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Wednesday, January 18, 2012

महिमा का पात्र

   पुरातत्वशास्त्री बारबरा मर्टज़ को मिस्त्र के प्राचीन फिरौन रैम्सेज़ द्वतीय से शिकायत है। अपनी पुस्तक Temples, Tombs, and Heiroglyphs में बारबरा लिखती हैं कि: "मिस्त्र की प्राचीन दीवारों पर हर जगह रैम्सेज़ के चेहरे, आकृति या नाम की उपस्थिति बेहद उबा देने वाली हो जाती है।" अपनी महिमा करवाने से कभी ना उबने वाले इस राजा ने मिस्त्र के धर्म का, जिस में राजा को देवता मानकर पूजा जाता था, भरपूरी से लाभ उठाया, और हर संभव स्थान पर अपनी कोई न कोई छवि स्थापित करवा दी जिससे उसे महिमा मिलती रहे।

   रैम्सेज़ के महिमा पाते रहने के इस व्यवहार की तुलना पौलुस और बरनाबास के व्यवहार से कीजिए। अपनी एक मिशनरी यात्रा के दौरान उन्हें ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा जहाँ लोग उन्हें महिमा देना चाहते थे, पर उन्होंने इन्कार कर दिया। लुस्त्रा नामक एक नगर में, जो मूर्तिपूजा में लिप्त था, उन्होंने यीशु के नाम में एक जन्म के लंगड़े को चंगा किया; चंगाई का यह अद्भुत कार्य देखकर उस नगर के लोग विस्मित हो गए और: "लोगों ने पौलुस का यह काम देखकर लुकाउनिया भाषा में ऊंचे शब्‍द से कहा; देवता हमारे पास उतर आए हैं" (प्रेरितों १४:११); फिर तुरंत ही लोगों ने उन्हें बलिदान चढ़ाने और उनकी पूजा करने के लिए तैयारी आरंभ कर दी। यह सब देखकर पौलुस और बरनाबास बहुत दुखी हुए और लोगों को ऐसा करने से रोकते हुए कहा: "हम भी तो तुम्हारे समान दु:ख-सुख भोगी मनुष्य हैं, और तुम्हें सुसमाचार सुनाते हैं, कि तुम इन व्यर्थ वस्‍तुओं से अलग होकर जीवते परमेश्वर की ओर फिरो, जिस ने स्‍वर्ग और पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उन में है बनाया" (प्रेरितों १४:१५)।

   आज हम मसीही विश्वासी चाहे अपौलुस और बरनाबास के समान परमेश्वर के लिए अद्भुत आश्चर्याकर्म ना कर पाते हों, लेकिन हर विश्वासी मसीह के लिए कुछ न कुछ तो कर ही सकता है, और बहुतेरे करते भी हैं। हमारा मसीही जीवन और कार्य संसार और संसार के लोग को प्रभावित कर, उन्हें इन कार्यों के कारण हमें आदर और महिमा देने को प्रेरित कर सकता है। यदि ऐसी स्थिति आए, तो पौलुस और बरनाबास के समान ही हमें महिमा के पात्र नहीं बनना, वरन उस सारी महिमा, यश, कीर्ति और आदर को महिमा के सच्चे पात्र - परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह ही की ओर केंद्रित करना है तथा लोगों को उस जीवते सच्चे परमेश्वर के बारे में बताना है। - डेनिस फिशर


मनुष्य का सबसे महान लक्ष्य स्वयं महिमा पाना नहीं, महिमा के सच्चे पात्र - परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह को महिमा देना है।

[परमेश्वर:] अपने निमित्त, हां अपने ही निमित्त मैं ने यह किया है, मेरा नाम क्यों अपवित्र ठहरे? अपनी महिमा मैं दूसरे को नहीं दूंगा। - यशायाह ४८:११

बाइबल पाठ: प्रेरितों १४:४-१८
Act 14:4  परन्‍तु नगर के लोगों में फूट पड़ गई थी; इस से कितने तो यहूदियों की ओर, और कितने प्रेरितों की ओर हो गए।
Act 14:5  परन्‍तु जब अन्यजाति और यहूदी उन का अपमान और उन्‍हें पत्थरवाह करने के लिये अपने सरदारों समत उन पर दौड़े।
Act 14:6  तो वे इस बात को जान गए, और लुकाउनिया के लुस्‍त्रा और दिरबे नगरों में, और आसपास के देश में चले गए।
Act 14:7   और वहां सुसमाचार सुनाने लगे।
Act 14:8  लुस्‍त्रा में एक मनुष्य बैठा था, जो पांवों का निर्बल था: वह जन्म ही से लंगड़ा था, और कभी न चला था।
Act 14:9   वह पौलुस को बातें करते सुन रहा था और इस ने उस की ओर टकटकी लगाकर देखा कि इस को चंगा हो जाने का विश्वास है।
Act 14:10  और ऊंचे शब्‍द से कहा, अपने पांवों के बल सीधा खड़ा हो: तब वह उछलकर चलने फिरने लगा।
Act 14:11  लोगों ने पौलुस का यह काम देखकर लुकाउनिया भाषा में ऊंचे शब्‍द से कहा; देवता हमारे पास उतर आए हैं।
Act 14:12  और उन्‍होंने बरनबास को ज्यूस, और पौलुस को हिरमेस कहा, क्‍योंकि यह बातें करने में मुख्य था।
Act 14:13  और ज्यूस के उस मन्‍दिर का पुजारी जो उस के नगर के साम्हने था, बैल और फूलों के हार फाटकों पर लाकर लोगों के साथ बलिदान करना चाहता था।
Act 14:14  परन्‍तु बरनबास और पौलुस प्रेरितों ने जब सुना, तो अपने कपड़े फाड़े, और भीड़ में लपक गए, और पुकारकर कहने लगे; हे लोगो तुम क्‍या करते हो?
Act 14:15  हम भी तो तुम्हारे समान दु:ख-सुख भोगी मनुष्य हैं, और तुम्हें सुसमाचार सुनाते हैं, कि तुम इन व्यर्थ वस्‍तुओं से अलग होकर जीवते परमेश्वर की ओर फिरो, जिस ने स्‍वर्ग और पृथ्वी और समुद्र और जो कुछ उन में है बनाया।
Act 14:16  उस ने बीते समयों में सब जातियों को अपने अपने मार्गों में चलने दिया।
Act 14:17  तौभी उस ने अपने आप को बे-गवाह न छोड़ा; किन्‍तु वह भलाई करता रहा, और आकाश से वर्षा और फलवन्‍त ऋतु देकर, तुम्हारे मन को भोजन और आनन्‍द से भरता रहा।
Act 14:18  यह कहकर भी उन्‍होंने लोगों को कठिनता से रोका कि उन के लिये बलिदान न करें।
 
एक साल में बाइबल: 
  • उत्पत्ति ४३-४५ 
  • मत्ती १२:२४-५०