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शनिवार, 29 नवंबर 2025

God’s Word - The Bible - 20 - Bible & Science - 1 Introduction / परमेश्वर का वचन - बाइबल - 20 - बाइबल और विज्ञान भाग - 1 परिचय

 

परमेश्वर का वचन - बाइबल - 20

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परमेश्वर का वचन – बाइबल और विज्ञान भाग - 1


परिचय


एक आम किन्तु गलत धारणा है कि बाइबल और विज्ञान परस्पर सहमत नहीं हैं, और बाइबल की बातें विज्ञान के समक्ष ठहर नहीं पाती हैं, क्योंकि वे सभी काल्पनिक किस्से-कहानियाँ हैं; निराधार बातें हैं। यदि थोड़ा थम कर सोचा जाए, कि विज्ञान क्या है, तो एक भिन्न ही चित्र हमारे सामने उभर कर आता है। विज्ञान हमारे संसार और सृष्टि की रचना और संचालन, सृष्टि के सभी कार्यों तथा कार्यविधियों का अध्ययन है। जैसे-जैसे नई बातें सामने आती जाती हैं, उन नई बातों के संदर्भ में पुरानी बातों और धारणाओं की समीक्षा, विश्लेषण, और पुनः अवलोकन तथा परिवर्तन भी होता रहता है। इस कारण विज्ञान सदा परिवर्तनशील रहता है - यही उसका स्वरूप है, यह एक जाना-माना तथ्य है। इसीलिये, विज्ञान के अनुसार आज जो सत्य है, कल किसी अन्य बात की खोज या किसी अन्य तथ्य के सामने आने के कारण वही असत्य भी हो सकता है, बदला और हटाया भी जा सकता है। विज्ञान के कितने ही सिद्धांत और बातें जो पहले तथ्य के रूप में बताए और सिखाए जाते थे, वे बदले जा चुके हैं। इसलिए विज्ञान की कोई भी बात कभी भी अपरिवर्तनीय, संपूर्ण, और अंतिम नहीं हो सकती है।

दूसरी ओर, परमेश्वर और परमेश्वर का वचन बाइबल शाश्वत सत्य हैं, अटल और अपरिवर्तनीय हैं, सदा एक ही थे, हैं, और हमेशा अनन्त काल तक वैसे ही बने  रहेंगे (मलाकी 3:6; इब्रानियों 13:8; भजन 119:89, 160)। आज तक न तो परमेश्वर में, और n पमेश्वर के वचन बाइबल में कभी कोई सुधार अथवा संशोधन हुआ है; और न ही कभी उनका कोई नया या उन्नत संस्करण अस्तित्व में आया है। इसलिये एक बहुत साधारण सा प्रश्न है कि क्या कोई असिद्ध, परिवर्तनशील ज्ञान, जो स्वयँ अभी विकसित हो रहा है, जो स्वयँ अपनी ही कही बातों को गलत दिखाता और बदलता रहता है, क्या उसके आधार पर किसी शाश्वत, अटल, अपरिवर्तनीय, सिद्ध, स्थापित का आँकलन किया जा सकता है? क्या असिद्ध, किसी सिद्ध को गलत और अस्वीकार्य ठहरा सकता है? क्या ऐसा करना उचित और मान्य होगा?

परन्तु एक अन्य, सत्य किन्तु कम ही जानी तथा मानी जाने वाली बात यह भी है कि विज्ञान की बातों के आधार पर तर्क देने वाले सभी जन अब यथार्थ कहने वाले और सत्यवादी नहीं होते हैं। अब यह एक बहुत प्रचलित और सामान्य धारणा बन चुकी है कि जैसे भी हो सके विज्ञान के नाम पर  परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार करना है, और बाइबल को गलत प्रमाणित करना है। इसलिए विज्ञान के बहुत से तथ्य, खोज, जानकारियाँ, जो प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध हैं, उन्हें दबा दिया जाता है, उनकी चर्चा नहीं की जाती है, उन्हें प्रमुखता प्रदान नहीं की जाती है, और उनकी उपेक्षा की जाती है। आप स्वयं ही इसे जाँच कर देख लीजिये और “Evolution Hoaxes” अर्थात, “क्रमिक विकसवाद में छल” को लेकर आप स्वयँ इंटरनेट पर ढूंढ लीजिए, और आप विस्मित रह जाएँगे कि कितनी बातें छिपाई गई हैं कितने तथ्य दबाए गए हैं, और किस प्रकार से सही को दबा कर गलत को प्रमुख करने के द्वारा इस अस्वीकार्य धारणा को स्वीकार्य बनाने के प्रयास किए जाते रहे हैं, और अभी भी हो रहे हैं; झूठी और गलत जानकारी को “वैज्ञानिक तथ्य” बताया जा रहा है।

बाइबल के अनुसार, यह समस्त सृष्टि, जिसे अभी तक वैज्ञानिक ठीक से देख और समझ नहीं पाए हैं, और जिसकी जटिलता तथा बारीकियों को लेकर आए दिन अचरज में पड़ते रहते हैं, परमेश्वर द्वारा बनाई गई है। अब यह कैसे संभव है कि परमेश्वर की रची गई सृष्टि उसके ही विरुद्ध गवाही देगी? सृष्टि का अध्ययन सृष्टिकर्ता परमेश्वर के अस्तित्व को ही नकार देगा? वरन, इसके विपरीत, सृष्टि तो अपने सृष्टिकर्ता के पक्ष में बताएगी; उसकी अद्भुत बुद्धिमता और कारीगरी की पुष्टि करेगी – परन्तु तब ही जब उसे ठीक से देखा, परखा, पहचान, और समझा जाए। यह बात बाइबल के साथ भी पूर्णतः लागू होती है। बाइबल अवैज्ञानिक नहीं है; और न ही सभी वैज्ञानिक बाइबल को गलत या झूठ समझते हैं। तथ्य तो ये है कि संसार के महानतम वैज्ञानिकों में से अधिकांश, जैसे के न्यूटन, फैराडे, रॉबर्ट बॉयल, जेम्स मैक्सवेल, बाइबल पर विश्वास करते थे; वर्तमान सदी के भी अनेकों वैज्ञानिक मसीही हैं। विज्ञान की बातें बाइबल की बातों को गलत नहीं प्रमाणित करती हैं। परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में हजारों और सैकड़ों वर्ष पहले अनेकों बातें लिखवा दी थीं, जिन्हें विज्ञान ने बहुत बाद में, या कुछ समय पहले ही पहचाना है। 

हमें बाइबल में लिखी इन बातों को पहचानने में सहायक होने के लिए एक आधारभूत बात का ध्यान रखना होगा - जिस समय और जिन परिस्थितियों में बाइबल की पुस्तकें, हजारों वर्ष पहले, अपने-अपने समय में लिखी गईं थीं, तब विज्ञान इस स्वरूप में नहीं था जैसा आज है, और न ही वैज्ञानिक शब्दावली, जो वर्तमान में आई है, प्रयोग हुआ करती थी। बाइबल की बातें सामान्य, साधारण लोगों के लिए लिखी गई थीं; ऐसे लोगों के लिए, जिनमें से बहुत ही कम शिक्षित होते थे, या किसी गूढ़ बात को समझने की क्षमता रखते थे। बाइबल की बातें उनके दिन-प्रतिदिन के जीवन और व्यवहार के संदर्भ में लिखी गई थीं, इसलिए उन बातों को लिखने के लिए उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया है, जो उन लोगों के लिए सहज और समझ में आने वाली हो। बाइबल वैज्ञानिक सिद्धांत बताने या समझाने के दृष्टिकोण से लिखी गई विज्ञान की पुस्तक नहीं है। किन्तु फिर भी इन सीमाओं में भी परमेश्वर ने अपने वचन में ऐसी बहुत सी बातें लिखवाई हैं, जो न केवल जनसाधारण के लिए भी उपयोगी हैं, किन्तु उन में विज्ञान के रहस्य भी सांकेतिक अथवा प्रत्यक्ष रीति से लिखे गए हैं, और जिन्हें वर्तमान समय में पहचाना गया है, तथा बाइबल के ज्ञाताओं ने दिखाया है कि ये बाइबल में पहले से लिखा था। हम अगले लेख में ऐसी ही कुछ बातों को देखेंगे।

अगले लेख में हम इसी विषय पर चर्चा को बढ़ाते हुए, सृष्टि के बारे में बाइबल की कुछ बातों को देखेंगे। यही बाइबल, सृष्टिकर्ता परमेश्वर के आप के प्रति अथाह प्रेम, और उसकी इस गहरी लालसा के बारे में भी बताती है कि वह आप को पापों से मुक्त जीवन प्रदान करके और स्वर्गीय आशीषों से भरे जीवन में अपने साथ समभागी रखना चाहता है। परन्तु यह, वह केवल आप के स्वेच्छा से, परमेश्वर के पक्ष में लिये गये निर्णय के आधार पर ही कर सकता है। यदि आप इसके लिये परमेश्वर के साथ सहमत हैं, तो प्रभु यीशु के समर्पित, आज्ञाकारी, और प्रतिबद्ध शिष्य बन जाइये। 

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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 God’s Word - The Bible - 20

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Word of God – Bible & Science - 1

Introduction


There is a general misconception that the Bible and science do not agree with each other, and because what the Bible says are all fictional tales and baseless things, therefore, Biblical things cannot stand up to science. If we stop and think for a moment about what science is, then a totally different picture emerges in front of us. Science is the study of the origin and functioning of our world and the universe, of all the workings and activities of everything that makes the universe. As new knowledge comes up, through this study, the older things and concepts are reviewed, re-analyzed, re-evaluated and changed in the context of the new knowledge. Because of this, science is always changing - this is the nature of science, and is a very well-known and accepted fact about science. Therefore, what is true today, due to the discovery of some other thing or any other fact may become false and be changed to something different tomorrow. So many principles and things of science which were previously stated and taught as facts have changed, many have been discarded, others have been modified. So, science is never absolute, never final, and nothing it says can be taken as the “last word.”

On the other hand, God and His Word the Bible are eternal truths, unchanging and firmly established, what they were earlier, are the same today, and will forever remain the same for eternity (Malachi 3:6; Hebrews 13:8; Psalm 119:89, 160). To date there has never been any alteration or improvement in God or His Word the Bible; and never has their revised and improved, updated version ever come about. This gives rise to a very simple, common-sense question: Any knowledge that is imperfect, always changing and getting updated, one that keeps showing its own things as incorrect and changing them; can it be used to evaluate and decide upon that which is perfect, firmly established, never-changing? Can that which is imperfect, decide that the perfect is wrong and unacceptable? Should such an evaluation and decision at all be considered appropriate and acceptable?

There is another, equally true, lesser known and even lesser accepted fact, that all the people who argue on the basis of the knowledge of science are neither honest nor unbiased, nor do they do so on the basis of the truth. Nowadays it has become a very common and general thinking, to deny the existence of God and falsify the Bible, whichever way it can be done and to whatever extent it is possible, on the name and basis of science. Therefore, many facts, discoveries, scientific information, which are in favor of God and the Bible, but against these popular beliefs and tendencies of denying God and the Bible, are suppressed, are not told and discussed, they are not given any prominence in reporting, and they are ignored as much as they can be. Check this out for yourself by searching the Internet for "Evolution Hoaxes", and see for yourself about the deceits related to the theory of evolution, and you'll be amazed at how many lies are told in the name of science, how many things are hidden, how many facts are suppressed, and how by suppressing the facts, the false has been made prominent and has wrongly been passed on as “scientific truth”. Many such attempts to falsify th Bible have been made in the past, and they are still being made even today.

According to the Bible, all of this creation, which scientists have not yet been able to see in its entirety, or understand properly, and whose complexity, vastness, intricacy and finesse continues to astonish them by the day, everything has been created by God. Therefore, how is it possible that God's creation will testify against Him? Therefore, it is simply not possible that a sincere and honest study of creation will ever deny the existence of God the Creator. On the contrary, the creation will always and only speak in favor of its Creator; will attest to His astonishing intelligence and workmanship – if seen, evaluated, recognized, and understood honestly and properly. This also fully applies with the Bible. The Bible is not unscientific; Nor do all scientists consider the Bible as incorrect. The fact is that most of the world's greatest scientists, such as Newton, Faraday, Robert Boyle, James Maxwell, believed in the Bible; Many scientists of the present century are also Christians. The words of science do not prove the things of the Bible wrong. God had many things written in His Word, the Bible, thousands and hundreds of years ago, which science has only come to recognize much later, or just some time back.

Regarding scientific facts and things and the Bible, one fundamental thing has to be kept in mind while trying to understand the things written in the Bible; that at the time and in the circumstances in which the books of the Bible were written, thousands of years ago, in their respective times and places, “science” did not exist in the form it is today; neither was scientific terminology present or in use, as it is today. The words of the Bible were written for the common, ordinary people; for people of whom very few were literate and educated, and very few had the ability to understand anything complex. The words of the Bible were written in the context of such people’s day-to-day life and activities, hence the kind of language that has been used to write those things, was that which was easy to understand and grasp by the people of those times. The Bible is not a book of science, nor was it written with a view to talk about or explain scientific principles. But still, even within these limits, God has written many scientific things in His Word, which not only are useful for the common man, but in them the secrets of science are also written in a symbolic or an indirect way, or even directly. And these things have been recognized in the present time by the Biblical scholars, who have made evident what was already written in the Bible, but recognized by “science” much later. We will look at some of these things in the coming articles.

In the next article we will continue considering this topic, and see some things written in the Bible about the creation. This same Bible, also speaks of the unfathomable love of the creator God for you, and His deep longing to give you a sin-free life and have you live with Him for eternity with heavenly blessings. But this is only possible on the basis of your voluntary decision taken in God’s favor. If you agree with God for this, then agree to become a surrendered, obedient disciple of the Lord Jesus.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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