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Monday, August 7, 2017

दोष और आलोचना


   अनेकों लोगों के समान, जब मैं समाचार-पत्र या कोई पत्रिका पढ़ता हूँ, तो वर्तनी और व्याकरण की त्रुटियाँ मेरे सामने आती हैं। मैं जान बूझकर उन त्रुटियों को ढूँढ़ने का प्रयास नही करता हूँ; वे स्वतः ही मुझे दिखाई दे जाती हैं। ऐसे में मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि मैं उस प्रकाशन और उससे संबंधित लोगों की आलोचना करूँ, और इस संबंध में अपनी चिड़चिड़ाहट व्यक्त करूँ।

   संभव है कि आपके विशिष्ट कार्य-क्षेत्र को लेकर आपका भी कुछ ऐसा ही अनुभव हो। ऐसा लगता है कि हम किसी बात के बारे में जितना अधिक जानते हैं, उससे संबंधित त्रुटियों के विषय में उतने अधिक आलोचनात्मक हो जाते हैं। यहाँ तक कि हमारे ऐसे आलोचनात्मक व्यवहार के कारण अन्य लोगों के साथ हमारे संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं।

   परन्तु परमेश्वर का वचन बाइबल हमें एक भिन्न दृष्टिकोण प्रदान करती है। प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी की मसीही मण्डली को लिखी अपनी पत्री में लिखा, "मैं यह प्रार्थना करता हूं, कि तुम्हारा प्रेम, ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए" (फिलिप्पियों 1:9)। परमेश्वर चाहता है कि हम उसे जितना अधिक जानें और समझें, उतने अधिक नम्र और प्रेम करने वाले बनते जाएं। बजाए इसके कि हम दोष ढूँढ़ने और आलोचना करने वाले बनें, या ऐसा व्यवहार करें कि मानों हमने देखा नहीं, या हम परवाह नहीं करते हैं, हमारी समझ-बूझ के कारण हमारे अन्दर सहानुभूति और नम्रता बढ़ती जानी चाहिए। आलोचना के स्थान पर करुणा होनी चाहिए।

   बजाए इसके कि हम दूसरों में दोष ढूँढ़ने वाले हों, प्रभु परमेश्वर चाहता है कि हम "उस धामिर्कता के फल से जो यीशु मसीह के द्वारा होते हैं, भरपूर होते जाओ जिस से परमेश्वर की महिमा और स्‍तुति होती रहे" (पद 11)।

   जब प्रभु यीशु हमारे जीवनों और मनों में बसेगा, तब जैसे वह हमारे दोषों के प्रति व्यवहार करता है, हम औरों के दोषों के प्रति व्यवहार करना सीखेंगे; जैसे वह हमारी आलोचना नहीं करता है, हम भी औरों कि आलोचना नहीं करेंगे। उसके समान ही हमारा व्यवहार भी प्रेम का होगा, हम चाहे उन लोगों और उनकी कमियों के बारे में चाहे जितना भी जानने वाले क्यों न हों। - डेविड मैक्कैसलैंड


गलती करना मानवीय स्वभाव है, 
परन्तु क्षमा करना दिव्य स्वभाव है। - एलेकज़ैंडर पोप

जैसा मसीह यीशु का स्‍वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्‍वभाव हो। - फिलिप्पियों 2:5

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 1:1-11
Philippians 1:1 मसीह यीशु के दास पौलुस और तीमुथियुस की ओर से सब पवित्र लोगों के नाम, जो मसीह यीशु में हो कर फिलिप्पी में रहते हैं, अध्यक्षों और सेवकों समेत। 
Philippians 1:2 हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्‍ति मिलती रहे।
Philippians 1:3 मैं जब जब तुम्हें स्मरण करता हूं, तब तब अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं। 
Philippians 1:4 और जब कभी तुम सब के लिये बिनती करता हूं, तो सदा आनन्द के साथ बिनती करता हूं। 
Philippians 1:5 इसलिये, कि तुम पहिले दिन से ले कर आज तक सुसमाचार के फैलाने में मेरे सहभागी रहे हो। 
Philippians 1:6 और मुझे इस बात का भरोसा है, कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा। 
Philippians 1:7 उचित है, कि मैं तुम सब के लिये ऐसा ही विचार करूं क्योंकि तुम मेरे मन में आ बसे हो, और मेरी कैद में और सुसमाचार के लिये उत्तर और प्रमाण देने में तुम सब मेरे साथ अनुग्रह में सहभागी हो। 
Philippians 1:8 इस में परमेश्वर मेरा गवाह है, कि मैं मसीह यीशु की सी प्रीति कर के तुम सब की लालसा करता हूं। 
Philippians 1:9 और मैं यह प्रार्थना करता हूं, कि तुम्हारा प्रेम, ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए। 
Philippians 1:10 यहां तक कि तुम उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो, और मसीह के दिन तक सच्चे बने रहो; और ठोकर न खाओ। 
Philippians 1:11 और उस धामिर्कता के फल से जो यीशु मसीह के द्वारा होते हैं, भरपूर होते जाओ जिस से परमेश्वर की महिमा और स्‍तुति होती रहे।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 72-73
  • रोमियों 9:1-15