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Saturday, September 28, 2013

उन्नति का माध्यम

   लेखक बनने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए उनके लेखों का बार बार अस्वीकृत हो जाना बहुत निराशाजनक हो सकता है। जब वे अपना लेख किसी प्रकाशक को भेजते हैं और फिर उन्हें उत्तर आता है कि "लेख भेजने के लिए धन्यवाद, किंतु आपका यह लेख वर्तमान में हमारे प्रकाशन की आवश्यकताओं के अनुसार नहीं है" तो अकसर इसका तातपर्य होता है, "ना अभी है और ना कभी होगा!" और लेखक एक के बाद एक प्रकाशकों के पास लेख भेजकर अपने प्रयास जारी रखते हैं, इस आशा में कि कभी तो कोई स्वीकार करेगा।

   मैंने पाया है कि प्रकाशकों द्वारा प्रयुक्त यह अस्वीकृति का वाक्यांश मेरे मसीही जीवन में बढोतरी के लिए बहुत उपयोगी है। इसके सहारे मेरे विचार पुनः मेरे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु पर केंद्रित हो जाते हैं और मसीही जीवन ठोकर खाने से बच जाता है!

   कैसे? वो इस प्रकार:
   जब कभी कोई चिंता मुझे घेरने लगती है तो मैं इस वाक्यांश को इस प्रकार अपने ऊपर लागू करती हूँ: "चिंता करना वर्तमान में मेरी आवश्यकताओं के अनुसार नहीं है; अभी नहीं और कभी नहीं" क्योंकि परमेश्वर का वचन बाइबल मुझे आश्वस्त करती है कि "किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं" (फिलिप्पियों 4:6) और मुझे स्मरण हो आता है कि मेरा परमेश्वर मेरी हर प्रार्थना को सुनता है और उसका उत्तर देता है। यदि मुझे किसी से कोई ईर्ष्या होने लगती है तो मैं अपने आप से कहती हूँ "ईर्ष्या वर्तमान में मेरी आवश्यकताओं के अनुसार नहीं है; अभी नहीं और कभी नहीं" क्योंकि परमेश्वर का वचन मुझे चिताता है कि "शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियां भी जल जाती हैं" (नीतिवचन 14:30) तथा "हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है" (1 थिस्सुलुनीकियों 5:18) और मुझे स्मरण हो आता है कि मेरा कार्य धन्यवाद करते रहना है ईर्ष्या करना नहीं। ऐसी ही अनेक बातों और परिस्थितियों में इस अस्वीकृति के वाक्यांश को, जो औरों के लिए निराशा का माध्यम हो सकता है मैं अपनी उन्नति का माध्यम बना लेती हूँ।

   एक और स्थल है जहाँ यह वाक्याँश मेरे लिए उन्नति का माध्यम रहा है: हम अपने मनों और चाल-चलन को अपने आप पवित्र और शुद्ध नहीं कर सकते; इसके लिए हमें एक परिवर्तित जीवन चाहिए जो केवल प्रभु यीशु से मिलने वाली पापों की क्षमा तथा उद्धार द्वारा ही संभव है। पापों की क्षमा और उद्धार के साथ ही हमारे मन परमेश्वर के पवित्र आत्मा के मन्दिर बन जाते हैं और वह हमारे अन्दर आकर वास करता है, हमें सिखाता है, और उसकी शिक्षाओं का पालन करने से हम एक निर्मल जीवन व्यतीत करते हैं। संसार और शैतान द्वारा मुझे फिर से अपवित्रता तथा सांसारिकता में ले जाने तथा पवित्र आत्मा की अनाज्ञाकारिता करने से रोकने के लिए और मुझे आत्मिक जीवन में गिराने वाली अशुद्ध बातों के प्रति सही निर्णय लेने में यही वाकयाँश "अभी नहीं और कभी नहीं" मेरा बहुत सहायक रहा है, मेरा उन्नति का माध्यम बना है। आप भी इसे अपने जीवन में आज़मा कर देखिए। - ऐनी सेटास


परमेश्वर के वचन पर मनन करने से परमेश्वर के आत्मा द्वारा हमारे मन नूतन हो जाते हैं।

और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो। - रोमियों 12:2 

बाइबल पाठ: रोमियों 11:33-12:2
Romans 11:33 आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!
Romans 11:34 प्रभु की बुद्धि को किस ने जाना या उसका मंत्री कौन हुआ?
Romans 11:35 ​या किस ने पहिले उसे कुछ दिया है जिस का बदला उसे दिया जाए।
Romans 11:36 क्योंकि उस की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है: उस की महिमा युगानुयुग होती रहे: आमीन।
Romans 12:1 इसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान कर के चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।
Romans 12:2 और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 5-6 
  • इफिसियों 1