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Friday, November 4, 2016

विदित या वास्तविक


   अकसर यह कहा जाता है कि "जो प्रत्यक्ष है वह वास्तविक है"। अमेरिका के निवासियों के लिए यह धारणा संभवतः 26 सितंबर 1960 के दिन सजीव हुई होगी, जब उस दिन राष्ट्रपति पद के दो उम्मीदवारों के मध्य होने वाली बहस का सर्वप्रथम राष्ट्रीय टेलिविज़न पर प्रसारण किया गया। टेलिविज़न कैमरा के सामने जॉन केनेडी शांत और नियंत्रण में नज़र आए किंतु रिचर्ड निक्सन बेचैन दिखाई दे रहे थे। जो विचार इससे लोगों के सामने आया वह था कि केनेडी अधिक मज़बूत नेता होंगे। इस प्रसारण ने ना केवल उस चुनाव को एक निर्णायक मोड़ दे दिया, वरन उसने अमेरिका की राजनीतिक प्रक्रीया को भी बदल दिया; विदित तथा प्रत्यक्ष होने का महत्व राजनीति का नियम बन गया।

   अकसर जो विदित होता है वह वास्तविक होता है, परन्तु हमेशा नहीं - विशेषकर परमेश्वर को लेकर हमारी धारणाओं के संबंध में। जब प्रभु यीशु और उनके चेले एक छोटी मछली पकड़ने वाली नाव में गलील की झील को पार कर रहे थे, तो अचानक आए एक तूफान से उनकी नाव डूबने को होने लगी। प्रभु यीशु नाव में सो रहे थे और तूफान देखकर चेले घबरा गए, उन्होंने बेचैन होकर उन्हें जगाया और उनसे कहा, "...हे गुरू, क्या तुझे चिन्‍ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं" (मरकुस 4:38)।

   उन चेलों का यह प्रश्न उन प्रश्नों के समान ही है जो मैंने अनेकों बार परमेश्वर से पूछे हैं; जब भी मुझे प्रतीत हुआ है कि परमेश्वर का किसी विपरीत परिस्थिति में मेरे पक्ष में हस्तेक्षेप ना करना इस बात का सूचक है कि उसे मेरी परवाह नहीं है। लेकिन वास्तविकता यही है कि मेरे लिए उसकी परवाह, मेरे देख पाने या जाँच अथवा नाप पाने से कहीं बढ़कर है। हमारा प्रभु परमेश्वर हमारी हर बात के प्रति गहरी परवाह रखता है; इसीलिए वह हमें कहता है, आश्वस्त करता है कि हम अपनी सभी चिंता उस पर डाल दें: "और अपनी सारी चिन्‍ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है" (1 पतरस 5:7), प्रत्येक परिस्थिति का निवारण उस पर छोड़ दें, क्योंकि वह हमारी भलाई ही की योजनाएं बनाता है, भलाई ही के लिए कार्य करता रहता है। चाहे यह विदित हो या ना हो पर वास्तविकता यही है। - बिल क्राउडर


चाहे हम परमेश्वर की प्रेम भरी उपस्थिति को महसूस ना भी करें, 
लेकिन उसकी प्रेम भरी देखभाल हमारे साथ सदा बनी रहती है।

और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। - रोमियों 8:28

बाइबल पाठ: मरकुस 4:35-41
Mark 4:35 उसी दिन जब सांझ हुई, तो उसने उन से कहा; आओ, हम पार चलें, 
Mark 4:36 और वे भीड़ को छोड़ कर जैसा वह था, वैसा ही उसे नाव पर साथ ले चले; और उसके साथ, और भी नावें थीं। 
Mark 4:37 तब बड़ी आन्‍धी आई, और लहरें नाव पर यहां तक लगीं, कि वह अब पानी से भरी जाती थी। 
Mark 4:38 और वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उस से कहा; हे गुरू, क्या तुझे चिन्‍ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं? 
Mark 4:39 तब उसने उठ कर आन्‍धी को डांटा, और पानी से कहा; “शान्‍त रह, थम जा”: और आन्‍धी थम गई और बड़ा चैन हो गया। 
Mark 4:40 और उन से कहा; तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं? 
Mark 4:41 और वे बहुत ही डर गए और आपस में बोले; यह कौन है, कि आन्‍धी और पानी भी उस की आज्ञा मानते हैं?

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 32-33
  • इब्रानियों 1