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बुधवार, 12 जुलाई 2023

Miscellaneous Questions / कुछ प्रश्न – 42o – Summary / सारांश



क्या बाइबल के अनुसार, क्या मसीही कलीसियाओं में स्त्रियों को पुलपिट से प्रचार करने और पास्टर की भूमिका निभाने की अनुमति है? 

भाग 15 – सारांश

 

    पिछले दो सप्ताह से हम एक ऐसे विषय पर विचार करते आ रहे हैं जो ईसाई या मसीही समाज में बहुत बहस, असमंजस, और विभाजनों का विषय बना हुआ है। इस विषय पर विचार करने के लिए जो तरीका हमने अपनाया है वह परमेश्वर के वचन बाइबल में इसके बारे में लिखी बातों को देखना और फिर जो लोग कलीसियाओं में स्त्रियों के प्रचारक अथवा पास्टर बनने का समर्थन करते हैं, उनके तर्कों का बाइबल की बातों के आधार पर विश्लेषण करना, और देखना कि क्या उनकी धारणाओं का बाइबल से कोई समर्थन है या नहीं।


    हमने आरंभ किया था शैतान की युक्तियों को देखने के साथ। शैतान की एक प्रमुख युक्ति है परमेश्वर के वचन की गलत व्याख्या के द्वारा लोगों को बहकाना, जिससे वे बाइबल की शिक्षाओं की गलत समझ रखें और उनका दुरुपयोग करें। उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली दूसरी युक्ति, जिसका वह बहुधा उपयोग करता है, और जिसे उसने यहाँ पर भी उसने बहुत प्रभावी रीति से उपयोग किया है, लोगों का ध्यान उससे जो परमेश्वर ने दिया है हटा कर, उसकी ओर लगाना है जो परमेश्वर ने नहीं दिया। इस युक्ति के द्वारा वह लोगों को परमेश्वर द्वारा उन्हें दिए गए वरदानों के लिए परमेश्वर का धन्यवादी होने और उनका सदुपयोग परमेश्वर की महिमा और अपने लाभ के लिए करने की बजाए, जो नहीं मिला है उसके लिए परेशान होकर परमेश्वर के अनाज्ञाकारी होने और हानि उठाने के लिए करता है। इसी युक्ति के द्वारा वह इस विषय के बारे में लोगों के मनों में भ्रम और संदेह डालता है। हमने देखा है कि ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने अपने वचन की समझ और सिखाने की योग्यता स्त्रियों को नहीं दी है। जैसे पुरुषों के लिए, वैसे ही स्त्रियों के लिए भी परमेश्वर ने स्त्रियों को भी परमेश्वर के वचन की समझ और सिखाने की योग्यता प्रदान की है; अंतर यह है कि परमेश्वर ने स्त्रियों को यह सेवकाई अन्य स्त्रियों एवं बच्चों में करना निर्धारित किया है – उनके बीच में जहाँ पुरुष जाकर यह सेवकाई कभी नहीं कर सकते हैं।


    स्त्रियों का ध्यान उस पर लगाने के द्वारा जो परमेश्वर ने पुरुषों के लिए निर्धारित किया है – कलीसियाओं में प्रचारक और पास्टर का कार्य करें, शैतान ने लोगों को स्त्रियों के लिए दिए गए निर्देशों और उनके वरदानों से बहका दिया है, जिससे वे स्त्रियों को परमेश्वर द्वारा दी गई बातों का सदुपयोग नहीं करने पाएँ, वरन अनाज्ञाकारी होकर अपनी आशीषों को खो दें। क्योंकि 1 कुरिन्थियों 14:34-35 और 1 तीमुथियुस 2:11-12, में बाइबल बड़ी स्पष्टता से स्त्रियों के कलीसियाओं में प्रचार करने और पास्टर बनने को मना करती है, और इन्हीं खण्डों के साथ ही परमेश्वर ने इन निर्देशों के के कारण भी दिए हैं। साथ ही, बाइबल में इस धारणा के समर्थन में कोई भी बात नहीं है कि ये निर्देश केवल उस समय की कुछ विशेष कलीसियाओं के लिए दिए गए थे, या केवल उस युग की महिलाओं ही के लिए थे, क्योंकि तब स्त्रियाँ अधिकांशतः अनपढ़ होती थीं। इसी सन्दर्भ में हमने यह भी ध्यान किया था कि तर्क “क्योंकि स्त्रियों में भी वचन को समझने, प्रचार करने, और सिखाने की योग्यता है, इसलिए उन्हें कलीसियाओं में यह करने की अनुमति होनी चाहिए” व्यर्थ है क्योंकि शैतान के पास भी परमेश्वर के वचन को समझने, सिखाने और प्रचार करने की योग्यता है (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15); लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं है कि परमेश्वर की ओर से शैतान को यह करने की अनुमति है, और उसे यह करने देना चाहिए।


    इसके बाद हमने स्त्रियों द्वारा परमेश्वर के लोगों के मध्य प्रशासनिक एवं वचन की सेवकाई के उदाहरणों को देखा था। हमने ध्यान किया था कि पुराने नियम में केवल पुरुषों को ही याजकीय ज़िम्मेदारियाँ दी गईं थीं, कभी भी किसी भी स्त्री को नहीं, चाहे वे स्त्रियाँ याजकीय वंशजों में से ही क्यों न हों। नए नियम में भी हमने देखा था कि यद्यपि प्रभु यीशु और उसके शिष्यों के साथ कुछ स्त्रियाँ भी रहती थीं और उनकी देखभाल करती थीं, किन्तु प्रभु ने कभी भी किसी भी स्त्री को न तो प्रेरित नियुक्त किया, और न ही अन्य शिष्यों के साथ कभी किसी सेवकाई के लिए भेजा। और साथ ही आरंभिक कलीसिया में जो लोग कलीसियाओं से संबंधित विषयों पर चर्चा और निर्णय करने के लिए सभाओं में एकत्रित होते थे, उनमें कभी भी कोई भी स्त्री सम्मिलित नहीं थी, उन सभाओं में भी नहीं जिनमें स्त्रियों से संबंधित बातों पर चर्चा होती थी।


    इसके बाद हमने पुराने और नए नियम में दिए गए भक्त स्त्रियों के उदाहरणों को देखा था, जिनकी सेवकाई का दुरुपयोग बहुधा यह दिखाने के लिए किया जाता है कि क्योंकि बाइबल में इन स्त्रियों की सेवकाइयों का उल्लेख है, इसलिए यह अनुमति आज की स्त्रियों को भी दी जानी चाहिए। बाइबल में उन स्त्रियों के बारे में दी गई जानकारी के आधार पर हमने उनके उदाहरणों के लिए देखा था कि जब केवल बाइबल में दी गई जानकारी के आधार पर उनका निष्पक्षता तथा बिना किसी पूर्व-धारणा को आधार बनाए हुए विश्लेषण किया जाता है, तो कभी भी उनके उदाहरणों को उचित रीति से इस दावे की पुष्टि के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है कि स्त्रियों को भी कलीसियाओं में प्रचार करने और पास्टर बनने की अनुमति है।


    अगले लेख में हमने परमेश्वर के वचन से जो अभी तक देखा और समझा है, उसके आधार पर निष्कर्ष निकालेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

- क्रमशः

 

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According to the Bible, Do Women Have the Permission to Serve as Pastors and Preach from the Pulpit in the Church?

Part 15 – Summary

 

For the past two weeks we have been considering a topic that has been a cause of much confusion and debate, as well as divisions in Christendom. The approach we have taken is to see what the Word of God says, and then on the basis of what is written in the Bible, consider and analyze the various arguments put forward by those who support women preaching in Churches and becoming Pastors, and see if this notion has any Biblical standing or support, or not.


    We started off by first considering Satan’s strategies. One of his strategies is to mislead people through misinterpretation of God’s Word, causing them to misunderstand and wrongfully apply its teachings. The second strategy that he often uses, and has used very effectively over here is to turn our attention to what God has not given, instead of being aware and thankful for what God has given, and using the God given things for God’s glory and our benefit. Through this strategy he makes people to feel deprived and then by make the mistake of disobeying God and coming to harm. As part of this strategy, he puts misunderstandings and doubts in people heart about this topic. We had seen that it is not that God has withheld the understanding and ministry of God’s Word from women. Just as with men, God has given women also the gift of understanding and teaching His Word; only that God has assigned women to do this ministry amongst other women and children – places and people that men cannot go and serve for this ministry.


    By turning the attention of women to do what has been assigned by God for men to do – minister in Churches as preachers, and become Pastors, Satan has beguiled people to ignore God’s gifts and instructions, to not utilize what God has given the women, and thereby be disobedient to God, and lose their blessings. Because the Bible very clearly in 1 Corinthians 14:34-35 and 1 Timothy 2:11-12, forbids women from becoming preachers and Pastors in Churches. and in these passages, the reasons for this are also given by God. Moreover, there is nothing in the Bible to support the assumptions that these instructions were meant for only a particular Church of that time, or were only for women of that era, since most of the women were not literate or educated at that time. In this context we had also seen that the argument, “since women have the ability to understand, preach, and teach God’s Word, therefore, they should be allowed to do so in the Churches” is vain, since Satan too has the ability to understand, preach, and teach from God’s Word, and does so (2 Corinthians 11:3, 13-15); but this does not mean that he has God’s sanction to do so, and should be allowed to do it!


    We then considered examples from God’s Word about administrative and Word ministry by women amongst God’s people. We recalled that in the Old Testament all priestly duties were given to and carried out only by men, never by any women, not even by women of the priestly families. In the New Testament too, we had seen that though women were amongst the Lord Jesus’s followers and ministered to Him and His disciples, but the Lord never appointed any of them as Apostles, nor ever sent any of them for ministry, as He sent out His disciples. Also, in the various councils that met for deliberations in the initial Church, to sort out various issues arising in the Churches, there is no mention of any women being a part of the councils and deliberating over the issues with men, even while considering matters related to women.


    We then considered the examples of various godly women of the Old and New Testament, whose ministry examples are often misused to prove that since these women had a ministry in the Bible, therefore, this should be granted to the women now also. Through analyzing the information given in the Bible about those women, we saw that their examples, when considered purely on the basis of information given about them in the Bible, without any pre-conceived notions, and in an unbiased manner, can never rightfully be used to justify the claim that the Bible permits women to preach in the Churches, or be appointed as Pastors.


    In the next article we will come to the conclusions that we can draw from all that we have considered and analyzed regarding this topic from God’ Word so far.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

- To Be Continued

 

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