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गुरुवार, 11 जुलाई 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 127

 

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आरम्भिक बातें – 88


विश्वासियों का न्याय – 2

 

पिछले लेख में, छठी आरम्भिक बात, “अन्तिम न्याय” पर विचार करते हुए, हमने लेख का अन्त इस दावे के साथ किया था कि बाइबल में जिस अन्तिम न्याय की बात की गई है, वह, सामान्य समझ और धारणा के विपरीत, मुख्यतः वास्तव में नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों का होगा। आज हम इसे परमेश्वर के वचन से देखना आरम्भ करेंगे, और जैसे-जैसे हम इस विषय में आगे बढ़ते जाएँगे, हम इस से जुड़ी हुई कुछ अन्य बाइबल की बातों को भी देखेंगे, जिन को लेकर इस दावे के साथ दुविधा हो सकती है। आगे बढ़ने से पहले, हमें दो शब्दों के उपयोग करने को लेकर एक तथ्य को समझना आवश्यक है। बहुधा, ये दोनों शब्द अदल-बदल कर, पर्यायवाची शब्दों के समान उपयोग किए जाते हैं, किन्तु वास्तव में उनके अर्थों में कुछ भिन्नता है, तथा वे हमेशा ही अदल-बदल कर, पर्यायवाची शब्दों के समान उपयोग नहीं किए जा सकते हैं। ये शब्द हैं “न्याय” और “दण्ड” और सामान्यतः न्याय का अर्थ दण्ड देना मान लिया जाता है। किन्तु वास्तव में किसी का न्याय करना, या किसी को न्याय के लिए सौंपने का अर्थ होता है कुछ निर्धारित मानकों के अनुसार उस व्यक्ति की जाँच-पड़ताल करना, उपलब्ध और खोजे गए प्रमाणों के आधार पर उस व्यक्ति का आँकलन करना, और फिर जाँच-पड़ताल तथा आँकलन के आधार पर उस व्यक्ति को एक परिणाम देना। यह दिया जाने वाला परिणाम दण्ड हो सकता है, पुरस्कार हो सकता है, या उसे आरोप से बरी करना हो सकता है। इस प्रकार से, दण्ड देना, न्याय के सम्भव परिणामों में से एक है। किन्तु आम तौर से लोग किसी का न्याय करने का अर्थ उसे दण्ड देना ही समझ लेते हैं।

उपरोक्त के आधार पर, और हमारे विषय “अन्तिम न्याय” तथा उस के संदर्भ में, कृपया इस खण्ड, यूहन्ना 3:16-18 में प्रभु यीशु द्वारा कही गई बात पर कुछ विचार कीजिए, और विशेषकर पद 18 पर, जिसे प्रमुख किया गया है, ध्यान दीजिए, “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना इकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उसने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।” परमेश्वर ने समस्त मानवजाति के बचाए जाने, उद्धार पाने के लिए प्रावधान किया है, और उसे सभी के लिए मुफ्त उपलब्ध करवा दिया है। जो कोई भी परमेश्वर के प्रावधान को स्वीकार करता है, और प्रभु यीशु में विश्वास करता है, वह, उसी पल से जिस पल उसने स्वीकार किया और विश्वास किया, बचाया गया या उद्धार पाया हुआ बन जाता है, परमेश्वर की सन्तान बन जाता है (यूहन्ना 1:12-13), और हमेशा के लिए पाप के दोष से मुक्त हो जाता है। लेकिन जो अपने सारे जीवन भर परमेश्वर के प्रावधान को स्वीकार नहीं करता है, उस में विश्वास नहीं करता है, और उसी अस्वीकार करने तथा अविश्वास करने की दशा में ही मर जाता है, वह अपने सारे जीवन भर दण्ड की आज्ञा के अन्तर्गत जिया, उसी स्थिति में मरा, और अब उसी को भोगने के लिए अनन्त दण्ड की दशा में चला गया है। उस की यह दशा अब कभी नहीं बदली जाएगी, कभी पलट नहीं सकती है। उसकी इस स्थिति का बदलना, इस पृथ्वी पर तो सम्भव था; यदि जीवन के किसी भी पल में वह परमेश्वर के प्रावधान को स्वीकार कर लेता, प्रभु यीशु में विश्वास कर लेता तो स्थिति पलट जाती। लेकिन अस्वीकार करने और अविश्वास की दशा में सँसार से कूच करने के बाद, उस की आत्मा हमेशा के लिए नरक के दण्ड की भागी हो गई है, और यह दशा कभी बदलेगी नहीं, कभी पलटी नहीं जाएगी। अब इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है, ज़रा सा भी नहीं, कि उस ने पृथ्वी पर कैसा जीवन जीया है, और लोग उस के बारे में क्या कहते हैं, उसे कैसे याद करते हैं। चाहे उस ने बहुत भला जीवन जिया हो, या बहुत बुरा जीवन जिया हो, या वे केवल एक “सामान्य” प्रकार का व्यक्ति था, जो भी रहा हो, किन्तु क्योंकि उस ने परमेश्वर के प्रावधान का तिरस्कार किया है और प्रभु यीशु में अविश्वास किया है, इसलिए वह केवल दोषी और अनन्तकाल के लिए नरक के भागी ही माना जाएगा।

हम इसके निहितार्थों को अगले लेख में देखेंगे, और यह भी की यह बात न्याय विश्वासियों का होने पर न की अविश्वासियों के, किस प्रकार से लागू होती है।    

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

कृपया इस संदेश के लिंक को औरों को भी भेजें और साझा करें

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English Translation


The Elementary Principles – 88


Judgment of Believers – 2

 

   In the last article, while considering the sixth elementary principle “Eternal Judgment,” we had closed with the assertion that the final judgment mentioned in the Bible, contrary to common belief and understanding, is essentially the judgment of the truly Born-Again Christian Believers. Today we will begin seeing this from God’s Word, and as we develop this theme, we will also consider some other related Bible texts that may seem to be confusing with this assertion. Before we proceed further, we need to realize a fact regarding the usage of two words; quite often these words are used interchangeably or as synonyms, but actually they have a difference in meaning, and cannot always be used interchangeably and synonymously. These two words are “judgment” and “punishment” and very often judgment is also taken to mean punishment. But actually speaking, to judge someone, or the carrying out of judgment of someone means evaluating that person for something, on the basis of some given criteria, ascertaining and weighing the evidence for or against that person, coming to a certain conclusion about the matter, and then awarding a result to that person based on the evaluation done and the conclusion reached. This result that is awarded can be a punishment, or a reward, or being acquitted of the allegation against that person. So, punishment is one of the possible concluding parts of the judgment or evaluation of the person. But usually, often judgment is taken to mean handing over a punishment to the person being judged.

    In light of what has been said above, from our context, for our topic of discussion and learning, i.e., from the point of view of “Eternal Judgment,” please ponder over what the Lord Jesus has said in this passage, John 3:16-18, paying particular attention to verse 18, that has been made prominent: “For God so loved the world that He gave His only begotten Son, that whoever believes in Him should not perish but have everlasting life. For God did not send His Son into the world to condemn the world, but that the world through Him might be saved. He who believes in Him is not condemned; but he who does not believe is condemned already, because he has not believed in the name of the only begotten Son of God.” God has made a provision for all of mankind to be saved, and has made it freely available to everyone. Whosoever accepts God’s provision and believes in the Lord Jesus, from the moment of his accepting and believing, becomes a saved person, a child of God (John 1:12-13), and is set free from the condemnation of sin, forever. But those who do not accept and believe in God’s provision, all through their lives, and die in their state of non-acceptance and unbelief, they while they are alive on earth, as well as when they die and their soul reaches the next world, are in the state of condemnation, die in that state of condemnation, and reach the next world as those irreversibly and permanently condemned for eternity. Their change of state from being under condemnation to being saved could have been altered on earth; had they at any time accepted God’s offer and believed in the Lord Jesus. But not having accepted God’s offer, not having believed in the Lord Jesus, once they leave earth, the state of their soul becomes irrevocable, unchangeable, permanent; they are forever condemned to be in hell. Now, it matters little, rather, not at all, what kind of life they have lived on earth and what people say of them, and remember them to be. Whether they have led very good lives, or whether they have led very bad lives, or whether they have been just “ordinary” or “average” kind of people of the world, in any case, because they have rejected God’s provision and not believed in the Lord Jesus, they will only be considered condemned and sent to hell for eternity.

    We will consider the implications of this in the next article, and see how it applies to the assertion that the judgment will be of Believers, and not of non-believers.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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सोमवार, 30 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 5

 

पाप का समाधान - उद्धार - 1

यूनानी भाषा, जिसमें परमेश्वर के वचन बाइबल का नया नियम खण्ड मूल में लिखा गया है, उसमें प्रयुक्त जिस शब्द का अनुवादउद्धारयाबचावकिया गया है, उसका अर्थ होता हैकिसी खतरे अथवा हानि से सुरक्षा प्रदान करना”; अर्थात उद्धार दिए जाने का अर्थ है बचाया जाना, सुरक्षित कर दिया जाना। यहाँ पर एक बहुत महत्वपूर्ण, और इस संदर्भ में सर्वदा ध्यान में रखने वाली बात है कि उद्धार हमेशा परमेश्वर की ओर से दिया जाता है; कोई भी व्यक्ति कभी भी, किसी भी रीति से परमेश्वर के उद्धार को कमा नहीं सकता है; अर्थात अपने किसी भी प्रयास से अपने आप को उद्धार प्राप्त करने का अधिकारी अथवा योग्य नहीं कर सकता है। हम आगे चलकर इसे कुछ और विस्तार से देखेंगे और समझेंगे। 

प्रभु यीशु मसीह के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य, स्वयँ उन्हीं के शब्दों में, सँसार के सभी पाप में खोए हुए लोगों को बचाना, यही सुरक्षा, अर्थात उद्धार, सारे सँसार के सभी लोगों को उपलब्ध करवाना थाक्योंकि मनुष्य का पुत्र लोगों के प्राणों को नाश करने नहीं वरन बचाने के लिये आया है ...” (लूका 9:56); “यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूं” (यूहन्ना 12:47)। प्रभु द्वारा दिए जाने वाले इस उद्धार के विषय कुछ आधारभूत प्रश्न हैं, जिनके उत्तर जानना और समझना परमेश्वर की मानव जाति को अपनी संगति में बहाल करने की इस योजना को जानने, समझने, और मानने के लिए बहुत आवश्यक है। 

ये प्रश्न हैं:

·        यह उद्धार, अर्थात बचाव, या सुरक्षा किस से और क्यों होना है?

·        व्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?

·        इसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?

उद्धार - किस से और क्यों

 कल हमने देखा था कि मनुष्य के प्रति परमेश्वर के प्रेम का संकेत इस बात से मिलता है कि केवल मनुष्य ही है जिसको परमेश्वर ने, अपनी समस्त सृष्टि में से, अपने ही हाथों से, अपनी ही स्वरूप में रचा, और उसके नथनों में अपनी श्वास डालकर उसे जीवित प्राणी बनाया, तथा उसे समस्त पृथ्वी और उसकी सभी बातों और प्राणियों पर अधिकार दिया (उत्पत्ति 1:26-28; 2:7)। केवल मनुष्य ही है जिससे संगति रखने के लिए परमेश्वर अदन की वाटिका में आया करता था। किन्तु आदम और हव्वा के द्वारा किए गए परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता के पाप के कारण, परमेश्वर और मनुष्य की यह संगति टूट गई, और मनुष्य मृत्यु, अर्थात परमेश्वर से सदा के लिए अलग रहने के खतरे में आ गया। यह बहुत महत्वपूर्ण तथा आधारभूत तथ्य है, जिसे समझे बिना उद्धार के बारे में समझना असंभव है। क्योंकि निष्पाप, निष्कलंक परमेश्वर पाप के साथ संगति रखना तो दूर, पाप को देख भी नहीं सकता है (हबक्कूक 1:13) इसलिए उस प्रथम पाप, उस अनाज्ञाकारिता के कारण परमेश्वर और मनुष्य की संगति में अवरोध आ गया (यशायाह 59:1-2), मनुष्य परमेश्वर की संगति से दूर हो गया, और उससे हमेशा के लिए दूर हो जाने, अर्थात, मृत्यु के खतरे में आ गया।

परमेश्वर का वचन बाइबल बताती है कि पाप करने के बाद, पवित्र परमेश्वर के समक्ष निःसंकोच आने, और उससे उन्मुक्त होकर संगति और वार्तालाप करने की मनुष्य, आदम और हव्वा, की प्रवृत्ति बदल गई। उनके अंदर परमेश्वर की दृष्टि में दोषी होने का बोध आ गया, उन्होंने अपने इस नंगेपन, अपनी लज्जा को अपनी दृष्टि में उपयुक्त और उचित, अपने प्रयासों, अंजीर के पत्तों से बने आवरण के द्वारा ढाँप लिया, और जब परमेश्वर उनसे मिलने, संगति करने आया, तो वे परमेश्वर द्वारा उन्हें लगाकर दी गई वाटिका के वृक्षों में छिप गए:तब उन दोनों की आंखें खुल गई, और उन को मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए” (उत्पत्ति 3:7-8)। यहाँ सांकेतिक भाषा में, पाप के प्रभाव और मनुष्य में आए परिवर्तनों के विषय कुछ महत्वपूर्ण बातें दी गई हैं:

·        आँखें खुलनाउन्हें पवित्र परमेश्वर के सम्मुख उनकी वास्तविक दशा तथा अपने किए पाप के दोषी होने का बोध होना दिखाता है।

·        नंगापनपाप के कारण उत्पन्न आत्म-ग्लानि, लज्जा को दिखाता है। उनकी सृष्टि से लेकर उस समय तक, वे अपनी इसी निर्वस्त्र दशा में परमेश्वर के साथ मिला करते थे, संगति करते थे, किन्तु उन्हें इसमें कोई लज्जा नहीं होती थी, उन्हें कभी अपने आप को ढाँपने की आवश्यकता नहीं हुई, क्योंकि वे भी निष्पाप और पवित्र दशा में थे। 

·        उनकी सृष्टि के समय से लेकर उनकी यह निर्वस्त्र दशा परमेश्वर के सम्मुख उनके बिल्कुल खुले, प्रकट और किसी भी प्रकार के आवरण रहित होने, और परमेश्वर द्वारा उनके विषय में सब कुछ जानने की ओर भी संकेत करता है।

·        अंजीर के पत्तों के लंगोट पहननामनुष्य के अपने आप को अपने ही प्रयासों से परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत कर पाने योग्य बनाने को दिखाता है। मनुष्य अपने धर्म के कामों, अपने भले कार्यों, अपने ही बनाए तौर-तरीकों से अपनी लज्जा, परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारिता और पाप की दशा, को छुपाने का प्रयास करता है। वह यह भूल जाता है कि परमेश्वर के सामने उसका सब हाल खुला है, बेपरदा है। वह अपना कुछ भी परमेश्वर से छिपा नहीं सकता है। 

·        जिस प्रकार वे अंजीर के पत्ते वास्तविकता में केवल एक अस्थाई समाधान थे - थोड़े समय वे मुरझा जाते, सूख कर गिर जाते, और मनुष्य का नंगापन फिर से प्रकट हो जाता, उन्हें फिर से कुछ नया प्रावधान करना पड़ता; उसी प्रकार मनुष्य की धार्मिकता के काम, उसके अपने भलाई के प्रयास, सभी अस्थाई और नश्वर हैं, उसे कभी परमेश्वर के सम्मुखढँपाहुआ और प्रस्तुत होने योग्य नहीं बना सकते हैं। वह बार-बार अपने इन प्रयासों को दोहराता रहता है, किन्तु पाप का दोषी होने का बोध उसके विवेक से नहीं जाता है।

·        उन्होंने परमेश्वर की आवाज़ सुनकर अपने आप को “वाटिका के वृक्षोंमें छुपा लिया। आज भी मनुष्य अपनी ही गढ़ी हुई धार्मिकता को ओढ़ कर, अपने आप को परमेश्वर की सृष्टि की बातों में छुपाए रखने के प्रयास करता है; परमेश्वर के सामने अपनी वास्तविकता में आने के स्थान पर, वह अपने बनाए हुए आवरण ओढ़े हुए, अपने आप को अपनी ही गढ़ी हुई नश्वर बातों में छिपाए रखना चाहता है। 

 

आज किसी भी पूछ लें, सब के पास परमेश्वर की संगति में और उसके वचन के साथ समय न बिताने का एक ही बहाना है -जीवन इतना व्यस्त है कि इन बातों के लिए समय ही नहीं मिलता है; जो थोड़ा बहुत कर सकते हैं, वह कर लेते हैं, वरना संसार की माँगें यह सब करने के लिए समय ही नहीं देती हैं” - सभी अपने आप को संसार की बातों वाटिका के वृक्षोंमें छुपाए रखना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि संसार की यह सब बातें अस्थाई हैं, नश्वर हैं, यहीं रह जाएंगी, इनमें से कोई भी साथ नहीं जाएगी, ऐसा कोई बहाना परमेश्वर के सामने नहीं चलेगा।

अन्ततः वह समय सभी के जीवन में आएगा जब उन्हें परमेश्वर के सम्मुख अपनी वास्तविकनिर्वस्त्रदशा में आना ही होगा, और अपने जीवन की हर बात का हिसाब उसे देना होगा। तब उनके बनाए हुएअंजीर के पत्तों के लंगोटउनके पाप की दशा को ढाँपने पाएँगे, और उनके अपने नहीं वरन परमेश्वर के मानकों के आधार पर उन्हें न्यायसंगत ठहराने नहीं पाएंगे। परमेश्वर से उनकी वास्तविकता न अभी छुपी हुई है, और न तब छुपी हुई होगी, “सो जब तक प्रभु न आए, समय से पहिले किसी बात का न्याय न करो: वही तो अन्धकार की छिपी बातें ज्योति में दिखाएगा, और मनों की मतियों को प्रगट करेगा, तब परमेश्वर की ओर से हर एक की प्रशंसा होगी” (1 कुरिन्थियों 4:5) 

       पहले पाप से उत्पन्न हुई स्थिति के बारे में हम आगे अगले लेख में देखेंगे। अभी के लिए आप से निवेदन है कि अपने जीवनों को परमेश्वर के दृष्टिकोण से जाँच कर देखें, आप की वास्तविक स्थिति क्या है? ध्यान करें, आपके अपने कोई भी प्रयास और उपाय आपको परमेश्वर की दृष्टि से छुपा नहीं सकते हैं; आपकी लज्जा - आपके पाप की दशा उसके सामने खुली है। फिर भी वह आप से प्रेम करता है, आपके साथ संगति को बहाल करना चाहता है। लेकिन यह संभव हो पाना आपके निर्णय पर आधारित है। आपकी स्वेच्छा और सच्चे पश्चाताप तथा समर्पित मन से की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं मान लेता हूँ कि मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता करके मैंने पाप किया है। मैं धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे स्थान पर उनके मृत्यु-दण्ड को कलवरी के क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया। आप मेरे स्थान पर मारे गए, और मेरे उद्धार के लिए मृतकों में से जी भी उठे। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे पाप क्षमा करें। मुझे अपना शिष्य बना लें, अपनी आज्ञाकारिता में अपने साथ बना कर रखें।परमेश्वर आपकी संगति की लालसा रखता है, आपको आशीषित देखना चाहता है; इसे संभव करना या न करना, आपका अपना व्यक्तिगत निर्णय है। 

 

बाइबल पाठ: रोमियों 6:19-23 

रोमियों 6:19 मैं तुम्हारी शारीरिक दुर्बलता के कारण मनुष्यों की रीति पर कहता हूं, जैसे तुम ने अपने अंगों को कुकर्म के लिये अशुद्धता और कुकर्म के दास कर के सौंपा था, वैसे ही अब अपने अंगों को पवित्रता के लिये धर्म के दास कर के सौंप दो।

रोमियों 6:20 जब तुम पाप के दास थे, तो धर्म की ओर से स्वतंत्र थे।

रोमियों 6:21 सो जिन बातों से अब तुम लज्जित होते हो, उन से उस समय तुम क्या फल पाते थे?

रोमियों 6:22 क्योंकि उन का अन्त तो मृत्यु है परन्तु अब पाप से स्वतंत्र हो कर और परमेश्वर के दास बनकर तुम को फल मिला जिस से पवित्रता प्राप्त होती है, और उसका अन्त अनन्त जीवन है।

रोमियों 6:23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है। 

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 129; 130; 131

·      1 कुरिन्थियों 11:1-16

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

बोझ

 

         बिजली-पानी आदि के बिल का अत्यधिक आना कोई असामान्य बात नहीं है। परन्तु उत्तरी कैरोलाइना के केयर्न हीले को जो पानी का बिल मिला उसे सुनकर आप भौंचक्के रह जाएँगे। उसका पानी बिल था 100 करोड़ डॉलर का। इस बात से आश्वस्त कि उसने इतना पानी बिलकुल भी प्रयोग नहीं किया था, उसने मज़ाकिया तौर से पूछा कि क्या वह उस बिल को किस्तों में चुका सकता है?

         100 करोड़ डॉलर का क़र्ज़ डराने वाला बोझ हो सकता है, परन्तु यह बोझ भी उस बोझ के सामने बहुत ही कम है जो हमारे पाप हमें उठाए रहने के लिए मजबूर करते हैं – पाप का बोझ तो नापा भी नहीं जा सकता, परन्तु उसे उठाए घूमते रहने के कारण हम दोष, लज्जा, और हीन भावना से थकित होकर जीने लगते हैं। सत्य यही है कि हम अपने पापों का बोझ उठाकर नहीं चल सकते हैं।

         किन्तु एक और सत्य यह भी है कि हमें अपने पापों के बोझ को उठाकर चलने के आवश्यकता भी नहीं है। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पतरस ने मसीही विश्वासियों को लिखी अपनी पत्री में उन्हें स्मरण करवाया कि यह बोझ परमेश्वर का निर्दोष पुत्र, प्रभु यीशु मसीह ने उठा लिया है (1 पतरस 2:24)। क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान में प्रभु यीशु ने संसार के सभी लोगों के सभी पापों का बोझ अपने ऊपर ले लिया और उनका पूरा पूरा दण्ड सह लिया, और हमें अपनी क्षमा को उपलब्ध करवा दिया। अब हमें उन पापों के बोझ को लिए चलने और उसके दण्ड को भोगने की आवश्यकता नहीं है। हम प्रभु यीशु से अपने पापों की क्षमा मांगकर, अपना जीवन उसे सच्चे मन से समर्पित कर के अपने पापों के बोझ को उसके चरणों में रखकर, उससे अनन्त जीवन की आशीष को प्राप्त कर सकते हैं।

         अब हमें अपने बाप-दादों से चले आ रहे निकम्मे चाल-चलन (1:18) के भय या दोष में रहने की आवश्यकता नहीं है। अब हम इस बोझ से मुक्त होकर प्रेम और स्वतंत्रता के नए जीवन का अनुभव कर सकते हैं (पद 22-23)। - मार्विन विलियम्स

 

प्रभु यीशु ने हमारे पापों के बोझ को अपने ऊपर ले लिया, 

और हमें अपनी धार्मिकता और अनन्त जीवन को दे दिया।


हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है। - मत्ती 11:28-30

बाइबल पाठ: 1 पतरस 1:18-25

1 पतरस 1:18 क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप-दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा चान्दी सोने अर्थात नाशमान वस्तुओं के द्वारा नहीं हुआ।

1 पतरस 1:19 पर निर्दोष और निष्कलंक मेमने अर्थात मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा हुआ।

1 पतरस 1:20 उसका ज्ञान तो जगत की उत्पत्ति के पहिले ही से जाना गया था, पर अब इस अन्तिम युग में तुम्हारे लिये प्रगट हुआ।

1 पतरस 1:21 जो उसके द्वारा उस परमेश्वर पर विश्वास करते हो, जिसने उसे मरे हुओं में से जिलाया, और महिमा दी; कि तुम्हारा विश्वास और आशा परमेश्वर पर हो।

1 पतरस 1:22 सो जब कि तुम ने भाईचारे की निष्कपट प्रीति के निमित्त सत्य के मानने से अपने मनों को पवित्र किया है, तो तन मन लगा कर एक दूसरे से अधिक प्रेम रखो।

1 पतरस 1:23 क्योंकि तुम ने नाशमान नहीं पर अविनाशी बीज से परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है।

1 पतरस 1:24 क्योंकि हर एक प्राणी घास के समान है, और उस की सारी शोभा घास के फूल के समान है: घास सूख जाती है, और फूल झड़ जाता है।

1 पतरस 1:25 परन्तु प्रभु का वचन युगानुयुग स्थिर रहेगा: और यह ही सुसमाचार का वचन है जो तुम्हें सुनाया गया था।

 

एक साल में बाइबल: 

  • यशायाह 41-42
  • 1 थिस्सलुनीकियों 1

शुक्रवार, 19 जून 2020

अनुग्रह


     मैं जब भी लोगों को अपने मोबाइल फोन के प्रयोग में मगन होकर सड़क पर चलते हुए देखती थी, तो मन ही मन में मैं उन्हें लापरवाह होने का दोषी ठहराती थी। मुझे समझ में नहीं आता था कि वे अपनी सुरक्षा को लेकर इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं की आती-जाती गाड़ियों से टकरा जाने का जोखिम उठाए हुए ध्यान कहीं और लगाए हुए सड़क पर चलते चले जाते हैं। परन्तु एक दिन एक गली के मुहाने को पार करते हुए मैं अपने मोबाइल फोन पर आए एक सन्देश में इतनी मगन थी, कि मैंने गली में से आती हुई कार को देखा ही नहीं, उसके सामने आ गई। परन्तु उस कार के चालक ने मुझे देख लिया था, और उसने तुरंत ब्रेक लगा कर दुर्घटना होने से बचा लिया; परन्तु उसके चहरे पर जो खिसियाहट के भाव उभर कर आए, उन्हें मैं भुला नहीं सकती हूँ। मैं जिस बात के लिए लोगों पर दोष मढ़ती रहती थी, अपने आप को भला और उन्हें बुरा समझती रहती थी, मैं भी उसी गलती की दोषी थी; मेरा पाखण्ड मेरे सामने था।

     परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु मसीह ने अपने पहाड़ी उपदेश में इसी प्रकार के पाखण्ड को संबोधित किया है। प्रभु ने कहा, “हे कपटी, पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा” (मत्ती 7:5)। मैं भी अपनी आँखों में एक बड़ा सा लट्ठा लिए चल रही थी, जो मुझे अपनी ही गलतियों को देखने नहीं दे रहा था; और मैं दूसरों को ही दोषी समझती रहती थी। जिस खिसियाहट को मैं दूसरों के प्रति व्यक्त करती थी, उस दिन वही मेरे लिए भी उस कार चालक के चेहरे पर प्रकट थी।

     हम में से कोई भी सिद्ध नहीं है, हम सभी गलतियाँ करते हैं; वही गलतियाँ जिनके लिए हम औरों को दोषी ठहराते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारा अनुग्रहकारी परमेश्वर पिता हमारी कितनी बर्दाश्त करता है, हमें कितने अवसर देता है, हमें कितनी गलतियों के दुष्परिणामों से बचाता है। यह उसका अनुग्रह और प्रेम ही है जो हमें नष्ट नहीं होने देता है। - लिंडा वॉशिंगटन

 

औरों पर दोष लगाने में जल्दबाज़ी कभी न करें।


यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। - 1 यूहन्ना 1:9

बाइबल पाठ: मत्ती 7:1-6

मत्ती 7:1 दोष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए।

मत्ती 7:2 क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा; और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।

मत्ती 7:3 तू क्यों अपने भाई की आंख के तिनके को देखता है, और अपनी आंख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता?

मत्ती 7:4 और जब तेरी ही आंख मे लट्ठा है, तो तू अपने भाई से क्योंकर कह सकता है, कि ला मैं तेरी आंख से तिनका निकाल दूं।

मत्ती 7:5 हे कपटी, पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा।

मत्ती 7:6 पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत डालो; ऐसा न हो कि वे उन्हें पांवों तले रौंदें और पलट कर तुम को फाड़ डालें।   

 

एक साल में बाइबल: 

  • नहेम्याह 12-13
  • प्रेरितों 4:23-37


सोमवार, 7 अगस्त 2017

दोष और आलोचना


   अनेकों लोगों के समान, जब मैं समाचार-पत्र या कोई पत्रिका पढ़ता हूँ, तो वर्तनी और व्याकरण की त्रुटियाँ मेरे सामने आती हैं। मैं जान बूझकर उन त्रुटियों को ढूँढ़ने का प्रयास नही करता हूँ; वे स्वतः ही मुझे दिखाई दे जाती हैं। ऐसे में मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है कि मैं उस प्रकाशन और उससे संबंधित लोगों की आलोचना करूँ, और इस संबंध में अपनी चिड़चिड़ाहट व्यक्त करूँ।

   संभव है कि आपके विशिष्ट कार्य-क्षेत्र को लेकर आपका भी कुछ ऐसा ही अनुभव हो। ऐसा लगता है कि हम किसी बात के बारे में जितना अधिक जानते हैं, उससे संबंधित त्रुटियों के विषय में उतने अधिक आलोचनात्मक हो जाते हैं। यहाँ तक कि हमारे ऐसे आलोचनात्मक व्यवहार के कारण अन्य लोगों के साथ हमारे संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं।

   परन्तु परमेश्वर का वचन बाइबल हमें एक भिन्न दृष्टिकोण प्रदान करती है। प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी की मसीही मण्डली को लिखी अपनी पत्री में लिखा, "मैं यह प्रार्थना करता हूं, कि तुम्हारा प्रेम, ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए" (फिलिप्पियों 1:9)। परमेश्वर चाहता है कि हम उसे जितना अधिक जानें और समझें, उतने अधिक नम्र और प्रेम करने वाले बनते जाएं। बजाए इसके कि हम दोष ढूँढ़ने और आलोचना करने वाले बनें, या ऐसा व्यवहार करें कि मानों हमने देखा नहीं, या हम परवाह नहीं करते हैं, हमारी समझ-बूझ के कारण हमारे अन्दर सहानुभूति और नम्रता बढ़ती जानी चाहिए। आलोचना के स्थान पर करुणा होनी चाहिए।

   बजाए इसके कि हम दूसरों में दोष ढूँढ़ने वाले हों, प्रभु परमेश्वर चाहता है कि हम "उस धामिर्कता के फल से जो यीशु मसीह के द्वारा होते हैं, भरपूर होते जाओ जिस से परमेश्वर की महिमा और स्‍तुति होती रहे" (पद 11)।

   जब प्रभु यीशु हमारे जीवनों और मनों में बसेगा, तब जैसे वह हमारे दोषों के प्रति व्यवहार करता है, हम औरों के दोषों के प्रति व्यवहार करना सीखेंगे; जैसे वह हमारी आलोचना नहीं करता है, हम भी औरों कि आलोचना नहीं करेंगे। उसके समान ही हमारा व्यवहार भी प्रेम का होगा, हम चाहे उन लोगों और उनकी कमियों के बारे में चाहे जितना भी जानने वाले क्यों न हों। - डेविड मैक्कैसलैंड


गलती करना मानवीय स्वभाव है, 
परन्तु क्षमा करना दिव्य स्वभाव है। - एलेकज़ैंडर पोप

जैसा मसीह यीशु का स्‍वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्‍वभाव हो। - फिलिप्पियों 2:5

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 1:1-11
Philippians 1:1 मसीह यीशु के दास पौलुस और तीमुथियुस की ओर से सब पवित्र लोगों के नाम, जो मसीह यीशु में हो कर फिलिप्पी में रहते हैं, अध्यक्षों और सेवकों समेत। 
Philippians 1:2 हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह की ओर से तुम्हें अनुग्रह और शान्‍ति मिलती रहे।
Philippians 1:3 मैं जब जब तुम्हें स्मरण करता हूं, तब तब अपने परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं। 
Philippians 1:4 और जब कभी तुम सब के लिये बिनती करता हूं, तो सदा आनन्द के साथ बिनती करता हूं। 
Philippians 1:5 इसलिये, कि तुम पहिले दिन से ले कर आज तक सुसमाचार के फैलाने में मेरे सहभागी रहे हो। 
Philippians 1:6 और मुझे इस बात का भरोसा है, कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा। 
Philippians 1:7 उचित है, कि मैं तुम सब के लिये ऐसा ही विचार करूं क्योंकि तुम मेरे मन में आ बसे हो, और मेरी कैद में और सुसमाचार के लिये उत्तर और प्रमाण देने में तुम सब मेरे साथ अनुग्रह में सहभागी हो। 
Philippians 1:8 इस में परमेश्वर मेरा गवाह है, कि मैं मसीह यीशु की सी प्रीति कर के तुम सब की लालसा करता हूं। 
Philippians 1:9 और मैं यह प्रार्थना करता हूं, कि तुम्हारा प्रेम, ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए। 
Philippians 1:10 यहां तक कि तुम उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो, और मसीह के दिन तक सच्चे बने रहो; और ठोकर न खाओ। 
Philippians 1:11 और उस धामिर्कता के फल से जो यीशु मसीह के द्वारा होते हैं, भरपूर होते जाओ जिस से परमेश्वर की महिमा और स्‍तुति होती रहे।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 72-73
  • रोमियों 9:1-15


शनिवार, 29 जुलाई 2017

गन्दगी


   मैंने कुड़कुड़ाते हुए जे से शिकायत करी, "क्या वे अपना कूड़ा इतनी सी दूर ले जाकर भी नहीं फेंक सकते थे?" और वहाँ से कठिनाई से बीस फीट की दूरी पर स्थित कूड़ेदान में वह कूड़ा डाल दिया। फिर आगे कुड़कुड़ाते हुए कहा, "क्या दूसरों के लिए गन्दगी से भरा हुआ समुद्र-तट छोड़ने से उन्हें अपने विषय में अच्छा लगता है? मेरा मानना है कि ऐसा करने वाले लोग अवश्य ही पर्यटक रहे होंगे। मैं यह कतई मानने को तैयार नहीं हूँ कि हमारे अपने स्थानीय लोग ही हमारे समुद्र-तट को इस प्रकार गन्दा करेंगे, उसका ऐसा निरादर करेंगे।"

   इस घटना के अगले ही दिन मेरी दृष्टि उस प्रार्थना पर पड़ी जिसे मैंने अनेकों वर्ष पहले दूसरों पर दोषारोपण करने और उन्हें जाँचने के संबंध में लिखी थी। मेरे अपने ही शब्दों ने मुझे एहसास करवाया कि मेरे द्वारा औरों की गन्दगी को साफ करने से मेरे अपने मन में आया अहंकार कितना गलत था। क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि मेरे अपने जीवन में बहुत गन्दगी है जिसे मैं नज़रंदाज़ करती रहती हूँ, विशेषकर मेरे आत्मिक जीवन में।

   मैं यह दावा तो बड़ी शीघ्रता से कर लेती हूँ कि मैं अपना जीवन व्यवस्थित और सही इसलिए नहीं कर पाती हूँ क्योंकि कोई न कोई उसमें गन्दगी डालता रहता है। और मैं इस निषकर्ष पर भी बहुत शीघ्र पहुँच जाती हूँ कि जिस गन्दगी के कारण मेरे आस-पास दुर्गन्ध है, वह सब दूसरों की फैलाई हुई है। परन्तु यह दोनों ही बातें सत्य नहीं हैं। मेरे बाहर की कोई भी बात मुझे ना तो दोषी बना सकती है और न ही मुझे दूषित कर सकती है - ऐसा केवल वही कर सकता है जो मेरे हृदय में है। यही बात परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु ने भी कही है (मत्ती15:19-20)।

   असली गन्दगी तो मेरा वह रवैया है जिसके कारण किसी दूसरे के छोटे से पाप पर भी मैं नाक-भौं सिकोड़ने लगती हूँ, जबकि अपने जीवन में भरी गन्दगी की सड़ान्द को नज़रंदाज़ करती हूँ। - जूली ऐकैरमैन लिंक


हम में से अधिकतर लोग दूरदर्शी होते हैं;
 हमें दूसरों के पाप बहुत दूर से दिख जाते हैं; 
परन्तु अपने नहीं दिखते!

दोष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए। क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा; और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा। - मत्ती 7:1-2

बाइबल पाठ: मत्ती 15:7-21
Matthew 15:7 हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक की। 
Matthew 15:8 कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। 
Matthew 15:9 और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश कर के सिखाते हैं। 
Matthew 15:10 और उसने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, सुनो; और समझो। 
Matthew 15:11 जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। 
Matthew 15:12 तब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई? 
Matthew 15:13 उसने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्‍वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा। 
Matthew 15:14 उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्‍धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे। 
Matthew 15:15 यह सुनकर, पतरस ने उस से कहा, यह दृष्‍टान्‍त हमें समझा दे। 
Matthew 15:16 उसने कहा, क्या तुम भी अब तक ना समझ हो? 
Matthew 15:17 क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता, वह पेट में पड़ता है, और सण्‍डास में निकल जाता है? 
Matthew 15:18 पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। 
Matthew 15:19 क्योंकि कुचिन्‍ता, हत्या, पर स्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्‍दा मन ही से निकलतीं है। 
Matthew 15:20 यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, परन्तु हाथ बिना धोए भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता।
Matthew 15:21 यीशु वहां से निकलकर, सूर और सैदा के देशों की ओर चला गया।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 49-50
  • रोमियों 1


बुधवार, 31 मई 2017

दोष


   मुझ पर कई बातों का दोष लगाया गया है, और बहुधा यह सही भी था। मेरे पाप, विफलताएं, और अयोग्यताएं, मेरे मित्रों, परिवारजनों, और संभवतः अजनबियों के लिए भी दुःख, चिंता और असुविधा का कारण रहे हैं। लेकिन मुझ पर ऐसी बातों के लिए भी दोषारोपण किया गया है जिनके लिए मैं कदापि दोषी नहीं थी, ऐसी बातें जिन्हें बदलना मेरे वश के बाहर था।

   परन्तु ऐसा भी हुआ है कि मैंने दूसरों पर दोष लगाए हैं। कितनी ही बार अपनी परिस्थितियों के लिए मैंने दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराया है, कहा है कि यदि उन्होंने ऐसा या वैसा नहीं किया होता तो मैं आज इस परिस्थिति में नहीं होती। दोष चोट पहुँचाता है। इसलिए चाहे हम दोषी हों अथवा नहीं, हम बहुत सा समय और मानसिक सामर्थ दोष को किसी अन्य पर लादने में खर्च कर देते है।

   प्रभु यीशु मसीह हमें दोष से निपटने का एक बेहतर विकल्प देता है। यद्यपि वह स्वयं निर्दोष था, फिर भी उसने सारे संसार के पापों को अपने ऊपर ले लिया (यूहन्ना 1:29)। हम अकसर प्रभु यीशु को बलि के मेमने के रूप में देखते हैं, परन्तु वह संसार के सभी लोगों के सभी पापों और दोषों के लिए प्रायश्चित का अन्तिम मेमना भी था (लैव्यवस्था 16:10)।

   यदि हम अपने पापों को मान लें, और उन पापों को उठा ले जाने के प्रभु यीशु के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें, तो उन पापों का दोष हमें फिर कभी न तो उठाना पड़ेगा और न ही उनके लिए कोई दण्ड भुगतना पड़ेगा। साथ ही फिर हम अपने पापों, अपनी गलतियों के लिए किसी अन्य को दोषी ठहराने के प्रयास भी नहीं करेंगे।

   परमेश्वर पिता का धन्यवाद हो कि प्रभु यीशु के बलिदान और पुनरुत्थान के कारण आज संसार का प्रत्येक व्यक्ति, प्रभु यीशु पर स्वेच्छा से लाए गए साधारण विश्वास तथा अपने पापों के लिए किए गए पश्चाताप के द्वारा सभी दोषों से मुक्त हो सकता है, उनका दण्ड भोगने से बच सकता है, परमेश्वर से अनन्त जीवन का दान सेंत-मेंत प्राप्त कर सकता है। - जूली ऐकैरमैन लिंक


अपने पाप तथा दोषों के प्रति ईमानदारी ही 
परमेश्वर से उनकी क्षमा प्राप्त करने का मार्ग है।

दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है। - यूहन्ना 1:29

बाइबल पाठ: लैव्यवस्था 16:5-22
Leviticus 16:5 फिर वह इस्त्राएलियों की मण्डली के पास से पापबलि के लिये दो बकरे और होमबलि के लिये एक मेढ़ा ले। 
Leviticus 16:6 और हारून उस पापबलि के बछड़े को जो उसी के लिये होगा चढ़ाकर अपने और अपने घराने के लिये प्रायश्चित्त करे। 
Leviticus 16:7 और उन दोनों बकरों को ले कर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के साम्हने खड़ा करे; 
Leviticus 16:8 और हारून दोनों बकरों पर चिट्ठियां डाले, एक चिट्ठी यहोवा के लिये और दूसरी अजाजेल के लिये हो। 
Leviticus 16:9 और जिस बकरे पर यहोवा के नाम की चिट्ठी निकले उसको हारून पापबलि के लिये चढ़ाए; 
Leviticus 16:10 परन्तु जिस बकरे पर अजाजेल के लिये चिट्ठी निकले वह यहोवा के साम्हने जीवता खड़ा किया जाए कि उस से प्रायश्चित्त किया जाए, और वह अजाजेल के लिये जंगल में छोड़ा जाए। 
Leviticus 16:11 और हारून उस पापबलि के बछड़े को जो उसी के लिये होगा समीप ले आए, और उसको बलिदान कर के अपने और अपने घराने के लिये प्रायश्चित्त करे। 
Leviticus 16:12 और जो वेदी यहोवा के सम्मुख है उस पर के जलते हुए कोयलों से भरे हुए धूपदान को ले कर, और अपनी दोनों मुट्ठियों को फूटे हुए सुगन्धित धूप से भरकर, बीच वाले पर्दे के भीतर ले आकर 
Leviticus 16:13 उस धूप को यहोवा के सम्मुख आग में डाले, जिस से धूप का धुआं साक्षीपत्र के ऊपर के प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर छा जाए, नहीं तो वह मर जाएगा; 
Leviticus 16:14 तब वह बछड़े के लोहू में से कुछ ले कर पूरब की ओर प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर अपनी उंगली से छिड़के, और फिर उस लोहू में से कुछ उंगली के द्वारा उस ढकने के साम्हने भी सात बार छिड़क दे। 
Leviticus 16:15 फिर वह उस पापबलि के बकरे को जो साधारण जनता के लिये होगा बलिदान कर के उसके लोहू को बीच वाले पर्दे के भीतर ले आए, और जिस प्रकार बछड़े के लोहू से उसने किया था ठीक वैसा ही वह बकरे के लोहू से भी करे, अर्थात उसको प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर और उसके साम्हने छिड़के। 
Leviticus 16:16 और वह इस्त्राएलियों की भांति भांति की अशुद्धता, और अपराधों, और उनके सब पापों के कारण पवित्रस्थान के लिये प्रायश्चित्त करे; और मिलापवाला तम्बू जो उनके संग उनकी भांति भांति की अशुद्धता के बीच रहता है उसके लिये भी वह वैसा ही करे। 
Leviticus 16:17 और जब हारून प्रायश्चित्त करने के लिये पवित्रस्थान में प्रवेश करे, तब से जब तक वह अपने और अपने घराने और इस्त्राएल की सारी मण्डली के लिये प्रायश्चित्त कर के बाहर न निकले तब तक कोई मनुष्य मिलापवाले तम्बू में न रहे। 
Leviticus 16:18 फिर वह निकलकर उस वेदी के पास जो यहोवा के साम्हने है जाए और उसके लिये प्रायश्चित्त करे, अर्थात बछड़े के लोहू और बकरे के लोहू दोनों में से कुछ ले कर उस वेदी के चारों कोनों के सींगो पर लगाए। 
Leviticus 16:19 और उस लोहू में से कुछ अपनी उंगली के द्वारा सात बार उस पर छिड़ककर उसे इस्त्राएलियों की भांति भांति की अशुद्धता छुड़ाकर शुध्द और पवित्र करे। 
Leviticus 16:20 और जब वह पवित्रस्थान और मिलापवाले तम्बू और वेदी के लिये प्रायश्चित्त कर चुके, तब जीवित बकरे को आगे ले आए; 
Leviticus 16:21 और हारून अपने दोनों हाथों को जीवित बकरे पर रखकर इस्त्राएलियों के सब अधर्म के कामों, और उनके सब अपराधों, निदान उनके सारे पापों को अंगीकार करे, और उन को बकरे के सिर पर धरकर उसको किसी मनुष्य के हाथ जो इस काम के लिये तैयार हो जंगल में भेज के छुड़वा दे। 
Leviticus 16:22 और वह बकरा उनके सब अधर्म के कामों को अपने ऊपर लादे हुए किसी निराले देश में उठा ले जाएगा; इसलिये वह मनुष्य उस बकरे को जंगल में छोड़े दे।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 13-14
  • यूहन्ना 12:1-26


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

जानकारी


   हाल ही में मैंने अमेरिका में व्यक्तियों के लिए जासूसी का काम करने वाले एक जन के बारे में पढ़ा जो लोगों के दरवाज़े पर जाकर खटखटाता था और जो भी दरवाज़ा खोलता उसे अपनी पहचान बताने वाला बिल्ला दिखाकर कहता, "मुझे पता है कि मुझे आपको मेरे यहाँ आने का कारण बताने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।" अनेक अवसरों पर दरवाज़ा खोलने वाला भौंचका रह जाता और कह उठता, "आपको बात का पता कैसे चला?" और इससे काफी पहले हुए किसी अपराधिक कार्य का भेद खुलना आरंभ हो जाता था। स्मिथसोनियन पत्रिका में इसके विषय में लिखते हुए रौन रोज़ेनबॉम ने लोगों की इस प्रतिक्रिया के बारे में लिखा, "यह विवेक के प्राथमिक बल का कार्य, हृदय के अपने आप से चल रहे भीतरी वार्तालाप का प्रगटिकरण है।"

   हम सब अपने बारे में अनेक ऐसी बातें जानते हैं जो अन्य कोई नहीं जानता - हमारी असफलताएं, हमारे दोष, हमारे पाप - चाहे हम ने परमेश्वर के समक्ष इन सबका अंगीकार कर लिया है, लेकिन वे लौट लौट कर हमें दोषी ठहराने के लिए हमारे सामने आ खड़े होते हैं। प्रभु यीशु के एक निकट अनुयायी, यूहन्ना ने हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम और उसके द्वारा हमें उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने के निर्देशों के विषय में लिखा: "इसी से हम जानेंगे, कि हम सत्य के हैं; और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उसके विषय में हम उसके साम्हने अपने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे। क्योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है; और सब कुछ जानता है" (1 यूहन्ना 3:19-20)।

   परमेश्वर के प्रति हमारा विश्वास हमारे प्रति प्रभु यीशु में होकर किए गए उसके प्रेम और क्षमा के द्वारा आरंभ एवं घनिष्ठ होता है ना कि हमारे किसी कर्म के द्वारा, "...और इसी से, अर्थात उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है" (1 यूहन्ना 3:24)। परमेश्वर जो हमेशा हमारी हर बात की संपूर्ण जानकारी रखता है, हमारी अपनी आत्मनिन्दा से बढ़कर है, और अपने महान प्रेम में होकर ही हमारे पक्ष में कार्य करता है। - डेविड मैक्कैसलैंड


जिसने मसीह यीशु को स्वीकार कर लिया है, उसे परमेश्वर से दण्ड स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होगी।

और धर्म का फल शांति और उसका परिणाम सदा का चैन और निश्चिन्त रहना होगा। - यशायाह 32:17

बाइबल पाठ: 1 यूहन्ना 3:16-24
1 John 3:16 हम ने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए। 
1 John 3:17 पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देख कर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्योंकर बना रह सकता है? 
1 John 3:18 हे बालकों, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें। 
1 John 3:19 इसी से हम जानेंगे, कि हम सत्य के हैं; और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उसके विषय में हम उसके साम्हने अपने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे। 
1 John 3:20 क्योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है; और सब कुछ जानता है। 
1 John 3:21 हे प्रियो, यदि हमारा मन हमें दोष न दे, तो हमें परमेश्वर के साम्हने हियाव होता है। 
1 John 3:22 और जो कुछ हम मांगते हैं, वह हमें उस से मिलता है; क्योंकि हम उस की आज्ञाओं को मानते हैं; और जो उसे भाता है वही करते हैं। 
1 John 3:23 और उस की आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और जैसा उसने हमें आज्ञा दी है उसी के अनुसार आपस में प्रेम रखें। 
1 John 3:24 और जो उस की आज्ञाओं को मानता है, वह उस में, और वह उन में बना रहता है: और इसी से, अर्थात उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है। 

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 36-38
  • मत्ती 23:1-22


मंगलवार, 17 नवंबर 2015

विजेता नायक


   कुछ समय पहले किसी ने मुझ से एक बहुत कठिन प्रश्न पूछा: "बगैर पाप किए आप अधिक से अधिक कितनी देर तक रहने पाई हैं? एक सप्ताह, एक दिन, एक घण्टा?" ऐसे प्रश्न का हम क्या उत्तर दे सकते हैं? यदि हम सच्चे हों तो संभवतः हम कहेंगे, "बिना पाप किए कोई एक दिन भी रह पाया हो, ऐसा संभव नहीं है।" यदि हम अपने जीवन के पिछले सप्ताह का अवलोकन करें तो हो सकता है कि हमने पूरे सप्ताह परमेश्वर से किसी भी पाप के लिए अंगीकार ना किया हो, क्षमा ना माँगी हो; लेकिन यदि इससे हम यह मान बैठें के हमने अपने मन, या ध्यान या विचारों में पूरे सप्ताह कभी एक भी पाप नहीं किया है तो हम अपने आप को धोखा ही देंगे।

   परमेश्वर हमारे मनों को जानता है, और यह भी कि हम परमेश्वर के पवित्र आत्मा द्वारा पापों के लिए कायल किए जाने के प्रति संवेदनशील रहते हैं या नहीं। यदि हम वास्तव में अपने आप को जानते हैं और अपने पाप तथा परमेश्वर के पवित्र आत्मा के निर्देशों के प्रति संवेदनशील हैं तो हमें परमेश्वर के वचन बाइबल के कथन: "यदि हम कहें, कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं: और हम में सत्य नहीं" (1 यूहन्ना 1:8) को स्वीकार कर लेने में कोई संकोच नहीं होगा; और ना ही हम इससे आगे के पद में कही बात, "यदि कहें कि हम ने पाप नहीं किया, तो उसे झूठा ठहराते हैं, और उसका वचन हम में नहीं है" (1 यूहन्ना 1:10) के दोषी होना चाहेंगे।

   मुझसे जो प्रश्न मुझसे पूछा गया था, उसकी बजाए उससे बेहतर और उत्साहजनक प्रश्न होगा, "जब हम अपने पाप को मान लेते हैं और उसके लिए परमेश्वर से क्षमा माँगते हैं तो परमेश्वर का प्रत्युत्तर क्या होता है?" उत्तर है उपरोक्त दोनों पदों के बीच का पद, "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है" (1 यूहन्ना 1:9)। प्रभु यीशु ने हमारे पाप और उसके सारे दोष को अपने ऊपर लेकर उसका सारा दण्ड भी हमारे लिए सह लिया; वह हमारे पापों के लिए ही क्रूस पर बलिदान हुआ और फिर मृतकों में से जी उठा। इसीलिए वह हमारे अन्दर एक शुद्ध मन उत्पन्न करने और हमें एक नया जीवन, जो परमेश्वर के प्रति समर्पित और संवेद्नशील है, देने में सक्षम है (भजन 51:10)। जो कोई स्वेच्छा और पूरे समर्पण के साथ उसके पास पाप क्षमा के लिए आता है वह नए जीवन को प्राप्त करता है।

   मेरा युवा मित्र जेडन बिलकुल सही कहता है, प्रभु यीशु हमारे पापों का विजेता, हमारा नायक है। - ऐनी सेटास


प्रभु यीशु से मिलने वाली क्षमा नए जीवन का आरंभ है।

हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर। - भजन 51:10

बाइबल पाठ: 1 यूहन्ना 1
1 John 1:1 उस जीवन के वचन के विषय में जो आदि से था, जिसे हम ने सुना, और जिसे अपनी आंखों से देखा, वरन जिसे हम ने ध्यान से देखा; और हाथों से छूआ। 
1 John 1:2 (यह जीवन प्रगट हुआ, और हम ने उसे देखा, और उस की गवाही देते हैं, और तुम्हें उस अनन्त जीवन का समाचार देते हैं, जो पिता के साथ था, और हम पर प्रगट हुआ)। 
1 John 1:3 जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है। 
1 John 1:4 और ये बातें हम इसलिये लिखते हैं, कि हमारा आनन्द पूरा हो जाए। 
1 John 1:5 जो समाचार हम ने उस से सुना, और तुम्हें सुनाते हैं, वह यह है; कि परमेश्वर ज्योति है: और उस में कुछ भी अन्धकार नहीं। 
1 John 1:6 यदि हम कहें, कि उसके साथ हमारी सहभागिता है, और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं: और सत्य पर नहीं चलते। 
1 John 1:7 पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं; और उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है। 
1 John 1:8 यदि हम कहें, कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं: और हम में सत्य नहीं। 
1 John 1:9 यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। 
1 John 1:10 यदि कहें कि हम ने पाप नहीं किया, तो उसे झूठा ठहराते हैं, और उसका वचन हम में नहीं है।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल 5-7
  • इब्रानियों 12


गुरुवार, 12 नवंबर 2015

असफलता तथा शर्मिंदगी


   मार्ग के किनारे पुलिस की गाड़ी की जलती-बुझती बत्तियों ने मेरा ध्यान वहाँ खड़ी एक अन्य गाड़ी की ओर खेंचा, उसे यातायात नियम के उल्लंघन के लिए रोका गया था। मुझे पुलिस कार से उतरकर, हाथ में चालान काटने की पुस्तिका लिए उस गाड़ी की ओर बढ़ता हुआ पुलिस अधिकारी दिखाई दिया, और गाड़ी के अन्दर बैठी चालिका भी जो अपने चेहरे को अपने हाथों से ढाँपे हुए थी जिससे आते-जाते लोग उसको पहचान ना सकें। उसकी प्रतिक्रीया दिखा रही थी कि वह अपने गलत चुनाव और उसके दुषपरिणाम को लेकर कैसी शर्मिंदा थी।

   प्रभु यीशु के सामने जब भीड़ एक दोषी स्त्री को लाई, और उसके व्यभिचार को प्रकट किया तो भीड़ की मनसा केवल उस स्त्री को शर्मिंदा मात्र ही करने की नहीं थी; वे देखना चाहते थे कि प्रभु की क्या प्रतिक्रीया होगी। वे उस स्त्री को दोषी और दंड पाने के योग्य देखना चाहते थे, लेकिन प्रभु यीशु ने उस पर दया दिखाई; वह, केवल जिसे पाप का दोष और उसका दण्ड देने का अधिकार है, उस स्त्री के विफल चरित्र के प्रति करुणामय और क्षमाशील था। जब उस स्त्री पर दोषारोपण करने वाले चले गए, तब "यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना" (यूहन्ना 8:11)।

   प्रभु यीशु की यह करुणा हमें उसके क्षमा करने वाले अनुग्रह की याद दिलाती है, और उस स्त्री को दिया गया उसका निर्देश दिखाता है कि प्रभु चाहता है कि हम इस अनुग्रह के आनन्द में सदा बने रहें; और यह दोनों बातें मिलकर ठोकर खाकर पाप में गिरने वालों के प्रति प्रभु यीशु के नज़रिए को दिखाती हैं कि वह पापियों को भी नाश नहीं वरन पाप से परिवर्तित जीवन, पाप और उसके दोष तथा दुषपरिणामों से रहित आनन्दमय जीवन देना चाहता है।

   हम अपने सबसे बुरी नैतिक असफलता तथा शरमिंदगी की हालात में भी पूरे भरोसे के साथ उसे पुकार सकते हैं, उसकी ओर निःसंकोच हाथ बढ़ा सकते हैं क्योंकि उस की करुणा वास्तव में अद्भुत है, उसकी दया और क्षमा असीम हैं, वह किसी को भी अपने से दूर रखना नहीं चाहता। - बिल क्राउडर


हर परीक्षा का सामना करने के लिए आवश्यक अनुग्रह और सामर्थ हमें केवल प्रभु यीशु से ही प्राप्त हो सकती है।

यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। - 1 यूहन्ना 1:9 

बाइबल पाठ: यूहन्ना 8:1-11
John 8:1 परन्तु यीशु जैतून के पहाड़ पर गया। 
John 8:2 और भोर को फिर मन्दिर में आया, और सब लोग उसके पास आए; और वह बैठकर उन्हें उपदेश देने लगा। 
John 8:3 तब शास्त्री और फरीसी एक स्त्री को लाए, जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, और उसको बीच में खड़ी कर के यीशु से कहा। 
John 8:4 हे गुरू, यह स्त्री व्यभिचार करते ही पकड़ी गई है। 
John 8:5 व्यवस्था में मूसा ने हमें आज्ञा दी है कि ऐसी स्‍त्रियों को पत्थरवाह करें: सो तू इस स्त्री के विषय में क्या कहता है? 
John 8:6 उन्होंने उसको परखने के लिये यह बात कही ताकि उस पर दोष लगाने के लिये कोई बात पाएं, परन्तु यीशु झुककर उंगली से भूमि पर लिखने लगा। 
John 8:7 जब वे उस से पूछते रहे, तो उसने सीधे हो कर उन से कहा, कि तुम में जो निष्‍पाप हो, वही पहिले उसको पत्थर मारे। 
John 8:8 और फिर झुककर भूमि पर उंगली से लिखने लगा। 
John 8:9 परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से ले कर छोटों तक एक एक कर के निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई। 
John 8:10 यीशु ने सीधे हो कर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी। 
John 8:11 उसने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 51-52
  • इब्रानियों 9


गुरुवार, 19 जून 2014

लापरवाही के निर्णय


   एक राष्ट्रीय समाचार पत्रिका ने इंटरनैट पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करी जिसके अनुसार हमारा समुदाय राष्ट्र के उन सर्वोच्च 10 समुदायों में से एक था जो समाप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं; इसे पढ़कर स्थानीय नागरिक बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने उस पत्रिका के इस गलत निषकर्ष के बारे में अपने विरोध को दर्ज कराने के लिए तथ्य प्रस्तुत किए। समुदाय का एक नागरिक तो इस कठोर निर्णय का विरोध करने के लिए इस सीमा तक गया कि उसने अनेक नागरिकों को अपने साथ लिया और उनके साथ हमारे समुदाय के विभिन्न भागों में जाकर वहाँ के सजीव जीवन और चल रहे कार्य का वीडियो बनाया। उसके इस वीडियो ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान सत्य की ओर आकर्षित किया और उस पत्रिका को यह स्वीकार करना पड़ा कि उसके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट गलत थी। लेकिन जिस संस्था ने "शोध" करके यह रिपोर्ट तैयार करी थी वह अपने निषकर्ष पर अड़ी रही, यह जानते हुए भी कि उनकी "शोध" बहुत ही सीमित मानदण्डों पर आधारित थी।

   उस संस्था के इस लापरवाही से भरे निषकर्ष और फिर उसे लेकर, तथ्यों की अनदेखी करते हुए अपने बचाव के प्रयासों से मैं अचंभित हुई। लेकिन फिर मैंने विचार किया कि यह हम लोगों के लिए कितनी सामान्य सी बात है कि अनेक बातों में हम दूसरों के बारे में थोड़ी सी जानकारी के आधार पर ही गलत निषकर्ष निकाल लेते हैं और अपने अहम में आकर उन गलत निर्णयों को थामे रहते हैं, उनका विशलेष्ण कर के तथा तथ्यों को स्वीकार करके अपने निर्णयों को बदलना नहीं चाहते।

   इस प्रवृति का एक उत्तम उदाहरण है परमेश्वर के वचन बाइबल में अय्युब के साथ घटी घटना, जहाँ उसकी त्रासदी में उसे सांत्वना देने आए उसके मित्रों ने यह गलत निर्णय लिया कि अय्युब का पापी होना ही उसके दुखों का कारण है और वे इस आधार पर उस पर दोष मढ़ते रहे, तथा अय्युब उन्हें समझाने और अपने आप को निर्दोष साबित करने के प्रयास करता रहा। अन्ततः स्वयं परमेश्वर ने अय्युब का बचाव किया और एक चौंका देने वाला निषकर्ष उन मित्रों के सामने रखा। परमेश्वर ने अय्युब के मित्रों द्वारा अय्युब को दोषी ठहराने के प्रयासों की निन्दा नहीं की, वरन इस बात की निन्दा करी कि उन्होंने परमेश्वर के बारे में असत्यों को आधार बनाकर अय्युब को दोषी ठहराने का प्रयास किया (अय्युब 42:7)। 

   परमेश्वर द्वारा कही गई यह बात हमें सिखाती है कि जब हम दूसरों के बारे में तथ्यों को ठीक से जाने या जाँचे बिना और लापरवाही से निर्णय लेते हैं तो हम परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हैं - यह एक नम्र करने वाला तथ्य है, जिसे हमें सदा स्मरण रखना चाहिए तथा जिसकी हमें कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। - जूली ऐकैरमैन लिंक


यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो स्मरण रखिए कि संसार आपके परमेश्वर का आप के व्यवहार के द्वारा आँकलन करता है।

परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उन को धर्मी ठहराने वाला है। फिर कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा? मसीह वह है जो मर गया वरन मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है। - रोमियों 8:33-34

बाइबल पाठ: अय्युब 42:1-8
Job 42:1 तब अय्यूब ने यहोवा को उत्तर दिया; 
Job 42:2 मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है, और तेरी युक्तियों में से कोई रुक नहीं सकती। 
Job 42:3 तू कौन है जो ज्ञान रहित हो कर युक्ति पर परदा डालता है? परन्तु मैं ने तो जो नहीं समझता था वही कहा, अर्थात जो बातें मेरे लिये अधिक कठिन और मेरी समझ से बाहर थीं जिन को मैं जानता भी नहीं था। 
Job 42:4 मैं निवेदन करता हूं सुन, मैं कुछ कहूंगा, मैं तुझ से प्रश्न करता हूँ, तू मुझे बता दे। 
Job 42:5 मैं कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं; 
Job 42:6 इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूलि और राख में पश्चात्ताप करता हूँ। 
Job 42:7 और ऐसा हुआ कि जब यहोवा ये बातें अय्यूब से कह चुका, तब उसने तेमानी एलीपज से कहा, मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही। 
Job 42:8 इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छांट कर मेरे दास अय्यूब के पास जा कर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की मैं ग्रहण करूंगा; और नहीं तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूंगा, क्योंकि तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 76-78