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रविवार, 31 अगस्त 2025

The Holy Communion – 81 - God’s Dealing With Sin (3) / प्रभु भोज – 81 - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (3)

 

प्रभु भोज 81

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प्रभु की मेज़ - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (3)


पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर की संतान, नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी के लिए, सच्चे पाप अंगीकार और पश्चाताप का अर्थ है नाम-बनाम विशिष्ट पापों को मान लेना, उनके लिए वास्तविकता में प्रभु के सामने दुखी और पश्चातापी होना, और उनसे दूर हो जाने या उन्हें अपने जीवन से निकाल देने का निर्णय करना। एक औपचारिकता के समान, पुस्तक से या पादरी की पीछे-पीछे रस्म की विधि के अनुसार, पुस्तक में छापे हुए शब्दों को बोलते और दोहराते रहना, वह पाप अंगीकार तथा पश्चाताप नहीं है जिसकी बात 1 कुरिन्थियों 11:28 कर रहा है, और न ही यह वह “प्रभु की देह को पहचानना” है जो पद 29 का अभिप्राय है। इसलिए, इस रीति से प्रभु की मेज़ में भाग लेना, वह भाग लेना नहीं है जो परमेश्वर का वचन करने को कहता है, वरन यह करना वास्तव में अनुचित रीति से भाग लेना है। हमने यह भी देखा था कि बाइबल के अनुसार, या तो पाप परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया जाएगा, अन्यथा परमेश्वर उसका न्याय करेगा, दण्ड देगा। पाप के साथ व्यवहार करने का और कोई तरीका नहीं है।

परमेश्वर अपनी क्षमा प्रदान करने के लिए न तो किसी मनुष्य की सिफारिश को स्वीकार करता है (यशायाह 1:11-15; यिर्मयाह 7:16; 11:14; 14:11-12; यिर्मयाह 15:1; यहेजकेल 14:14-20), और न ही वह अपने द्वारा आँकलन के लिए मनुष्यों द्वारा बनाए गए तरीकों अथवा मानकों का प्रयोग करता है। व्यक्ति के पापों के क्षमा किए जाने के लिए, उसके द्वारा किया गया पाप अंगीकार और पश्चाताप परमेश्वर के मानकों के अनुसार, परमेश्वर द्वारा दिए गए तरीके से होना चाहिए, और परमेश्वर को, जो प्रत्येक व्यक्ति की भीतरी वास्तविक स्थिति को भली-भांति जानता है, उसके पश्चाताप के लिए आश्वस्त होना चाहिए, केवल तब ही परमेश्वर उसे क्षमा करेगा। इसलिए कोई भी, कभी भी पापों के लिए क्षमा मिलने को हल्के में नहीं ले सकता है, यूं ही उसे मान कर नहीं चल सकता है। विशेषकर वे तो कदापि नहीं जो केवल बाहरी रीति से कुछ क्रिया-कलापों, रीतियों को निभाते हैं, जबकि जो वे पाप अंगीकार तथा पश्चाताप के बारे में बोल और कर रहे हैं उसमें उनका मन खराई से कभी होता ही नहीं है। वे तो बस यही सोच और मान कर चलते हैं कि अब क्योंकि उन्होंने अपनी डिनॉमिनेशन की रीति के अनुसार कुछ शब्द बोल दिए हैं, इसलिए अब वे आश्वस्त रह सकते हैं कि परमेश्वर को वह करना ही होगा जो उन्होंने कहा है, उसे उन्हें क्षमा करना ही होगा, क्योंकि उन्होंने उचित अनुष्ठान को पूरा कर लिया है।

परमेश्वर से उसके बच्चों, उसके लोगों को पाप क्षमा मिलने के बारे में एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है, जिसके बारे में हमें बहुत गंभीरता से मनन करना चाहिए और हमेशा जिसका ध्यान भी रखना चाहिए। जैसा कि इब्रानियों 12:5-11 में लिखा है। जब, जैसी और जितनी आवश्यकता होती है, एक प्रेमी पिता के समान, परमेश्वर भी अपने जिद्दी बच्चों की ताड़ना करता है; जैसे कि संसार के माता-पिता करते हैं। परमेश्वर द्वारा अपने बच्चों की ताड़ना करना इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर अपने बच्चों की चिंता करता है, उनके जीवन और व्यवहार को लेकर चिंतित है, और अपनी संतान को संसार के साथ समझौते की स्थिति में बने नहीं रहने देगा, वरन उस पापमय स्थित से जिस में उस बच्चे ने अपने आप को डाल लिया है, उसे निकालने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है वह करेगा। इब्रानियों की पत्री का लेखक इस बात पर बल देने के लिए, पद 8 में बहुत कठोर भाषा का प्रयोग भी करता है - उनके ढिठाई के पापमय व्यवहार के लिए जिनकी ताड़ना नहीं हुई उन्हें वह “व्यभिचार की संतान”, अर्थात वे जो वास्तव में परमेश्वर की संतान नहीं हैं, कहता है। इसलिए परमेश्वर की जिद्दी, ढीठ, और पाप के साथ समझौता करने में लगे रहने वाले बच्चों के लिए, उन्हें मोड़ कर वापस ठीक मार्ग पर लाने के लिए परमेश्वर की ताड़ना उनके प्रति परमेश्वर के प्रेम और चिंता का प्रमाण तो है ही, साथ ही इस बात का भी प्रमाण है कि वह व्यक्ति परमेश्वर की संतान भी है। दूसरी ओर, जो लोग अपने पापमय, सांसारिक, समझौते के बिगड़े हुए जीवन में ढिठाई से बने रहते हैं, चलते रहते हैं, किन्तु उन्हें परमेश्वर की ताड़ना का सामना नहीं करना पड़ता है, उन्हें बहुत गंभीरता से इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा होना, उनके “व्यभिचार की संतान”, अर्थात उनके वास्तव में परमेश्वर की संतान नहीं होने का प्रमाण भी है; परमेश्वर ने उन्हें अपनी संतान, अपने लोग स्वीकार ही नहीं किया है।

अगले लेख में हम इस बात के बहुत गम्भीर व्यावहारिक तात्पर्य के बारे में देखेंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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The Holy Communion – 81

English Translation

The Lord’s Table - God’s Dealing With Sin (3)


    In the previous article we had seen that for a child of God, a Born-Again Christian Believer, true confession and repentance means confessing specific sins by name, genuinely being sorry for them before the Lord, and resolving to get away from them or cast them out of one’s life. The perfunctory, liturgical reading from a book or repeating after the Pastor, printed words about this, is not the self-examination, confession, and repentance that 1 Corinthians 11:28 is talking about, nor is it the “discerning the Lord's body” that verse 29 means. Hence, participation in the Lord’s Table in this manner is not the one that God’s Word is talking about, rather it is participating unworthily. We had also seen that Biblically speaking, sin can either be forgiven by God, or be judged and punished by God. There is no other way for dealing with sin.

    God neither accepts any man’s recommendations for granting His forgiveness (Isaiah 1:11-15; Jeremiah 7:16; 11:14; 14:11-12; Jeremiah 15:1; Ezekiel 14:14-20), nor does He accept or go by any man-made methods and criteria for His evaluation and judgment. To have one’s sins forgiven, the person’s confession and repentance has to be according to God’s standards, in the God given manner, and God, who knows the actual inner state of every person, has to be convinced about the repentance being factual, only then will He forgive. So, no one can ever take his forgiveness from God for granted, least of all those who simply go through the motions externally while their hearts are nowhere in anything they say or do about confession and repentance, and think that by uttering a few words as a denominational tradition, they can assume and rest assured that God is now obliged to do as they have asked Him to do, He has to forgive them, because they have fulfilled the appropriate ritual.

    There is another very important aspect of forgiveness that we need to seriously ponder over and always remain aware of, when thinking about God’s forgiveness for His children. As it says in Hebrews 12:5-11, as and when it is required, and to the degree necessary, God also chastens His wayward children, as a loving Father; just the same as earthly fathers do. This chastening by God is a proof that God cares for His child, is concerned about the child’s life and behavior, will not let His child continue in a state of compromise with the world, and will do whatever is necessary to bring His child out of the sinful state he might have got himself into. The author of Hebrews emphasizes this by using very strong language in verse 8 - calling those who have not been chastened for their stubborn behavior as “illegitimate”, i.e., not actually the children of God. So, God’s chastening for a wayward, stubborn and compromising child of God, to turn him around is an expression of God’s love and care for His child, as well as a proof of that person being a child of God. On the other hand, those who continue in their worldly, wayward, compromising, sinful behavior, without facing God’s chastening and corrections, should seriously take note that this is also a proof that they are “illegitimate”, i.e., God does not consider or know them as His children!

    In the next article we will see about the very serious practical implications of this.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.


 

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