ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

मंगलवार, 8 मार्च 2011

"व्यवस्था का उद्देश्य" पर अनवर जमाल जी की टिपणी के सन्दर्भ में

अन्वर जमाल साहब,
आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आपकी टिप्पणी में कही गई बातों में कुछ सच है, कुछ अन्समझा है और कुछ गलत। इन तीनों को बाइबल की कुछ सच्चाईयों के सन्दर्भ में समझाने की कोशिश करता हूं, आशा है कि कामयाब हो पाऊंगा।

१. सच यह है कि प्रभु यीशु मसीह और उनके चेले व्यवस्था का पालन करते थे।

प्रभु यीशु का दावा था कि वे व्यवस्था को हटाने नहीं वरन उसे पूरा करने आए हैं। व्यवस्था को सही और सच्चे दिली तौर से पूरा कर पाना किसी भी इन्सान के लिये असंभव है; और जब तक व्यवस्था पूरी नहीं होती वह लागू भी रहती, क्योंकि परमेश्वर की कही कोई बात पूरी हुए बिना रह नहीं सकती। प्रभु यीशु मसीह ने, जो व्यवस्था का देने वाला है, व्यवस्था को सही और सच्चे दिली तौर से पूरा किया और उसकी जगह परमेश्वर की आज्ञाकारिता और उसे प्रसन्न करने की एक आसान और कारगर विधी दी जो किसी नियम - कानून के पालन के बन्धनों द्वारा नहीं वरन मसीह में विश्वास और प्रेम द्वारा है।


. अन्समझा यह है कि वे, यानि मसीह और उनके चेले, ऐसा क्यों करते थे और व्यवस्था क्यों दी गई?

मसीह ने व्यवस्था का पालन किया परमेश्वर के वचन को पूरा करने और उद्धार का मार्ग देने के लिये। आरंभ में उनके चेलों के पास भी परमेश्वर के वचन के पालन के लिये केवल व्यवस्था ही थी। मसीह के क्रूस पर चढ़ाकर मारे जाने और फिर तीसरे दिन जी उठने से पहले, यहूदी लोगों के पास परमेश्वर की आज्ञाकारिता का कोई और माध्यम नहीं था। व्यवस्था मसीह के आने तक मसीह की पहिचान कराने और परमेश्वर के लोगों को मसीह के लिये संभाल कर रखने के लिये एक शिक्षक के समान थी। मसीह के जी उठने के बाद व्यवस्था पूरी हो गई और परमेश्वर तक पहुंचने की राह मसीह में होकर बन गई - न केवल यहूदियों के लिये वरन किसी भी धर्म - जाति - समाज - स्थान के दायरों से परे समस्त मानव जाति के लिये भी। उसके बाद चेले भी व्यवस्था का नहीं वरन मसीह में मिले अनुग्रह का पालन करने लगे, जो अपने आप में व्यवस्था का दिल से पालन करने के समान था।

व्यवस्था का उद्देश्य कभी उद्धार देना नहीं था, व्यवस्था परमेश्वर की पवित्रता और मनुष्यों की पापमय दशा को पहिचानने के लिये परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को दिया गया एक पैमाना या नापने का ज़रिया है। "व्यवस्था का उद्देश्य" ब्लॉग के लेख में तीन उदाहरणों से इसी बात को साफ किया गया है कि व्यवस्था केवल समस्या की पहिचान करवाती है, व्यवस्था में समस्या का समाधान नहीं है। इसे एक और उदाहरण से समझिये - जैसे एक्स-रे, रक्त जांच आदि के द्वारा रोग की पहिचान होती है इलाज नहीं; जांच के नतीजों द्वारा इलाज निर्धारित होता है लेकिन करी गई जांच अपने आप में दवा या इलाज नहीं है, वैसे ही व्यवस्था के द्वारा हमारे पाप के रोग की पहिचन होती है, उसका इलाज नहीं। पाप का इलाज तो मसीह यीशु ही में है।

व्यवस्था हमें हमारी पापों में गिरी हुई दशा दिखाती है, लेकिन वह न तो हमें पाप करने से रोक पाती है और न किसी पापी को माफी देकर निष्पाप बना सकती है। व्यवस्था पाप के लिये पापी को सिर्फ सज़ा का हकदार बता सकती है। मनुष्य के हर पाप के लिये व्यवस्था के पास सिर्फ सज़ा है और सज़ा की दहशत है। इसलिये व्यवस्था पर बने रहने वाला मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता परमेश्वर के लिये अपने प्रेम के अन्तर्गत नहीं वरन सज़ा से बचने के डर से करता रहता है।

व्यवस्था के साथ एक और मुश्किल यह है कि जो कोई व्यवस्था के साथ जीना चाहता है, वो अगर एक भी बात में गलती से भी चूक गया तो फिर वह पूरी व्यवस्था का दोषी और सज़ा का हकदार ठहरता है; जैसे साफ श्वेत चादर पर यदि एक छोटे भाग में ही कीचड़ का दाग़ क्यों न लग जाए, गन्दी पूरी चादर ही मानी जाती है। इसलिये सारी उम्र व्यवस्था का पालन करते रहो और आखिर में आकर किसी एक बात में चूक जाओ तो पिछला सारा हिसाब खत्म हो जाता है, सिर्फ सज़ा सामने रह जाती है।

एक और अहम बात समझने की आवश्यक्ता है - व्यवस्था में दी गई शिक्षाएं, विधियां और रीतियां आदि, सभी आने वाले उद्धारकर्ता अर्थात प्रभु यीशु मसीह के जीवन और कार्यों का पूर्वावलोकन था, एक इशारों में कही गई बात थी जिसे मसीह ने आकर स्पष्ट तथा सजीव किया। इसीलिये मसीह व्यवस्था की परिपूर्णता और सजीव स्वरूप है, और अब उस पुराने छाया समान स्वरूप, अर्थात विधियों की व्यवस्था के स्थान पर वह अपने सजीव और सदा विद्यमान स्वरूप को हमें पालन करने के लिये देता है। इसीलिये जो मसीह और मसीह की शिक्षाओं का पालन करते हैं वे व्यवस्था का भी पालन करते हैं। जो बात व्यवस्था अपने लिखित स्वरूप में करने में असमर्थ थी - अर्थात प्रेम, अनुग्रह और क्षमा; वह मसीह के सजीव स्वरूप में समर्थ हो गई। अब विधियों का लेख तो हमारे सामने से हट गया लेकिन परमेश्वर की व्यवस्था अपने सच्चे और खरे स्वरूप में अभी भी पालन के लिये विद्यमान है। अब उसमें अर्थात मसीह रूपी व्यवस्था में दण्ड की आज्ञा नहीं वरन प्रेम, अनुग्रह और क्षमा है, पाप की माफी है, पाप करने की प्रवृति पर विजयी हो पाने की सामर्थ देने की क्षमता है।


३. गलत है आपका कहना कि "इसीलिए पॉल की उनसे नहीं बनी और उसने अपने मत को अन्य जातियों के लिए आसान बनाने की खातिर व्यवस्था को निरस्त घोषित कर दिया। जिसका कि उन्हें कोई अधिकार न था।"

पूरी बाइबल परमेश्वर का वचन है, मसीह का वचन है - पौल (या पौलूस) द्वारा लिखी हुई किताबें भी। पूरी बाइबल में सबसे ज़्यादा किताबें पौल ही की लिखी हुई हैं और बाकी सभी किताबों की तरह पौल के लिखी किताबें भी परमेश्वर की आत्मा की प्रेरणा ही से लिखी गईं हैं। पौल ने कभी अपनी किसी किताब में व्यवस्था को अनुचित, बुरा या गलत नहीं बताया। पौल मसीह के आरंभिक चेलों में से नहीं था। पौल मसीही विश्वास में बाद में आया, पहले वो मसीहीयों के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द करके उन्हें सताने वाला यहूदी हुआ करता था, जो बड़ी कड़ाई से व्यवस्था का पालन करता था। एक बार जब वह स्वयं व्यवस्था के असली और सही उद्देश्य को मसीही विश्वास में आने के द्वारा पहिचान गया तो फिर उसके बाद उसने हमेशा व्यवस्था के इसी सही और सच्चे उद्देश्य को पहिचानने और मसीह में होकर संसार के हरेक पापी को मिलने वाले अनुग्रह, क्षमा और उद्धार की सच्चाई का बयान किया। मसीही विश्वास में आने के बाद भी उसने हमेशा व्यवस्था को पूरा आदर और सम्मान दिया। पौल ने व्यवस्था के उल्लंघन करने की नहीं वरन मसीह में होकर व्यवस्था के पालन ही की शिक्षा दी।

न तो पौल ने कभी कोई "अपना मत" चलाने की कोशिश करी और न ही उसने परमेश्वर से मिली शिक्षाओं को "अन्य जातियों के लिए आसान बनाने की खातिर व्यवस्था को निरस्त घोषित कर दिया"। उसने हमेशा मसीह ही को आगे रखा और उसके समय के मसीह के बाकी चेलों ने भी उसका साथ दिया, उसकी शिक्षाओं को माना, उनका समर्थन किया और उन्हें सही बताया। बाइबल में कहीं यह नहीं दर्शाया गया कि पौल ने कोई अलग मत स्थापित करने का प्रयास किया अथवा वह मसीह के अन्य चेलों से अलग चला हो या मसीह के अन्य चेलों ने उसे कभी गलत बताया हो।

किसी मनुष्य को यह अधिकार नहीं कि वो परमेश्वर की शिक्षाओं और उसकी किसी बात में कोई फेरबदल कर सके और उसकी बातों को "आसान" बनाने के लिये उनमें मिलावट कर सके। पौल की लिखी किताबों का परमेश्वर के वचन बाइबल में सम्मिलित होना ही इस बात का प्रमाण है कि उसकी द्वारा लिखित बातें और शिक्षाएं सही, जायज़ और परमेश्वर के मन के अनुसार हैं।

आशा है कि मैं व्यवस्था पालन को लेकर आपकी चिंताओं का निवारण करने में सफल रहा हूँ।

धन्यवाद,
रोज़ की रोटी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें