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Sunday, September 22, 2013

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   कोलंबिया के शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक, डा० जैक मैज़िरो का कहना है कि व्यसकों को शिक्षा पाने में अग्रसर होने के लिए अनिवार्य है कि वे अपनी अन्तर्दृष्टि और अपने मन में बैठे हुए विचारों को चुनौती देते रहें और आलोचनात्मक रीति से उन्हें जाँचते रहें। उनका कहना है कि व्यसक तब ही सबसे अच्छी तरह सीख सकते हैं जब उनका सामना उनकी धारणाओं को चुनौती देने वाली दुविधाओं से होता रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स की बारबरा स्ट्रौक के अनुसार, ऐसी दुविधाएं मन में बैठी हुई धारणाओं पर आलोचनात्मक चिन्तन करने में सहायता करती हैं। यह कथन उस आम धारणा का बिलकुल विपरीत है जो हमारे अन्दर साधारणतया देखी जाती है, अर्थात वह धारणा जो कहती है - "मैंने तो अपना मन बना रखा है - अब तथ्यों द्वारा मुझे भ्रमित मत करो!"

   प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने समय के धर्म-अगुवों की धारणाओं को ऐसी ही चुनौती दी। जब उन्होंने सब्त के दिन एक मनुष्य को चंगा किया, तो यह धर्मगुरुओं के लिए उनकी दृढ़ धारणाओं को चुनौती देना था, क्योंकि वे धर्मगुरू मानते और सिखाते थे कि सब्त वाले दिन किसी प्रकार का कोई कार्य नहीं किया जा सकता - किसी को चंगाई देना भी नहीं। प्रभु यीशु की इस चुनौती में जब वे किसी तर्क द्वारा प्रभु यीशु को गलत प्रमाणित नहीं कर पाए तो उन्होंने प्रभु यीशु को शान्त कर देने का प्रयास किया (यूहन्ना 5:16-18)। प्रभु यीशु ने उनसे कहा: "तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:39-40)।

   बाइबल शिक्षक और प्रचारक ओस्वाल्ड चैम्बर्स ने कहा, "परमेश्वर के पास तथ्यों को प्रगट करने की ऐसी विधियाँ हैं जो मनुष्यों की धारणाओं और सिद्धांतों को झकझोर कर पलट देती हैं, यदि उनके ये सिद्धांत और धारणाएं परमेश्वर के उनकी आत्मा तक पहुँचने में बाधक हैं"।

   अस्थिर कर देने वाले अनुभव, जो हमें विवश करते हैं कि हम परमेश्वर के विषय बनाई गई अपनी धारणाओं पर पुनःविचार करें, हमें परमेश्वर के बारे में और गहरी रीति से जानने और उस पर और भी अधिक विश्वास करने में सहायक हो सकते हैं - यदि हम इन सब पर सच्चे मन से विचार करने और परमेश्वर के समीप आने को तैयार हों तो। - डेविड मैक्कैसलैंड


जिस जीवन में जाँचना ना हो वह जीने के योग्य नहीं। - सुकरात

फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते। - यूहन्ना 5:40

बाइबल पाठ: यूहन्ना 5:31-47
John 5:31 यदि मैं आप ही अपनी गवाही दूं; तो मेरी गवाही सच्ची नहीं।
John 5:32 एक और है जो मेरी गवाही देता है, और मैं जानता हूँ कि मेरी जो गवाही देता है वह सच्ची है।
John 5:33 तुम ने यूहन्ना से पुछवाया और उसने सच्चाई की गवाही दी है।
John 5:34 परन्तु मैं अपने विषय में मनुष्य की गवाही नहीं चाहता; तौभी मैं ये बातें इसलिये कहता हूं, कि तुम्हें उद्धार मिले।
John 5:35 वह तो जलता और चमकता हुआ दीपक था; और तुम्हें कुछ देर तक उस की ज्योति में, मगन होना अच्छा लगा।
John 5:36 परन्तु मेरे पास जो गवाही है वह यूहन्ना की गवाही से बड़ी है: क्योंकि जो काम पिता ने मुझे पूरा करने को सौंपा है अर्थात यही काम जो मैं करता हूं, वे मेरे गवाह हैं, कि पिता ने मुझे भेजा है।
John 5:37 और पिता जिसने मुझे भेजा है, उसी ने मेरी गवाही दी है: तुम ने न कभी उसका शब्द सुना, और न उसका रूप देखा है।
John 5:38 और उसके वचन को मन में स्थिर नहीं रखते क्योंकि जिसे उसने भेजा उस की प्रतीति नहीं करते।
John 5:39 तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है।
John 5:40 फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।
John 5:41 मैं मनुष्यों से आदर नहीं चाहता।
John 5:42 परन्तु मैं तुम्हें जानता हूं, कि तुम में परमेश्वर का प्रेम नहीं।
John 5:43 मैं अपने पिता के नाम से आया हूं, और तुम मुझे ग्रहण नहीं करते; यदि कोई और अपने ही नाम से आए, तो उसे ग्रहण कर लोगे।
John 5:44 तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो और वह आदर जो अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते, किस प्रकार विश्वास कर सकते हो?
John 5:45 यह न समझो, कि मैं पिता के साम्हने तुम पर दोष लगाऊंगा: तुम पर दोष लगाने वाला तो है, अर्थात मूसा जिस पर तुम ने भरोसा रखा है।
John 5:46 क्योंकि यदि तुम मूसा की प्रतीति करते, तो मेरी भी प्रतीति करते, इसलिये कि उसने मेरे विषय में लिखा है।
John 5:47 परन्तु यदि तुम उस की लिखी हुई बातों की प्रतीति नहीं करते, तो मेरी बातों की क्योंकर प्रतीति करोगे।

एक साल में बाइबल: 
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