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बुधवार, 6 मई 2026

Blessed and Successful Life - 90 - Holy Spirit – Always With Us – 2 / आशीषित एवं सफल जीवन – 90 - पवित्र आत्मा – हमेशा हमारे साथ - 2

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 90 - पवित्र आत्मा के भण्डारी – 10

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पवित्र आत्मा – हमेशा हमारे साथ - 2

 

हम परमेश्वर द्वारा प्रत्येक वास्तव में नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों को सौंपे गए संसाधनों का भण्डारी होने के बारे में अध्ययन करते आ रहे हैं। इन संसाधनों में परमेश्वर पवित्र आत्मा भी सम्मिलित है, जो किसी भी व्यक्ति के प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करते ही उसी पल से उस में आ कर निवास करने लगता है। और उसी पल से, प्रत्येक वास्तव में नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी, स्वतः ही पवित्र आत्मा का मन्दिर तथा भण्डारी बन जाता है। हमने यूहन्ना 14:16 से देखा है कि पवित्र आत्मा को परमेश्वर द्वारा मसीही विश्वासी को दिया गया है, कि उनका सहायक, उनका साथी हो, उनकी सेवकाई में उनका मार्गदर्शन करे, उन्हें सिखाए, और हमेशा उनके साथ बना रहे। विश्वासी का सहायक और साथी होने की पवित्र आत्मा की भूमिका को देखने के बाद, पिछले लेख से हमने परमेश्वर पवित्र आत्मा का उनके साथ होने, उनमें निवास करने, विश्वासी का उनका मन्दिर होने के बारे में 1 कुरिन्थियों 3:16; 6:19-20 से देखना आरम्भ किया है। इन पदों से एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य, उसके दो परिणाम, और विश्वासी की ज़िम्मेदारी के बारे में पता चलता है। महत्वपूर्ण तथ्य, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं, है कि परमेश्वर ही प्रत्येक विश्वासी को पवित्र आत्मा प्रदान करता है, उसके आत्मिक स्तर और परिपक्वता, आत्मिक आयु, शारीरिक आयु, और उसके सेवकाई चाहे कुछ भी हो। आज हम दो परिणामों को देखेंगे।


हम 1 कुरिन्थियों 6:19-20 से देखते हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के उन में निवास करने के दो परिणाम हैं; पहला है कि वे पवित्र आत्मा का मन्दिर हो जाते हैं, और दूसरा है कि अब वे अपने नहीं है बल्कि परमेश्वर की संपत्ति हैं, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हैं – प्रभु यीशु के लहू और जीवन के द्वारा।


मसीही विश्वासी का पवित्र आत्मा का मन्दिर होने को हम कैसे समझ सकते हैं? प्रभु यीशु ने परमेश्वर के मन्दिर के उद्देश्य को यूहन्ना 2:14-17 में और फिर मत्ती 21:13 बताया है। हम यूहन्ना 2:14-17 से सीखते हैं कि मन्दिर व्यापार का स्थान होने के लिए नहीं था, अर्थात ऐसा स्थान जहाँ से लोगों का कोई शोषण किया जाए, और परमेश्वर के नाम में साँसारिक सम्पत्ति कमाई जाए। और मत्ती 21:13 से हम सीखते हैं कि मंदिर को प्रार्थना का स्थान होना था, वह स्थान जहाँ व्यक्ति परमेश्वर के साथ संपर्क कर सके, उस से वार्तालाप कर सके। प्रभु के इन कथनों से हम समझ सकते हैं कि एक विश्वासी को, परमेश्वर का मन्दिर होने के नाते, संसार के समक्ष कैसा होना चाहिए। विश्वासी को परमेश्वर द्वारा उसे दी गई सेवकाई और प्रभु के नाम का उपयोग साँसारिक सम्पत्ति कमाने के लिए नहीं करना चाहिए। वरन, उसे लोगों को परमेश्वर की ओर मार्गदर्शन करने वाला, उस से संपर्क में लाने वाला – लोगों तक सुसमाचार को पहुँचाने वाला; उन्हें साँसारिक नहीं बल्कि अनन्तकालीन स्वर्गीय आशीषों की ओर ध्यान करवाने वाला होना चाहिए। यह बदलाव उसके जीवन में स्पष्ट दिखाई देना चाहिये (रोमियों 12:1-2); न केवल भौतिक वस्तुओं के प्रति परन्तु मानसिकता और व्यवहार में भी, जैसा कि कुलुस्सियों 3 अध्याय में बताया गया है। 


विश्वासी के अब अपना नहीं रहने, वरन परमेश्वर की सम्पत्ति हो जाने, क्योंकि उसे प्रभु यीशु के जीवन की कीमत पर लिया गया है (1 थिस्सलुनीकियों  5:10; तीतुस  2:14), को समझने के लिए, दो पदों पर विचार कीजिए: “तुम दाम देकर मोल लिये गए हो, मनुष्यों के दास न बनो” (1 कुरिन्थियों 7:23), और “और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)। हम 1 कुरिन्थियों 7:23 से सीखते हैं कि क्योंकि विश्वासी प्रभु का है, उसकी संपत्ति है, इसलिए उसे अपने आप को किसी मनुष्य की अनुचित या अनुपयुक्त अधीनता में नहीं देना है; प्रभु की सेवकाई में होने के नाते, उसे मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला नहीं बनना है (गलातियों 1:10)। हम 2 कुरिन्थियों 5:15 से सीखते हैं कि विश्वासी को अपने लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए जीना है, अर्थात हर बात के लिये पहले प्रभु की इच्छा को जान कर (इफिसियों 5:17), फिर केवल उसी को पूरा करने के लिए जीना है; न कि लोगों के अनुसार और उन्हें प्रसन्न करने के लिए।


शैतान विभिन्न युक्तियों और प्रलोभनों, और अन्य बातों के द्वारा विश्वासी को परमेश्वर की संपत्ति और पवित्र आत्मा का मन्दिर होने के उद्देश्य को पूरा करने से बाधित करता है। अगले लेख में हम विश्वासी के लिए 1 कुरिन्थियों 6:20 में कही गयी ज़िम्मेदारी, शरीर और आत्मा द्वारा परमेश्वर की महिमा करने के बारे में देखेंगे।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


  

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Blessed and Successful Life - 90 - Stewards of Holy Spirit - 10 

English Translation

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Video Discussion                     Audio Discussion

Holy Spirit – Always With Us – 2

 

We have been studying about the stewardship of the provisions God has given to every truly Born-Again Christian Believer. One of these is the Holy Spirit, who comes to reside in every person from the moment he accepts the Lord Jesus as his savior. From then onwards, every truly Born-Again Christian Believer, automatically becomes the Temple and also a steward of the Holy Spirit. We have seen from John 14:16 that the Holy Spirit has been given to the Christian Believers by God to be their Helper and Companion, to teach and guide them in their ministry; and to always be with them. Having seen about His role as the Believer’s Helper and Companion, since the last article we have begun to see about the Holy Spirit being with and in the Believers; the Believers being His Temple, and God the Holy Spirit residing in them from 1 Corinthians 3:16; 6:19-20. These verses imply one very important fact, its two consequences, and the responsibilities of the Believer. The important fact, that we have considered in the previous article, is that it is God who gives the Holy Spirit to every Believer irrespective of their spiritual status, physical or spiritual age, maturity, and the ministry that God has given to them. Today we will consider the consequences, as stated in these verses.


From 1 Corinthians 6:19-20, for every Believer, the two consequences of having God the Holy Spirit residing in them are, firstly they become the Temple of the Holy Spirit, and secondly, they are no longer their own, they now belong to God, having been bought with a price – the blood and life of Lord Jesus.

 

How do we understand the Believer’s being the Temple of God the Holy Spirit? The Lord Jesus stated the purpose of the Temple of God in John 2:14-17 and Matthew 21:13. From John 2:14-17 we learn that the Temple was not meant to be a place of merchandise, i.e., of exploiting people; nor was it meant to be for earning temporal riches in the name of God. And from Matthew 21:13 we learn that it was meant to be a house of prayer, a place where one can commune with God. From the Lord’s statements we can understand what the Believer should be before the world, as the Temple of the Holy Spirit. The Believer should not use his God given ministry and the Lord’s name to earn worldly wealth, but should be one who helps and guides the people of the world to come in touch with and commune with God – to be the bearer of the Gospel for the people of the world, and pointing them towards eternal heavenly riches, instead of earthly possessions. This change must be clearly seen in their lives (Romans 12:1-2); not only in relation to temporal things, but also in mentality and behavior, as is given in Colossians chapter 3.


To understand the Believer no longer being his own, but being a possession of God, since he has been bought at the cost of the life of the Lord Jesus (1 Thessalonians 5:10; Titus 2:14), consider two verses: “You were bought at a price; do not become slaves of men” (1 Corinthians 7:23), and “and He died for all, that those who live should live no longer for themselves, but for Him who died for them and rose again” (2 Corinthians 5:15). From 1 Corinthians 7:23 we understand that since the Believer belongs to the Lord, therefore, he is not to put himself into any undue or inappropriate subjugation of any man; being in the service of the Lord he is not to be a ‘man-pleaser’ (Galatians 1:10). From 2 Corinthians 5:15 we learn that the Believer is to live not for himself, but for the Lord, i.e., for everything to first know the will of the Lord (Ephesians 5:17), and then live to do only that which pleases the Lord, instead of living according to men and trying to please the people.


Satan, in various ways, tries various ploys, temptations and other things, to make the Believers not fulfil these functions of being the Temple of the Holy Spirit and the possession of God. In the next article we will see about the responsibility of a Believer mentioned in 1 Corinthians 6:20 – glorify God in body and spirit.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.




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बुधवार, 15 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 81 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 10

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पवित्र आत्मा – हमेशा हमारे साथ - 2

 

    हम मसीही विश्वासी के परमेश्वर द्वारा उसे सौंपे गए संसाधनों का भण्डारी होने के बारे में अध्ययन करते आ रहे हैं। इस में परमेश्वर पवित्र आत्मा भी सम्मिलित है, जो मसीही विश्वासी के प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करते ही उसी पल से उस में आ कर निवास करने लगता है। हमने यूहन्ना 14:16 से देखा है कि पवित्र आत्मा को परमेश्वर द्वारा मसीही विश्वासी को दिया गया है, कि उनका सहायक, उनका साथी हो, उनकी सेवकाई में उनका मार्गदर्शन करे, उन्हें सिखाए, और हमेशा उनके साथ बना रहे। विश्वासी का सहायक और साथी होने की पवित्र आत्मा की भूमिका को देखने के बाद, पिछले लेख से हमने परमेश्वर पवित्र आत्मा का उनमें निवास करने, विश्वासी का उनका मन्दिर होने के बारे में 1 कुरिन्थियों 3:16; 6:19-20 से देखना आरम्भ किया है। इन पदों से एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य, उसके दो परिणाम, और विश्वासी की ज़िम्मेदारी के बारे में पता चलता है। तथ्य, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं, है कि परमेश्वर ही प्रत्येक विश्वासी को पवित्र आत्मा प्रदान करता है, उसके आत्मिक स्तर और परिपक्वता, आत्मिक आयु, शारीरिक आयु, और उसके सेवकाई चाहे कुछ भी हो। आज हम दो परिणामों को देखेंगे।


    हम 1 कुरिन्थियों 6:19-20 से देखते हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के उन में निवास करने के दो परिणाम हैं; पहला है कि वे पवित्र आत्मा का मन्दिर है, और दूसरा है कि अब वे अपने नहीं है बल्कि परमेश्वर की संपत्ति हैं, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हैं – प्रभु यीशु के लहू और जीवन के द्वारा।


    मसीही विश्वासी का पवित्र आत्मा का मन्दिर होने के उद्देश्य को हम कैसे समझ सकते हैं? प्रभु यीशु ने परमेश्वर के मन्दिर के उद्देश्य को यूहन्ना 2:14-17 में और फिर मत्ती 21:13 बताया है। हम यूहन्ना 2:14-17 से सीखते हैं कि मन्दिर व्यापार का स्थान होने के लिए नहीं था, अर्थात ऐसा स्थान जहाँ से लोगों का कोई शोषण किया जाए, और परमेश्वर के नाम में साँसारिक सम्पत्ति कमाई जाए। और मत्ती 21:13 से हम सीखते हैं कि मंदिर को प्रार्थना का स्थान होना था, वह स्थान जहाँ व्यक्ति परमेश्वर के साथ संपर्क कर सके, उस से वार्तालाप कर सके। प्रभु के इन कथनों से हम समझ सकते हैं कि एक विश्वासी को, परमेश्वर का मन्दिर होने के नाते, संसार के समक्ष कैसा होना चाहिए। विश्वासी को परमेश्वर द्वारा उसे दी गई सेवकाई और प्रभु के नाम का उपयोग साँसारिक सम्पत्ति कमाने के लिए नहीं करना चाहिए। वरन, उसे लोगों को परमेश्वर की ओर मार्गदर्शन करने वाला, उस से संपर्क में लाने वाला – लोगों तक सुसमाचार को पहुँचाने वाला; उन्हें साँसारिक नहीं बल्कि अनन्तकालीन स्वर्गीय आशीषों की ओर ध्यान करवाने वाला होना चाहिए।


    विश्वासी के अब अपना नहीं रहने, वरन परमेश्वर की सम्पत्ति हो जाने, क्योंकि उसे प्रभु यीशु के जीवन की कीमत पर लिया गया है (1 थिस्सलुनीकियों  5:10; तीतुस  2:14), को समझने के लिए, दो पदों पर विचार कीजिए: “तुम दाम देकर मोल लिये गए हो, मनुष्यों के दास न बनो” (1 कुरिन्थियों 7:23), और “और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)। हम 1 कुरिन्थियों 7:23 से सीखते हैं कि क्योंकि विश्वासी प्रभु का है, उसकी संपत्ति है, इसलिए उसे अपने आप को किसी मनुष्य की अधीनता में नहीं देना है; प्रभु की सेवकाई में होने के नाते, उसे मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला नहीं बनना है (गलातियों 1:10)। हम 2 कुरिन्थियों 5:15 से सीखते हैं कि विश्वासी को अपने लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए जीना है, अर्थात प्रभु की इच्छा को जान कर (इफिसियों 5:17), केवल उसी को पूरा करने के लिए जीना है, न कि लोगों के अनुसार और उन्हें प्रसन्न करने के लिए।


    शैतान विभिन्न युक्तियों और प्रलोभनों, और अन्य बातों के द्वारा विश्वासी को परमेश्वर की संपत्ति और पवित्र आत्मा का मन्दिर होने के उद्देश्य को पूरा करने से बाधित करता है। अगले लेख में हम विश्वासी के लिए 1 कुरिन्थियों 6:20 में कही गयी ज़िम्मेदारी, शरीर और आत्मा द्वारा परमेश्वर की महिमा करने के बारे में देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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Holy Spirit – Always With Us – 2

 

    We have been studying the Christian Believer’s stewardship of the provisions God has given him, including stewardship of the Holy Spirit, who comes to reside in every Believer from the moment he accepts the Lord Jesus as his savior. We have seen from John 14:16 that the Holy Spirit has been given to the Christian Believers by God to be their Helper and Companion, to teach and guide them in their ministry; and to always be with them. Having seen about His role as the Believer’s Helper and Companion, since the last article we have begun to see about the Holy Spirit being with the Believers; the Believers being His Temple, and God the Holy Spirit residing in them from 1 Corinthians 3:16; 6:19-20. These verses imply one very important fact, its two consequences, and responsibilities of the Believer. The fact, that we have considered in the previous article, is that it is God who gives the Holy Spirit to every Believer irrespective of their spiritual status, physical or spiritual age, maturity, and the ministry God has given to them. Today we will consider the consequences, as stated in these verses.


    From 1 Corinthians 6:19-20, for every Believer, the two consequences of having God the Holy Spirit residing in them are, firstly they are Temple of the Holy Spirit, and secondly, they are no longer his own, they now belong to God, having been bought with a price – the blood and life of Lord Jesus.


    How do we understand the Believer’s being the Temple of God the Holy Spirit? The Lord Jesus stated the purpose of the Temple of God in John 2:14-17 and Matthew 21:13. From John 2:14-17 we learn that it was not meant to be a place of merchandise, i.e., of exploiting people and earning temporal riches in the name of God; and from Matthew 21:13 we learn that it was meant to be a house of prayer, a place where one can commune with God. From the Lord’s statements we can understand what the Believer should be before the world, as the Temple of the Holy Spirit. The Believer should not use his God given ministry and the Lord’s name to earn worldly wealth, but should be one who helps and guides the people of the world to come in touch with and commune with God – to be the bearer of the Gospel for the people of the world, and pointing them towards eternal heavenly riches, instead of earthly possessions.


    To understand the Believer no longer being his own, but being a possession of God, since he has been bought at the cost of the life of the Lord Jesus (1 Thessalonians 5:10; Titus 2:14), the consider two verses: “You were bought at a price; do not become slaves of men” (1 Corinthians 7:23), and “and He died for all, that those who live should live no longer for themselves, but for Him who died for them and rose again” (2 Corinthians 5:15). From 1 Corinthians 7:23 we understand that since the Believer belongs to the Lord, therefore, he is not to put himself into the subjugation of any man; being in the service of the Lord he is not to be a ‘man-pleaser’ (Galatians 1:10). From 2 Corinthians 5:15 we learn that the Believer is to live not for himself, but for the Lord, i.e., to know the will of the Lord (Ephesians 5:17), and live to do only that which pleases the Lord, instead of living according to men and trying to please the people.


    Satan, in various ways, tries various ploys, temptations and other things, to make the Believers not fulfil these functions of being the Temple of the Holy Spirit and the possession of God. In the next article we will see about the responsibility of a Believer mentioned in 1 Corinthians 6:20 – glorify God in body and spirit.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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शनिवार, 24 जुलाई 2021

घमण्ड

 

          वास्तविक होने का क्या अर्थ होता है? छोटे बच्चों की पुस्तक The Velveteen Rabbit में इसी बड़े प्रश्न का उत्तर दिया गया है। यह पुस्तक एक कहानी है बच्चों की नर्सरी (शिशु सदन) के खिलौनों की, जिनमें से एक वेलवेटीन खरगोश जो वास्तविक बन गया, एक बच्चे के द्वारा उसे प्यार किए जाने की अनुमति देने के द्वारा। उन खिलौनों में से एक अन्य है पुराना और बुद्धिमान स्किन घोड़ा। उस घोड़े ने बहुत से मशीनी खिलौनों को आते, अपने बारे में घमण्ड करते, इठलाते, और कुछ समय के बाद टूटने या खराब हो जाने के कारण बेकार और अनुपयोगी हो जाते हुए देखा था। आरंभ में तो वे मशीनी खिलौने बड़े प्रभावी दिखाई देते थे, किन्तु उनका घमण्ड करना, अन्ततः व्यर्थ रहत था, विशेषकर उन्हें प्रेम से सहलाने के भाव में।

          घमण्ड करने का आरंभ तो बल प्रदर्शन के साथ होता है; किन्तु अन्त में आकर, यह सदा ही धूमिल होकर मिट जाता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में यिर्मयाह नबी ने तीन ऐसे क्षेत्र बताए जिनमें यह प्रकट होता है: “बुद्धिमत्ता ... वीरता ... धन” (यिर्मयाह 9:23)। वह वृद्ध बुद्धिमान नबी, अपने काफी वर्षों के अनुभव से इनके बारे में कुछ बातें तो अवश्य ही जानता था। उसने इस प्रकार से घमण्ड करने का सामना परमेश्वर के वचन से किया: “परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता हे, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ” (पद 24)।

          हम मसीही विश्वासी जो कि परमेश्वर की संतान हैं, अपने विषय नहीं वरन अपने परमेश्वर पिता के बारे में घमण्ड करें, उसी का व्याख्यान करें। हमारे प्रति उसके महान प्रेम के प्रकटीकरण की खुलती जाती कहानी में, यह अद्भुत है कि मैं और आप उसके प्रेम के कारण उसकी समानता में बदलते चले जा रहे हैं, और एक दिन उसके समान हो जाएँगे। - जॉन ब्लेज़

 

हे पिता परमेश्वर, मैं केवल आप में और आपके महान चिर-स्थाई प्रेम में ही घमण्ड करूं।


क्योंकि जिन्हें उसने पहिले से जान लिया है उन्हें पहिले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे। - रोमियों 8:29

बाइबल पाठ: यिर्मयाह 9:23-29

यिर्मयाह 9:23 यहोवा यों कहता है, बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न वीर अपनी वीरता पर, न धनी अपने धन पर घमण्ड करे;

यिर्मयाह 9:24 परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता हे, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ।

यिर्मयाह 9:25 देखो, यहोवा की यह वाणी है कि ऐसे दिन आने वाले हैं कि जिनका खतना हुआ हो, उन को खतनारहितों के समान दण्ड दूंगा,

यिर्मयाह 9:26 अर्थात मिस्रियों, यहूदियों, एदोमियों, अम्मोनियों, मोआबियों को, और उन रेगिस्तान के निवासियों के समान जो अपने गाल के बालों को मुंड़ा डालते हैं; क्योंकि ये सब जातियाँ तो खतनारहित हैं, और इस्राएल का सारा घराना भी मन में खतनारहित है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 35-36
  • प्रेरितों 25

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

संतुष्टि

 

          वीनस फ्लाईट्रैप नामक पौधे को सबसे पहले हमारे घर के पास के इलाके के रेतीले-दलदली क्षेत्र में देखा गया था। इन पौधों को देखना बहुत दिलचस्प होता है, क्योंकि ये मांसाहारी होते हैं। ये पौधे खिले हुए फूलों के समान दिखने वाले फंदों में मीठा सुगन्धित द्रव्य छोड़ते हैं। जब कोई कीड़ा उस सुगन्ध और मिठास से आकर्षित होकर उन खुले हुए फूलों के समान दिखने वाले फंदे के अन्दर को आता है तो एक सेकेंड से भी कम समय में वह फंदा बन्द हो जाता है, कीड़ा अन्दर फंसा जाता है, फिर उस ‘फूल में से उस कीड़े को गलाकर पचा लेने वाले पदार्थ निकलते हैं, और वह पौधा इस प्रकार अपने लिए उन पोषक तत्वों को प्राप्त कर लेता है, जो उसकी जड़ें रेतीली भूमि से नहीं लेने पाती हैं।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में हमें सचेत किया गया है कि हम भी एक अन्य प्रकार के फंदे से बच कर रहें, जो कभी भी हमें फंसा सकता है। प्रेरित पौलुस ने अपने शिष्य तीमुथियुस को चेतावनी दी: “जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं” और “क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटक कर अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है” (1 तिमुथियुस 6:9-10)।

          धन और भौतिक वस्तुएँ हमें सुख की प्रतिज्ञाएं तो देती हैं, किन्तु जब वे हमारे जीवनों में प्रथम स्थान ले लेती हैं, तब हम खतरे की स्थिति में आ जाते हैं। हम इस फंदे में फंसने से बच सकते हैं, परमेश्वर के प्रति दीन और नम्र होकर तथा उसकी भलाइयों के लिए सदा धन्यवादी बने रहकर, जो आशीषें उसने हमें प्रभु यीशु मसीह में होकर प्रदान की हैं: “पर सन्‍तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है” (पद 6)।

          जैसी संतुष्टि परमेश्वर प्रदान कर सकता है, इस संसार की नश्वर वस्तुएँ वह कभी प्रदान नहीं कर सकती हैं। सच्ची और स्थाई संतुष्टि केवल प्रभु परमेश्वर के साथ एक सच्चे संबंध में आने से मिलती है।  - जेम्स बैंक्स

 

हे प्रभु आप ही मेरे जीवन के लिए सबसे महान आशीष हैं।


मैं दीन होना भी जानता हूं और बढ़ना भी जानता हूं: हर एक बात और सब दशाओं में तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। - फिलिप्पियों 4:12

बाइबल पाठ: 1 तिमुथियुस 6:6-10

1 तीमुथियुस 6:6 पर सन्‍तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है।

1 तीमुथियुस 6:7 क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं।

1 तीमुथियुस 6:8 और यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो, तो इन्हीं पर सन्‍तोष करना चाहिए।

1 तीमुथियुस 6:9 पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं।

1 तीमुथियुस 6:10 क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटक कर अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 13-15
  • प्रेरितों 19:21-41

शनिवार, 5 जून 2021

खज़ाना

 

          जॉन और मेरी अपनी भू-संपत्ति में अपने कुत्ते को टहला रहे थे, और उनका ध्यान हाल ही की वर्षा के कारण मिट्टी में से दिखने लगे एक जंग लगे कनस्तर की ओर गया। वे उसे मिट्टी से निकाल कर अपने घर के अन्दर ले गए, और जब उसे खोला तो पाया कि उसमें एक शताब्दी पुराने सोने के सिक्के थे। वे दोनों उस स्थान पर वापस गए, और वहाँ पर और खुदाई की। उन्हें सात और कनस्तर मिले, और उन सभी में कुल मिलाकर 1,427 सिक्के थे। उन्होंने अपने इस खज़ाने को सुरक्षित रखने के लिए उसे एक अन्य स्थान पर ले जाकर दबा दिया। सिक्कों का वह भण्डार सैडल रिज होर्ड के नाम से जाना गया, और उसकी कीमत लगभग 1 करोड़ डॉलर आँकी गई, जो अमेरिका के इतिहास का अपने प्रकार का सबसे बड़ा खज़ाना था।

          यह कहानी परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु मसीह द्वारा कही गई एक बात के बहुत अनुरूप है। प्रभु ने परमेश्वर के राज्य के बारे में समझाने के लिए यह दृष्टांत कहा: “स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जा कर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया” (मत्ती 13:44)।

          यद्यपि इस प्रकार की खोज बहुत ही कम होने पाती है, फिर भी गड़े हुए खज़ानों की कहानियों ने लम्बे समय से लोगों की कल्पनाओं को बाँध के रखा है। लेकिन प्रभु यीशु ने ऐसे खज़ाने के बारे में बताया जो सभी को उपलब्ध हो सकता है – जो भी अपने पापों को स्वीकार करते हुए, उनके लिए प्रभु से क्षमा मांगता है, और प्रभु का शिष्य बनकर जीवन जीने का निर्णय लेता है, उसे परमेश्वर की संतान बनाए जाकर (यूहन्ना 1:12-13) यह स्वर्गीय खज़ाना प्रभु द्वारा मुफ्त में उपलब्ध करवा दिया जाता है।

          हम उस स्वर्गीय खज़ाने की थाह कभी पा नहीं सकेंगे। हम जब अपने पुराने जीवन को छोड़कर, परमेश्वर और उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जीवन व्यतीत करते हैं, तो हम उस खज़ाने की कीमत को भी समझते चले जाते हैं। प्रत्येक मसीही विश्वासी को परमेश्वर उसकी कलपना से भी परे “अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन” (इफिसियों 2:7) प्रदान करता है। परमेश्वर हमें अपनी संतान बना कर, इस पृथ्वी पर एक नया जीवन, जीवन जीने का एक नया उद्देश्य, और स्वर्ग में उसके साथ रहते हुए अनन्तकाल के लिए समझ तथा बयान से बाहर स्वर्गीय आशीषों तथा आनन्द का अद्भुत खज़ाना प्रदान करता है। - जेम्स बैंक्स

 

प्रभु यीशु हम मनुष्यों के लिए सबसे महान और बहुमूल्य खज़ाना है।


परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। - यूहन्ना 1:12-13

बाइबल पाठ: मत्ती 13:44-46

मत्ती 13:44 स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जा कर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।

मत्ती 13:45 फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।

मत्ती 13:46 जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उसने जा कर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया।

 

एक साल में बाइबल: 

  • इतिहास 23-24
  • यूहन्ना 15