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Tuesday, September 6, 2011

अनिवार्य भाग

क्या आप कभी ऐसे लोगों को लेकर विसमित हुए हैं जो कहते तो हैं कि उन्होंने प्रभु यीशु में विश्वास किया है, लेकिन उनके जीवनों में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता? ना तो वे पाप से ज़रा भी दुखी होते हैं और ना ही धार्मिकता में कोई रुचि रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनके अन्दर सच्चा पश्चाताप नहीं है।

बहुत वर्ष पहले की बात है कि एक जाना माना आपराधी एक सुसमाचार सभा में सन्देश सुनने आया। जो लोग सभा संचालित कर रहे थे, उन्होंने व्यक्तिगत रीति से उसे अपनी गवाही दी। उन्होंने उससे आग्रह किया कि वह मसीह यीशु के लिए अपने हृदय के द्वार खोल दे। ऐसा प्रतीत हुआ कि उस अपराधी ने उनकी बात मान ली। लेकिन कुछ महीने बीतने पर भी जब उसके जीवन में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया, उसके कार्य पहले ही के समान आपाराधिक ही रहे, तो उन प्रचारकों ने उससे इस विष्य में पूछा। उसने उत्तर दिया कि उससे कभी किसी ने यह नहीं कहा कि मसीह यीशु को अपने जीवन में आने देने के लिए उसे अपने पिछले जीवन और गतिविधियों से मूँह मोड़ना होगा। जब उन्हों ने उसे पश्चाताप और बदले हुए जीवन के बारे में समझाया, तो उस अपराधी ने अपने तथाकथित मसीही विश्वास को तुरंत ही तिलांजली दे दी।

परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम की मूल भाषा युनानी में जो शब्द पश्चाताप के लिए प्रयुक्त हुआ है वह है metanoia, जिस का अर्थ होता है "मन का बदला जाना"। इस के लिए मनुष्य को स्वयं, पाप और परमेश्वर के बारे में एक सही सोच रखनी अनिवार्य है। मनुष्य को यह बोध होना चाहिए कि वह अपने पाप के कारण परमेश्वर के न्याय और दण्ड का भागी है, और जैसे पानी में डूबता हुआ व्यक्ति अपने सर के बाल पकड़ कर अपने आप को पानी से बाहर नहीं खींच सकता, वैसे ही पाप की दलदल में फंसा व्यक्ति भी अपने किसी कार्य और प्रयास से अपने आप को पाप से बाहर नहीं निकाल सकता। पाप से बचने का केवल एक ही उपाय है कि हम अपने आप को प्रभु यीशु के हाथों में समर्पित कर दें, उसके सामने अपने पाप मान कर, उससे उनकी क्षमा मांग कर उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता ग्रहण कर लें क्योंकि केवल वह ही है जिस ने अपने जीवन के बलिदान के द्वारा पाप और मृत्यु पर विजय पाई है।

यदि हम सच्चे पश्चाताप के लिए तैयार हैं तो परमेश्वर भी हमें अपनी समर्थ से परिपूर्ण करने के लिए तैयार है। लेकिन हमें यह बात भली भांति समझ लेनी है कि मसीह यीशु की ओर फिरने का अर्थ है पापों से मूँह मोड़ लेना; एक के बिना दूसरा संभव नहीं है।

सच्चे पश्चाताप का अनिवार्य भाग है पुराने पापी जीवन से अपना मूँह मोड़ लेना। - डेनिस डी हॉन


हम मसीह यीशु के निकट जाने के लिए पश्चाताप नहीं करते; हम मसीह यीशु के निकट आ जाने के कारण पश्चाताप करते हैं।

समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो। - मरकुस १:१५


बाइबल पाठ: लूका १३:१-५

Luk 13:1 उस समय कुछ लोग आ पहुंचे, और उस [यीशु] से उन गलीलियों की चर्चा करने लगे, जिन का लोहू पीलातुस ने उन ही के बलिदानों के साथ मिलाया था।
Luk 13:2 यह सुन उस [यीशु] ने उन से उत्तर में यह कहा, क्‍या तुम समझते हो, कि ये गलीली, और सब गलीलियों से पापी थे कि उन पर ऐसी विपत्ति पड़ी?
Luk 13:3 मैं तुम से कहता हूं, कि नहीं; परन्‍तु यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब भी इसी रीति से नाश होगे।
Luk 13:4 या क्‍या तुम समझते हो, कि वे अठारह जन जिन पर शीलोह का गुम्मट गिरा, और वे दब कर मर गए: यरूशलेम के और सब रहने वालों से अधिक अपराधी थे?
Luk 13:5 मैं तुम से कहता हूं, कि नहीं; परन्‍तु यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम भी सब इसी रीति से नाश होगे।

एक साल में बाइबल:
  • भजन १४८-१५०
  • १ कुरिन्थियों १५:२९-५८