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Saturday, May 30, 2015

नम्र मन


   साहित्य में अकसर देखा जाता है कि चरित्र का कोई छोटा सा ऐब, कहानी के नायक के पतन का कारण हो जाता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में भी हम ऐसे उदाहरण पाते हैं, जिनमें से एक है राजा उज़्ज़ियाह का। उज़्ज़ियाह 16 वर्ष की आयु में यहूदा का राजा बना; राजा बनने के कई वर्ष पश्चात तक वह परमेश्वर का खोजी रहा और जब तक वह ऐसा करता रहा, परमेश्वर उसे सफलता तथा उन्नति देता रहा, उसे सामर्थी करता रहा (2 इतिहास 26:4-5)। इस सफलता, उन्नति तथा सामर्थ से उसकी ख्याति चारों ओर फैल गई; किंतु इससे उसके अन्दर घमंड भी आ गया, जो फिर उसके विनाश का कारण बन गया (2 इतिहास 26:15-16)।

   अपने घमंड में उज़्ज़ियाह को लगा कि वह परमेश्वर के नियमों की अवहेलना कर सकता है, अपनी मन-मर्ज़ी कर सकता है। वह मन्दिर में गया और मन्दिर के पुजारी के कार्य को करने लगा - परमेश्वर की वेदी पर धूप जलाने लगा। पुजारियों ने उसे चिताया कि यह करना उसके लिए सही नहीं है और रोकना चाहा, परन्तु वह उल्टे पुजारियों पर क्रोधित होने लगा; तब परमेश्वर ने उसे कोढ़ी कर दिया और वह कोढ़ की दशा में मन्दिर तथा राज-पद से निकाल दिया गया (2 इतिहास 26:16-20)।

   साहित्य तथा जीवन, दोनों में ही हम पाते हैं कि सुनामी और प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने ही घमंड या किसी अन्य ऐब के कारण अपमान तथा कष्ठ में गिर जाते हैं; "और उज्जिय्याह राजा मरने के दिन तक कोढ़ी रहा, और कोढ़ के कारण अलग एक घर में रहता था, वह तो यहोवा के भवन में जाने न पाता था। और उसका पुत्र योताम राजघराने के काम पर नियुक्त किया गया और वह लोगों का न्याय भी करता था" (2 इतिहास 26:21)।

   प्रशंसा के अमृत को अहंकार का विष बनने से रोकने का एक ही मार्ग है, एक नम्र तथा आज्ञाकारी मन के साथ प्रभु परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलते रहना; उसे ही अपने मन तथा जीवन में प्राथमिकता और महिमा का स्थान देना। - डेविड मैक्कैसलैंड


जैसे चान्दी के लिये कुठाई और सोने के लिये भट्ठी हैं, वैसे ही मनुष्य के लिये उसकी प्रशंसा है। - नीतिवचन 27:21

विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहिले घमण्ड होता है। - नीतिवचन 16:18

बाइबल पाठ: 2 इतिहास 26:3-21
2 Chronicles 26:3 जब उज्जिय्याह राज्य करने लगा, तब वह सोलह वर्ष का था। और यरूशलेम में बावन वर्ष तक राज्य करता रहा, और उसकी माता का नाम यकील्याह था, जो यरूशलेम की थी। 
2 Chronicles 26:4 जैसे उसका पिता अमस्याह, किया करता था वैसा ही उसने भी किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक था। 
2 Chronicles 26:5 और जकर्याह के दिनों में जो परमेश्वर के दर्शन के विषय समझ रखता था, वह परमेश्वर की खोज में लगा रहता था; और जब तक वह यहोवा की खोज में लगा रहा, तब तक परमेश्वर उसको भाग्यवान किए रहा। 
2 Chronicles 26:6 तब उसने जा कर पलिश्तियों से युद्ध किया, और गत, यब्ने और अशदोद की शहरपनाहें गिरा दीं, और अशदोद के आसपास और पलिश्तियों के बीच में नगर बसाए। 
2 Chronicles 26:7 और परमेश्वर ने पलिश्तियों और गूर्बालवासी, अरबियों और मूनियों के विरुद्ध उसकी सहायता की। 
2 Chronicles 26:8 और अम्मोनी उज्जिय्याह को भेंट देने लगे, वरन उसकी कीर्ति मिस्र के सिवाने तक भी फैल गई्र, क्योंकि वह अत्यन्त सामथीं हो गया था। 
2 Chronicles 26:9 फिर उज्जिय्याह ने यरूशलेम में कोने के फाटक और तराई के फाटक और शहरपनाह के मोड़ पर गुम्मट बनवा कर दृढ़ किए। 
2 Chronicles 26:10 और उसके बहुत जानवर थे इसलिये उसने जंगल में और नीचे के देश और चौरस देश में गुम्मट बनवाए और बहुत से हौद खुदवाए, और पहाड़ों पर और कर्म्मेल में उसके किसान और दाख की बारियों के माली थे, क्योंकि वह खेती किसानी करने वाला था। 
2 Chronicles 26:11 फिर उज्जिय्याह के योद्धाओं की एक सेना थी जिनकी गिनती यीएल मुंशी और मासेयाह सरदार, हनन्याह नामक राजा के एक हाकिम की आज्ञा से करते थे, और उसके अनुसार वह दल बान्ध कर लड़ने को जाती थी। 
2 Chronicles 26:12 पितरों के घरानों के मुख्य मुख्य पुरुष जो शूरवीर थे, उनकी पूरी गिनती दो हजार छ: सौ थी। 
2 Chronicles 26:13 और उनके अधिकार में तीन लाख साढ़े सात हजार की एक बड़ी बड़ी सेना थी, जो शत्रुओं के विरुद्ध राजा की सहायता करने को बड़े बल से युद्ध करने वाले थे। 
2 Chronicles 26:14 इनके लिये अर्थात पूरी सेना के लिये उज्जिय्याह ने ढालेæ