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Saturday, January 3, 2015

साथ


   मुझे लोगों के साथ रहना अच्छा लगता है....अकसर! जब हम अपने पसन्द के लोगों के साथ होते हैं तो एक अलग ही प्रकार आनन्द हमारे हृदयों में होता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हम सदा ही अपने पसन्द के लोगों के साथ नहीं रहने पाते। कभी कभी लोग कष्टदायक भी होते हैं; शायद इसीलिए किसी ने कहा है, "मैं जितना अधिक लोगों को जानने लगता हूँ, मुझे अपने कुत्ते से उतना अधिक प्रेम होता जाता है!" जब किसी संबंध से हमें कष्ट होता है या उसमें हमें आनन्द नहीं मिलता तो हम दूसरे को दोषी ठहराने लगते हैं और फिर कोई बहाना बनाकर उस संबंध से पृथक होकर अपनी पसन्द के लोगों के साथ संगति ढूंढ़ने लगते हैं।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पौलुस ने अपनी एक पत्री में लिखा कि अपने मसीही विश्वासी भाई-बहनों के साथ सप्रेम व्यवहार एवं संबंध बनाए रखें। साथ ही उसने मसीह यीशु के स्वभाव के अनुरूप परस्पर एकमनता बनाए रखने तथा दूसरों के हित के विषय में प्रयासरत रहने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया (फिलिप्पियों 2:2-5)। इस बारे में थोड़ा विचार कीजिए - प्रभु यीशु ने स्वर्ग के वैभव और महिमा को, अपने प्रत्येक अधिकार को हमारे लिए छोड़ दिया; हमारे पापों की क्षमा और उद्धार के लिए वह एक दास का स्वरूप लेकर स्वर्ग से संसार में आ गया, और हमें बचाने के लिए सबसे बड़ा बलिदान दे दिया - अपने प्राणों का बलिदान, ताकि हम उसमें होकर परमेश्वर के साथ एक आनन्दमय संबंध में आ सकें (इब्रानियों 12:2)। और यह सब उसने हमारे लिए तब किया जब हम पापी ही थे, उसके लिए किसी रीति से आनन्दायक नहीं वरन कष्टदायक ही थे (रोमियों 5:8)।

   इसलिए जब अगली बार आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हों जिसके साथ निभाना सरल नहीं है, तो प्रभु यीशु से प्रार्थना करें कि आपको ऐसी सामर्थ दे कि आप उस व्यक्ति के साथ प्रभु के प्रेम को दिखा सकें। प्रभु के प्रेम को हर परिस्थिति में प्रदर्शित करने का प्रयास करते रहें, और समय के साथ आपको यह देखकर अचरज होगा कि कैसे परमेश्वर लोगों के प्रति आपके नज़रिये एवं रवैये को बदल देता है। - जो स्टोवैल


दूसरों के साथ निभा पाने की कुंजी है अपने अन्दर प्रभु यीशु का सा मन रखना।

परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा। - रोमियों 5:8

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 2:1-11
Philippians 2:1 सो यदि मसीह में कुछ शान्‍ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करूणा और दया है। 
Philippians 2:2 तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। 
Philippians 2:3 विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। 
Philippians 2:4 हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों के हित की भी चिन्‍ता करे। 
Philippians 2:5 जैसा मसीह यीशु का स्‍वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्‍वभाव हो। 
Philippians 2:6 जिसने परमेश्वर के स्‍वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। 
Philippians 2:7 वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्‍वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। 
Philippians 2:8 और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। 
Philippians 2:9 इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है। 
Philippians 2:10 कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें। 
Philippians 2:11 और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है।

एक साल में बाइबल: 
  • उत्पत्ति 7-9
  • मत्ती 3