मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 53
Click Here for the English Translation
सुसमाचार प्रचार का महत्व एवं अनिवार्यता (1)
हमने देखा है कि इफिसियों 4:11 में कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त किए गए पाँच प्रकार के सेवकों या कार्यकर्ताओं और उनकी सेवकाई या कार्यों की सूची दी गई है, कलीसिया में उनकी सेवकाई के विषय बताया गया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों के लिए प्रयोग किए गए शब्दों के आधार पर, ये पाँचों कार्यकर्ता और उनके कार्य, वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इनमें से पहले दो, प्रेरित और भविष्यद्वक्ता और इनकी सेवकाइयों के विषय हम पिछले लेखों में देख चुके हैं। परमेश्वर के वचन बाइबल में दी गई इनकी सेवकाई के हवालों से यह प्रकट है कि आज जो स्वयं के प्रेरित और भविष्यद्वक्ता होने का दावा करते हैं, उनमें, उनके कार्यों में और बाइबल में इन सेवकाइयों के बारे में दी गई बातों में कोई सामंजस्य नहीं है। अधिकांशतः ये लोग उन मत, समुदाय, डिनॉमिनेशंस में देखे जाते हैं जो परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं को मानते, मनवाते, और उन गलत शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार करते हैं। ये लोग अपने आप ही, या कुछ अन्य मनुष्यों या किसी संस्था अथवा मत के अगुवों द्वारा प्रेरित या भविष्यद्वक्ता बन जाते हैं, और इसे एक पदवी के समान औरों पर अधिकार रखने तथा सांसारिक लाभ की बातों को अर्जित करने के लिए प्रयोग करते हैं। जबकि वचन इफिसियों 4:11 में, और अन्य स्थानों पर यह स्पष्ट कहता है कि कलीसिया में यह नियुक्ति केवल प्रभु के द्वारा की जाती है, किसी मनुष्य के द्वारा नहीं।
इन लोगों की बातों और विशेषकर “भविष्यवाणियों” के लिए एक और बात ध्यान में रखनी बहुत आवश्यक है - प्रभु परमेश्वर द्वारा नियुक्त प्रेरितों और प्रथम कलीसिया के अगुवों का समय समाप्त होते-होते, नए नियम की सभी पत्रियां और पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं, और स्थान-स्थान पर पहुँचा दी गई थीं। अर्थात, परमेश्वर का वचन लिखित रूप में पूर्ण हो चुका था; अब केवल उसे संकलित करके एक पुस्तक के रूप में लाना शेष था, जैसा कि आज बाइबल के रूप में वह हमारे हाथों में विद्यमान है। उन प्रेरितों और आरंभिक कलीसिया के अगुवों में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने जो वचन लिखवा दिया, वही संकलित होकर अनन्तकाल के लिए बाइबल के रूप में परमेश्वर का वचन स्थापित हो गया है। इस सन्दर्भ में पतरस अपनी दूसरी पत्री, 2 पतरस 1:3-4 में, परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में लिखता है कि प्रभु यीशु की पहचान और समझा के द्वारा, जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें, तथा परमेश्वर की बड़ी और महान प्रतिज्ञाएं, और संसार की सड़ाहट से बचने का मार्ग हमे दे दिया गया है - एक पूर्ण किया जा चुका सिद्ध कार्य, जिसमें किसी भी अन्य बात के जोड़े जाने या संशोधन किए जाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही कोई संभावना शेष है। अर्थात, अब जब वचन के एक बार लिख कर दे दिया गया है, तो उसके बाद उसमें न कुछ जोड़ा जा सकता है, और न घटाया जा सकता है, न बदला जा सकता है; जिसने भी ऐसा कुछ भी करने का प्रयास किया, उसे बहुत भारी दण्ड भोगना पड़ेगा (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। इसलिए आज, जो यह अपनी ओर से “भविष्यवाणी” करके परमेश्वर के वचन में अपनी ओर से बातें जोड़ने या वचन की बातों को बदलने या सुधारने के प्रयास करते हैं, वह उनके लिए, और उनकी बातों को मानने वालों के लिए बहुत हानिकारक होगा (मत्ती 12:36-37; 15:8-9, 13-14)।
इफिसियों 4:11 में दिए गए तीसरे प्रकार की कार्यकर्ता हैं “सुसमाचार सुनाने वाले”। ध्यान कीजिए कि यद्यपि कलीसिया में कुछ लोगों को सुसमाचार प्रचार का दायित्व और वरदान दिया गया है, किन्तु सुसमाचार सुनाना प्रभु ने अपने सभी शिष्यों के लिए रखा है (मत्ती 28:18-20; मरकुस 16:15; प्रेरितों 1:8); सुसमाचार प्रचार प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी है। पौलुस ने अपनी मसीही सेवकाई में सुसमाचार प्रचार करने की अनिवार्यता को 1 कुरिन्थियों 9:16-17, 23 में व्यक्त किया, तथा अपने सहकर्मी तीमुथियुस को भी दुख उठाकर भी बड़ी सहनशीलता के साथ, बिना हार माने, सुसमाचार प्रचार में लगे रहने के लिए कहा (2 तीमुथियुस 4:5)। प्रभु यीशु की कलीसिया के लिए प्रयुक्त विभिन्न रूपकों (metaphors) के अध्ययन में भी, और प्रेरितों 2:42 की चार बातों में से “रोटी तोड़ने” के बारे में वचन की बातों को देखते समय हमने देखा था कि कलीसिया का एक उद्देश्य, उसका एक कर्तव्य है प्रभु यीशु की गवाही देते रहना। जहाँ प्रभु यीशु की गवाही होगी, वहीं साथ ही सुसमाचार प्रचार भी होगा। जिस भी स्थानीय कलीसिया की गतिविधियों में सुसमाचार प्रचार नहीं है, वह कलीसिया या तो प्रभु की कलीसिया नहीं है, अन्यथा प्रभु के मार्गों, कार्यों, और उद्देश्यों से भटक गई है, प्रभु के लिए कार्य नहीं कर रही है। जैसा हम प्रकाशितवाक्य अध्याय 2 और 3 की कलीसियाओं से देखते हैं, ऐसी सभी अप्रभावी और निकम्मी कलीसियाएँ, बची नहीं रहेंगी, वे प्रभु द्वारा मिटा दी जाएँगी। जैसा हम पहले के लेखों में देख चुके हैं, प्रभु यीशु की कलीसिया और उसके सदस्यों के मसीही जीवनों की उन्नति वचन की सही आज्ञाकारिता के साथ जुड़ी हुई है। जहाँ प्रभु तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता है, वहाँ प्रभु परमेश्वर की सुरक्षा और आशीष भी है; जहाँ वचन का पालन नहीं है, वहाँ परमेश्वर की आशीष और सुरक्षा भी नहीं है।
यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।
और
कृपया अपनी स्थानीय भाषा में अनुवाद और प्रसार करें
*************************************************************************
The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 53
The Importance & Necessity of Preaching the Gospel (1)
We have seen that in Ephesians 4:11 a list of five kinds of ministries and their workers appointed by the Lord Jesus for the growth and edification of His Church is given. The words used for the ministries in the original Greek language, in context of the Church and the Christian Faith, all imply various works and functions related to the ministry of the Word of God. Of these five, we have considered the first two, i.e., Apostles, Prophets and Prophesying. From the Biblical texts related to these ministries and workers, it is evident that today those who claim to be Apostles and Prophets, neither live up to the criteria, nor exhibit the characteristics and qualities mentioned in God’s Word the Bible about these ministries and workers. Today, these people are usually seen in those groups, sects, and denominations that preach, teach, and make people follow wrong doctrines and false teachings related to God the Holy Spirit. In such groups, sects, and denominations, some persons or elders, declare some of their members as Apostles or Prophets. They then use these ministries as a title or status symbol to assert authority over other members, to gain material things and temporal benefits. Whereas Ephesians 4:11 says it very clearly that the appointments to these ministries were done by the Lord, not any person.
Another very important thing to always be keep in mind, related to the activities of these people, especially regarding “Prophesying” is that by the time the era and life-time of the Lord appointed Apostles and the Elders of the first Church came to an end, all the books and letters that eventually were going to be a part of the New Testament, had already been written, circulated, and had reached their destinations. In other words, the Word of God in its written form had been completed; now all that remained was to compile it into one book, in the form we have it with us, as the Bible. What those Apostles and Prophets of the initial Church wrote under the guidance of the Holy Spirit and left for us, later, that was compiled in one book to be with us for all eternity, as the Word of God, the Bible. In this context, Peter under the guidance of the Holy Spirit wrote in 2 Peter 1:3-4, that everything that pertains to life and godliness, along with God’s great promises and the way to escape the corruption of the world, has already been given to us in the knowledge and understanding of the Lord Jesus - as a completed and accomplished perfect work, in which there is neither any need nor any scope or possibility of any addition, or modification, or correction. In other words, now that God’s Word has been written down and given to us, there is no possibility of adding or taking away or modifying anything from it; whoever does anything like this will have to pay a very heavy price for doing so (Revelation 22:18-19). Therefore, the present-day self or man proclaimed “Apostles” and “Prophets”, who claim to receive visions and instructions from god, on the basis of which they then add or modify or reject things from God’s Word with gross impunity, will have to give a serious account and heavily suffer for manhandling God’s Word to suit their convenience (Matthew 12:36-37; 15:8-9, 13-14).
In Ephesians 4:11, the third ministry and its workers are “Evangelists.” Take note that although some in the Church have especially been given the gift of preaching the gospel, but the Lord has kept preaching and propagating the gospel for each and every one of His disciples (Matthew 28:18-20; Mark 16:15; Acts 1:8); evangelism or preaching the gospel is every Christian’s responsibility. The Apostle Paul expressed the compulsion and necessity of preaching the gospel in 1 Corinthians 9:16-17, 23; and he also instructed his co-worker, Timothy, to continue patiently in preaching the gospel, putting up with all the problems and difficulties that may come while doing this, without giving up on it (2 Timothy 4:5). While we were considering the various metaphors used in the Bible for the Church of the Lord Jesus Christ, and also in the discussion from Acts 2:42 on “Breaking of Bread”, i.e., the Holy Communion, we had seen that one of the purposes, a responsibility of the Church is to be engaged in witnessing for the Lord Jesus. Wherever there is witnessing for the Lord Jesus, the preaching of the gospel will also be there, automatically. Therefore, in whichever local church, there is no outreach and gospel preaching in its activities, that church either does not belong to the Lord Jesus, or has been misled and fallen away from the Lord’s ways, works, and purposes and is no longer working for the Lord, is ineffective and not of any use for Him. As we see from the churches of Revelation chapters 2 and 3, all ineffective and useless churches will face the Lord’s judgment and be brought to an end. As we have seen in the earlier articles, the growth, stability, and edification of the Lord’s Church and of His Believers is closely related to their proper obedience to God’s Word. Where there is obedience to the Lord and His Word, there the security and blessings of the Lord God are also present; else that church or person are on their own, without any help, security, and blessings of God.
If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.
&
Please Translate and Propagate in your Regional Language
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें