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Monday, June 17, 2013

सच्ची दौलत

   धन सशक्त है; हम उसे कमाने के लिए मेहनत करते हैं, उसे संचित करते हैं, उस के द्वारा अपनी इच्छापूर्ति के प्रयास करते हैं और अपने पार्थिव जीवन की अभिलाषाओं को पूरा करने की चाह रखते हैं। धन की बहकाने वाली सामर्थ के कारण, प्रभु यीशु की शिक्षाओं में सर्वाधिक धन से ही संबंधित थीं; किंतु उन्होंने कभी एक बार भी अपने लिए कोई भेंट या उपहार नहीं चाहा। स्पष्ट है कि उन्होंने धन से संबंधित अपनी शिक्षाएं, अपनी जेब भरने के लिए नहीं दीं। धन संचय करने तथा उसपर निर्भर रहने की शिक्षाओं के विपरीत प्रभु की शिक्षाएं चेतावनी थीं कि धन संचय करने की लालसा और धन को सांसारिक सामर्थ पाने के लिए उपयोग करने की प्रवृत्ति हमारे आत्मिक जीवन के विकास को अवरुद्ध कर देती है और पार्थिव जीवन में अनेक परेशानियाँ ले आती है। प्रभु यीशु ने अपने आस-पास एकत्रित लोगों को एक "धनी-मूर्ख" की नीतिकथा सुनाई जिससे वे परमेश्वर के प्रति धनवान होने के मर्म को समझ सकें तथा पहचान सकें कि परमेश्वर की दृष्टि में धनवान होना संसार के मापदण्ड से कितना भिन्न है: "फिर भीड़ में से एक ने उस से कहा, हे गुरू, मेरे भाई से कह, कि पिता की संपत्ति मुझे बांट दे। उसने उस से कहा; हे मनुष्य, किस ने मुझे तुम्हारा न्यायी या बांटने वाला नियुक्त किया है? और उसने उन से कहा, चौकस रहो, और हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो: क्योंकि किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता। उसने उन से एक दृष्‍टान्‍त कहा, कि किसी धनवान की भूमि में बड़ी उपज हुई। तब वह अपने मन में विचार करने लगा, कि मैं क्या करूं, क्योंकि मेरे यहां जगह नहीं, जहां अपनी उपज इत्यादि रखूं। और उसने कहा; मैं यह करूंगा: मैं अपनी बखारियां तोड़ कर उन से बड़ी बनाऊंगा; और वहां अपना सब अन्न और संपत्ति रखूंगा: और अपने प्राण से कहूंगा, कि प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिये बहुत संपत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह। परन्तु परमेश्वर ने उस से कहा; हे मूर्ख, इसी रात तेरा प्राण तुझ से ले लिया जाएगा: तब जो कुछ तू ने इकट्ठा किया है, वह किस का होगा? ऐसा ही वह मनुष्य भी है जो अपने लिये धन बटोरता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं" (लूका 12:13-21)।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार परमेश्वर के प्रति धनवान होने से क्या तात्पर्य है? प्रेरित पौलुस ने लिखा है कि वे जो धनवान हैं वे अपने धन के प्रति मिथ्या अभिमान ना रखें वरन भले कार्यों में धनी बनें और धन को बाँटने में उदार हों (1 तिमुथियुस 6:17-18)। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर की नज़रों में धनवान होना हमारे जीवन की गुणवन्ता तथा अपने धन के द्वारा दूसरों की सहायता करने पर निर्भर है। यह बड़ी रोचक बात है! संसार में धन कमाने और धनवान बनने के मार्ग दिखाने वालों की सलाह तथा मार्गदर्शन देने वालों की शिक्षाओं से कितनी भिन्न है यह शिक्षा! लेकिन जो लोग यह विचार रखते हैं कि उनकी सुरक्षा और समाज में उनका स्तर उनके संचित धन के अनुपात में होता है वे प्रभु यीशु की इस नीतिकथा तथा धन संबंधित शिक्षाओं से सचेत हों, सच्ची दौलत वही है जो अविनाशी और चिरस्थाई है ना कि इस पृथ्वी पर संचित करी जाने वाली नाशमान दौलत। - जो स्टोवैल


धन केवल उन्हीं के लिए आशीष है जो उसे दूसरों के लिए आशीष बनाते हैं।

इस संसार के धनवानों को आज्ञा दे, कि वे अभिमानी न हों और चंचल धन पर आशा न रखें, परन्तु परमेश्वर पर जो हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से देता है। - 1 तिमुथियुस 6:17 

बाइबल पाठ: 1 तिमुथियुस 6:6-19
1 Timothy 6:6 पर सन्‍तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है।
1 Timothy 6:7 क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं।
1 Timothy 6:8 और यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्‍हीं पर सन्‍तोष करना चाहिए।
1 Timothy 6:9 पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं।
1 Timothy 6:10 क्य