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रविवार, 25 अगस्त 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 170

 

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मसीही जीवन से सम्बन्धित बातें – 15


मसीही जीवन के चार स्तम्भ - 1 - वचन (8) 


परमेश्वर के वचन के द्वारा बढ़ोतरी के हमारे इस अध्ययन में हम व्यावहारिक मसीही जीवन से सम्बन्धित बाइबल की शिक्षाओं, और वर्तमान में प्रेरितों 2 अध्याय में दी गई 7 बातों को सीख रहे हैं। हम यरूशलेम में एकत्रित हुए भक्त यहूदियों को पतरस द्वारा किए गए प्रचार में से, इन सात में से पहली तीन बातें, अर्थात पश्चाताप, बपतिस्मा, और संसार से अलगाव के बारे में देख चुके हैं। अब हम प्रेरितों 2:42 में दी गई चार बातों, जिन्हें “मसीही जीवन के स्तम्भ” भी कहा जाता है, और आरम्भिक मसीही विश्वासी जिन में लौलीन रहते थे, उन पर विचार कर रहे हैं। इन चार में से पहली बात है परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना, और हम बाइबल से कारणों को देख रहे हैं कि बाइबल का अध्ययन करना क्यों आवश्यक है। अभी हम जिस कारण पर हैं, वह है शैतान पर विजयी होने के लिए। हमने प्रभु यीशु की परीक्षाओं के उदाहरण से देखा था कि शैतान पर विजयी होने का सबसे उत्तम और प्रभावी तरीका है, उसके विरुद्ध परमेश्वर के वचन का सदुपयोग करना। परमेश्वर के वचन को “आत्मा की तलवार” भी कहा गया है (इफिसियों 6:17), और यह परमेश्वर द्वारा विश्वासी को दिए गए हथियारों (इफिसियों 6:13-17) या कवच में वार करने वाला एकमात्र हथियार है। आत्मा की इस तलवार को प्रयोग करने के लिए, उसे ठीक से और दृढ़ता से थामना आवश्यक है। पिछले लेख से हमने हाथ के उदाहरण से सीखना आरम्भ किया है कि शैतान के विरुद्ध परमेश्वर के वचन को प्रभावशाली रीति से कैसे प्रयोग किया जाए। जिस प्रकार से हाथ में चार उँगलियाँ और एक अँगूठा होता है, और इन पाँचों को एक साथ मिलकर काम करना होता है, ताकि किसी भी वस्तु को अच्छे से थामा जाए, उसी प्रकार से परमेश्वर के वचन को ठीक से सीखने और प्रयोग में लाने के लिए भी पाँच बातें आवश्यक हैं। पिछले लेख में हमने इनमें से दो “उँगलियों” या “बातों” को देखा था, अर्थात परमेश्वर के वचन को सुनना और उसे पढ़ना। आज हम आगे बढ़ेंगे, और तीसरी बात को देखेंगे।


3. तीसरी या बीच की उँगली - परमेश्वर के वचन का अध्ययन: यह अनुमान  लगाए गया है कि व्यक्ति जो अध्ययन करता है, उसका लगभग 35% याद रख लेता है। पौलुस ने तीमुथियुस को लिखा “अपने आप को परमेश्वर का ग्रहण योग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो” (2 तीमुथियुस 2:15)। इस पद में हम न केवल पवित्र आत्मा के द्वारा पौलुस में होकर तीमुथियुस को, तथा अब मसीही विश्वासियों को दिए गए इस निर्देश को देखते हैं, कि परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना है; वरन हम कुछ बातों को भी देखते हैं, बाइबल अध्ययन करने के लिए जिनका पालन आवश्यक है। पढ़ने और अध्ययन करने में अन्तर है। पढ़ने में हम केवल लिखे हुए को पढ़ते चले जाते हैं, बिना उसे समझने या उसका विश्लेषण करने पर कोई समय लगाए। जब कि अध्ययन करने में, लेख को धीरे-धीरे, ध्यान देकर, बहुधा बारम्बार, शब्दों और वाक्यांशों पर विचार करते हुए पढ़ा जाता है, ताकि उसके अर्थ और तात्पर्य समझे जा सकें और फिर उन्हें जीवन में लागू किया जा सके। बाइबल अध्ययन भिन्न-भिन्न तरीकों से किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, एक-एक पुस्तक का; या अलग-अलग विषय, जैसे प्रार्थना, उद्धार, स्वर्ग, आदि पर; या बाइबल के महत्वपूर्ण चरित्रों की जीवनियों का अध्ययन; या बाइबल में भिन्न अर्थों के साथ किसी शब्द के विभिन्न प्रयोगों का अध्ययन, जैसे कि ‘भविष्यवाणी’ का; या प्रमुख चरित्रों से सम्बन्धित कुछ बातों का, जैसे कि पौलुस की प्रार्थनाएं, या प्रेरितों के प्रचार और शिक्षा देने के तरीके; इत्यादि।


हम उपरोक्त 2 तीमुथियुस 2:15 से देखते हैं कि परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने के कुछ महत्वपूर्ण पक्ष हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। इस पद में जिन पक्षों का उल्लेख आया है वे इस प्रकार से हैं:

  • परमेश्वर के वचन का अध्ययन एक उद्देश्य के साथ, यत्न से किया जाना चाहिए, न कि हल्के में, या औपचारिकता पूरी करने के लिए।

  • यह अपने आप और अपने काम को मनुष्यों को नहीं, बल्कि परमेश्वर को ग्रहण योग्य ठहरने के लिए करना चाहिए। बाइबल अध्ययन केवल ज्ञान प्राप्त करने के लिए, अथवा मनुष्यों से अनुमोदन, प्रशंसा, आदर और पहचान प्राप्त करने के लिए नहीं होना चाहिए। यदि इस प्रकार के अनुचित विचारों के साथ अध्ययन किया जाता है, तो वह व्यर्थ और निष्फल रहता है, और उस से घमण्ड तथा समस्याएं उत्पन्न होते हैं (1 कुरीन्थियों  1:26-29; 8:1-3)।

  • बाइबल अध्ययन परमेश्वर के लिए एक उपयुक्त सेवक होने के लिए करना चाहिए। यदि व्यक्ति परमेश्वर से, उसके वचन को सीखता है, तो फिर उसे उस वचन को परमेश्वर के कार्य में उपयोग भी करना चाहिए। बाइबल अध्ययन का उद्देश्य परमेश्वर के लिए और अधिक उपयोगी एवं प्रभावी होना चाहिए, जिससे परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों का और बेहतर रीति से निर्वाह किया जा सके।

  • बाइबल अध्ययन इस रीति से करना चाहिए कि व्यक्ति को कभी शर्मिन्दा न होने पड़े, अर्थात, जो वह कहे, उस में गलत ना ठहरे। ध्यान रखिए, वास्तव में नया-जन्म पाए हुए प्रत्येक मसीही विश्वासी का सहायक और शिक्षक परमेश्वर पवित्र आत्मा है (यूहन्ना 14:16, 26)। यदि कोई वास्तव में पवित्र आत्मा से सीखता है, तो फिर उसके कुछ भी गलत सीखने की, और फिर किसी प्रकार की गलत शिक्षा देने की कोई सम्भावना ही नहीं है। समस्या यह है कि आज पवित्र आत्मा के नाम में लोग मनुष्यों से सीखते हैं। इसीलिए वे गलतियों में पड़ते हैं, और उन्हें या तो अपनी गलतियों के लिए, नहीं तो ठीक जानकारी न होने के कारण शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।

  • परमेश्वर के वचन के अध्ययन के समय वचन को ठीक से काम लाने, अर्थात उसकी सही व्याख्या करने, उसमें कोई गलत समझ अथवा त्रुटि ना लाने का बहुत ध्यान रखना चाहिए। बहुत ही संक्षेप में, परमेश्वर के वचन की व्याख्या करते समय कम से कम चार बातों का ध्यान रखना चाहिए। पहली, हमेशा सन्दर्भ में व्याख्या करें, कभी भी कोई व्याख्या बिना सन्दर्भ का ध्यान रखे नहीं की जानी चाहिए। सन्दर्भ दो प्रकार का होता है, तात्कालिक, अर्थात पद या खण्ड के आगे पीछे लिखी हुई बातें; और दूर का, अर्थात उस पद या बात से सम्बन्धित बाइबल के अन्य पद और खण्ड तथा अन्य शिक्षाएं। जो भी व्याख्या की जाए, वह तात्कालिक एवं दूर, दोनों संदर्भों के साथ संगत होनी चाहिए। दूसरी, व्याख्या के द्वारा कभी भी बाइबल में कोई विरोधाभास अथवा असंगति नहीं आनी चाहिए। यदि व्याख्या सन्दर्भ का ध्यान रखकर की जाएगी, तो फिर कोई असंगति अथवा विरोधाभास भी नहीं होगा। तीसरी, व्याख्या करते समय उस पद या खण्ड के प्राथमिक अर्थ, अर्थात वह अर्थ जो उस लेख के उन प्रथम लोगों के लिए था, जिन्हें वह बात लिखी गई थी, का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। इस प्राथमिक अर्थ में कुछ सहायक अर्थ जोड़े जा सकते हैं, किन्तु यह प्राथमिक अर्थ कभी भी हटाया, या बदला नहीं जा सकता है, और न ही किसी भी व्याख्या से इसमें कोई विरोधाभास लाया जा सकता है। चौथी, व्याख्या या अर्थ के द्वारा परमेश्वर के वचन में न तो कभी कुछ जोड़ा जाना चाहिए, और न ही उसमें से कुछ हटाया जाना चाहिए। परमेश्वर के वचन में जो, जैसा लिखा गया है, कहा गया है, उसे वैसा ही लिया और उपयोग किया जाना चाहिए; उसमें कोई भी नए अर्थ या अभिप्राय नहीं डाले जाने चाहिएं। यदि बाइबल अध्ययन पवित्र आत्मा की अधीनता में किया जाए, और कम से कम इन चार बातों का ध्यान रखा जाए, तो फिर गलत व्याख्या और झूठी शिक्षा देने से बच कर रहा जा सकता है। इसी प्रकार से, यदि इन चारों सिद्धान्तों को किसी के भी द्वारा दी गई किसी भी शिक्षा अथवा सन्देश पर लागू किया जाए, तो यह जाँचने और पहचानने का तरीका भी है कि वह शिक्षा या सन्देश सही और ग्रहण करने योग्य हैं या नहीं।


अगले लेख में हम यहाँ से आगे बढ़ेंगे, और शेष दोनों “उँगलियों” या बातों के बारे में देखेंगे, जो आत्मा की तलवार को ठीक से थामने और उपयोग करने के लिए आवश्यक हैं।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 


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English Translation


Things Related to Christian Living – 15


The Four Pillars of Christian Living - 1 - Word (8)



In our study on the Biblical teachings related to practical Christian living for Growing through God’s Word, we are presently considering the 7 things given in Acts 2. We have considered the first three, i.e., Repentance, Baptism, and Separation from the world, stated by Peter in his sermon to the devout Jews gathered in Jerusalem. We are now considering the four teachings of Acts 2:42, also known as the “Pillars of Christian Faith,” and practiced steadfastly by the initial Christian Believers. The first of these four is studying God’s Word, and we have been seeing from God’s Word the Bible, why we need to study the Bible. The reason we are now on, is to overcome Satan. We have seen through the example of the Lord Jesus Christ, at the time of His temptations, that the best and most effective way of overcoming Satan and being victorious over him is to properly use God’s Word against him. God’s Word has also been called the “Sword of the Spirit” (Ephesians 6:17), and it is the Christian Believer’s only weapon of offence in the armor given by God (Ephesians 6:13-17). To use this Sword of the Spirit, one has to hold it properly and firmly. Since the last article, through the analogy of the hand, we have begun learning how to hold and use God’s Word effectively against Satan. Just as the hand has four fingers and a thumb, and all five of them have to function together to hold anything well, similarly, there are five components to properly learning and utilizing God’s Word. In the last article we have seen two, “fingers” i.e., two points; i.e., hearing God’s Word and Reading God’s Word. Today we will move ahead and see the third.


3. The Third Finger or Middle Finger - Study God’s Word: It has been estimated that a person retains about 35% of what he studies. Paul wrote to Timothy “Be diligent to present yourself approved to God, a worker who does not need to be ashamed, rightly dividing the word of truth.” (2 Timothy 2:15). In this verse we not only have Paul’s exhortation through the Holy Spirit to Timothy, and now to the Christian Believers, to study God’s Word; but we also see certain essential points about doing a Bible study, that need to be kept in mind for doing a Bible study. There is a difference between reading and studying. In reading one just reads through the text without spending time to understand and analyze it. While in studying, one reads the text slowly, deliberately, often multiple times, pondering over words and phrases, trying to grasp their meaning and implications, and seeing how the text and its meanings can be applied to one’s life. Bible study can be done in many different ways, e.g., book-by-book; or, by topics like prayer, salvation, heaven, etc.; or, through studying the lives of important characters of the Bible; or, through studying how a particular word has been used in different passages, with different meanings, e.g. the word prophesy; or, studying certain things related to prominent Bible characters, e.g., the prayers of Paul, or, preaching methods of the Apostles; etc.

 

We see from 2 Timothy 2:15, quoted above, that there are some essential aspects to studying God’s Word, that need to be adhered to. The aspects mentioned in this verse can be listed as follows:

  • Be diligent,” i.e., labor sincerely to study and learn God’s Word with a purpose, not casually or perfunctorily.

  • present yourself approved to God” Do it to present yourself to God, not men; as one approved by Him. Bible study should not be with the aim of gaining knowledge, or to gain the approval, commendation, or recognition and honor from men. If done with such ulterior motives, it will be vain and infructuous, and lead to pride and problems (1 Corinthians 1:26-29; 8:1-3).

  • a worker” Study God’s Word to be a worthy worker for God. If one is studying God’s Word from God the Holy Spirit, then that which is learnt from God, should also be put to use for the work of God. The aim of the Bible study should to be more useful and effective for God, to be able to do the God given work better.

  • who does not need to be ashamed” Study in a manner that you are never brought to shame, or found incorrect in what you say. Remember, God the Holy Spirit is every truly Born-Again Christian Believer’s God given teacher and helper (John 14:16, 26). If one actually is learning from the Holy Spirit, then there is no scope of learning anything incorrect; and therefore, of preaching or teaching anything incorrect. The problem is that people, in the name of the Holy Spirit, actually learn from men. Therefore, they fall into errors, and have to face shame, either for their wrongs, or, for not being up to the mark.

  • rightly dividing the word of truth” Through studying God’s Word, one should make it a point to “rightly divide God’s Word;” i.e., rightly interpret and understand it, and not bring in any errors into it. Very briefly, at least four things should be kept in mind while interpreting any part of God’s Word. Firstly, always interpret it in its context, and never interpret anything out of context. This context is of two types, immediate, i.e., the immediate verses and passages before and after the text being interpreted; and remote, i.e., other texts and passages at other places in the Bible, related to the topic or text being interpreted. The interpretation should always be in harmony with the immediate as well as the remote contexts. Secondly, the interpretation should never bring in any contradiction or discrepancy in God’s Word. If the interpretation is done in context, then there also will not be any contradictions or discrepancies. Thirdly, always keep the primary meaning of the verse or passage in mind, i.e., the meaning which the original audience understood, when it was first stated to them. This primary meaning can be supplemented, but never be replaced, or altered, or contradicted by any interpretation. Fourthly, the interpretation should never add to, or, take away anything from God’s Word. Everything given in God’s Word should be taken and used as it has been stated and used; no new meanings and implications should be inserted. If the Bible study is done under the guidance of the Holy Spirit, and at least these four principles are adhered to, then incorrect interpretations and false teachings will be avoided. Similarly, if these four principles are utilized on anyone’s interpretations and teachings of God’s Word, then it can always be seen whether the given interpretation is correct and worthy of acceptance, or not. 


In the next article we will carry on from here, and see about the remaining two “fingers” or points necessary for properly holding and using the Sword of the Spirit.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 


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शनिवार, 27 जुलाई 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 143

 

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आरम्भिक बातें – 104


परमेश्वर की क्षमा और न्याय – 10


क्षमा किए और भुलाए गए पापों का स्मरण – 2  

 

पिछले लेख में, “अन्तिम न्याय,” जो इब्रानियों 6:1-2 में दी गई छठी आरम्भिक बात है, के बारे में सीखते हुए, हमने परमेश्वर के वचन बाइबल में से देखा है कि विश्वासी के बारे में सभी कुछ स्वर्ग में लिखा जा रहा है। पाप, जिन्हें परमेश्वर ने क्षमा करके भुला दिया है, वे भी स्वर्ग की पुस्तकों में लिखे हुए हैं। न्याय के समय, प्रत्येक विश्वासी को उसके सही और उपयुक्त प्रतिफल देने के लिए, प्रत्येक बात खोलकर प्रकट की जाएगी, और प्रभु यीशु के द्वारा धार्मिकता से उसका न्याय होगा। यह हमें, दो प्रश्नों के रूप में, परमेश्वर द्वारा पापों को क्षमा करने और भुला देने के एक और पक्ष पर ले कर आता है। प्रश्न ये हैं कि यदि अन्ततः हर बात को प्रकट करना ही था, तो परमेश्वर यह स्पष्ट भी तो कह सकता था कि यद्यपि उसने पाप क्षमा तो कर दिए हैं, लेकिन न्याय के समय, वह उनका हिसाब अवश्य लेगा; उसने अपनी यह मनसा छिपा कर क्यों रखी? दूसरा, परमेश्वर ने यह आश्वासन क्यों दिया कि वह पाप क्षमा करके उन्हें भुला देता है; अब परमेश्वर द्वारा पाप भुलाए जाने की क्या आवश्यकता रह गई? आज से हम इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करेंगे।

जैसा कि पाठकों को एहसास हुआ होगा, जब वे इन लेखों पर मनन करते हैं, तो यहाँ पर कही गई हर बात केवल बाइबल के पदों और खण्डों के आधार पर ही है। यहाँ इन लेखों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी भी डिनॉमिनेशन या मत की मान्यताओं या शिक्षाओं के अनुसार हो; और न ही यह किसी भी व्यक्ति द्वारा दी गई शिक्षाओं पर आधारित है, न ही बाइबल की किसी कॉममेंटरी पर या बाइबल अध्ययन की किसी सहायक पुस्तकों से है जो सामान्यतः धर्म-विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने वाले उपयोग करते हैं। यहाँ पर जो कुछ भी लिखा गया है, वह प्रभु परमेश्वर की पवित्र आत्मा के द्वारा सिखाई गई बातें हैं, जैसी कि प्रभु ने यूहन्ना 14:26 तथा 1 कुरिन्थियों 2:11-14 में प्रतिज्ञा दी है। मसीही या ईसाई सामान्यतः जो समझते और मानते हैं, तथा वह जो यहाँ लिखा जाता है, उसमें इतनी अधिक भिन्नता इसलिए है, क्योंकि वे मसीही या ईसाई मनुष्यों द्वारा दी जाने वाली शिक्षाओं पर निर्भर रहते हैं, बजाए उसके जैसा कि परमेश्वर चाहता है, कि उसके लोग सीधे उसी से सीखें, शर्त यह है कि लोगों को परमेश्वर के साथ समय बिताने के लिए तैयार होना चाहिए। अपने न्याय के बारे में परमेश्वर ने कुछ भी छिपा कर नहीं रखा है, सभी बातें उसके वचन में सबके लिए खुली और स्पष्ट हैं, अगर लोग परमेश्वर के वचन को परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में, जो प्रत्येक मसीही विश्वासी को दिया गया है, सीखने के लिए तैयार हों, तो। यदि वे पवित्र आत्मा के आज्ञाकारी रहेंगे, और जैसा वह उन्हें सिखाना चाहता है वैसे सीखना चाहेंगे तो वह उन्हें सिखाएगा। यदि वे परमेश्वर के वचन के अर्थ, सही व्याख्या, और प्रति दिन के जीवन में वचन को लागू करने के बारे में उस से माँगेंगे, तो वह यह क्यों नहीं करेगा? लेकिन इसके लिए एक अनुशासन तथा प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है; अपने जीवनों में परमेश्वर और उसके वचन को उनका उचित, सर्वोच्च प्राथमिकता का स्थान देने की आवश्यकता होती है, न कि जैसा अधिकांशतः किया जाता है, केवल एक औपचारिकता पूरी करने के लिए वचन का कोई अंश पढ़ या सुन भर लेना।

परमेश्वर के वचन से उसके सत्यों को न सीख पाने का मूल कारण है मसीहियों में परमेश्वर के वचन बाइबल के प्रति उदासीनता। जो बाइबल पढ़ते भी हैं, उनमें से अधिकाँश कहीं से भी निकालकर एक छोटे से भाग को औपचारिकता पूरी करने के लिए पढ़ लेते हैं, और सोचते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है; जबकि अधिकाँश ईसाई या मसीही तो इतना भी नहीं करते हैं। इसकी बजाए, अधिकाँश ईसाई या मसीही केवल उसी पर निर्भर रहते हैं जो उन्हें कोई मनुष्य या पादरी बता या सिखा देता है जिस पर वे अँध-विश्वास कर लेते हैं, और यह भी सप्ताह में केवल एक बार, इतवार के दिन होता है। लेकिन फिर भी लगभग सभी यह दावा करते हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, और इस जीवन में तथा पृथ्वी के बाद के जीवन में वे परमेश्वर की आशीष और देखभाल चाहते हैं। यदि उन से पूछा जाए कि उनके द्वारा परमेश्वर से प्रेम करने और प्रभु यीशु में विश्वास करने के क्या संकेत अथवा प्रमाण हैं, तो अधिकतर लोग उनके द्वारा प्रभु के नाम में किए जाने वाले भले कामों, कलीसिया और उसके कार्यों में सम्मिलित रहने, और कुछ लोग परमेश्वर के वचन से प्रचार करने या सिखाने, तथा प्रभु यीशु के बारे में गवाही देने आदि बातों को प्रमाण के समान बताएंगे।

जो लोग इस गलतफहमी में हैं कि उपरोक्त बातों के कारण वे परमेश्वर से प्रेम करने और उसके लिए कार्य करने वाले स्वीकार किए जाने चाहिएँ, उनके लिए परमेश्वर के वचन में कुछ शिक्षाएँ हैं जिन पर उन्हें गम्भीरता से विचार करना चाहिए। जो यह मानते हैं कि उनके द्वारा प्रभु के नाम में किए जाने वाले भले काम प्रमाण हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उनको प्रभु यीशु द्वारा मत्ती 7:21-23 में कही बात पर विचार करना चाहिए। अधिकाँश ईसाई या विश्वासी बस यह मान लेते हैं कि यदि वे प्रभु के नाम में भले और बाइबल से संगत काम करेंगे, तो यह परमेश्वर को प्रसन्न करेगा और उसे स्वीकार होगा। किन्तु मत्ती 7:21-23 यह स्पष्ट कर देता है कि जब तक कि ये भले और बाइबल से संगत काम परमेश्वर के निर्देश के अनुसार न किए जाएँ, तो वे परमेश्वर को स्वीकार्य नहीं हैं, उनके लिए कोई प्रतिफल नहीं है, बल्कि परमेश्वर उनका तिरस्कार कर के, उनके लिए श्राप देता है। जो यह सोचते हैं कि उनके द्वारा प्रचार करना और परमेश्वर का वचन बाँटना इस बात का प्रमाण है कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं और प्रभु के लिए काम करते हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि शैतान बाइबल के बारे में हम में से किसी से भी अधिक जानकारी रखता है, उसने तो परमेश्वर के वचन का प्रभु यीशु के सामने ही दुरुपयोग करना चाहा (मत्ती 4:1-11)। साथ ही शैतान के दूत झूठे प्रेरित, धार्मिकता के कार्य करने वाले, और धर्म के सेवक बनकर काम करते हैं, लोगों को बहकाते और भरमाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15)। हम यह भी देखे हैं कि दुष्टात्माएं भी परमेश्वर के भवन में आ जाती हैं (लूका 4:33), और प्रभु यीशु के बारे में गवाही देती हैं (मरकुस 5:7; लूका 4:41; 8:28; प्रेरितों 16:17; याकूब 2:19), लेकिन उन्हें यह करने नहीं दिया गया। इसलिए परमेश्वर के वचन को बाँटना और प्रचार करना, तथा प्रभु यीशु की गवाही देना, परमेश्वर से प्रेम करने के कोई निश्चित प्रमाण नहीं हैं।

प्रभु यीशु तथा परमेश्वर से प्रेम करने का केवल एक ही निश्चित प्रमाण है, और यह प्रमाण स्वयं प्रभु यीशु ने कहा है, और इसके अतिरिक्त बाइबल में कहीं भी कोई और प्रमाण नहीं दिया गया है। और यह प्रमाण है परमेश्वर के वचन से प्रेम करना और उसका पालन करना “जिस के पास मेरी आज्ञा है, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है, उस से मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उस से प्रेम रखूंगा, और अपने आप को उस पर प्रगट करूंगा। यीशु ने उसको उत्तर दिया, यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे” (यूहन्ना 14:21, 23)। इसलिए जो यह दावा करते हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और यह मानते हैं कि वे उसके लिए कार्य कर रहे हैं, उन्हें अपने आप को गम्भीरता से जाँच कर देखना चाहिए कि उनके जीवनों में परमेश्वर के वचन का क्या स्थान है? क्या वे अपनी ही धारणा और मान्यता के अनुसार, परमेश्वर के नाम में काम कर रहे हैं, या वे परमेश्वर की इच्छा को जानने, उसके वचन से उस से निर्देश प्राप्त करने, और फिर उसके बाद, वही करते हैं जो परमेश्वर उनसे चाहता है कि वे करें?

इसलिए, जब तक कि ईसाई या मसीही परमेश्वर के वचन से प्रेम करना, प्रतिदिन उस दिन के लिए परमेश्वर की इच्छा जाने के लिए वचन का नियमित अध्ययन करना, और परमेश्वर के लिए उसकी इच्छा के अनुसार काम करना नहीं सीखेंगे, वे लोगों के द्वारा बहकाए और भरमाए जाते रहेंगे, तथा औरों को भी बहकाते और भरमाते रहेंगे, और सत्य को कभी नहीं जानने और सीखने पाएँगे। अन्तिम न्याय के बारे में परमेश्वर ने कुछ भी छिपा कर नहीं रखा है; बल्कि लोगों ने ही अपनी ही धारणाएँ बना रखी हैं, परमेश्वर के वचन की गलत व्याख्याओं में पड़ गए हैं, और स्वयं के लिए असमंजस उत्पन्न कर लिए हैं। अगले लेख में हम दूसरे प्रश्न को लेंगे कि यदि न्याय के लिए सभी बातें प्रकट होनी ही हैं, तो फिर परमेश्वर उन्हें भूलता क्यों है?

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


The Elementary Principles – 104


God’s Forgiveness and Justice – 10


Remembrance of Sin Forgiven and Forgotten - 2

   

In the last article, in learning about “Eternal Judgment” the sixth elementary principle given in Hebrews 6:1-2, we have seen from God’s Word the Bible that everything about every Believer is being recorded in heaven. The sins forgiven and forgotten by God are present in the record books kept in kept heaven. At the time of judgment, to give every Believer their fair rewards and consequences in a just manner, everything will be laid open and judged righteously by the Lord Jesus. This brings before us another aspect related to God’s forgiving and forgetting sins, in the form of two questions. The questions are that if everything ultimately had to be made open, then God could as well have said that though he has forgiven sin, but at judgment time, He will ask for an account about them; and then why has He kept this intention hidden? Secondly, why has God assured that he forgives sins and forgets them too; what then is the necessity of God forgetting sins? We will try to answer these questions from today.

As the readers would realize, as they ponder over the contents of these articles, everything stated here is on the basis of verses and passages from God’s Word the Bible. There is nothing given that is according to any denominational beliefs or teachings; nor is anything stated on the basis of any person’s teachings, nor on the basis of any Commentaries and Bible study helps commonly used by those undergoing theological training and educational qualifications. Whatever has been written here, has been as the Lord God has taught through His Holy Spirit, as is His promise in John 14:26 and 1 Corinthians 2:10-14. The immense difference between what Christians generally believe, and what these articles have brought out is because of the reliance of those Christians on human beings and man’s teachings, instead of learning directly from God, as God wants us to do; provided we are willing to spend time with Him. God has not kept anything hidden from man about His judgment. It is all there in His Word, open and evident before everyone, if they care to study God’s Word under the guidance of God’s Holy Spirit who has been given the Believers to teach God’s Word to them. If they remain obedient to the Holy Spirit, and are willing to learn as He teaches them, He will teach them. If they ask Him to show them the meanings, correct interpretations, and actual applications of God’s Word in day-to-day lives, why will He not do it? But this requires discipline, and commitment; giving God and His Word the proper, the highest priority, place and time in their lives, instead of a cursory fulfilling of formality, as most Christian do with God’s Word, in their daily routines.

The underlying problem of not seeing and learning God’s truths from His Word, is the apathy Christians have towards God’s Word the Bible. It is a stark reality that the vast majority of Christians do not study God’s Word the Bible for themselves. There are few who read the Bible, but only some do it regularly and very few do it systematically. Most of those who read the Bible, only fulfill a formality by reading some short passage, usually randomly, and think they have done their part; whereas most do not even do this. Instead, most of the Christians blindly rely only on what some person, or some Pastor teaches them or tells them, and that too once week, on Sundays. And yet, practically everyone claims to love God, believe in the Lord Jesus, and wants to be blessed by God in this life as well as the next. If one were to ask them of some indicators or proof of their loving God and believing in the Lord Jesus, then the majority will speak about the good things they do in the name of the Lord, being involved in the Church and the things related to the Church, and some would also add about the preaching or sharing of God’s Word and witnessing for the Lord Jesus that they might be doing.

For those who think and believe that they are working for the Lord through the above-mentioned misconceptions, God’s Word has some teachings for them to ponder about quite seriously. Those who believe that their doing good things in the Lord’s name is proof of their loving God, they should ponder over what the Lord Jesus has said in Mathew 7:21-23. Most Christians simply assume that if they do some good and “Biblical” things in God’s name, God will be happy and pleased with them for it. But Matthew 7:21-23 makes it very clear that unless even these good and “Biblical” things are done as per God’s will and instructions, they are not accepted or rewarded by God, rather are rejected and cursed by Him. For those who think that their preaching and sharing God’s Word and witnessing for the Lord Jesus proves they love and work for the Lord Jesus, should remember that Satan knows the Bible far better than anyone one of us, he even misquoted God’s Word to the Lord Jesus (Matthew 4:1-11). Satan’s agents as false Apostles and in the guise of deceitful workers and ministers of righteousness are all the time, in every place preaching from God’s Word, and beguiling people into false teachings (2 Corinthians 11:3, 13-15). We also see that demons would come into God’s house (Luke 4:33), and they too witnessed about the Lord Jesus (Mark 5:7; Luke 4:41; 8:28; Acts 16:17; James 2:19), though they were not allowed to continue doing so. So, preaching and sharing God’s Word and witnessing about the Lord Jesus is not a definite proof of loving God.

There is only one valid proof of loving the Lord Jesus and God, and this proof has been given by the Lord Jesus Himself; other than this one proof, there is no other proof mentioned in the Bible to prove one’s love for God and the Lord Jesus. And this proof is loving the Word of God and obeying it “He who has My commandments and keeps them, it is he who loves Me. And he who loves Me will be loved by My Father, and I will love him and manifest Myself to him. Jesus answered and said to him, "If anyone loves Me, he will keep My word; and My Father will love him, and We will come to him and make Our home with him.” (John 14:21, 23). Therefore, those who claim to love the Lord Jesus, and believe they are working for Him, should examine themselves and see what place does God’s Word have in their lives? Are they assuming and doing things in the name of God, or, are they seeking God’s will, receiving God’s instructions through His Word, and then doing what God wants them to do for Him.

So, unless Christians start loving God’s Word and studying it daily to learn God’s will for them for that day; to know what God wants them to do for Him, they will keep getting misled by people, even misleading others, and never know the actual truth. God has not kept anything about the eternal judgment a secret; it is people who have assumed things, fallen for misinterpretations of God’s Word, and got themselves into a confusion. In the next article we will take up the second question, why does God forget, if things have to be brought out again for judgment.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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रविवार, 12 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 78 – Stewards of Holy Spirit / पवित्र आत्मा के भण्डारी – 7


पवित्र आत्मा परीक्षाओं में हमारी सहायता करता है – 4

 

    परमेश्वर पवित्र आत्मा, जो प्रभु यीशु मसीह के प्रत्येक शिष्य को दिया गया है, के एक भले भण्डारी होने के बारे में अध्ययन करते हुए, हमने देखा है कि पवित्र आत्मा हमारा सहायक या साथी होने के लिए हमें दिया गया है, की वह परमेश्वर द्वारा हमें सौंपे गए कार्यों और जिम्मेदारियों को करने में हमारी सहायता करे। किन्तु कुछ मसीही विश्वासी उन्हें अपने स्थान पर काम करने वाले के समान उपयोग करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि परमेश्वर उनके लिए वह कर दे जिसे करने में वे अपने आप को असमर्थ पाते हैं। लेकिन यह एक गलत धारणा है, जिसका बाइबल से कोई समर्थन नहीं है। इस धारणा के गलत होने के कारणों को हम देख चुके हैं; यह गलत है क्योंकि:

  • जीवन और भक्ति से सम्बन्धित प्रत्येक बात परमेश्वर ने हर एक मसीही विश्वासी को उपलब्ध करवा रखी है; इसलिए, ऐसा कोई कारण नहीं है कि कोई विश्वासी यह कह सके कि अपने कार्यों और जिम्मेदारियों के लिए उनके पास उपयुक्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
  • परमेश्वर पवित्र आत्मा को कभी भी विश्वासियों के स्थान पर उनका कार्य कर के देने के लिए नहीं दिया गया है। उन्हें दिया गया है ताकि वे परमेश्वर द्वारा विश्वासियों को उपलब्ध करवाए गए संसाधनों का उपयोग करने में मार्गदर्शन और सहायता करें, जिस से कि विश्वासी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सके; परमेश्वर को महिमा देने वाला गवाही का जीवन जी सके; न कि विश्वासी के स्थान पर उसका काम कर के देने के लिए।
  • परमेश्वर जब अपने बच्चों से कुछ करने के लिए कहता है, तो वह उस व्यक्ति की क्षमताओं और योग्यताओं को भली-भांति जानता है। और परमेश्वर कभी किसी से ऐसा कुछ भी करने के लिए नहीं कहेगा, जिस के लिए उसने उस व्यक्ति को आवश्यक बातें उपलब्ध नहीं करवाई हैं। साथ ही, विश्वासी में निवास करने वाला पवित्र आत्मा उस कार्य को करने में उसकी सहायता करने के लिए, उसका मार्गदर्शन करने के लिए, परमेश्वर के संसाधनों का उचित उपयोग करने के लिए हमेशा उपलब्ध रहता है। इसलिए किसी का भी यह कहना कि वह अपनी जिम्मेदारियों के निर्वाह और भक्ति का जीवन जीने में अक्षम है, यही दिखाता है कि या तो वह अपने संसाधनों का उपयोग नहीं कर रहा है, या, पवित्र आत्मा के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है, अथवा ये दोनों ही गलतियाँ कर रहा है।
  • जैसा हमने पिछले दो लेखों में देखा है, जब कोई विश्वासी किसी परिस्थिति पर विजयी होने नहीं पाता है, या फिर बारम्बार किसी पाप या ऐसी गलती में गिरता रहता है, जिसके कारण वह अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा नहीं करने पाता है, तो उसकी इस असफलता का कारण उसी में ही विद्यमान होता है। बहुत संभव है कि यह सँसार के साथ उसके किसी प्रकार का समझौते का जीवन जीने के कारण है, जहाँ वह सँसार की किसी बात का भी आनन्द लेते रहना चाहता है और साथ ही भक्ति का जीवन भी जीना चाहता है। लेकिन यह तो हो नहीं सकता है, और इसीलिए वह एक हारा हुआ जीवन जीता है, क्योंकि सँसार के साथ समझौता परमेश्वर की सामर्थ्य को भी उस में और उसके द्वारा कार्य करने से रोकता है।


    इस सन्दर्भ में, हम देखेंगे कि कैसे परमेश्वर के लोग बहुधा परमेश्वर के वचन के कुछ भागों की गलत व्याख्या करते हैं, इस विचार के साथ और यह कहने के लिए कि कुछ ऐसी बातें भी लिखी गई हैं जो मनुष्य के करने के लिए असंभव हैं; इसलिए उन्हें आलंकारिक रीति से लेना चाहिए न कि शब्दार्थ में। वे यह अपनी असफलताओं को वैध ठहराने के लिए, परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गए कार्य एवं जिम्मेदारियों को पूरा न करने पाने का ‘उचित’ कारण दिखाने के लिए करते हैं। इस तर्क के मिथ्या होने को दिखाने के लिए हम मसीही विश्वासी के एक गुण, पवित्रता, को लेंगे; क्योंकि पवित्रता न केवल मसीही जीवन का एक आधारभूत सिद्धान्त है, किन्तु साथ ही यह भी माना जाता है कि यह मनुष्य द्वारा प्राप्त किए जाने और फिर बनाए रखने के लिए असंभव है। यह और भी असंभव इस से हो जाता है कि बाइबल कहती है कि ऐसा कोई नहीं है जो पाप नहीं करता और जितनी बार वह पाप करता है, उतनी बार फिर से बहाल होने के लिए उसे पश्चाताप करने तथा क्षमा मांगने की आवश्यकता होती है (1 यूहन्ना 1:8-10); तो फिर कोई भी मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है तथा बना रह सकता है?


    लेकिन साथ ही बाइबल का यह तथ्य भी है कि परमेश्वर ने कहा है कि बिना पवित्रता के कोई भी प्रभु को नहीं देख सकता है (इब्रानियों 12:14); साथ ही पवित्र होना विश्वासियों के लिए अनिवार्य इसलिए भी हो जाता है क्योंकि परमेश्वर ने अपने बच्चों को पवित्र होने की आज्ञा दी है, “पर जैसा तुम्हारा बुलाने वाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल चलन में पवित्र बनो। क्योंकि लिखा है, कि पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूं” (1 पतरस 1:15-16)। अब, क्योंकि पाप और पवित्रता एक साथ नहीं हो सकती हैं, तो फिर मनुष्य की पाप करते रहने की प्रवृत्ति और परमेश्वर की उसके पवित्र होने की माँग के मध्य सामंजस्य कैसे बैठाया जा सकता है? क्या परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य से असंभव की माँग कर रहा है? या, क्या यहाँ पर परमेश्वर के वचन में कोई विरोधाभास है जो विश्वासी को एक असंभव स्थिति में डाल देता है?


    जैसा कि हम अगले लेख में देखेंगे, यहाँ पर, परमेश्वर के वचन और उसकी आज्ञाओं के मध्य कोई परस्पर विरोधाभास की स्थिति नहीं है। समस्या जो प्रतीत होती है, वह परमेश्वर के वचन की बातों की एक गलत समझ और गलत व्याख्या के कारण है, और जब उसे बाइबल के अनुसार सही दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो इसका समाधान भी हो जाता है।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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Holy Spirit Helps in Our Tests – 4

 

    In our study on being a good steward of God the Holy Spirit, given to every disciple of the Lord Jesus, we have seen that the Holy Spirit is meant to be our Helper or Companion, to help us in our God assigned tasks and ministry. But some Christian Believers have tried to use Him as their substitute, wanting God to do for them what they find themselves incapable of doing. But this is a wrong concept, that has no Biblical support. We have seen the reasons for this to be false, because:

  • God has made available everything a Christian Believer needs for life and godliness; so, there is no way any Believer can say that they do not have the necessary resources to carry out his God assigned tasks and fulfil his responsibilities.
  • The Holy Spirit was never meant to do the Believer’s tasks for them; He has been given to guide the Believers, to help them use their God given resources to fulfil their responsibilities; to help them live a witnessing life that glorifies God; but not to be their replacement.
  • When God asks His children to do something, He well knows the capabilities of the person that He has asked to do the thing. And God will never ask anyone to do anything that He has not already equipped him to do. Moreover, the Holy Spirit residing in the Believer is there to guide and help him through to do that task, utilizing God’s resources. Therefore, for someone to claim that he is incapable of fulfilling his responsibilities and of living a life of godliness, implies that either he is not using his resources, or, not obeying the instructions of God the Holy Spirit, or, committing both these mistakes.
  • As we have seen in the previous two articles, when some Believers find themselves unable to get over a situation, or they repeatedly keep falling for some sin or short-coming that keeps them from fulfilling their responsibility, then, the reason for this failure is within themselves. Quite possibly it is in their living a life of some kind of compromise, where they want to enjoy something of the world as well as live a godly life. But this does not work, and they live a defeated life since compromise with the world also prevents God’s power from working in and through them.


    In this context, we will see how God’s people often misinterpret certain portions of God’s Word to think and say that some things that are impossible for men to do have been stated; and these should be taken figuratively, and not literally. They do this to try to justify their failures, their claim of being incapable of fulfilling their God assigned tasks and responsibilities. To illustrate the fallacy of this argument, we will use an attribute of a Christian Believer’s life, ‘Holiness’; since holiness is not only a fundamental characteristic of Christian life, but is also often assumed to be impossible for man to achieve and maintain. More so, as the Bible says, there is no one who does not sin and does not need to repent and ask forgiveness to be restored, every time he sins (1 John 1:8-10), so how can any man be holy or remain holy?


    But it is also a Biblical fact that God says without holiness no one can see the Lord (Hebrews 12:14); being holy becomes imperative for the Believers since God has commanded His children to be holy, “but as He who called you is holy, you also be holy in all your conduct, because it is written, ‘Be holy, for I am holy’” (1 Peter 1:15-16). So, since sin and holiness cannot co-exist, how then does one reconcile between man’s tendency to keep sinning and God’s demand of being holy? Is God deliberately asking the impossible from man? Or, is there a contradiction here in God’s Word, that places a Believer in an unmanageable situation?


    As we will see in the next article, there is no mutual contradiction in these portions of God’s Word and His commands. The problem is a misunderstanding and misinterpretation, of God’s Word and is readily resolved when it is interpreted in context, with the correct understanding and proper Biblical perspective.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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