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सोमवार, 31 मार्च 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 52 - Prophesying Meanings (2) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 52 - भविष्यवाणी के अर्थ (2)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 52 

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बाइबल के अनुसार भविष्यवाणी के अर्थ (2)


    पिछले लेख में हमने शब्दों "भविष्यद्वक्ता" और भविष्यद्वाणी" के विभिन्न अर्थों और तात्पर्यों के बार में देखा था। इन बातों की पुष्टि के लिए, तथा यह भी समझने के लिए कि वर्तमान में जो स्वयं को "भविष्यद्वक्ता" कहते हैं, तथा उनकी "भविष्यद्वाणियाँ" परमेश्वर के वचन के समक्ष क्या स्थान रखती हैं, आज हम परमेश्वर के वचन बाइबल के कुछ पदों से "भविष्यद्वक्ता" और "भविष्यद्वाणी" शब्दों के प्रयोग के कुछ उदाहरण देखते हैं। 


बाइबल के इन पदों पर कुछ विचार कीजिए:


* किसी देवी-देवता को पुकारना: 1राजा 18:29 वे दोपहर भर ही क्या, वरन भेंट चढ़ाने के समय तक नबूवत करते रहे, परन्तु कोई शब्द सुन न पड़ा; और न तो किसी ने उत्तर दिया और न कान लगाया। - एल्लियाह से मिली चुनौती के अंतर्गत बाल देवता के नबी अपने देवता को भरसक पुकारते रहे।


* अपने शब्दों के द्वारा लोगों को आश्वस्त अथवा प्रोत्साहित करना, शान्ति या सांत्वना देना: 1 कुरिन्थियों 14:3 परन्तु जो भविष्यद्वाणी करता है, वह मनुष्यों से उन्नति, और उपदेश, और शान्‍ति की बातें कहता है।


* परमेश्वर द्वारा दी गई आज्ञा को बोलना और मानना: 


- यहेजकेल 37:4 तब उसने मुझ से कहा, इन हड्डियों से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे सूखी हड्डियों, यहोवा का वचन सुनो।


- यहेजकेल 37:9-10 तब उसने मुझ से कहा, हे मनुष्य के सन्तान सांस से भविष्यद्वाणी कर, और सांस से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे सांस, परमेश्वर यहोवा यों कहता है कि चारों दिशाओं से आकर इन घात किए हुओं में समा जा कि ये जी उठें। उसकी इस आज्ञा के अनुसार मैं ने भविष्यद्वाणी की, तब सांस उन में आ गई, ओर वे जीकर अपने अपने पांवों के बल खड़े हो गए; और एक बहुत बड़ी सेना हो गई।


* परमेश्वर की ओर से आने वाली घटनाओं और बातों के बारे में बताना:


 - यहेजकेल 36:1, 3 फिर हे मनुष्य के सन्तान, तू इस्राएल के पहाड़ों से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे इस्राएल के पहाड़ों, यहोवा का वचन सुनो। इस कारण भविष्यद्वाणी कर के कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता हे, लोगों ने जो तुम्हें उजाड़ा और चारों ओर से तुम्हें ऐसा निगल लिया कि तुम बची हुई जातियों का अधिकार हो जाओ, और लुतरे तुम्हारी चर्चा करते और साधारण लोग तुम्हारी निन्दा करते हैं;


- यहेजकेल 37:12-14 इस कारण भविष्यद्वाणी कर के उन से कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता है, हे मेरी प्रजा के लोगों, देखो, मैं तुम्हारी कब्रें खोल कर तुम को उन से निकालूंगा, और इस्राएल के देश में पहुंचा दूंगा। सो जब मैं तुम्हारी कब्रें खोलूं, और तुम को उन से निकालूं, तब हे मेरी प्रजा के लोगों, तुम जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ। और मैं तुम में अपना आत्मा समाऊंगा, और तुम जीओगे, और तुम को तुम्हारे निज देश में बसाऊंगा; तब तुम जान लोगे कि मुझ यहोवा ही ने यह कहा, और किया भी है, यहोवा की यही वाणी है।


* परमेश्वर के प्रभाव में आकर उसके निर्देश के अनुसार बोलना: 


- अमोस 3:8 सिंह गरजा; कौन न डरेगा? परमेश्वर यहोवा बोला; कौन भविष्यद्वाणी न करेगा?


  - यहेजकेल 36:6 इस कारण इस्राएल के देश के विषय में भविष्यद्वाणी कर के पहाड़ों, पहाडिय़ों, नालों, और तराइयों से कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता है, देखो, तुम ने जातियों की निन्दा सही है, इस कारण मैं अपनी बड़ी जलजलाहट से बोला हूँ।


* आराधना, स्तुति करना, और आराधना के लिए संगीत वाद्य बजाना: 1इतिहास 25:1-6 फिर दाऊद और सेनापतियों ने आसाप, हेमान और यदूतून के कितने पुत्रों को सेवकाई के लिये अलग किया कि वे वीणा, सारंगी और झांझ बजा बजाकर नबूवत करें। और इस सेवकाई के काम करने वाले मनुष्यों की गिनती यह थी: अर्थात आसाप के पुत्रों में से तो जक्कूर, योसेप, नतन्याह और अशरेला, आसाप के ये पुत्र आसाप ही की आज्ञा में थे, जो राजा की आज्ञा के अनुसार नबूवत करता था। फिर यदूतून के पुत्रों में से गदल्याह, सरीयशायाह, हसब्याह, मत्तित्याह, ये ही छ: अपने पिता यदूतून की आज्ञा में हो कर जो यहोवा का धन्यवाद और स्तुति कर कर के नबूवत करता था, वीणा बजाते थे। और हेमान के पुत्रों में से, मुक्किय्याह, मत्तन्याह, लज्जीएल, शबूएल, यरीमोत, हनन्याह, हनानी, एलीआता, गिद्दलती, रोममतीएजेर, योशबकाशा, मल्लोती, होतीर और महजीओत। परमेश्वर की प्रतिज्ञानुकूल जो उसका नाम बढ़ाने की थी, ये सब हेमान के पुत्र थे जो राजा का दर्शी था; क्योंकि परमेश्वर ने हेमान को चौदह बेटे और तीन बेटियां दीं थीं। ये सब यहोवा के भवन में गाने के लिये अपने अपने पिता के आधीन रह कर, परमेश्वर के भवन, की सेवकाई में झांझ, सारंगी और वीणा बजाते थे। और आसाप, यदूतून और हेमान राजा के आधीन रहते थे।


* किसी गुप्त या अनजानी बात को बताना: लूका 22:64 और उस की आंखे ढांपकर उस से पूछा, कि भविष्यद्वाणी कर के बता कि तुझे किसने मारा - प्रभु यीशु मसीह को पकड़ने के बाद उसका का ठट्ठा करते समय उससे उपहास करते हुए पूछना।  


ये “भविष्यद्वक्ता” और “भविष्यद्वाणी” शब्दों के बाइबल में विभिन्न अभिप्रायों के प्रयोग को दिखाने के लिए केवल उदाहरणस्वरूप लिए गए बाइबल के कुछ पद हैं; संपूर्ण सूची नहीं।


आज ईसाई या मसीही समाज में, विशेषकर उन समुदायों और डिनॉमिनेशंस में जो परमेश्वर पवित्र आत्मा के बारे में गलत शिक्षाएं बताते और सिखाते रहते हैं, ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने आप को “नबी” या “भविष्यद्वक्ता” कहते हैं, और परमेश्वर के नाम से कुछ भी कहते रहते हैं। उनका मुख्य ध्येय अपने आप को उच्च और प्रशंसनीय बनाना तथा परमेश्वर के नाम, काम, और उसके वचन के द्वारा अपने लिए सांसारिक लाभ, संपत्ति, यश, ओहदा, आदि एकत्रित करना होता है। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की गलत समझ और गलत उपयोग से बचें। वचन की सही समझ और सही उपयोग आपके लिए आत्मिक उन्नति और आशीष का कारण होगा, किन्तु गलत समझ और गलत उपयोग बहुत हानिकारक होगा। इसलिए यदि आप किसी गलत शिक्षा अथवा धारणा में पड़े हुए हैं, तो स्थिति को जाँच-परखकर अभी समय और अवसर के रहते उससे बाहर निकल आएं, आवश्यक सुधार कर लें।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है। 

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 52

English Translation

Biblical Meanings of Prophesying (2)


In the previous article, we have seen the various implications and meanings of the words “Prophet” and “Prophecy.” Today, let us look at some examples of the usage, meaning, and implications of these two words through some verses from the Bible; using them as examples of what we have said, and to see how the present day self-proclaimed "Prophets" and their "prophecies" measure up to God's Word.


Consider the following verses:


* To call unto some deity: 1 Kings 18:29 And when midday was past, they prophesied until the time of the offering of the evening sacrifice. But there was no voice; no one answered, no one paid attention. The prophets of Baal called out to their deity; but in vain.


* To comfort and assure people through speaking to them: 1 Corinthians 14:3 But he who prophesies speaks edification and exhortation and comfort to men.


* To speak out and obey God’s commandments:


- Ezekiel 37:4 Again He said to me, Prophesy to these bones, and say to them, 'O dry bones, hear the word of the Lord!’


- Ezekiel 37:9-10 Also He said to me, Prophesy to the breath, prophesy, son of man, and say to the breath, Thus says the Lord God: Come from the four winds, O breath, and breathe on these slain, that they may live. So I prophesied as He commanded me, and breath came into them, and they lived, and stood upon their feet, an exceedingly great army.


* To foretell about the future events, from God:


- Ezekiel 36:1, 3 And you, son of man, prophesy to the mountains of Israel, and say, O mountains of Israel, hear the word of the Lord! therefore prophesy, and say, Thus says the Lord God: Because they made you desolate and swallowed you up on every side, so that you became the possession of the rest of the nations, and you are taken up by the lips of talkers and slandered by the people


- Ezekiel 37:12-14 Therefore prophesy and say to them, Thus says the Lord God: Behold, O My people, I will open your graves and cause you to come up from your graves, and bring you into the land of Israel. Then you shall know that I am the Lord, when I have opened your graves, O My people, and brought you up from your graves. I will put My Spirit in you, and you shall live, and I will place you in your own land. Then you shall know that I, the Lord, have spoken it and performed it, says the Lord.


* To speak under the power and influence of God, according to His instructions:



- Amos 3:8 A lion has roared! Who will not fear? The Lord God has spoken! Who can but prophesy?


 - Ezekiel 36:6 Therefore prophecy concerning the land of Israel, and say to the mountains, the hills, the rivers, and the valleys, Thus says the Lord God: Behold, I have spoken in My jealousy and My fury, because you have borne the shame of the nations.


* To praise and worship God, and to play musical instruments for worshipping: 1Chronicles 25:1-6 Moreover David and the captains of the army separated for the service some of the sons of Asaph, of Heman, and of Jeduthun, who should prophesy with harps, stringed instruments, and cymbals. And the number of the skilled men performing their service was: Of the sons of Asaph: Zaccur, Joseph, Nethaniah, and Asharelah; the sons of Asaph were under the direction of Asaph, who prophesied according to the order of the king. Of Jeduthun, the sons of Jeduthun: Gedaliah, Zeri, Jeshaiah, Shimei, Hashabiah, and Mattithiah, six, under the direction of their father Jeduthun, who prophesied with a harp to give thanks and to praise the Lord. Of Heman, the sons of Heman: Bukkiah, Mattaniah, Uzziel, Shebuel, Jerimoth, Hananiah, Hanani, Eliathah, Giddalti, Romamti-Ezer, Joshbekashah, Mallothi, Hothir, and Mahazioth. All these were the sons of Heman the king's seer in the words of God, to exalt his horn. For God gave Heman fourteen sons and three daughters. All these were under the direction of their father for the music in the house of the Lord, with cymbals, stringed instruments, and harps, for the service of the house of God. Asaph, Jeduthun, and Heman were under the authority of the king.


* To tell about some secret or unknown thing: Luke 22:64 They blindfolded him and demanded, "Prophesy! Who hit you?"


These are just a few representative, sample verses, and not an exhaustive list from the Bible to illustrate the varying meanings of the words “Prophet” and “Prophecy.” 


Today, in Christendom, especially amongst those groups, sects, and denominations who keep preaching and teaching wrong doctrines and false teachings about God the Holy Spirit, there is no dearth of people who call themselves as “prophets”, are self-appointed or man-appointed to this position, and keep saying anything that comes to their mind as a “prophecy from God.” But their main purpose is to gain prominence, to become famous and acquire a name and following; they use the name of God, His Word, and things done in his name to acquire worldly benefits and possessions, name, fame, and status in the society, and rise to a position of having authority over people. If you are a Christian Believer, then it is essential for you to recognize and beware of the misunderstandings and misuse of God’s Word and name. Having a correct understanding and using God’s Word worthily will be a blessing for you and help you in your spiritual growth; but misuse and propagating misunderstandings will be deleterious and catastrophic. Therefore, check and evaluate what you accept and believe in, and if you are caught up and involved in some wrong doctrines and false teachings, in misconceptions and wrong notions, then now, while God is giving you the time and opportunity to rectify your beliefs and situation and come out of the wrong things, do so; lest by the time you realize and decide to do so, it is very late and beyond the point of correction.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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