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Thursday, August 21, 2014

शिक्षक


   इंटरनैट पर सोशल नेटवर्क बढ़ रहे हैं। ब्लॉग्स, ट्विटर, ई-मेल, वेब लिंक्स इत्यादि लोगों को आपस में संपर्क में लाने और रखने के अति प्रचलित माध्यम बन गए हैं। लोग, शारीरिक रूप से चाहे कितनी भी दूरी पर क्यों ना रहते हों, वे इन इंटरनैट पर उपलब्ध इन माध्यमों से परस्पर संपर्क कर सकते हैं, एक दूसरे से परामर्श ले-दे सकते हैं, एक दूसरे के साथ अपनी बात बाँट सकते हैं। ये माध्यम आत्मिक शिक्षाओं के प्रसार एवं प्रचार का भी सश्कत ज़रिया हैं।

   लेकिन इन सब बातों के लिए आमने-सामने मिलना और चर्चा करना भी अति मूल्यवान होता है। विशेषकर जब आत्मिक बातों में किसी परिपक्व विश्वासी के साथ चर्चा करने और मार्गदर्शन पाने की बात आती है, या कोई किसी का शिक्षक बनता है, तो यह प्रत्यक्ष भेंट एवं संवाद अच्छा रहता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में हम इसके अनेक उदाहरण पाते हैं: एलीशा ने एलिय्याह का अनुसरण किया (1 राजा 19:21), पौलुस ने तिमुथियुस को विश्वास में अपना सच्चा पुत्र मानकर उसका मार्गदर्शन और शिक्षण किया (1 तिमुथियुस 1:2)। पौलुस ने तिमुथियुस को यह भी निर्देश दिए कि जैसे उसने तिमुथियुस सिखाया है, वैसे ही वह भी अन्य लोगों को सिखाए, जो फिर औरों को सिखाएं और इस रीति से यह श्रंखला बनी रहे, बढ़ती रहे (2 तिमुथियुस 2:2)। मूसा ने माता-पिता को दायित्व दिया कि वे अपने बच्चों को परमेश्वर की शिक्षा सदा देते रहें, "और तू इन्हें अपने बाल-बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना" (व्यवस्थाविवरण 6:7)। हमारे सर्वोत्तम शिक्षक, प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने बारह चेलों की नियुक्ति के द्वारा हमें सिखाया है कि शिक्षण कैसे किया जाए - व्यक्तिगत संपर्क तथा निर्देशन के द्वारा: "तब उसने बारह पुरूषों को नियुक्त किया, कि वे उसके साथ साथ रहें, और वह उन्हें भेजे, कि प्रचार करें" (मरकुस 3:14); और इसी कार्य को ऐसे ही आगे बढ़ाने के निर्देश अपने चेलों को दिए (मत्ती 28:18-20)।

   इन परिच्छेदों से हम देखते हैं कि विभिन्न परिस्थितियों में भी प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संपर्क ही एक दूसरे को उभारने, सिखाने और आत्मिक जीवन में उन्नति करने का सर्वोत्तम माध्यम है: "जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है" (नीतिवचन 27:17)। जीवन यात्रा में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हम एक समझदार एवं परिपक्व व्यक्तित्व से सीख सकते हैं, मार्गदर्शन ले सकते हैं; या ऐसे ही हम भी किसी के शिक्षक बन सकते हैं। इसीलिए परमेश्वर का वचन हमें निर्देश देता है कि एक दुसरे से मिलना ना छोड़ें, वरन इसमें बढ़ते जाएं (इब्रानियों 10:25)। - डेनिस फिशर


परमेश्वर हमें जहाँ ले जाना चाहता है, वहाँ पहुँचने के लिए हमें एक दूसरे के साथ की आवश्यकता है।

और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना ने छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो। - इब्रानियों 10:25

बाइबल पाठ: मत्ती 28:18-20; 2 तिमुथियुस 2:1-2
Matthew 28:18 यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। 
Matthew 28:19 इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। 
Matthew 28:20 और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्‍त तक सदैव तुम्हारे संग हूं।

2 Timothy 2:1 इसलिये हे मेरे पुत्र, तू उस अनुग्रह से जो मसीह यीशु में है, बलवन्‍त हो जा। 
2 Timothy 2:2 और जो बातें तू ने बहुत गवाहों के साम्हने मुझ से सुनी हैं, उन्हें विश्वासी मनुष्यों को सौंप दे; जो औरों को भी सिखाने के योग्य हों।

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 9-12