थिस्स्लुनीकियों 4:11); और यहाँ तक भी कहा कि और जब हम तुम्हारे यहां थे, तब भी यह आज्ञा तुम्हें देते थे, कि यदि कोई काम करना न चाहे, तो खाने भी न पाए(2 थिस्स्लुनीकियों 3:10)

       मसीह यीशु के शिष्यों के लिए संदेश और निर्देश स्पष्ट है - परमेश्वर पिता के समान प्रभु यीशु भी कार्य करता रहा; प्रभु ने शिष्यों को चुना और उनके लिए भी प्रयोजन रखे; और भावी मसीही शिष्यों के लिए भी यही शिक्षा और निर्देश दिए कि मसीही सेवकाई में संलग्न होने पर भी वे औरों पर बोझ न बने, परंतु अपने ही परिश्रम से अपना जीवन यापन करें, तथा औरों की भी सहायता करें। मसीही विश्वासी होने का अर्थ औरों पर निर्भर होकर अपना घर चलाना नहीं है, वरन प्रभु के लिए उपयोगी बनकर प्रभु के घर के लिए कार्य करना है। प्रभु यीशु के शिष्यों के लिए प्रभु के उपरोक्त तीनों प्रयोजनों के बारे में हम आगे देखेंगे। किन्तु अभी, हम सभी के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षाओं के आधार पर भली-भांति जाँच-परख कर, प्रभु यीशु द्वारा सिखाए गए सच्चे मसीही विश्वास की सच्चाइयों तथा हमारे जीवनों के लिए प्रभु परमेश्वर के प्रयोजनों का पालन करना अनिवार्य है, न कि शैतान द्वारा मसीह यीशु के नाम से बनाए और फैलाए गए भ्रम में फँसे रहने का। 

इसलिए समय तथा अवसर के रहते आज ही, अभी ही, धर्म-कर्म-रस्म की व्यर्थ धारणा एवं मान्यता से निकलकर प्रभु यीशु मसीह की वास्तविक शिष्यता में आना और उसे निभाना अनिवार्य है। कहीं ऐसा न हो कि जब परलोक में आँख खुले तब पता लगे कि जिस धर्म का सारे जीवन बड़ी निष्ठा से निर्वाह करते रहे उससे कोई लाभ नहीं हुआ, और अब उस गलती को सुधारने का कोई अवसर पास नहीं है; अब तो केवल अनन्तकाल का दण्ड ही मिलेगा। यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 50-52     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 5

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 16


मसीही विश्वास या ईसाई धर्म?

       पिछले लेखों में हमने देखा है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, प्रभु यीशु का अनुयायी होना किसी धर्म का पालन करना नहीं है, वरन स्वेच्छा और सच्चे एवं पूर्णतः समर्पित मन से प्रभु यीशु मसीह का आज्ञाकारी शिष्य बनना स्वीकार करना है, और फिर उन का अनुसरण करते हुए जैसा वे कहें और सिखाएं, वैसा जीवन जीना है। हमने प्रेरितों 9:2; 19:9, 23; 22:4, 24:14, 22 से देखा था कि प्रभु यीशु मसीह के आरंभिक अनुयायी किसी विशेष नाम से नहीं जाने जाते थे, वरन लोगों द्वारा उन्हेंपंथयामतके लोग कहा जाता था, न कि किसी धर्म के मानने वाले। फिर प्रेरितों 11:26 से हमने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों को पहली बार अंताकिया मेंमसीहीकहा गया; और वहाँ से यह नाम उनके साथ जुड़ गया। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार मसीही विश्वासी होना प्रभु यीशु मसीह का शिष्य होना है, और एक विशिष्ट जीवन शैली के अनुसार जीना है; न कि किसी धर्म और उसके रीति रिवाजों और नियमों का पालन करना। साथ ही इस तथ्य में यह भी निहित है कि कोई भी किसी का शिष्य बनकर कभी जन्म नहीं लेता है; हर कोई स्वेच्छा से, अपनी समझ-बूझ के अनुसार अपना व्यक्तिगत निर्णय लेने से ही किसी का शिष्य बनता है। इसी प्रकार, संसार की सामान्य धारणा के विपरीत, किसी भी परिवार विशेष में जन्म ले लेने से कोई मसीही नहीं हो जाता है। वरन हर किसी को अपने पापों से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु द्वारा कलवरी के क्रूस पर समस्त संसार के सभी लोगों के पापों के लिए दिए गए बलिदान, और उनके मृतकों में से पुनरुत्थान को स्वीकार करते हुए, प्रभु यीशु से अपने पापों की क्षमा माँगकर, उसे अपना उद्धारकर्ता और प्रभु स्वीकार करना होता है, अपना जीवन स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से उसे समर्पित करना होता है। इसे ही उद्धार या नया जन्म पाना कहते हैं - नश्वर सांसारिक जीवन से अविनाशी आत्मिक जीवन में परमेश्वर की संतान बनकर जन्म लेना (यूहन्ना 1:12-13); और इसके बिना कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना तो दूर, उसे देख भी नहीं सकता है (यूहन्ना 3:3, 5, 7)। मसीही विश्वासी होना कोई धर्म परिवर्तन करना नहीं है, वरन यह व्यक्ति के मन का परमेश्वर की ओर परिवर्तन है।

प्रेरितों 2 अध्याय में प्रभु यीशु के शिष्य, पतरस के द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अगुवाई में यरूशलेम में परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार पर्व और बलिदानों के निर्वाह के लिए संसार भर से एकत्रित हुएभक्त यहूदियों” (प्रेरितों 2:5) के मध्य किया गया वह प्रचार दर्ज है जिसके फल स्वरूप प्रभु यीशु के अनुयायियों की पहली मण्डली ने जन्म लिया। इस पूरे प्रचार में हम कहीं भी किसी धर्म परिवर्तन की बात नहीं देखते हैं - किसी से नहीं कहा गया कि वह अपना यहूदी या कोई अन्य धर्म छोड़कर ईसाई धर्म में आ जाए। वरन सभी से मन फिराव अर्थात पापों से पश्चाताप करने के लिए कहा गया। पतरस ने उन्हें परमेश्वर को स्वीकार्य होने, उसकी दृष्टि मेंधर्मीठहरने के लिए अपने जीवनों सात व्यावहारिक बातों का समावेश करने के लिए कहा। प्रेरितों 2:38-42 में जिस क्रम में ये बातें दी गईं, उसी क्रम का पालन करते हुए, ये सात बातें हैं: (i) मन-फिराव अर्थात पापों से पश्चाताप करना, (ii) प्रभु यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लेना, (पद 38); (iii) अपने आप कोटेढ़ी जातिअर्थात भ्रष्ट और पतित संसार से पृथक रखना, (पद 40); (iv) प्रेरितों से शिक्षा पाना, अर्थात परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना, (v) अन्य मसीही विश्वासियों के साथ संगति रखना, (vi) रोटी तोड़ना अर्थात प्रभु भोज में सम्मिलित होना, (viii) प्रार्थना करते रहना (पद 42)। पद 42 यह भी बताता है कि उस आरंभिक मण्डली के लोग, इन अंतिम चार बातों मेंलौलीनरहते थे। दुर्भाग्यवश, मसीही विश्वास के इस मूल और वास्तविक स्वरूप को बिगाड़ कर, उसे मसीही या ईसाई धर्म बना देने वालों ने, और इस ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने इन सात बातों को एक रस्म पूर्ति की बात, एक औपचारिकता बना दिया है। और आरंभिक मसीही विश्वासियों की मण्डली के ये गुण अब लोगों के लिए धर्म-कर्म-रस्म के औपचारिक निर्वाह के बातें बन कर रह गए हैं।

शैतान की इस चाल ने मसीही विश्वास के नाम पर लोगों को इस औपचारिकता में फंसा कर परमेश्वर के वचन की वास्तविकता से दूर करके, उन्हें मसीही विश्वासी के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का - जिसका उल्लेख भी बाइबल में नहीं ही, मानने वाला कर दिया है। उनकी अपनी ही गढ़ी हुई धार्मिकता तथा उनके द्वारा अन्यजाति रीति-रिवाज़ों, त्यौहारों आदि का मसीह के नाम से मानना, मनाना, और सिखाना चाहे कितने ही लगन और उत्साह के साथ क्यों न हो, व्यर्थ है (मत्ती 15:9; यशायाह 1:14; गलातीयों 4:10-11)। ऐसे लोग परमेश्वर के नाम से और अपनी समझ के अनुसार परमेश्वर के लिए कुछ भी करें, वह सब निरर्थक एवं अनुपयोगी है, प्रभु परमेश्वर को पूर्णतः अस्वीकार्य है (मत्ती 7:21-23)। मसीही विश्वास का ईसाई धर्म बना देने की शैतान चाल का एक और व्यापक और दूरगामी दुष्प्रभाव है। अनुपात में, ईसाई धर्म के विभिन्न रूपों को मानने और मनाने वालों की तुलना में, सच्चे मसीही विश्वासियों की संख्या बहुत कम है; इसलिए संसार के सामने मसीह यीशु के अनुयायियों के रूप में अधिकांशतः वे ही लोग आते हैं जिनके जीवनों में न सच्चा पश्चाताप है और न वास्तविक परिवर्तन। वे अपने आप को मसीही तो कहते हैं, किन्तु उनके जीवन में मसीह की सच्ची शिष्यता के स्थान पर सांसारिकता और संसार की बातें ही दिखाई देती हैं। उनका यह पाखण्ड फिर संसार के लोगों के लिए ठोकर का कारण बनता है (रोमियों 2:21-24); इसलिए संसार के लोगों के मध्य मसीही विश्वास के प्रति एक अनुचित और बहुत गलत गवाही प्रसारित होती रहती है। जिसके कारण संसार के लोग सुसमाचार के सच्चे प्रचार, महत्व, और पालन पर भी संदेह करते हैं, उसे अस्वीकार करते हैं, और मसीह यीशु पर विश्वास करने, उद्धार पाने, तथा शैतान के जंजाल से निकल पाने से वंचित रह जाते हैं।

इसलिए परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षाओं के आधार पर भली-भांति जाँच-परख कर, प्रभु यीशु द्वारा सिखाए गए सच्चे मसीही विश्वास और मनुष्यों द्वारा गढ़े गए ईसाई धर्म के मध्य भिन्नता की पहचान करना बहुत आवश्यक है, ताकि सच्चाई का पालन किया जाए न कि शैतान द्वारा मसीह यीशु के नाम से बनाए और फैले गए भ्रम का। और समय तथा अवसर के रहते आज ही, अभी ही, धर्म-कर्म-रस्म की व्यर्थ धारणा एवं मान्यता से निकलकर प्रभु यीशु मसीह की वास्तविक शिष्यता में आना और उसे निभाना अनिवार्य है। कहीं ऐसा न हो कि जब परलोक में आँख खुले तब पता लगे कि जिस धर्म का सारे जीवन बड़ी निष्ठा से निर्वाह करते रहे उससे कोई लाभ नहीं हुआ, और अब उस गलती को सुधारने का कोई अवसर पास नहीं है; अब तो केवल अनन्तकाल का दण्ड ही मिलेगा। यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 47-49     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 4 

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 15


मसीही विश्वासी के गुण - अलगाव (2)

       पिछले लेखों में हम पिन्तेकुस्त के दिन, पवित्र आत्मा से भर जाने के बाद पतरस द्वारा यरूशलेम में एकत्रित हुएभक्त यहूदियोंको किए गए सुसमाचार प्रचार के प्रभावों को देखते आ रहे हैं। मसीह यीशु पर लाए गए विश्वास से प्राप्त होने वाली पापों की क्षमा, उद्धार, और मसीही शिष्यता से संबंधित सात व्यावहारिक बातों को पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस ने उनके सामने रखा, जिन्हें हम प्रेरितों 2:37-42 में से देख रहे हैं। पिछले लेख में हमने इन सात में से अंतिम, और लिखे गए क्रम के अनुसार तीसरी बात - मसीही विश्वासी के संसार और सांसारिकता की बातों से अपने आप को अलग करने के बारे में देखना आरंभ किया था। हमने देखा था कि ऐसा करना कितना महत्वपूर्ण है, और प्रत्येक मसीही विश्वासी में आकर निवास करने वाला पवित्र आत्मा ऐसा करने में उसकी सहायता करता है। किन्तु मसीही विश्वास को मसीही या ईसाई धर्म बनाकर धर्म-कर्म-रस्म के पालन करने की धारणा रखने वाले, पतरस द्वारा कही गई क्रम की पहली बात - मन फिराओ अर्थात पश्चाताप करो, और क्रम की यह तीसरी बात - अपने आप को संसार और सांसारिकता के व्यवहार से पृथक करो पर न तो कोई विशेष ध्यान देते हैं और न ही मसीही शिष्यता के जीवन में इनके महत्व एवं अनिवार्यता को लोगों को सिखाते हैं। 

मसीही विश्वास के प्रचार और प्रसार के आरंभिक समय में, प्रेरित पौलुस ने कुरिन्थुस में स्थित मसीही मण्डली को लिखाअविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो, क्योंकि धामिर्कता और अधर्म का क्या मेल जोल? या ज्योति और अन्धकार की क्या संगति? और मसीह का बलियाल के साथ क्या लगाव? या विश्वासी के साथ अविश्वासी का क्या नाता? और मूरतों के साथ परमेश्वर के मन्दिर का क्या सम्बन्ध? क्योंकि हम तो जीवते परमेश्वर का मन्दिर हैं; जैसा परमेश्वर ने कहा है कि मैं उन में बसूंगा और उन में चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्वर हूंगा, और वे मेरे लोग होंगे। इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और अशुद्ध वस्तु को मत छूओ, तो मैं तुम्हें ग्रहण करूंगा। और तुम्हारा पिता हूंगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियां होगे: यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर का वचन है” (2 कुरिन्थियों 6:14-18 )। यह दिखाता है कि संसार और सांसारिकता से पृथक रहना मसीही विश्वासी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, और अनिवार्य है। पतरस प्रेरित ने इसके विषय लिखाहे प्रियो मैं तुम से बिनती करता हूं, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जान कर उस सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो” (1 पतरस 2:11) 

थिस्सलुनीकिया की मसीही मण्डली के मसीही विश्वास और व्यवहार की सराहना करते हुए पौलुस प्रेरित ने उनके जीवन में आए परिवर्तन और उनके द्वारा अपनी पुरानी बातों को छोड़कर सुसमाचार प्रचार करने तथा प्रभु की बातों पर मन लगाने के बारे में सराहना करते हुए लिखाऔर तुम बड़े क्लेश में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मान कर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे। यहां तक कि मकिदुनिया और अखया के सब विश्वासियों के लिये तुम आदर्श बने। क्योंकि तुम्हारे यहां से न केवल मकिदुनिया और अखया में प्रभु का वचन सुनाया गया, पर तुम्हारे विश्वास की जो परमेश्वर पर है, हर जगह ऐसी चर्चा फैल गई है, कि हमें कहने की आवश्यकता ही नहीं। क्योंकि वे आप ही हमारे विषय में बताते हैं कि तुम्हारे पास हमारा आना कैसा हुआ; और तुम कैसे मूरतों से परमेश्वर की ओर फिरे ताकि जीवते और सच्चे परमेश्वर की सेवा करो। और उसके पुत्र के स्वर्ग पर से आने की बाट जोहते रहो जिसे उसने मरे हुओं में से जिलाया, अर्थात यीशु की, जो हमें आने वाले प्रकोप से बचाता है” (1 थिस्स्लुनीकियों 1:6-10) 

तो क्या इसका तात्पर्य है कि मसीही विश्वासी को संसार के साथ कोई संपर्क, कोई व्यवहार, कोई मेल-जोल या बातचीत नहीं रखनी है; वरन अपने आप को सभी से बिल्कुल अलग-थलग कर के एक सन्यासी के समान जीवन बिताना है? नहीं! परमेश्वर का वचन बाइबल यह भी नहीं कहता है; और ऐसी धारणा रखना भी बाइबल की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। प्रभु यीशु ने स्वयं अपने शिष्यों से कहा कि वे सारे जगत में जाकर मसीह यीशु में विश्वास द्वारा सेंत-मेंत उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार के संदेश को बताएं। यदि प्रभु यीशु मसीह के शिष्य संसार के लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे नहीं, उनसे संपर्क नहीं रखेंगे, तो फिर प्रभु की यह आज्ञा कैसे पूरी करेंगे? पौलुस जब अथेने में अपने साथियों के आने की बाट जोह रहा था, तो यहूदियों और अन्यजाति लोगों से चर्चाएं किया करता था, उन्हें सुसमाचार सुनाया करता थाजब पौलुस अथेने में उन की बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया। सो वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से और चौक में जो लोग मिलते थे, उन से हर दिन वाद-विवाद किया करता था। तब इपिकूरी और स्‍तोईकी पण्‍डितों में से कितने उस से तर्क करने लगे, और कितनों ने कहा, यह बकवादी क्या कहना चाहता है परन्तु औरों ने कहा; वह अन्य देवताओं का प्रचारक मालूम पड़ता है, क्योंकि वह यीशु का, और पुनरुत्थान का सुसमाचार सुनाता था” (प्रेरितों 17:16-18)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित ने कुरिन्थुस की मण्डली को लिखामैं ने अपनी पत्री में तुम्हें लिखा है, कि व्यभिचारियों की संगति न करना। यह नहीं, कि तुम बिलकुल इस जगत के व्यभिचारियों, या लोभियों, या अन्धेर करने वालों, या मूर्तिपूजकों की संगति न करो; क्योंकि इस दशा में तो तुम्हें जगत में से निकल जाना ही पड़ता” (1 कुरिन्थियों 5:9-10)

इन सभी बातों के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मसीही विश्वासी के लिए पृथक होकर रहने का अर्थ सन्यास ले लेना, अथवा सभी लोगों से हर प्रकार का संपर्क एवं व्यवहार समाप्त कर देना नहीं है। वरन, मसीही विश्वासी को संसार के लोगों के समान और सांसारिकता की मानसिकता नहीं रखनी है, उनके सदृश्य नहीं बनना है (रोमियों 12:2)। प्रभु यीशु मसीह ने अपने शिष्यों को संसार में रहते हुए किस प्रकार व्यवहार रखना है सिखाया, जो स्पष्ट करता है कि उन्हें संसार के लोगों के साथ संपर्क रखना था, उनके बीच में अपनी सच्चाई और खराई के कारण एक गवाह बन कर रहना था:तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इस के कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए। तुम जगत की ज्योति हो; जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता। और लोग दिया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुंचता है। उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें” (मत्ती 5:13-16)। इसका परिणाम होगाअन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; इसलिये कि जिन जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जान कर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देख कर; उन्‍हीं के कारण कृपा दृष्टि के दिन परमेश्वर की महिमा करें” (1 पतरस 2:12) 

मसीही विश्वास का जीवन एक व्यवहारिक जीवन है, निरंतर हर बात में प्रभु यीशु की आज्ञाकारिता में बने रहने, और अपनी हर बात के द्वारा परमेश्वर को महिमा देते रहने का जीवन हैसो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो” (1 कुरिन्थियों 10:31)। किन्तु यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, या परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता में भरोसा रखे हुए हैं, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 45-46     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 3

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 14

 

मसीही विश्वासी के गुण - अलगाव (1)

       हम देखते आ रहे हैं कि पतरस द्वारा पिन्तेकुस्त के दिन संसार भर से धार्मिक पर्व मनाने और व्यवस्था की विधि को पूरा करने के लिए आए हुएभक्त यहूदियों के हृदय छिद गए, और उन्हें इस बात का बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उन्हें उद्धार या नया जन्म देने और परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तब उन्होंने पतरस और अन्य प्रेरितों से इसके समाधान के विषय प्रश्न पूछा, और पतरस ने उद्धार या नया जन्म प्राप्त करने के लिए उन्हें प्रभु यीशु की शिष्यता का मार्ग बताया, जिसमें सात व्यावहारिक बातें थीं। उनमें से पाँच बातों को तो, जिन्हें हम पहले देख चुके हैं, मसीही या ईसाई धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह की मानसिकता रखने वालों ने एक औपचारिक रस्म बना दिया है, और उन औपचारिकताओं के निर्वाह के कारण वे अपने आप परमेश्वर को स्वीकार्य धर्मी समझते हैं। पतरस द्वारा उन भक्त यहूदियों को प्रेरितों 2:38 में दिए गए उत्तर का पहला कदम था अपने-अपने पापों से पश्चाताप करना और प्रभु का शिष्य हो जाने पर अपने पुराने जीवन की पापमय प्रवृत्तियों और व्यवहार से मन फिरा लेना, जिसे हम पिछले दो लेखों में दख चुके हैं। 

दूसरा कदम था अपने इस पश्चाताप और प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी हो जाने के निर्णय को बपतिस्मे के द्वारा सार्वजनिक रीति से प्रकट करना; प्रभु का शिष्य बन जाने की गवाही को लोगों के सामने रखना। इसका वास्तविक स्वरूप भी धर्म के निर्वाह के लिए बिगाड़ दिया गया है, और साथ ही इसे एक औपचारिकता बना दिया गया है। और अब धर्म-कर्म का निर्वाह करने में रुचि रखने वालों को उनके धर्म के अगुवों द्वारा, बाइबल के शिक्षाओं के विपरीत, यही जताया जाता है कि बपतिस्मा हो जाने से परमेश्वर भी उस व्यक्ति को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो गया है।  

इसके बाद पद 40 में तीसरा कदम बताया गया हैउसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:40)। मूल यूनानी भाषा के जिन शब्दों का हिन्दी अनुवादटेढ़ी जातिकिया गया है, उनका शब्दार्थ हैटेढ़ी/विकृत पीढ़ी। इसे अंग्रेजी अनुवादों में “perverse generation” या “corrupt  generation” लिखा गया है, जोटेढ़ी/विकृत पीढ़ीअनुवाद के अनुरूप है। कहने का अभिप्राय था, और है, कि जो व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बनकर उनके पीछे चलते रहने का निर्णय ले, वह साथ ही यह निर्णय भी ले कि अब वह अपने समकालीन संसार के भ्रष्ट और प्रभु के प्रतिकूल व्यवहार और जीवन से अपने आप को पृथक कर लेगा; संसार और उसकी बातों के प्रति उसका जीवन एक अलगाव का जीवन रहेगा। अर्थात, वह अपने आप को संसार और संसार की बातों से दूषित नहीं होने देगा, वरन प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता में उसी के लिए जीएगाऔर वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)

पाप और उद्धार से संबंधित बातों की चर्चा के समय हम देख चुके हैं कि पापों की क्षमा और उद्धार प्राप्त करने के साथ ही, तुरंत ही उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति की देह परमेश्वर पवित्र आत्मा का मंदिर बन जाती है और पवित्र आत्मा उसी क्षण से, उसकी सहायता और मसीही विश्वास में उन्नति के लिए, उस नए जन्मे हुए जन में आकर निवास करने लगता हैऔर उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी” (इफिसियों 1:13)। परमेश्वर पवित्र आत्मा के इस मंदिर को स्वच्छ और पवित्र रखना उस उद्धार पाए हुए व्यक्ति की ज़िम्मेदारी हैक्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नाश करेगा तो परमेश्वर उसे नाश करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो” (1 कुरिन्थियों 3:16-17)। इस ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए पवित्र आत्मा स्वयं व्यक्ति की सहायता करता है कि वह शारीरिक और सांसारिक अभिलाषाओं से हटकर, एक पवित्र और परमेश्वर को महिमा देने वाला जीवन जीएंपर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे। क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ” (गलातियों 5:16-17); “और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उस की लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है। यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी” (गलातियों 5:24-25)  

पौलुस प्रेरित ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में रोम के मसीही विश्वासियों को लिखाइसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान कर के चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रोमियों 12:1-2)। यहाँ तीन मुख्य बातें हमारे ध्यान देने के लिए हैं: (i) प्रत्येक मसीही विश्वासी की आत्मिक सेवा, उसके द्वारा अपने आप को परमेश्वर सम्मुख बलिदान करके चढ़ाना है। जो बलिदान में परमेश्वर को चढ़ा दिया गया, वह फिर और किसी सांसारिक काम में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। (ii) मसीही विश्वासी को संसार के सदृश्य नहीं बनना है; अर्थात सांसारिकता की बातों से और संसार के लोगों के अनुरूप व्यवहार से बच कर रहना है। उद्धार पा लेने के बाद हुए मन परिवर्तन का प्रमाण चाल-चलन में दिखने वाला परिवर्तन है। (iii) जो अपने आप को परमेश्वर को समर्पित कर के, अपने उस समर्पण एवं मन परिवर्तन को अपने बदले हुए चाल-चलन से संसार के समक्ष दिखाएंगे, वे फिर परमेश्वर की इच्छा को व्यक्तिगत अनुभवों से जानने वाले हो जाएंगे; अर्थात परमेश्वर की इच्छा उन पर प्रकट रहेगी। 

तो क्या इस अलगाव, इस पृथक रहने का अर्थ है कि मसीही विश्वासी संसार के साथ कोई व्यवहार, कोई संपर्क नहीं रख सकता है? इस प्रश्न का उत्तर हम कल देखेंगे। किन्तु यदि आप अभी भी संसार के साथ और संसार के समान जी रहे हैं, तो फिर संसार के साथ और संसार के समान विनाश में भी जाना पड़ेगा, क्योंकि संसार का मित्र बनना परमेश्वर का बैर मोल लेना हैहे व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है” (याकूब 4:4)। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 43-44     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 2