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शुक्रवार, 9 जून 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न - 30b - Lent & Lent Fasting / लेंट और लेंट का उपवास (2)


प्रभु यीशु मसीह के 40 दिन के उपवास का उदाहरण

 क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले प्रभु और उसके चेले किसी उपवास की दशा में नहीं थे, और उन्होंने फसह का पर्व मनाया, फसह का मेमना बलिदान किया और खाया (मत्ती 26:17-21)। इसलिए प्रभु यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले 'उपवास' रखना और मांस न खाना, किसी रीति से बाइबल के अनुसार संगत नहीं है।

   साथ ही हम यह भी देखते हैं कि प्रभु यीशु ने कभी अपने किसी भी शिष्य से उसके सेवकाई आरंभ करने से पहले ऐसा कुछ भी करने के लिए नहीं कहा। और बाद में प्रेरितों के कार्य अथवा पत्रियों में, जहाँ मसीही विश्वासियों की शिक्षा और सुधार के विषय पवित्र आत्मा की अगुवाई और निर्देशानुसार बहुत सी बातें लिखी गई हैं, कभी इस प्रकार के किसी उपवास का कोई उल्लेख अथवा निर्देश नहीं आया है।

   ऐसे 'उपवास' का न तो कोई आधार है, न ही कोई आवश्यकता है, और न ही परमेश्वर की ओर से उसका कोई संज्ञान या प्रतिफल है – क्योंकि यह 'उपवास' परमेश्वर की ओर से स्थापित अथवा वाँछित कदापि नहीं है। आज लोग परंपरा के अन्तर्गत यशायाह 1:14-15 की अवहेलना करते हैं और मनगढ़ंत उपवास तथा उस उपवास के उद्देश्य निर्धारित कर लेते हैं। किन्तु वे फिर भी अपेक्षा करते हैं, तथा औरों को सिखाते हैं, कि यह करने और मनाने से परमेश्वर उनकी अपनी मनगढ़ंत धारणाओं को स्वीकार करने और उन्हें आशीष देने के लिए बाध्य है, और बाध्य होकर ऐसा करेगा भी!

   क्यों लोग व्यर्थ मनगढ़ंत परंपराओं का इतने उत्साह से पालन करने के स्थान पर, पहले परमेश्वर के वचन का अध्ययन करके उन बातों का पालन करना नहीं सीखते जिन्हें परमेश्वर चाहता है कि हम करें (1 थिस्सलुनीकियों 5:21)? क्यों वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता के स्थान पर अंधी बुद्धि के साथ मनुष्यों की व्यर्थ विधियों को अधिक महत्व देते हैं जिनका बाइबल के अनुसार कोई आधार या औचित्य है ही नहीं; किन्तु परमेश्वर के आज्ञाकारी होने के प्रति इतना संकोच करते हैं; उसे सच्चा समर्पण नहीं करते हैं? क्यों?

इसलिये जब हम पर ऐसी दया हुईकि हमें यह सेवा मिलीतो हम हियाव नहीं छोड़ते। परन्तु हम ने लज्ज़ा के गुप्‍त कामों को त्याग दिया, और न चतुराई से चलतेऔर न परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैंपरन्तु सत्य को प्रगट कर केपरमेश्वर के साम्हने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं। परन्तु यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा हैतो यह नाश होने वालों ही के लिये पड़ा है। और उन अविश्वासियों के लियेजिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्‍धी कर दी हैताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप हैउसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके। क्योंकि हम अपने को नहींपरन्तु मसीह यीशु को प्रचार करते हैंकि वह प्रभु हैऔर अपने विषय में यह कहते हैंकि हम यीशु के कारण तुम्हारे सेवक हैं। इसलिये कि परमेश्वर ही हैजिसने कहाकि अन्धकार में से ज्योति चमकेऔर वही हमारे हृदयों में चमकाकि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो” (2 कुरिन्थियों 4:1-6)।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

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The Example of the Lord Jesus's 40 Days Fast

  Before His crucifixion the Lord and His disciples were not fastingthey observed the Passoverthey sacrificed and ate of the Passover Lamb (Matthew 26:17-21). Therefore to observe the time preceding the Lord’s crucifixion as a ‘fast’ and abstain from eating meat in that time has no Biblical basis or precedence.

   We also see that the Lord never asked any of His disciples to do anything like what He had undergone at the beginning of His Ministry, when they started their ministry with Him. Neither later, in the book of Acts or in any of the Epistleswhere under the guidance of the Holy Spirit many teachings and instructions have been given for the learning and improvement of Christian Believersnever has there been any mention or instruction regarding any such fast or practice.

   Such a ‘fast’ has neither any basis nor has any necessitynor is it of any usenor does God give it any consideration or reward – because such a ‘fast’ is neither given by nor desired by the Lord. Presently people traditionally observe a contrived a ‘fast’ and with a contrived purpose, but they disregard the admonition of Isaiah 1:14-15. But still they expectand also teach to othersthat when they observe it God will take it into consideration and bless them for it, as if God is under a compulsion to do so – which He most certainly is not!

   Why is it that people so enthusiastically accept and observe man-devised and contrived rituals and traditions but do not care about learning and obeying what God actually wants from them (1 Thessalonians 5:21)? Why do they blindly follow and remain committed to man devised rituals that have no Biblical sanction or standing, but are not committed and faithful in obeying God? Why?

   “Therefore, since we have this ministry, as we have received mercy, we do not lose heart. But we have renounced the hidden things of shame, not walking in craftiness nor handling the word of God deceitfully, but by manifestation of the truth commending ourselves to every man's conscience in the sight of God. But even if our gospel is veiled, it is veiled to those who are perishing, whose minds the god of this age has blinded, who do not believe, lest the light of the gospel of the glory of Christ, who is the image of God, should shine on them. For we do not preach ourselves, but Christ Jesus the Lord, and ourselves your bondservants for Jesus' sake. For it is the God who commanded light to shine out of darkness, who has shone in our hearts to give the light of the knowledge of the glory of God in the face of Jesus Christ” (2 Corinthians 4:1-6).

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

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