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Sunday, July 21, 2013

दृष्टिकोण और भविष्य

   अपने जीवन के एक लम्बे समय तक मैं उन लोगों के समान ही दृष्टीकोण रखता था जो परमेश्वर के विरुद्ध हैं क्योंकि परमेश्वर ने संसार में पीड़ा को होने दिया है। मैं किसी भी रीति से इस भिन्न-भिन्न प्रकार की पीड़ाओं से भरे विषाक्त संसार को तर्कसंगत नहीं मान सकता था। लेकिन जब मेरा मेलजोल उन लोगों से हुआ जो मुझ से भी अधिक दुख अथवा पीड़ा में से हो कर निकल रहे थे, तो उनके जीवन में इसके प्रभाव को देखकर मैं चकित हुआ। मैंने देखा कि दुख और पीड़ा एक समान ही दो भिन्न कार्य कर सकते हैं, परमेश्वर और उसके कार्यों के प्रति सन्देह उत्पन्न करना, या परमेश्वर में विश्वास और भी दृढ़ कर देना।

   दुख और पीड़ा को लेकर परमेश्वर के विरुद्ध मेरा वैमनस्य एक बात के कारण जाता रहा है - क्योंकि अब मैं परमेश्वर को जानने लगा हूँ और उस पर विश्वास रखता हूँ। उसे इस प्रकार व्यक्तिगत रीति से जानने और उस पर विश्वास लाने से मेरे जीवन में आनन्द, प्रेम और भलाई भर गए हैं। अब मेरा विश्वास मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई किसी धारणा या विचारधारा, या किसी किंवदंती अथवा काल्पनिक बात पर नहीं वरन एक प्रमाणित और जीवित ऐतिहासिक व्यक्ति - प्रभु यीशु मसीह पर है, और मेरे प्रभु ने मुझे ऐसा दृढ़ विश्वास दिया है जो किसी भी दुख अथवा पीड़ा से काटा नहीं जा सकता और ना ही कम हो सकता है।

   बहुत से लोगों के मन में प्रश्न रहता है - जब दुख और पीड़ा आती हैं तब परमेश्वर कहाँ होता है? उत्तर स्पष्ट और जगविदित है - वहीं जहाँ आपने अपने जीवन में उसे रखा है। यदि परमेश्वर आप के जीवन का स्वामी है, आपने अपना जीवन उसे समर्पित किया है, और उसकी इच्छानुसार अपना जीवन व्यतीत करने के प्रयास में रहते हैं तो वह आपके जीवन का रखवाला भी है, और हर परिस्थिति में वह आपके साथ बना रहता है और आपकी हर पीड़ा को वह सहता भी है और आपको उसे सहने और उस पर जयवंत होने की सामर्थ भी देता है। यदि आपने परमेश्वर को अपने जीवन से दूर कर रखा है, आप स्वयं अपने जीवन के स्वामी हैं और अपनी मन-मर्ज़ी से, अपनी ही लालसाओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए जीवन व्यतीत करते हैं, तो परमेश्वर भी आपके निर्णय का आदर करते हुए आपके जीवन की किसी बात में दखलंदाज़ी नहीं करता।

   दुख और पीड़ा परमेश्वर द्वारा करी गई सृष्टि की रचना का भाग नहीं हैं; इनका सृष्टि में प्रवेश मनुष्य द्वारा परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता और पाप का परिणाम है। जहाँ पाप की उपस्थिति है, वहाँ परमेश्वर कि उपस्थिति नहीं रह सकती है और ऐसी स्थिति शैतान को खुली रीति से अपना कार्य करने की पूरी छूट है। लेकिन परमेश्वर शैतान और उसके कार्यों के प्रति मजबूर नहीं है। परमेश्वर की सामर्थ ऐसी है कि वह शैतान द्वारा लाई गई दुख और पीड़ा की परिस्थितियों को भी अपने बच्चों की भलाई के लिए प्रयोग कर लेता है, उन्हें अपने बारे में और भी गहराई से सिखाने के लिए और अपने प्रति उनके विश्वास को और भी अधिक दृढ़ करने के लिए। इसीलिए आप पाएंगे कि जो लोग मसीही विश्वास में दृढ़ हैं, दुख और पीड़ाएं उनके जीवनों को परमेश्वर के और भी निकट ले आती हैं और उन परिस्थितियों में भी वे एक अद्भुत शांति के साथ रहते हैं, जो संसार की किसी भी शांति से बिलकुल भिन्न तथा श्रेष्ठतम होती है (यूहन्ना 14:27; 16:33)।

   हमारे उद्धाकर्ता प्रभु यीशु ने हमारे लिए दुख और पीड़ा व्यक्तिगत रूप में सहे हैं, वह अपने प्रीयों के दुख को अनुभव करके रोया भी है; आताताईयों द्वारा बड़ी निर्मम रीति से उसका शरीर तोड़ा गया है और उसका लहू बहाया गया है; उसने संसार के हर अपमान, तिरिस्कार और बेवजह क्रूरता को मृत्यु तक सहा है। इसीलिए वह हमारी हर पीड़ा और दुख को जानता है और सदा अपने विश्वासियों के साथ बना रहता है, उन्हें सामर्थ देता रहता है और इन परिस्थितियों द्वारा अपने लोगों को तराश कर, चमका कर, उनके जीवनों से व्यर्थ बातों को निकालकर उन्हें सिद्ध और अपने ही स्वरूप के लोग बना रहा है; "...हम उसी तेजस्‍वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं" (2 कुरिन्थियों 3:18)। एक दिन आएगा, और