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रविवार, 30 मार्च 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 51 - Prophesying Meanings (1) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 51 - भविष्यद्वाणी के अर्थ (1)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 51 

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बाइबल के अनुसार भविष्यद्वाणी के अर्थ (1)


इफिसियों 4:11 में कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त किए गए पाँच प्रकार के सेवकों या कार्यकर्ताओं और उनकी सेवकाई या कार्यों के विषय में सूची दी गई है, बताया गया है। मूल यूनानी भाषा में इनके लिए प्रयोग किए गए शब्दों के आधार पर, ये पाँचों कार्यकर्ता और उनके कार्य, वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इनमें से पहले, प्रेरितों, के बारे में हम पहले विस्तार से देख चुके हैं कि वर्तमान में जो लोग अपने आप को प्रेरित घोषित करते हैं, और इसे उपाधि के अनुसार प्रयोग करके ईसाई या मसीही समाज में आदर, सम्मान, और उच्च स्थान प्राप्त करने या दिखाने का यत्न करते हैं, वह “प्रेरित” शब्द के परमेश्वर के वचन बाइबल में किए गए प्रयोग और अभिप्राय के अनुरूप नहीं है। सूची के दूसरे कार्यकर्ता या सेवक हैं भविष्यद्वक्ता, जिनके बारे में हमने पिछले लेखों से देखना आरंभ किया है। हमने देखा है कि परमेश्वर के वचन बाइबल में परमेश्वर के लोगों के मध्य भावी कहने या भविष्य की बातें बताने वाले परमेश्वर की ओर से नियुक्त किए गए भविष्यद्वक्ता, अन्य सेवकाइयों की तुलना में बहुत कम रहे हैं। परमेश्वर ने अपने लोगों के मध्य जब भी इन भविष्यद्वक्ताओं को खड़ा किया, तब ऐसा परमेश्वर और उसके वचन से विमुख हो चुके उसके लोगों पर, उनके किए के कारण उन पर आने वाले परमेश्वर के प्रकोप और दण्ड के विषय सचेत करने और उन लोगों को अवसर एवं समय रहते परमेश्वर की ओर लौट आने के लिए उकसाने के लिए किया। बाइबल में बताए गए परमेश्वर के ये भविष्यद्वक्ता लोगों के मनोरंजन के लिए, उनकी मन-पसंद बातें सुनाने, उनके कानों की खुजली मिटाने (2 तीमुथियुस 4:3) के लिए कार्य नहीं करते थे। बाइबल में उल्लेखित सभी भविष्यद्वक्ता परमेश्वर द्वारा खड़े और नियुक्त किए गए थे, और उनमें से अधिकांशतः इस कार्य को करना ही नहीं चाहते थे, उन्होंने भरसक प्रयास किया कि परमेश्वर उन्हें यह ज़िम्मेदारी न दे। उन्होंने परमेश्वर के सामने बहाने बनाए, उसे अपनी दुर्बलताएं बताईं, कि किसी प्रकार परमेश्वर यह समझ जाए कि वे कितने अयोग्य हैं और उन्हें इस दायित्व से मुक्त कर दे। बाइबल के परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं में से कोई भी ऐसा नहीं था, जिसने स्वयं ही इस सेवकाई को अपना लिया हो, या फिर अपनी या कुछ अन्य मनुष्यों, अथवा किसी मत या समुदाय के कहने पर भविष्यद्वक्ता बन बैठा हो। परमेश्वर के इन सभी भविष्यद्वक्ताओं को, उनके सन्देश के कारण, सामान्यतः अपने समय के लोगों के विरोध और तिरस्कार का सामना करना पड़ा; उन्हें अपनी सेवकाई के दौरान निरंतर दुःख उठाने पड़े, ताड़नाएँ सहनी पडीं, किन्तु फिर भी परमेश्वर के कहे के अनुसार सेवकाई को करना पड़ा। आज के इन तथाकथित “भविष्यद्वक्ताओं” के विपरीत, परमेश्वर के भविष्यद्वक्ताओं को अपने समय के समाज और परमेश्वर के लोगों से जिनके मध्य उन्हें सेवकाई के लिए भेजा गया था नाम, संपत्ति, और प्रसिद्धि नहीं, वरन बदनामी, विरोध और परेशानी ही मिले।


पुराने और नए नियम की मूल इब्रानी और यूनानी भाषाओं के जिन शब्दों का अनुवाद भविष्यद्वक्ता या Prophet और भविष्यवाणी या Prophesy किया गया है, आम धारणा के विपरीत उनका शब्दार्थ हमेशा ही भावी कहना या भविष्य के बातें बताना ही नहीं होता है। मोटे तौर पर इन शब्दों का अभिप्राय होता है “सामने बोलना”, जहाँ “सामने” से “आने वाले समय के बारे में” नहीं वरन अभिप्राय “समक्ष” का रहता है; अर्थात किसी व्यक्ति या समूह के सामने, या समक्ष, या सम्मुख खड़े होकर उन्हें संबोधित करना, उनसे कुछ कहना। साथ ही आवश्यक नहीं कि जो बोला जाए वह लेख के समान गद्य ही हो, वह गीत या कविता/पद्य भी हो सकता है। और बाइबल में ये शब्द केवल यहोवा परमेश्वर के सेवकों और उनकी सेवकाइयों के लिए ही प्रयोग नहीं किए गए हैं; वरन अन्य देवी-देवताओं के उपासकों और उनके कार्य के लिए भी प्रयोग किए गए हैं।


साथ ही ध्यान कीजिए कि बाइबल में भविष्यद्वक्ताओं और उनकी बातों के उदाहरणों के आधार पर यह भी प्रकट और स्पष्ट है कि परमेश्वर द्वारा नियुक्त भविष्यद्वक्ता की कही हर बात भी “भविष्यवाणी” नहीं होती थी। बाइबल में “भविष्यवाणी” केवल उसे ही कहा गया है जो परमेश्वर के उस भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के कहे पर और उसकी ओर से मिले सन्देश में कहा है। कई बार भविष्यद्वक्ताओं ने अपनी भावनाएं और विचार भी व्यक्त किए, किन्तु उन सभी बातों को “भविष्यवाणी” नहीं कहा गया है। और न ही यह अनिवार्य है कि परमेश्वर का नियुक्त भविष्यद्वक्ता यदि कुछ कहेगा, तो परमेश्वर उसकी हर बात को मानने और पूरा करने के लिए बाध्य है। इन बातों का एक अच्छा उदाहरण है 2 शमूएल 7 अध्याय में दाऊद द्वारा परमेश्वर के लिए भवन बनवाने की लालसा रखना, उसे व्यक्त करना, और नातान नबी द्वारा दाऊद की इस इच्छा का अनुमोदन करना। किन्तु परमेश्वर ने दाऊद और नातान दोनों ही की इस बात को अस्वीकार कर दिया, यद्यपि वे दोनों उसके जन थे, उसके भविष्यद्वक्ता थे, उससे प्रेम करते थे, और परमेश्वर के आदर एवं महिमा के लिए कुछ करने की इच्छा रखते थे, और परमेश्वर की सेवकाई में संलग्न थे। परमेश्वर ने उन दोनों को अपने लोग, अपने नबी होने से तिरस्कार नहीं किया, किन्तु उनकी लालसा को स्वीकार करने और मानने के लिए भी परमेश्वर बाध्य नहीं बना। इसलिए हर “भविष्यद्वक्ता” की हर बात “भविष्यवाणी” नहीं है, चाहे वह बात परमेश्वर के आदर और महिमा के लिए ही क्यों न कही गई हो; और न ही हर बात परमेश्वर की ओर से पूरी होगी, जब तक कि उस “भविष्यद्वक्ता” ने परमेश्वर की ओर से और उसकी अधीनता में होकर वह बात न कही हो।


अगले लेख में हम उपरोक्त बातों से सम्बन्धित बाइबल के कुछ पदों को देखेंगे. 


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 51

English Translation

Biblical Meanings of Prophesying (1)


We have seen that in Ephesians 4:11 a list of five kinds of ministries and their workers appointed by the Lord Jesus for the growth and edification of His church is given. The words used for them in the original Greek language, in context of the Church and the Christian Faith, all imply various ministries and functions related to the ministry of the Word of God. We have seen in detail about the first of these, i.e., the Apostles, and have seen how and why those people who, presently, call themselves as “Apostles” and use this term as a title to gain name, fame, and temporal benefits in Christendom, are not actually using this term in accordance with its Biblical use. The second ministry and workers of this list are the “Prophets”, and we are now considering the Biblical facts about them in the recent articles. We saw that in God’s Word the Bible, in comparison to those engaged in other ministries, the God appointed “foretellers of events” amongst God’s people, as the “Prophets” are generally thought of, have been very few and far in-between. Whenever God raised up these “Prophets” - the “foretellers of events”, it was to warn people about their wayward behavior and forsaking God for worldliness, to provoke them to turn back to God, or else be ready to face God’s impending judgment and destruction upon them for their sins. These Biblical Prophets of God, did not function to entertain people, or to tell them pleasing things according to their liking, or to speak to the people to satisfy their ‘itching ears’ (2 Timothy 4:3). Each and every Prophet mentioned in the Bible was raised up and appointed by God, and generally speaking, hardly anyone was willing to accept this responsibility and function as God’s Prophet. They usually tried their utmost to somehow wriggle out of this God given responsibility, and pleaded to God using various excuses that God would realize how unworthy they were, and relieve them from this office. Amongst the Prophets of God mentioned in the Bible, there was not one single Prophet who took this responsibility upon himself on his own, or became a “Prophet” at the behest of some person, or group of persons, or any sect or institution. All these Prophets of God, because of their message, had to face the rejection and opposition of the people of their times and place; they continually had to suffer problems and persecution throughout their ministry, and yet carry on in their ministry, doing what God asked them to do. Contrary to our present day “Prophets”, those Prophets of God did not get any name, fame, and worldly possessions from the people and society of their times; instead they all received slander, opposition, and problems from God’s people amongst whom they were sent to minister.


The words used in the original Hebrew and Greek languages of the Old and the New Testaments respectively, and translated as “Prophet” and “Prophecy”, contrary to common belief, do not necessarily mean to foretell things, i.e., to tell about events before they happen. Generally speaking, the words used in the original languages imply “to speak before” - which could be to speak or say something before, i.e., in the presence of someone, or to address, i.e., speak to some persons; or to be able to tell beforehand what would happen sometime later. Moreover, what they said was not necessarily in prose, it could as well be in verse or in poetry. Also, the words “Prophet” and “Prophecy”, have not been used in the Bible, only for the workers of the Lord God Jehovah and their ministries, but also for the worshippers of other deities and their deeds.


Also take note that it is evident from these examples whatever the appointed Prophet of God spoke, was not necessarily a “prophecy.” In the Bible, a prophesy is only that which the prophet speaks under the instructions of God, God giving him the contents of the prophetic message. Many times, the Prophets of God have expressed their own views and feelings about various things, but these have not been called “prophecies.” Another thing to bear in mind is that it is not necessarily true that whatever God’s prophet says or advises in the name of God, would always be from God and worthy of being obeyed. A good example of this is in 2 Samuel chapter 7 of King David expressing to God’s Prophet Nathan his desire of building a Temple for God, and Nathan agreeing with David, approving David’s desire. But God rejected this desire of both David and Nathan, although both of them loved God, were God's prophet, wanted to honor and exalt God, both of them were people and prophets of God, and in active service of God. In refusing to accept their desire, God did not reject them as His appointees and Prophets, but neither was God under any compulsion to act according to whatever they said, even if it was for the worship and glory of God. Therefore, everything that a “Prophet” says need not necessarily be from God, nor will it automatically be considered as “Prophecy”; even though it may be said for the honor and glory of God. Nor will God fulfill everything that a “Prophet” says, unless and until that “Prophet” has actually said something that God asked him to say, under the power of God.


In the next article we will look at some Bible verses on what has been said above.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours. 

 

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