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रविवार, 7 जनवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 133 – Stewards of The Church / कलीसिया के भण्डारी – 9


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कलीसिया को समझना – 9 – रूपक – 7

 

    क्योंकि परमेश्वर ने प्रत्येक नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी को अपनी कलीसिया का एक अंग बनाया है तथा उसे अपनी अन्य सन्तानों की सहभागिता प्रदान की है, इसलिए न केवल प्रत्येक विश्वासी, परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए इन विशेषाधिकारों का भण्डारी है, वरन परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए इन प्रावधानों के लिए, जो उसे अपना मसीही जीवन जीने तथा परमेश्वर द्वारा सौंपी गई सेवकाई को पूरा करने के लिए दिए गए हैं, परमेश्वर को उत्तरदायी भी है। इसलिए यह प्रत्येक विश्वासी के लिए अनिवार्य है कि वह परमेश्वर द्वारा उसे दी गई बातों के बारे में सीखे। वर्तमान में हम बाइबल में कलीसिया के बारे में दिए गए विभिन्न रूपकों से परमेश्वर की कलीसिया, तथा उसकी अन्य सन्तानों के साथ सहभागिता रखने के बारे में सीख रहे हैं। हमने आरंभ में जो सात रूपक सूचीबद्ध किये थे, पिछले लेखों में हम उन में से छः रूपकों को देख चुके हैं। आज हम इस सूची के सातवें और अन्तिम रूपक, कलीसिया के परमेश्वर की दाख की बारी होने के संबंध में देखेंगे।

(7) परमेश्वर की दाख की बारी

    बाइबल के नए नियम खंड की पहली चार पुस्तकों, अर्थात प्रभु यीशु मसीह की जीवनियों में, प्रभु यीशु ने “दाख की बारी” से संबंधित कुछ दृष्टांत कहे हैं। किन्तु किसी भी दृष्टांत में, या फिर, बाद में बाइबल की अन्य पुस्तकों में, प्रभु यीशु की कलीसिया को, पहले छः रूपकों के समान, स्पष्टतः प्रभु की या परमेश्वर की दाख की बारी नहीं कहा गया है। पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों, इस्राएल को “परमेश्वर की दाख की बारी” कहा गया है। क्योंकि वर्तमान में मसीही विश्वासी परमेश्वर के लोग, उसके ‘आत्मिक’ इस्राएल (इफिसियों 2:11-13) हैं, इसलिए दाख की बारी से संबंधित प्रभु के दृष्टान्तों को प्रभु यीशु की कलीसिया के संदर्भ में भी ले लिया जाता है, और कलीसिया से संबंधित बातों और कार्यों के विषय उन दृष्टांतों से भी शिक्षाएं ली जाती हैं, जो मसीही जीवन के लिए शिक्षाप्रद भी हैं। हम भी यहाँ पर “दाख की बारी” से संबंधित प्रभु द्वारा दिए गए दृष्टांतों से कुछ शिक्षाएं लेंगे, जो मसीही जीवन, सेवकाई, और प्रभु के लिए उपयोगी होना सिखाती हैं।

    मत्ती 20:1-16 में एक गृहस्थ द्वारा लगाई गई दाख की बारी का दृष्टांत है, जिसमें कार्य करने के लिए वह सुबह से शाम, अर्थात आरंभ से लेकर अन्त तक, मजदूरों को ढूँढता और भेजता रहा। अर्थात, उस दाख की बारी को देखभाल की, उसमें कुछ-न-कुछ काम की आवश्यकता थी। उस दाख की बारी का स्वामी इस बात को जानता और समझता था, और वह ही अपनी बारी में काम के लिए मजदूरों को नियुक्त करता और भेजता रहा। प्रभु की कलीसिया में अभी भी बहुत से कार्य और सेवकाइयां करनी होती हैं, और प्रभु को अभी भी काम करने वाले सेवकों की आवश्यकता है, और यह आवश्यकता प्रभु के दूसरे आगमन तक बनी रहेगी। प्रभु की कलीसिया गतिहीन (static) नहीं, गतिशील (dynamic) है, अर्थात वह अभी भी निर्माणाधीन है, बढ़ रही है। जब तक अन्तिम विश्वासी उस में जोड़ नहीं दिया जाता है, और प्रभु की दुल्हन के रूप में उसके साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं कर दिया जाता है, कलीसिया निर्माणाधीन रहेगी; और उसे देखभाल की, तथा शैतान के द्वारा उस पर निरंतर किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के हमलों के कारण मरम्मत की आवश्यकता रहेगी। इसलिए प्रभु को अपनी कलीसिया में उसके लिए कार्य करते रहने वालों की भी आवश्यकता रहेगी।

    मत्ती 21:28-32 में, पिता की दाख की बारी में कार्य करने के लिए आज्ञाकारी तथा अनाज्ञाकारी और लापरवाह पुत्रों का दृष्टांत है। यह हमें सिखाता है कि परमेश्वर की कलीसिया में होने का अर्थ है परमेश्वर पिता की इच्छा के अनुसार कार्य करते रहना, उसका आज्ञाकारी बने रहना, न कि अनाज्ञाकारी और लापरवाह होना। 

    मत्ती 21:33-46 में दाख की बारी की देखभाल और उसके लिए उत्तरदायी होने से संबंधित दृष्टांत है, जिसे मरकुस 12:1-12 में और लूका 20:9-18 में भी लिखा गया है। प्रभु का यह दृष्टांत मुख्यतः उन धर्म के अगुवों के विरुद्ध था जिन्होंने परमेश्वर द्वारा उन्हें दिए गए दायित्व का ठीक से निर्वाह नहीं किया, परमेश्वर द्वारा भेजे गए नबियों का निरादर किया उन्हें मार डाला, और प्रभु को भी मार डालना चाहते थे। किन्तु हमारे लिए इस दृष्टांत में महत्वपूर्ण शिक्षा है - प्रभु परमेश्वर जब दायित्व देता है, तो फिर उसका हिसाब भी लेता है। मसीही जीवन लापरवाही का, प्रभु और उसके कार्य को हल्के में लेने, और ठीक से न करने का जीवन नहीं है। सभी को अपने जीवन और कार्यों का हिसाब देना होगा, और यह आँकलन होने के अनुसार ही प्रत्येक अपने प्रतिफल पाएगा।

    लूका 13:6-9 में प्रभु द्वारा दाख की बारी का एक और दृष्टांत है, जो दाख की बारी के स्वामी (परमेश्वर) के धैर्य और विलंब से कोप करने को, तथा बारी के रखवाले (प्रभु यीशु) के अपने लोगों के प्रति प्रेम और उनको फलवंत बनाने में प्रयासरत रहने को दिखाता है।

    ये सभी दृष्टांत अपने लोगों, अपनी “दाख की बारी” के प्रति परमेश्वर और प्रभु यीशु की लगन, प्रेम, और उनके लिए परिश्रम करने को, तथा प्रभु के लोगों से प्रभु की अपेक्षा को दिखाते हैं। सभी दृष्टांत प्रभु या परमेश्वर की “दाख की बारी” से संबंधित हैं; कोई भी दृष्टांत प्रभु की दाख की बारी में घुस आए या लगा दिए गए लोगों के लिए नहीं है। प्रभु परमेश्वर की देखभाल और चिंता, उसके अपने लोगों के लिए है; उसकी दाख की बारी में उसके लोगों का भेस धर कर रहने वालों का कोई उल्लेख नहीं है। हर वह पौधा जो परमेश्वर ने नहीं लगाया है, वह उखाड़ा और जलाया जाएगा (मत्ती 13:30; 15:13)।

    यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यह ध्यान रखिए कि अन्ततः, एक दिन, आपको अपने जीवन और कार्यों का संपूर्ण हिसाब प्रभु को देना होगा। प्रभु के धैर्य और विलंब से कोप करने का अर्थ उसका कभी कोप न करना, कभी हिसाब न लेना, नहीं है। उद्धार पाया हुए मसीही विश्वासी का उद्धार तो कभी नहीं जाएगा, किन्तु उसे अनन्तकाल के लिए मिलने वाले प्रतिफलों पर उसके जीवन और कार्यों पर दुष्प्रभाव अवश्य आएगा (1 कुरिन्थियों 3:13-15)।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation

Understanding the Church – 9 – Metaphors – 7

 

    Since God has made every Born-Again Christian Believer a part of His Church and has given him the fellowship of His other children, therefore not only is every Believer a steward of these privileges granted to him by God, but is also accountable to Him for fulfilling his stewardship and properly utilizing his God given resources, for living his Christian life as well carrying out his God given ministry. Hence it is imperative for every Believer to learn about the things God has given him. Presently, through the various metaphors given in the Bible for the Church, we are learning God’s Church and about fellowshipping with God’s other children. From the seven metaphors we had listed initially, we have so far considered six metaphors in the previous articles. Today we will consider the seventh and final metaphor of the list, being the Vineyard of God.

(7) God’s Vineyard

    In the New Testament section of the Bible, in its first four books, i.e., the Gospels – the biographies of the Lord Jesus, the Lord Jesus spoke some parables about “vineyards.” But in none of the parables, nor, later in any of the books of the Bible has the Church explicitly been called the “Vineyard of the Lord,” as has been the case with the first six metaphors that we have considered so far. In the Old Testament, the people of God, Israel, has been called the “Vineyard of God.” Since now, the Christian Believers are the people of God, His ‘spiritual’ Israel (Ephesians 2:11-13), and since the teachings of these parables given by the Lord are meant for Christian living and ministry, therefore the Lord’s parables about the vineyards are also seen as related to the Church of the Lord Jesus, and the teachings from these parables are applicable to the Church and its work or ministries. Here, we too will consider some teachings concerning the Christian life, ministry, and being useful for the Lord Jesus from the Lord’s parables.

    In Matthew 20:1-16 is a parable about a landowner who planted a vineyard; he kept looking for and sending into the vineyard people to work, from morning till evening. Meaning, there always was some opportunity or the other for work in the vineyard, till the end of the day. The landowner knew and understood this; therefore, he kept appointing laborers and sending them into the vineyard to work. In the Church of the Lord Jesus too, there are many works and ministries even today, and the need for laborers for these works and ministries will remain till the second coming of the Lord. The Lord’s Church is not static, but is dynamic, i.e., it is still being formed and growing. Till the last Believer is added to it, and till he is made ready to stand with the Lord as His Bride, the Church will remain “under-construction;” and therefore, it needs constant care and protection, and even repairs where it has been damaged by attacks from Satan and his forces. Therefore, the Lord needs people to continue to work in His Church and for its functions.

    In the parable of Matthew 21:28-32, where a father asks his sons to go work in his vineyard, the Lord taught about the obedient and the disobedient and careless children. Which gives us the lesson that being in the Church of God is about working according to the will of God the Father, and being obedient to Him, instead of being casual and disobedient.

    In Matthew 21:33-46 is a parable about taking care of the vineyard and being accountable for the assigned work; this parable has also been stated in Mark 12:1-2 and Luke 20:9-18. The Lord gave this parable mainly about those religious leaders who did not fulfil their responsibilities towards God, they insulted and even killed the prophets God sent to them, and were getting ready to kill even the Son, the Lord Jesus Christ. For us, there is a very important lesson in this parable, when God gives a responsibility, He also takes an account of it. The Christian life is not a life of being careless and taking the Lord’s work and ministries lightly, not doing them diligently. Everyone will have to give an account of their lives and the work they have done (2 Corinthians 5:10), and everyone will receive their rewards according to a minute evaluation of their works (1 Corinthians 3:13-15).

    In Luke 13:6-9, there is another parable of the Lord related to the vineyard, which illustrates about the patience and longsuffering of the owner of the vineyard (God), and the love of the ‘keeper of the vineyard’ (Lord Jesus) for His people and how He continues to labor and strive to make His people fruitful and useful.

    All these parables speak of the Lord’s expectations from His people, about the labor, diligence, and love of the Lord for His people. All these parables are related to “God’s Vineyard”; none of these parables is about the infiltrators into the vineyard or those planted surreptitiously. The care and looking after of the Lord God is for His people; there is no mention of the Lord being concerned about the welfare of those who may have clandestinely entered His Church, and are masquerading as members of His Church. Every plant that has not been planted by God will be uprooted and destroyed (Matthew 13:30; 15:13).

    If you are a Christian Believer, then keep in mind, that eventually, one day you will have to stand before the Lord and give an account of your life to Him. The present attitude of patience, forbearance, and longsuffering of the Lord does not mean that He will never take an account and will never appropriately deal with the disobedient and careless. While it is true that a Christian Believer will never lose his salvation; but his carelessness and disobedience surely will quite adversely affect his eternal rewards (1 Corinthians 3:13-15).

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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