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Monday, October 29, 2012

झूठ या सच


   स्टीव अकसर अपने सह-कर्मियों के साथ प्रभु यीशु और उद्धार के बारे में बातें करता है। किंतु जब भी वह सीधे परमेश्वर के वचन बाइबल से कोई बात कहता है तो कोई न कोई अवश्य यह कह उठता है कि "जरा ठहरो! किसी भी अन्य पुस्तक के समान यह भी तो मनुष्यों द्वारा ही लिखा गया है।" एक स्थानीय अखबार में छपे संपादक को लिखे पत्र में एक पाठक ने भी यही बात कही; उस पाठक ने लिखा: "मसीही विश्वासी बाइबल को परमेश्वर का वचन और अचूक बताते हैं, लेकिन मुझे कोई ऐसा कारण नहीं दीख पड़ता कि मैं स्वीकार कर लूँ कि बाइबल में मनुष्यों द्वारा लिखे शब्द किसी विज्ञान पत्रिका में लिखे मनुष्यों के शब्दों से अधिक विश्वासयोग्य हैं।"

   जब ऐसी आलोचना और परमेश्वर के वचन को मानव रचना एवं त्रुटिपूर्ण कहकर उसकी उपेक्षा का सामना करना पड़े तो हम मसीही विश्वासी प्रत्युत्तर में क्या कहें? संभव है कि हम में से बहुत से बाइबल के ज्ञाता नहीं हैं, इसलिए हम से कोई उत्तर बन ना पड़े। इसीलिए सबसे पहली आवश्यकता है कि हम परमेश्वर के वचन बाइबल का नियमित रूप से प्रार्थना के साथ अध्ययन करें और बाइबल के इतिहास तथा उससे संबंधित पुरातत्व खोजों के बारे में जानकारी अपने पास रख लें। जब हम ध्यान और नियम से बाइबल का अध्ययन करेंगे (२ तिमुथियुस २:१५) तो हम जानेंगे कि उसका परमेश्वर की प्रेर्णा से लिखा होना स्वयं बाइबल ही का दावा है (२ तिमुथियुस ३:१६) और विश्वासयोग्य है; ऐसा दावा जिसे आज तक कभी कोई गलत साबित नहीं कर पाया है।

   बाइबल से संबंधित थोड़े से तथ्यों पर विचार कीजिए - यह १६०० वर्षों के अन्तराल में लिखी ६६ भिन्न पुस्तकों का संकलन है। ये पुस्तकें ४० लेखकों द्वारा, जिनका सामाजिक और शैक्षिक स्तर बिलकुल भिन्न था, तीन भिन्न भाषाओं में, भिन्न परिस्थितियों में लिखी गईं। ये लेखक किसी दूसरे लेखक की कृति से अनभिज्ञ थे और ना ही उन्हें इस बात का आभास भी था कि कभी उनके द्वार लिखी बात एक पुस्तक के रूप में संकलित होगी। ना ही उनमें से कोई स्वभाव या पेशे लेखक था, वे सब परमेश्वर द्वारा प्रेरित होकर जो परमेश्वर उन्हें बताता गया लिखते गए, और जब उनका कार्य पूरा हो गया तो उनकी लेखनी भी शांत हो गई। बाइबल के प्रथम खंड ’पुराने नियम’ और दूसरे खंड ’नए नियम’ के बीच ४०० वर्षों की शांत अवधि है जब परमेश्वर द्वारा कोई वचन नहीं दिया गया। इतनी भिन्नता के बावजूद इस संकलन की प्रथम पुस्तक ’उत्पत्ति’ से लेकर अन्तिम पुस्तक ’प्रकाशितवाक्य’ तक एक ही वृतांत का वर्णन है, उसमें कोई परसपर विरोधाभास नहीं है और सभी पुस्तकें एक दुसरे की पूरक हैं। यह तभी संभव है जब उनका मानवीय लेखक चाहे जो भी हो, किंतु उन सब का मूल लेखक एक ही हो जो ना केवल बाइबल वरन सृष्टि के आरंभ से अन्त तक सब कुछ जानता हो - अर्थात परमेश्वर।

   यद्यपि हम बाइबल को परमेश्वर का वचन विश्वास द्वारा मानते हैं, तो भी यह कोई अन्ध-विश्वास नहीं है, क्योंकि परमेश्वर का वचन उसे परखने और जांचने का खुला निमंत्रण देता है। जिसने भी खुले और निषपक्ष मन से जांचा है, बाइबल को खरा और विश्वासयोग्य ही पाया है।

   परमेश्वर के वचन का नियमित अध्ययन कीजिए और उसकी आशीषें दूसरों के साथ भी बांटिए और आपका अपना जीवन आशीशों से भरपूर रहेगा। - ऐनी सेटास


बदलते और अस्थिर संसार में आप कभी ना बदलने वाले परमेश्वर के स्थिर और अटल वचन बाइबल पर पूरा भरोसा रख सकते हैं।

अपने आप को परमेश्वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्‍न कर, जो लज्ज़ित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो। - २ तिमुथियुस २:१५

बाइबल पाठ: २ तिमुथियुस ३:१२-१७
2Ti 3:12   पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे। 
2Ti 3:13  और दुष्‍ट, और बहकाने वाले धोखा देते हुए, और धोखा खाते हुए, बिगड़ते चले जाएंगे। 
2Ti 3:14  पर तू इन बातों पर जो तू ने सीखीं हैं और प्रतीति की थी, यह जानकर दृढ़ बना रह कि तू ने उन्‍हें किन लोगों से सीखा था; 
2Ti 3:15  और बालकपन से पवित्र शास्‍त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्‍त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है। 
2Ti 3:16  हर एक पवित्रशास्‍त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। 
2Ti 3:17  ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्‍पर हो जाए।

एक साल में बाइबल: 
  • यर्मियाह १८-१९ 
  • २ तिमुथियुस ३