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बुधवार, 22 जून 2022

मसीही विश्वास एवं शिष्यता / Christian Faith and Discipleship – 4


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“उसके नाम पर विश्वास” से अभिप्राय

  

    कल हमने प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करने के अर्थ को देखना आरंभ किया था। हमने इसे समझने के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल में से दो पदों, मत्ती 1:21 और यूहन्ना 1:12 को लिया था। हमने मत्ती 1:21 के आधार पर कल यह देखा था कि प्रभु यीशु मसीह का जन्म ही लोगों को उनके पापों से छुटकारा देने और सुरक्षित करने के उद्देश्य से हुआ था। प्रभु यीशु मसीह ही वे एकमात्र हैं जो मनुष्यों को उनके पापों से छुटकारा प्रदान कर सकते हैं, किसी भी मनुष्य के द्वारा अपने आप या अपने लिए यह कर पाना कभी संभव नहीं होने पाया था। किन्तु साथ ही हमने यह भी देखा था कि प्रभु यीशु मसीह द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह छुटकारा और सुरक्षा उनके लिए ही उपलब्ध और कारगर जो प्रभु यीशु के लोग हैं। जिसे भी यह छुटकारा और सुरक्षा चाहिए उसे पहले प्रभु का जन बनना पड़ेगा, और तब प्रभु द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह उपाय उसके जीवन में कार्यकारी हो सकेगा। प्रभु का जन बनने का तरीका हमें यूहन्ना 1:12 में दिया गया है - स्वेच्छा से प्रभु यीशु को ग्रहण करना, और उसके नाम पर विश्वास करना। प्रभु यीशु का जन होना किसी मानवीय पद्धति या क्रिया से, अथवा अन्य किसी प्रकार से संभव नहीं है। 


परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूहन्ना 1:12-13)। इन पदों का दूसरा अर्ध-भाग स्पष्ट कर देता है कि प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण करने वाले किसी मनुष्य के वंश अथवा प्रयास से नहीं वरन मसीह में अपने विश्वास के द्वारा “परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।”” और जिस विश्वास के द्वारा उनके लिए यह संभव हुआ है, वह प्रथम अर्ध-भाग के अंत में दिया गया है, “जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।” इस वाक्यांश में एक छोटा सा शब्द ‘पर प्रमुख किया गया है, क्योंकि वही इस बात को समझने की कुंजी है। यह वाक्यांश बता रहा है कि प्रभु यीशु मसीह को वे ग्रहण करते हैं, परमेश्वर की संतान वे बनते हैं जो “उसके नामपर विश्वास करते हैं। 


इसे समझने के लिए इन दोनों शब्दों, “उसके” और “यीशु” को देखिए। यूहन्ना 1 अध्याय में इन पदों से पहले के पदों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि बात उस “वचन” अर्थात सृष्टिकर्ता परमेश्वर की हो रही है, जो देहधारी होकर जगत में आया। अर्थात “उसके” से अभिप्राय उस सृष्टिकर्ता परमेश्वर से है जिसने मानव देह में होकर जन्म लिया। इस मानव देह में अवतरित परमेश्वर का नाम “यीशु” रखा गया। शब्द हिन्दी का शब्द “यीशु” बाइबल के नए नियम खंड की मूल यूनानी भाषा के शब्द “ईएसोऊस (Iesous)” से आया है। यूनानी भाषा का नाम “ईएसोऊस” पुराने नियम की मूल इब्रानी भाषा के नाम “यहोशूआ” से आया है। इब्रानी भाषा का नाम “येहोशूआ” एक संयुक्त शब्द है, जो दो शब्दों, संज्ञा “यहोवा” एवं शब्द “शूआ” की संधि से बना है। संज्ञा “यहोवा” इब्रानी में परमेश्वर का नाम है; और इब्रानी शब्द “शूआ” का अर्थ होता है “मुक्ति देने वाला” या “स्वतंत्र करने वाला”। अर्थात मूल इब्रानी भाषा के अनुसार शब्द “यहोशूआ” और उससे निकले यूनानी शब्द “ईएसोऊस” तथा हिन्दी शब्द “यीशु” का अर्थ है “यहोवा ही मुक्ति या स्वतंत्रता देने वाला है”। इसलिए यूहन्ना 1:12 के वाक्यांश “जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं” का अभिप्राय हो गया “जो यह विश्वास रखते हैं कि यहोवा ही मुक्ति या स्वतंत्रता देने वाला है”।


अर्थात, यीशु पर विश्वास करने, उस ग्रहण करने और इस के कारण परमेश्वर की संतान हो जाने का तात्पर्य है, इस तथ्य को ग्रहण करना या अपने जीवन में स्वीकार करना तथा कार्यान्वित करना कि केवल प्रभु यीशु मसीह ही वह एकमात्र है जिसके द्वारा पापों से मुक्ति, नश्वर संसार से स्वतंत्रता मिल सकती है। प्रभु यीशु मसीह के अतिरिक्त और कोई मार्ग अथवा माध्यम या तरीका नहीं है, जैसा कि प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं भी अपने विषय में कहा, “यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता” (यूहन्ना 14:6)। मनुष्यों के अपने किसी भी प्रयास, विधि, कर्म, धर्म, जीवन शैली, आदि के द्वारा उसे उसके पापों से यह मुक्ति या स्वतंत्रता कदापि नहीं मिल सकती है। यह केवल प्रभु यीशु मसीह के नाम पर लाए गए विश्वास द्वारा ही संभव है; किसी अन्य तरीके से नहीं। जो कोई भी स्वेच्छा और सत्य-निष्ठा से इस प्रकार प्रभु यीशु का जन हो जाएगा, मत्ती 1:21 के अनुसार, प्रभु यीशु उसे पापों से छुटकारा और सुरक्षा प्रदान करेगा, और वह परमेश्वर की संतान हो जाएगा। 


कल और आज के लेखों का सम्मिलित निष्कर्ष है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने का अर्थ है यह ग्रहण करना और अपने जीवन में कार्यान्वित करना कि केवल और केवल प्रभु यीशु मसीह ही मुझे मेरे पापों से छुड़ा सकता है, सुरक्षित कर सकता है; और जब मैं इस बात को ग्रहण करके अपने आप को उसे समर्पित कर दूँगा, उसका जन बना जाऊँगा, तब प्रभु यीशु मुझे मेरे पापों से छुड़ा कर उनके दुष्प्रभावों से सुरक्षित भी कर देगा, और परमेश्वर की संतान बनाकर उसका मेल-मिलाप परमेश्वर के साथ करवा देता है।

   

कल हम कुछ ऐसी बातों के बारे में देखेंगे, जिन पर सामान्यतः लोग भरोसा रखते हैं कि उनके द्वारा वे प्रभु के जन बन जाएंगे और पापों से छुटकारा एवं सुरक्षा पा जाएंगे, किन्तु यह केवल उनका भ्रम है, बाइबल की सच्चाई नहीं। यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • एस्तेर 6-8
  • प्रेरितों 6

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English Translation 

 Understanding the Meaning of “Believe in His Name”

    In the last article, we had started to see the meaning of believing in the Lord Jesus Christ. To understand this, we had taken two verses from God’s Word - Matthew 1:21 and John 1:12. We had seen on the basis of Matthew 1:21 that the Lord Jesus was born to deliver people from their sins and make them safe. The Lord Jesus is the one and only one who can deliver men from their sins, and it had never been possible for anyone, ever, to do this on his own or for himself. But we had also seen that this deliverance provided by the Lord Jesus Christ is only available and effective in the lives of those who are “His people.” Whosoever wants to have this deliverance and safety from the Lord, will first have to become “His people” and only then will this provision from the Lord become available to him, and effective in his life. The way to become “His people” is given to us in John 1:12 - to willingly accept the Lord Jesus and believe in His name. There is no other way, nor any man-made process by which one can become “His people.” 


But as many as received Him, to them He gave the right to become children of God, to those who believe in His name: who were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God” (John 1:12-13). These verses, specially their second-half also make it very clear that those who accept the Lord Jesus as their saviour, are neither granted this privilege because of being born in any particular family nor do they accomplish this by any of their efforts of any kind, but it is by coming to faith in the Lord Jesus that they are born “of God.” The way by which they have come to faith in the Lord Jesus is stated in the first half, “those who believe in His name.” A small word “in” (in most English translations ‘in’ is used, some translations use ‘on’ instead of ‘in’ but the meaning and implication remains the same, whichever is used), that has been made prominent, holds the key to understanding this statement. This phrase or statement from these verses is telling us that “those who believe in His name”, only they are the ones who have actually accepted the Lord or come to faith in Him, and become the children of God. 


To understand this, we will also look at two other words, “His” and “Jesus.” When we look at the preceding verses in John 1, it becomes clear to us that the subject of this verse is the creator God, the “Word” that came to earth in human form.  This incarnate God, for His human form, was given the name “Jesus.” The word ‘Jesus’ is the translated form of the Greek word ‘Iesous’; and ‘Iesous’ has come from the original Hebrew Old Testament name ‘Jehoshua.’ The noun ‘Jehoshua’ is a compound word, and is made up of two words “Jehovah” and “shua.” The word “Jehovah” is the Hebrew language expression or name of God; whereas the Hebrew word “shua” means ‘the one who liberates’ or ‘the one who sets free.’ Therefore, the meaning of the Hebrew word ‘Jehoshua’, its Greek translation ‘Iesous’, and its English translation ‘Jesus’, is “Jehovah liberates/sets free” or “Jehovah delivers and makes safe.” Through this, i.e., the meaning of the John 1:12 phrase “those who believe in His name”, is now apparent, it means “those who believe and accept that it is only Jehovah who liberates/sets free.”


Therefore, to believe in the Lord Jesus, to accept Him and thereby become a child of God means to believe in and accept the fact that the Lord Jesus is the one and only one who can liberate or set free from sin and the perishing world, and then to put this into practice in one’s life. God’s Word the Bible, testifies to this, that other than the Lord Jesus there is no other way to be set free from sin, at other places too. The Lord Jesus said this about Himself “Jesus said to him, "I am the way, the truth, and the life. No one comes to the Father except through Me” (John 14:6). No man can be liberated or set free from sin by any of his works, good deeds, religion, lifestyle, etc. This is only possible by believing in the name, i.e., in the meaning of the name of Jesus. Whosoever, willingly and sincerely, will become “His People” in this manner, as per Matthew 1:21, the Lord Jesus will deliver him from his sins and make him safe, he will become a child of God.


The collective conclusion of yesterday’s and today’s articles is that Biblically speaking, to believe in the Lord Jesus Christ means, to accept and apply in one’s life the fact that only and only the Lord Jesus can set me free from my sins and make me safe; and when a person accepts this and submits his life to the Lord Jesus to live in obedience to Him, he becomes “His people,” and the Lord Jesus cleanses him from his sins and secures him from their harmful effects, reconciles him with God as a child of God.


In the next article we will look at some things on which many people trust in, to become the Lord’s people and to be made free from sin and its effects; but these are only their assumptions, a delusion; and not the actual Biblical truth. If you are still thinking of yourself as being a Christian, because of being born in a particular family and having fulfilled the religious rites and rituals prescribed under your religion or denomination since your childhood, then you too need to come out of your misunderstanding of Biblical facts and start understanding and living according to what the Word of God says, instead of what any denominational creed says or teaches.


If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.



Through the Bible in a Year: 

  • Esther 6-8 

  • Acts 6





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