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Sunday, January 7, 2018

अनुग्रह


   मेरा घर एक बड़े पहाड़ की जड़ में स्थित घाटी में एक पानी के नाले कि किनारे पर है। जब शरद ऋतु के बाद बर्फ पिघलती है, या जब कभी भारी बारिश होती है, वह नाला नदी का रूप ले लेता है। उसके पानी में इतनी गहराई और वेग हो जाता है कि लोग उसमें डूब चुके हैं। एक दिन मैं उस नाले के उद्गम को देखने निकल पड़ा। नाले के किनारे से होते हुए पहाड़ के ऊपर चढ़ने पर मुझे पता चला कि उस नाले का पानी पहाड़ के ऊपर स्थित एक बर्फ से ढके मैदान से आ रहा था। उस मैदान से बर्फ पिघल कर छोटी-छोटी नालियों से नीचे की ओर बहना आरंभ करती है, और ये नालियां एक-दूसरे के साथ मिलकर फिर वह नाला बना देती हैं जो मेरे घर के पास से बहता है।

   इससे मुझे प्रार्थना के बारे में विचार आया कि अधिकांशतः हम प्रार्थना संबंधी प्रवाह को गलत ओर करते हैं। हम नीचे, अपनी चिंताओं से, ऊपर परमेश्वर की ओर जाना चाहते हैं। हम परमेश्वर को अपनी बातों, आवश्यकताओं और चिंताओं के बारे में ऐसे बताते हैं, जैसे कि परमेश्वर को उनके बारे में कुछ पता ही नहीं है। हम परमेश्वर से ऐसे विनती करते हैं, मानो किसी रीति से परमेश्वर के मन को बदल देंगे, ईश्वरीय अनिच्छा को परिवर्तित कर देंगे। क्या हमें ऊपर, जहाँ से परमेश्वर के अनुग्रह का प्रवाह आरंभ होता है, वहाँ से ही आरंभ नहीं करना चाहिए?

   जब हम अपना दृष्टिकोण बदलते हैं तो हमें एहसास होता है कि परमेश्वर पहले से ही हमारी चिंताओं और आवश्यकताओं से अवगत है, और उनके लिए कार्यरत है। हमारा स्वर्गीय पिता जानता है कि हमें किस बात की आवश्यकता है (मत्ती 6:8)।

   जल के समान, ईश्वरीय अनुग्रह भी ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होता है। हमें परमेश्वर के साथ आरंभ कर के उससे पूछना चाहिए कि पृथ्वी पर उसके कार्य में हम क्या भूमिका निभा सकते हैं। प्रार्थना के इस नए आरंभ बिंदु के साथ हमारा परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। हम अपने चारों ओर प्रकृति में एक महान कलाकार की कलाकृतियों को देखने लगते हैं। हम मनुष्यों को देखते हैं और परमेश्वर की छवि में बने अनन्त नियति वाले व्यक्तियों को पाते हैं। इस बदले हुए दृष्टिकोण के कारण परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद और स्तुति स्वतः ही हमारे हृदयों से निकलने लगते हैं; हम चिंता करने वाले नहीं वरन आराधना करने वाले बन जाते हैं। - फिलिप यैन्सी


प्रार्थना परमेश्वर के प्रावधानों को हमारी आवश्यकताओं के साथ मिला देती है।

इसलिये तुम चिन्‍ता कर के यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे? क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्‍तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए। इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी। – मत्ती-6:31-33

बाइबल पाठ: मत्ती 6:5-13
Matthew 6:5 और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये सभाओं में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े हो कर प्रार्थना करना उन को अच्छा लगता है; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके।
Matthew 6:6 परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्‍द कर के अपने पिता से जो गुप्‍त में है प्रार्थना कर; और तब तेरा पिता जो गुप्‍त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा।
Matthew 6:7 प्रार्थना करते समय अन्यजातियों के समान बक बक न करो; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी।
Matthew 6:8 सो तुम उन के समान न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या क्या आवश्यक्ता है।
Matthew 6:9 सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए।
Matthew 6:10 तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।
Matthew 6:11 हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।
Matthew 6:12 और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर।
Matthew 6:13 और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं।आमीन।


एक साल में बाइबल: 
  • उत्पत्ति 18-19
  • मत्ती 6:1-18