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Monday, January 27, 2020

नम्र



      एक दिन विश्वविद्यालय की एक दर्शनशास्त्र की कक्षा में, एक छात्र ने अपने शिक्षक द्वारा व्यक्त दृष्टिकोण को लेकर भड़काऊ टिप्पणी की। अन्य छात्र यह देखकर हैरान रह गए कि उस शिक्षक ने उस छात्र का धन्यवाद किया, और अगली टिप्पणी की ओर मुड़ गया। बाद में जब उससे पूछा गया कि उसने उस उद्दण्ड छात्र को उचित उत्तर क्यों नहीं दिया, तो शिक्षक का उत्तर था, “मैं अपनी ही बात को अंतिम बात न रखने के अनुशासन का अभ्यास कर रहा हूँ।”

      यह शिक्षक परमेश्वर से प्रेम करता था और उसका आदर करता था, और परमेश्वर के प्रेम को प्रतिबिंबित करने वाले व्यवहार को दिखाने के लिए वह नम्र भावना रखता था। उस शिक्षक के शब्द मुझे एक अन्य शिक्षक के शब्दों को स्मरण करवाते हैं, और यह दूसरा शिक्षक बहुत समय पहले का है – परमेश्वर के वचन बाइबल में सभोपदेशक का लेखक। यद्यपि इस दूसरे शिक्षक ने यह बात किसी क्रुद्ध व्यक्ति के प्रति व्यवहार करने के सन्दर्भ में नहीं कही थी, वरन परमेश्वर के निकट आने के समय हमारे उचित व्यवहार को सिखाने के लिए कही थी। सभोपदेशक के लेखक ने लिखा, “जब तू परमेश्वर के भवन में जाए, तब सावधानी से चलना; सुनने के लिये समीप जाना मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से अच्छा है; क्योंकि वे नहीं जानते कि बुरा करते हैं। बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों” (सभोपदेशक 5:1-2)।

      आप परमेश्वर के निकट किस मानसिकता के साथ आते हैं? यदि आपको लगता है कि आपके व्यवहार में कुछ सुधार होना चाहिए तो क्यों न कुछ समय परमेश्वर की महानता और महिमा पर विचार करने में बिताएं? जब हम परमेश्वर की असीम बुद्धिमत्ता, सामर्थ्य, और उपस्थिति पर मनन करते हैं, तो हमारे प्रति उसके उमड़ते हुए प्रेम से हम अभिभूतित हो सकते हैं, जो फिर हमें नम्र बनाता है। जब हम ऐसे नम्र रहना पसंद करेंगे, तो फिर अपनी बात को सबसे ऊपर रखने की प्रवृत्ति रहेगी ही नहीं। - एमी बाउचर पाई

ध्यान पूर्वक चुने गए शब्द परमेश्वर को आदर देते हैं।

...यह वही बात है जिसे यहोवा ने कहा था, कि जो मेरे समीप आए अवश्य है कि वह मुझे पवित्र जाने, और सारी जनता के साम्हने मेरी महिमा करे। - लैव्यवस्था 10:3

बाइबल पाठ: सभोपदेशक 5:1-7
Ecclesiastes 5:1 जब तू परमेश्वर के भवन में जाए, तब सावधानी से चलना; सुनने के लिये समीप जाना मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से अच्छा है; क्योंकि वे नहीं जानते कि बुरा करते हैं।
Ecclesiastes 5:2 बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली से परमेश्वर के साम्हने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में हैं और तू पृथ्वी पर है; इसलिये तेरे वचन थोड़े ही हों।
Ecclesiastes 5:3 क्योंकि जैसे कार्य की अधिकता के कारण स्वप्न देखा जाता है, वैसे ही बहुत सी बातों का बोलने वाला मूर्ख ठहरता है।
Ecclesiastes 5:4 जब तू परमेश्वर के लिये मन्नत माने, तब उसके पूरा करने में विलम्ब न करना; क्यांकि वह मूर्खों से प्रसन्न नहीं होता। जो मन्नत तू ने मानी हो उसे पूरी करना।
Ecclesiastes 5:5 मन्नत मान कर पूरी न करने से मन्नत का न मानना ही अच्छा है।
Ecclesiastes 5:6 कोई वचन कहकर अपने को पाप में ने फंसाना, और न ईश्वर के दूत के साम्हने कहना कि यह भूल से हुआ; परमेश्वर क्यों तेरा बोल सुन कर अप्रसन्न हो, और तेरे हाथ के कार्यों को नष्ट करे?
Ecclesiastes 5:7 क्योंकि स्वप्नों की अधिकता से व्यर्थ बातों की बहुतायत होती है: परन्तु तू परमेश्वर को भय मानना।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 16-18
  • मत्ती 18:1-20