ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

शनिवार, 22 मई 2021

उद्देश्य

 

            भूख के कारण मुझे बहुत परेशानी हो रही थी। मेरे आत्मिक सलाहकार ने परमेश्वर की निकटता में बढ़ने के लिए उपवास को एक माध्यम बताया था। किन्तु जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, मैं तो बस यही विचार करता रह गया कि प्रभु यीशु ने चालीस दिन तक यह कैसे कर लिया? मैं संघर्ष कर रहा था कि पवित्र आत्मा की सहायता से शान्ति, सामर्थ्य, और धैर्य – विशेषकर धैर्य को बनाए रखूँ। यदि हम शारीरिक रीति से यह कर सकते हैं, तो उपवास रखना हमें आत्मिक भोजन के महत्व को सिखा सकता है। जैसा परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु ने कहा,लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। लेकिन फिर भी, जैसा कि मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से सीखा, यह आवश्यक नहीं कि उपवास अपने आप से ही हमें परमेश्वर की निकटता में ले आए!

            वास्तव में, परमेश्वर ने अपने नबी ज़कर्याह के द्वारा अपने लोगों से कहा था कि उनका उपवास रखना व्यर्थ है यदि वे निर्धनों की सुधि नहीं रखते हैं तो। परमेश्वर ने विशेष रीति से संकेत करते हुए उन लोगों से पूछा,सब साधारण लोगों से और याजकों से कह, कि जब तुम इन सत्तर वर्षों के बीच पांचवें और सातवें महीनों में उपवास और विलाप करते थे, तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?” (ज़कर्याह 7:5)।

            परमेश्वर का यह प्रश्न प्रकट करता है कि प्राथमिक समस्या उनके पेट नहीं थे, वरन उनके ठण्डे पड़ गए हृदय थे। अपनी ही स्वार्थ-सिद्धि करते रहने के कारण, वे परमेश्वर के हृदय के निकट नहीं आने पा रहे थे। इसलिए उसने उन से बल देकर कहा,खराई से न्याय चुकाना, और एक दूसरे के साथ कृपा और दया से काम करना, न तो विधवा पर अन्धेर करना, न अनाथों पर, न परदेशी पर, और न दीन जन पर ; और न अपने अपने मन में एक दूसरे की हानि की कल्पना करना” (पद 9,10 )।

            आत्मिक अनुशासन बनाए रखने में हमारा उद्देश्य 0   अपने प्रभु परमेश्वर की निकटता में बढ़ना है। जब हम उसकी समानता में  बढ़ते जाएँगे, तो हम उनके बारे में भी चिंता करने लगेंगे, जिन से वह प्रेम करता है; और यही आत्मिक बढ़ोतरी का उद्देश्य है। - टिम गुस्ताफसन

 

प्रभु परमेश्वर, मेरे जीवन का उद्देश्य अपनी नहीं, वरन, आपकी इच्छा को पूरा करना हो।


और यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे, तो आज चुन लो कि तुम किस की सेवा करोगे, चाहे उन देवताओं की जिनकी सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार करते थे, और चाहे एमोरियों के देवताओं की सेवा करो जिनके देश में तुम रहते हो; परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा की सेवा नित करूंगा। - यहोशू 24:15

बाइबल पाठ: ज़कर्याह 7:1-10

ज़कर्याह 7:1 फिर दारा राजा के चौथे वर्ष में किसलेव नाम नौवें महीने के चौथे दिन को, यहोवा का वचन जकर्याह के पास पहुंचा।

ज़कर्याह 7:2 बेतेल वासियों ने शरेसेर और रेगेम्मेलेक को इसलिये भेजा था कि यहोवा से बिनती करें,

ज़कर्याह 7:3 और सेनाओं के यहोवा के भवन के याजकों से और भविष्यद्वक्ताओं से भी यह पूछें, क्या हमें उपवास कर के रोना चाहिये जैसे कि कितने वर्षों से हम पांचवें महीने में करते आए हैं?

ज़कर्याह 7:4 तब सेनाओं के यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा;

ज़कर्याह 7:5 सब साधारण लोगों से और याजकों से कह, कि जब तुम इन सत्तर वर्षों के बीच पांचवें और सातवें महीनों में उपवास और विलाप करते थे, तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?

ज़कर्याह 7:6 और जब तुम खाते-पीते हो, तो क्या तुम अपने ही लिये नहीं खाते, और क्या तुम अपने ही लिये नहीं पीते हो?

ज़कर्याह 7:7 क्या यह वही वचन नहीं है, जो यहोवा अगले भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उस समय पुकार कर कहता रहा जब यरूशलेम अपने चारों ओर के नगरों समेत चैन से बसा हुआ था, और दक्खिन देश और नीचे का देश भी बसा हुआ था?

ज़कर्याह 7:8 फिर यहोवा का यह वचन जकर्याह के पास पहुंचा, सेनाओं के यहोवा ने यों कहा है,

ज़कर्याह 7:9 खराई से न्याय चुकाना, और एक दूसरे के साथ कृपा और दया से काम करना,

ज़कर्याह 7:10 न तो विधवा पर अन्धेर करना, न अनाथों पर, न परदेशी पर, और न दीन जन पर ; और न अपने अपने मन में एक दूसरे की हानि की कल्पना करना।

 

एक साल में बाइबल: 

  • इतिहास 16-18
  • यूहन्ना 7:28-53 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें