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Thursday, December 12, 2013

प्रत्यक्ष परिवर्तन


   हाल ही एक हवाई यात्रा के दौरान एक विमान परिचारक ने मुझ से पूछा कि क्या मैं अकसर हवाई यात्रा करता हूँ; और मैंने उत्तर दिया हाँ। तब उसने फिर मुझ से पूछा, क्या आपने पिछले कुछ महीनों में ध्यान किया है कि हवाई यात्रा करने वाले कुछ अधिक आक्रमक और ज़बर्दस्ती करने वाले होते जा रहे हैं? मैंने थोड़ा सा विचार कर के उस से इस बात में सहमति जताई, और हम उन बातों के बारे में बात करने लगे जिन के कारण लोग ऐसा करने लगे हैं - जैसे कि हवाई अड्डों पर बढ़ी हुई सुरक्षा और उससे होने वाली परेशानी, हवाई यात्रा का महंगा और यात्रा में मिलने वाली सुविधाओं का कम होते चले जाना, यात्रा करने में सामान्यता होने वाली असंतुष्टता आदि। हम यह बातें कर ही रहे थे कि, मानो हमारे वार्तालाप की सच्चाई को प्रमाणित करने के लिए, एक यात्री ने बहस आरंभ कर दी क्योंकि वह अपनी निर्धारित सीट पर नहीं वरन किसी दूसरे की सीट पर बैठना चाहता था क्योंकि वह दूसरी सीट उसे अधिक अच्छी लग रही थी।

   जब कभी हमारा सामना क्रोध और आवेश में उत्तेजित किसी जन से होता है तो हम मसीही विश्वासियों के पास अवसर होता है कि हम, अपने प्रभु के समान, शांति लाने वाले बन सकें। प्रेरित पौलुस ने रोम की मसीही मण्डली को लिखी अपनी पत्री में उन्हें लिखा: "जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो" (रोमियों 12:18)। इस का क्या अर्थ है? इसका एक अर्थ तो यह हो सकता है कि जो कुछ हम नियंत्रित कर सकते हैं उसे नियंत्रित कर के रखें। हम दूसरों के व्यवहार को निर्धारित नहीं कर सकते, लेकिन अपने प्रत्युत्तर को अवश्य निर्धारित कर सकते हैं।

   जब कभी हम क्रोधपूर्ण और आक्रमक व्यवहार अपने आस-पास प्रदर्शित होते हुए देखते हैं, तो उसके प्रति अनुग्रह और शान्ति के व्यवहार द्वारा अपने तथा समस्त संसार के उद्धारकर्ता तथा शान्ति के राजकुमार प्रभु यीशु के चरित्र एवं व्यवहार को अपने जीवन से प्रदर्शित कर सकते हैं। यही वे अवसर होते हैं जब पाप के प्रभाव के कारण आक्रोश और असंतोष से भरा यह संसार उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के बारे में व्यावाहरिक रीति से जान सकता है और प्रभु से प्राप्त होने वाले उद्धार द्वारा जीवन में आए परिवर्तन को प्रत्यक्ष देख सकता है। - बिल क्राउडर


आज संसार को वह शान्ति चाहिए जो प्रत्येक गलतफहमी के दुष्प्रभाव पर जयवन्त है।

सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा। - इब्रानियों 12:14

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 4:4-9
Philippians 4:4 प्रभु में सदा आनन्‍दित रहो; मैं फिर कहता हूं, आनन्‍दित रहो। 
Philippians 4:5 तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो: प्रभु निकट है। 
Philippians 4:6 किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं। 
Philippians 4:7 तब परमेश्वर की शान्‍ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी।
Philippians 4:8 निदान, हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्‍हीं पर ध्यान लगाया करो। 
Philippians 4:9 जो बातें तुम ने मुझ से सीखीं, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्‍हीं का पालन किया करो, तब परमेश्वर जो शान्‍ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 9-11 
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