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Friday, April 30, 2010

मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ुंगा

अच्छा संगीत सुनने की मेरी सबसे प्रथम यादें उस समय की हैं जब समूहगान के अभ्यास के लिये कुछ पुरुष मेरे घर पर आते थे और मेरे पिता के साथ अभ्यास करते थे। मैं सबसे अधिक ध्यान अपने पिता पर रखता था जिन्हें समूहगान में सबसे ऊंचे सुर पर गाना होता था। उस समूह के एक मन्पसन्द भजन का शीर्षक था "मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ।" उस छोटी उम्र में भी मैंने न केवल उस भजन संगीत को चाहा वरन उस गीत के सन्देश को भी समझा।

अपने स्वर्गरोहण से ठीक पहले यीशु द्वारा अपने चेलों से कहे गए वायदे, "मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ" को, उस भजन की पंक्ति "खिली धूप हो या गहरी छांव, तू जहां जाएगा मैं तेरे साथ रहूंगा" ने मेरे लिये और भी बहुमूल्य बना दिया।

परमेश्वर की सदैव साथ रहने वाली उपस्थिति का पहला उल्लेख व्यवस्थाविवरण ३१:६-८ में मिलता है जहां मूसा ने अपने उत्तराधिकारी यहोशु को परमेश्वर के लोगों को वाचा के देश में ले जाने के निर्देश दिये। फिर यहोशु ने भी वही वचन परमेश्वर से सुने, "जैसे मैं मूसा के संग था वैसे ही तेरे संग भी रहूंगा। मैं न तुझे कभी छोड़ूंगा न त्यागुंगा।" (यहोशु १:५)।

नये नियम में यही प्रतिज्ञा फिर से दी गई जब इब्रानियों को लिखी पत्री में लेखक कहता है, "उसने स्वयं ही कहा है, ’मैं न तुझे कभी छोड़ूंगा न त्यागुंगा’" (इब्रानियों १३:५)।

आप आज जहां भी हों, आप अकेले नहीं हैं। अगर आपने अपने अनन्त उद्धार के लिये यीशु पर भरोसा रखा है तो आप यह निश्चय जान रखिये कि वह आपको कभी नहीं छोड़ेगा। - क्लेयर हैस


पहले यह निश्चय कर लें कि आप प्रभु के साथ हैं, फिर यह निश्चय जान लें कि वह सदैव आपके साथ बना रहेगा।


बाइबल पाठ: व्यवस्थाविवरण ३१:१-८


मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे साथ हूँ। - मत्ती २८:२०


एक साल में बाइबल:
  • १ राजा ८, ९
  • लूका २१:१-१९

Thursday, April 29, 2010

दूरी

शांत समुद्र पर, रब्बर की डिंगी में आंखें मूंदे हुए निश्चिंत लेटकर सूर्य की गरमाहट को शरीर में सोखना और लहरों की आवाज़ का आनन्द लेना कितना अच्छा लगता है। जब तक आंख न खुले, कोई चिंता नहीं! किंतु ऐसे में कभी नाव, धीरे धीरे बह कर किनारे से दूर भी हो जाती है; और तब जब आंख खुलती है तो किनारा दूर और भय साथ होता है।

आत्मिक तौर पर भी कुछ इसी तरह हम अन्जाने में ही परमेश्वर से दूर बह जाते हैं, फिर अचानक किसी कारण जब ध्यान आता है तो मालूम पड़ता है कि दूरी कितनी हो गई है। दूरी की यह प्रक्रिया आरंभ होती है जब शैतान सृष्टीकर्ता परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम को चुराकर, उसके स्थान पर सन्देह डाल देता है। हमारे जीवन के किन्हीं अनुभवों के कारण, छल से वह हमारे मन में परमेश्वर पर विश्वास के स्थान पर सन्देह उत्पन्न कर देता है।

अय्युब और उसकी पत्नी का उदाहरण देखिये। दोनो के पास परमेश्वर पर क्रोधित होने के कई कारण थे। उनके बच्चे मर गए, धन-संपत्ति जाती रही, अय्युब की सेहत नाश हो गई। उसकी पत्नि ने कहा, "परमेश्वर की निन्दा कर और मर जा!" लेकिन अय्युब ने उत्तर दिया, " क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुख न लें?" (अय्युब २:९, १०)।

कई स्थितियां ऐसी होती हैं जो हमारा परमेश्वर से दूर बहना आरंभ करा सकती हैं, जैसे: यह मानना कि खुश रहने के लिये हमें परमेश्वर से अधिक भी कुछ आवश्यक है; कुछ करीबी संबंधों को परमेश्वर से अधिक महत्वपूर्ण मानना; यह मान के चलना कि परमेश्वर को हमारी हर इच्छा को पूरा करना अनिवार्य है; उसकी चेतावनियों को अन्देखा करना; जब उसका वचन हमारे मन के अनुसार न हो और हमें विचिलित करे तो उसे ठुकरा देना, आदि।

यदि आपने भी बहकर दूर जाना आरंभ कर दिया है तो शांति और संतुष्टि के एकमात्र स्त्रोत के पास आ जाएं। - जो स्टोवेल


परमेश्वर से दूर बहने से बचने के लिये अपना लंगर चट्टान (यीशु) पर डाले रहें


बाइबल पाठ: अय्युब १:१३-२२


क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुख न लें? अय्युब २:१०


एक साल में बाइबल:
  • १ राजा ६, ७
  • लूका २०:२७-४७

Wednesday, April 28, 2010

कुटिल शत्रु

इंगलैंड के दक्षिणी तट पर एक स्थान है ’स्लैप्टन सैंड्स’। इस सुंदर तटीय इलाके के साथ एक पुरानी दुखद घटना जुड़ी है।

अप्रैल २८, १९४४ के दिन, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, यहाँ पर मित्र राष्ट्रों की सेना युद्ध प्रशिक्षण के अभ्यास में लगी हुई थी। वे नौरमैन्डी के तट पर कब्ज़ा करने की तैयारी कर रहे थे। अचानक ही शत्रु की नावों ने वहाँ पर धावा बोल दिया और उस आक्रमण में ७०० अमेरीकी सिपाही मार डाले गए। आज ’स्लैप्टन सैंड्स’ में उनके इस बलिदान की याद में एक स्मारक खड़ा है, इस बात को याद करने के लिये कि वे युद्ध में भाग नहीं ले सके, प्रशिक्षण में ही मारे गए।

यह दुर्घटना एक रूपक है, जो मसीह के हर विश्वासी के लिये चेतावनी देती है। हम भी एक आत्मिक युद्ध में लगे हैं और हमारा शत्रु बहुत धूर्त और बलवान है। इसी लिये हमें पतरस प्रेरित सावधान करता है कि "सचेत हो और जागते रहो; क्योंकि तुम्हारा शत्रु शैतान एक गरजने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किसको फाड़ खाए" (१ पतरस ५:८)।

हमारा शत्रु भी हमारे विनाश की चाह रखता है, जैसे ’स्लैप्टन सैंड्स’ के सैनिकों के साथ हुआ। अपने राजा परमेश्वर की सेवा में, सिपाहियों के समान हमें सदा जागरूक रहना चाहिये। युद्ध के मोर्चे पर डटे सैनिक के समान, शत्रु के अचानक हमलों का सामना करने के लिये भी हमें सचेत और तैयार रहना है (२ तिमुथियुस २:३, ४) जिससे हम नाश न हों वरन आगे भी अपनी सेवा निभाते रहें। - बिल क्राउडर


शैतान की युक्तियाँ हमारे प्रभु उद्धारकर्ता की सामर्थ के सामने कुछ भी नहीं हैं।


बाइबल पाठ: १ पतरस ५:१-११


सचेत हो और जागते रहो; क्योंकि तुम्हारा शत्रु शैतान एक गरजने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किसको फाड़ खाए - १ पतरस ५:८


एक साल में बाइबल:
  • १ राजा ६, ७
  • लूका २०:१-२६

Tuesday, April 27, 2010

प्राथमिकताएं

एक शिक्षक अपने शिष्यों को एक महत्वपूर्ण बात समझाना चाहता था। उसने एक चौड़े मुँह वाला मर्तबान लिया और उसे पत्थरों से भर दिया। फिर उसने कक्षा से पूछा, "क्या यह मर्तबान भर गया?" उत्तर मिला "हाँ।" उसने कहा "क्या सच में?" और फिर उस मर्तबान में पत्थरों के बीच की जगह में कंकर भर दिये, और फिर पूछा, "क्या अब यह भर गया?" फिर उत्तर मिला "हाँ।" उसने फिर कहा, "वाकई?" और फिर पत्थरों और कंकरों के बीच की जगह को रेत से भर दिया। उसने फिर पूछा, " क्या अब यह भर गया?" अब उत्तर मिला "शायद नहीं।" उसने एक बर्तन में पानी लेकर उस मर्तबान में डाल दिया, और पानी पत्थर, कंकर और रेत के बीच की जगहों में भर गया।

तब उसने कक्षा से पूछा, "इस से हम क्या सीखते हैं?" किसी ने कहा कि "मर्तबान जितना भी भरा क्यों न दिखे, उसमें और डालने के लिये जगह रहती है।" शिक्षक बोला "नहीं, यह नहीं। वास्तविक शिक्षा है कि मर्तबान में सब कुछ भरना है तो सबसे पहले सबसे बड़ी चीज़ डालो और फिर क्रमशः छोटी।"

अपने पहाड़ी उपदेश में भी यीशु ने कुछ ऐसा ही सिद्धांत दिया। वह जानता था कि हम अपना समय छोटी छोटी बातों की चिंता करके व्यर्थ कर देते हैं क्योंकि वे हमें महत्वपूर्ण लगती हैं, किंतु होती नहीं हैं; और उन के कारण हमारे अनन्तकाल के लिये महत्वपूर्ण बड़ी बातों की उपेक्षा हो जाती है। यीशु ने अपने सुनने वालों को याद दिलाया "तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें यह सब वस्तुएं चाहियें। इसलिये पहले तुम उसके राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो यह सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी" (मत्ती ६:३३)।

आप अपने जीवन में किसे प्राथमिकता देते हैं? - डेनिस डी हॉन

व्यवाहारिक उपाय:
  • योजना से पहले प्रार्थना करो।
  • वस्तुओं से अधिक मनुष्यों से प्रेम करो।
  • हर कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिये करो।

पृथ्वी पर सबसे धनी वे हैं जिन्होंने स्वर्ग में ख़ज़ाना जमा किया है।


बाइबल पाठ: मत्ती ६:२५-३४


पहले तुम उसके राज्य और धार्मिकता की खोज करो। - मत्ती ६:३३


ऎक साल में बाइबल:
  • १ राजा १, २
  • लूका १९:२८-४८

Monday, April 26, 2010

बनावटी सेवकाई

जै, जो मुझे कार में चर्च लेकर जा रहा था, मुझसे बोला "मुस्कुराओ, तुम दुखी लग रही हो।" मैं दुखी नहीं थी, केवल विचारों में थी और एक साथ दो काम नहीं कर सकती थी। तो भी उसे प्रसन्न करने के लिये मैं मुस्कुराई। वह बोला "ऐसे नहीं, एक सच्ची मुस्कान।"

उसकी इस टिपण्णी ने मुझे और गंभीर सोच में डाल दिया। क्या किसी को मुस्कुराने की आज्ञा देकर उससे सच्ची मुस्कुराहट की आशा रखना संभव है? सच्ची मुस्कान तो अन्दर से आती है, वह मन की भावना की अभिव्यक्ति होती है, चेहरे की नहीं।

फोटो खींचने के समय हम कृत्रिम हंसी स्वीकार कर लेते हैं। हम प्रसन्न होते हैं जब सब लोग फोटो खींचने वाले के साथ सहयोग करके मुस्कुराते चेहरों के साथ फोटो खींचवाते हैं। आखिरकर हम खुशी की तस्वीर ही तो बना रहें हैं, ज़रूरी नहीं कि वह वास्तविक हो।

परन्तु परमेश्वर के सामने ऐसी दिखावटी बातें स्वीकार्य नहीं हैं। चाहे हम प्रसन्न हों, उदास हों या विचिलित हों, उसके समक्ष ईमान्दारी अनिवार्य है। परमेश्वर आराधना के झूठे भाव नहीं चाहता और न ही वह लोगों या परिस्थितियों से सम्बंधित झूठी बातें सुनना चाहता है (मरकुस ७:६)।

चेहरे के भाव बदलना, मन की भावना बदलने से अधिक आसान है किंतु सच्ची आराधना के लिये अनिवार्य है कि हम पूरे मन, पूरी आत्मा और पूरी शक्ति से मानें कि परमेश्वर उपासना के पूर्ण्तः योग्य है। यदि हमारी परिस्थिति प्रतिकूल भी हो, हम तब भी परमेश्वर के अनुग्रह और करुणा के लिये उसके धन्यवादी हो सकते हैं, जिनकी कीमत दिखावटी मुस्कान या बनवटी सेवकाई से कहीं अधिक है। - जूली ऐकरमैन लिंक


यदि हृदय में गान है तो चेहरे पर मुस्कान होगी।


बाइबल पाठ: मरकुस ७:५-१५


ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझसे दूर रहता है। - मरकुस ७:६


एक साल में बाइबल:
  • २ शमुएल २३, २४
  • लूका १९:२८-४८

Sunday, April 25, 2010

दीवार के सामने

२५ अप्रैल १९१५ को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की सामूहिक सेना गल्लीपोली प्रायद्वीप पर शीघ्र विजय की आशा से उतरी। किन्तु तुर्की की सेना ने उनका जमकर मुकाबल किया और युद्ध ८ महीने तक खिंचा जिसमें दोनो पक्षों के हज़ारों सैनिक घायल हुए या मारे गए।

ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैन्ड के जो घायल सैनिक युद्धक्षेत्र से निकाल कर मिस्त्र भेजे गए, उनमें से कई मिस्त्र की राजधानी कायरो के बाहर स्थित YMCA के एक कैंप में गए। वहाँ के पादरी ओस्वाल्ड चैम्बर्स ने युद्ध से अत्यंत निराश और टूटे हुए इन सिपाहियों की बहुत अच्छी देखभाल करी और उन्हें आशा बंधाई। बड़ी सहनुभूति और समझदारी से चैम्बर्स ने उन्हें कहा, "कोई भी व्यक्ति किसी भारी विपत्ती से निकलकर पहले जैसा नहीं रहता। वह पहले से या तो बेहतर हो जाता है या बदतर। किसी व्यक्ति के दुख के अनुभव अक्सर उसके मन को खोलते हैं कि वह यीशु के द्वारा किये गये उद्धार के कार्य को पहचाने। जब सन्सार में निराशा की दीवार किसी के सामने हर मार्ग को रोक देती है तो वहाँ परमेश्वर अपने हाथ फैलाये खड़ा होता है। जो कोई उस दीवार तक आता है, वह परमेश्वर के पास आता है कि परमेश्वर उसे अपनी बाहों में भर सके। यीशु का क्रूस, परमेश्वर के प्रेम का उच्चत्त्म प्रमाण है।"

पौलुस ने पूछा: "कौन हमको मसीह के प्रेम से अलग करेगा?" (रोमियों ८:३५)। उसका विश्वास भरा उत्तर था कि कुछ भी हमें परमेश्वर के प्रेम से जो प्रभु यीशु मसीह में है, अलग नहीं कर सकेगा (पद ३८, ३९)।

जब हम रास्ता रोकने वाली दीवार के सामने होते हैं तो परमेश्वर वहाँ हमारे लिये अपनी बाहें फैलाये खड़ा होता है। - डेविड मैक कैसलैण्ड


जब सब कुछ नष्ट हो जाता है तब भी परमेश्वर का प्रेम स्थिर खड़ा मिलता है।


बाइबल पाठ: रोकियों ८:३१-३९


कौन हमको मसीह के प्रेम से अलग करेगा? - रोमियों ८:३५


  • एक साल में बाइबल:
  • २ शमुएल २१, २२
  • लूका १८:२४-४३

Saturday, April 24, 2010

परमेश्वर पिता की विश्वासयोग्यता

हडसन टेलर परमेश्वर का एक बहुत विनम्र सेवक था, जिसे परमेश्वर ने चीन में सेवकाई के लिये बहुतायत से प्रयोग किया। उसने परमेश्वर के प्रति एक असाधारण विश्वासयोग्यता प्रदर्षित की।

उसने अपनी डायरी में लिखा:
"हमारा स्वर्गीय पिता बहुत अनुभवी है। वह जानता है कि उसके बच्चों को सुबह अच्छी भूख लगती है...उसने ४० साल तक बियाबान में ३० लाख इस्त्राएलियों का पालन-पोषण किया। शायद परमेश्वर ३० लाख मिशनरी सेवकों को चीन नहीं भेजेगा; किंतु अगर भेजे भी तो इस बात पर पूरा भरोसा रखिये कि उन सबका पालन पोषण करने के लिये उसके पास बहुतायत से संसाधान होंगे। परमेश्वर का कार्य यदि परमेश्वर द्वारा बताए तरीके से किया जाय तो उस कार्य के लिये परमेश्वर के साधनों का अभाव कभी नहीं होगा।"

हम थके-मांदे हो सकते हैं लेकिन हमारा स्वर्गीय पिता सर्वशक्तिमान है। हमारी भावनाएं घट-बढ़ सकती हैं पर हमारा परमेश्वर कभी न बदलने वाला है। सृष्टि स्वयं ही उसके स्थिर और विश्वासयोग्य होने की गवाह है। इसलिये थॉमस चिश्‍होल्म के एक भजन कि पंक्तियों को हम गा सकते हैं, जिनके भाव हैं: "ग्रीष्मकाल और शीतकाल, बसन्त और पतझड़, ऊपर अपने अपने कक्ष में चलने वाले सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र, सारी सृष्टि के साथ मिलकर तेरी महान विश्वासयोग्यता, अनुग्रह और प्रेम के गवाह हैं।"

उस महान परमेश्वर के लिये जीने के लिये यह कितना उत्साहवर्धक है! वर्तमान के लिये हमारी सामर्थ और भविष्य के लिये हमारी आशा हमारे अपने परिश्रम की स्थिरता पर नहीं परन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर आधारित हैं। हमारी जो भी आवश्यक्ता हो, हम उसके लिये पिता की विश्वासयोग्यता पर भरोसा कर सकते हैं।

हे प्रभु मेरे प्रति आपकी विश्वासयोग्यता कितनी महान है। - पौल वैन गॉर्डर


जो अपने आप को परमेश्वर पर छोड़ देता है परमेश्वर उसे कभी नहीं छोड़ता।


बाइबल पाठ: भजन १०७:१-१६


हम मिट नहीं गए, यह यहोवा की महान करुणा क फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है।...तेरी विश्वास्योग्यता महान है।


एक साल में बाइबल:
  • २ शमुएल १९, २०
  • लूका १८:१-२३

Friday, April 23, 2010

परमेश्वर से सहमति

एक रेडियो कार्यक्रम में एक फोन करने वाले ने धर्म के संबंध में कुछ कहा। इस पर उस कार्यक्रम के संचालक ने धर्म के नाम पर पाखण्ड करने वालों के विरुद्ध बोलना शुरू कर दिया। वह कहने लगा कि "मुझे इन धर्मी ढोंगियों से घृणा है। वे केवल धर्म के बारे में बोलते ही हैं, लेकिन वे वास्तव में मुझ से ही बेहतर नहीं हैं। इसलिये मुझे धर्म की बातें पसन्द नहीं हैं।"

उस व्यक्ति को यह एहसास नहीं हुआ कि अपनी इस राय में वह परमेश्वर के साथ पूर्ण सहमत है। परमेश्वर भी ढोंगियों को बिलकुल पसन्द नहीं करता। विडम्बना यह है कि जिस बात का परमेश्वर विरोध करता है, उसी को आधार बनाकर लोग परमेश्वर से दूर रहते हैं।

यीशु ने ढोंगीयों के लिये कहा: "यह लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनके मन मुझसे दूर रहते हैं। ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्य की विधियों को धर्म उप्देश करके सिखाते हैं" (मत्ती १५:८,९)।

ध्यान दीजिये कि यीशु ने अपने समय के सम्भवतः सबसे बड़े ढोंगियों - धर्म के अगुवे उन फरीसीयों को क्या कहा। मत्ती के २३वें अध्याय में उसने उन्हें एक नहीं, दो नहीं, वरन सात बार ढोंगी कहा। वे लोगों के सामने धर्म का दिखावा करते थे पर परमेश्वर उनके मन को जानता था। वह जानता था कि वे उससे बहुत दूर हैं।

जब गैरमसीही हम विश्वासियों में ढोंग का दोष दिखाते हैं तो सही करते हैं। वे परमेश्वर के साथ सहमत हैं जो स्वयं भी इससे घृणा करता है। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हमारे जीवन परमेश्वर आदर करें जो हमारे सम्पूर्ण समर्पण के योग्य है। - डेव ब्रैनन

शैतान हमसे प्रसन्न रहता है अगर हमारा मसीही प्रचार और जीवन मेल नहीं खाता।


बाइबल पाठ: मत्ती १५:१-१९


यह लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनके मन मुझसे दूर रहते हैं। - मत्ती १५:८


एक साल में बाइबल:
  • २ शमुएल १६-१८
  • लूका १७:२०-३७

Thursday, April 22, 2010

बहुत बूढ़े?

जब परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की कि उसे और उसकी पत्नि सारा के पुत्र होगा तो अब्राहम अविश्वास के कारण हंसा और उसने कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरूष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नव्वे वष की है पुत्र जनेगी?" (उत्पत्ति १७:१७)।

बाद में सारा भी इसी कारण हंसी: "मैं तो बूढ़ी हूँ और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा?" (उत्पत्ति १८:१२)।

हम भी बूढ़े होते हैं और सन्देह करते हैं कि क्या परमेश्वर के लिये हमसे किये गए वायदे पूरे करना संभव होगा? बुढ़ापे में हमारा पद और महत्त्व कम हो गए, हमारे दिमाग़ पहले जैसे सक्रीय नहीं रहे। हमारे शरीर में कई परेशानियाँ हो जाती हैं जो हमारे चलने फिरने में बाधा डलती हैं और हमें घर के आस पास ही रहने को मजबूर करती हैं। प्रतिदिन हम उन चीज़ों को खोते जाते हैं जिन्हें पाने के लिये हमने उम्र बिता दी। रॉबर्ट फ़्रॉस्ट हमारे मन में उठने वाले प्रश्न को पूछता है: "प्रश्न है...किसी घटती हुई वस्तु से क्या हासिल होगा?"

अगर हम केवल अपनी सामर्थ पर ही निर्भर हैं तो कुछ खास हासिल नहीं होगा। लेकिन परमेश्वर हमारी कलपना से कहीं बढ़कर हमारा उपयोग कर सकता है। जैसे उसने सारा से पूछा, वह हमसे भी पूछता है, "क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है?" (उत्पत्ति १८:१४) - बिलकुल नहीं!

यदि हम अपने आप को परमेश्वर के लिये उपलब्ध कराते हैं कि वह हमसे अपने उद्देश्यों को पूरा करे, तो उसके लिये उपयोगी होने में हम कभी बहुत बूढ़े नहीं होंगे। - डेविड रोपर


जैसे जैसे परमेश्वर आपके जीवन में वर्ष जोड़ता जाता है, उससे मांगें कि वह आपके वर्षों में जीवन भरता जाए।


बाइबल पाठ: उत्पत्ति १७:१५-२२


मेरी वाचा तेरे साथ बंधी रहेगी, इसलिये तू जातियों के समूह का मूल पिता हो जायेगा। - उत्पत्ति १७:४


एक साल में बाइबल:
  • २ शमूएल १४, १५