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Sunday, April 21, 2013

पराजय से आगे


   अपने मसीही विश्वास में कमज़ोर पड़कर यदि हम से कोई ऐसा कार्य हो जाए जिससे हमारे परिवार और मित्र जनों में परमेश्वर का नाम और राज्य निन्दित हो, तो इस परिस्थिति का सामना हमें कैसे करना चाहिए?

   परमेश्वर के वचन बाइबल में राजा दाऊद का एक ऐसा ही उदाहरण है जिससे हम इस विषय पर शिक्षा ले सकते हैं। दाऊद अपने एक वफादार सैनिक ऊरिय्याह की पत्नि बतशेबा के साथ व्यभिचार में पड़ा, जिससे बतशेबा गर्भवती हुई। अपने पाप को छिपाने के लिए दाऊद ने ऊरिय्याह को छल से युद्ध भूमि में मरवा दिया। उसकी इस बात के लिए परमेश्वर ने अपने नबी नातान द्वारा दाऊद के पास अपनी नाराज़गी का सन्देश भेजा और कहा कि दाऊद को अपने इस पाप का प्रतिफल भोगना पड़ेगा। उस पाप के दर्दनाक परिणामों से तो दाऊद बच तो नहीं सका, लेकिन उसने परमेश्वर से अपने संबंध को टूटने भी नहीं दिया और वह लौट कर फिर परमेश्वर की संगति में आ सका, परमेश्वर के लिए फिर से उपयोगी हो सका। दाऊद के समान ही हम भी ऐसा कर सकते हैं।

   बाइबल के 2 शमूएल 12:13-23 में दिया गया राजा दाऊद के पुनःस्थापन का नमूना आज हमारे लिए भी परमेश्वर की संगति में लौट आने का मार्ग दिखाता है। पाप से मिली पराजय से आगे बढ़कर फिर से परमेश्वर की संगति और आशीषों में लौटने के लिए सबसे पहला कार्य है खुलकर अपने दोष का अंगीकार कर लेना (पद 13) और उसके लिए परमेश्वर से क्षमा माँगना तथा परमेश्वर से प्रार्थना करना कि हमारे पापों के दुषप्रभावों से अन्य संबंधित लोग बचे रहें (पद 16)। फिर यह पहचानना कि उन पापों के प्रतिफलों से बच पाना सदा ही संभव नहीं होता, और उन दुषपरिणामों को धैर्य पूर्वक सहन करना, उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करते रहना। हम उन दुषपरिणामों के लिए दुखी हो सकते हैं, शोक कर सकते हैं लेकिन परमेश्वर पर अपना भरोसा सदा बनाए रहें। उन दुषपरिणामों को अपने ऊपर इतना हावी भी ना होने दें कि हम परमेश्वर से कट जाएं; सदा परमेश्वर से प्रार्थना का भाव बनाए रखें और यह परमेश्वर से संबंध को जोड़े रहेगा, शांति के मार्ग को खुला रखेगा (पद 20-23)।

   शैतान ना केवल हमें पाप में गिराने और फंसाने से प्रसन्न होता है वरन हमें आत्मिक तौर से निषक्रीय करने और पछतावे में निढाल होकर बैठे रहने तथा व्यर्थ हाथ मलते रहने से भी उसे आनन्द मिलता है। परमेश्वर हमें दुख और पछतावे में बैठे देख कर आनन्दित नहीं होता; वह आनन्दित होता है उस पछतावे और दुख में उससे पाप की क्षमा माँग कर हमारे आगे बढ़ने और उसकी भलाई तथा प्रेम पर विश्वास रख कर फिर से उसके लिए कार्यकारी होने से। उसका प्रेम हमारे लिए कभी कम नहीं होता, उसके मार्ग सदा अपने बच्चों के लिए खुले रहते हैं और वह उनके लौट आने की सदा प्रतीक्षा करता है तथा लौटने वालों का स्वागत आनन्द और आदर से करता है (लूका 15:11-24)।

   यदि हमने अपनी मसीही जीवन की गवाही बिगाड़ ली है तो उसके लिए पश्चातापी और दीन होना आवश्यक है; लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम बिलकुल चुपचाप होकर, संसार और लोगों से छुप कर बैठ जाएं। ऐसा करने से उस पाप के दुषपरिणाम हम पर और भी हावी होंगे। पाप के लिए क्षमा याचना के साथ परमेश्वर का हाथ फिर से थाम कर आगे बढ़ें; यही पराजय से आगे बढ़ने की कुंजी है। - रैंडी किलगोर


परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करके सदा ही हमें अपनी संगति तथा कार्य में फिर से स्थापित रखना चाहता है।

मैं वही हूं जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूं और तेरे पापों को स्मरण न करूंगा। - (यशायाह 43:25)

बाइबल पाठ: 2 शमूएल 12:1-23
2 Samuel 12:1 तब यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा, और वह उसके पास जा कर कहने लगा, एक नगर में दो मनुष्य रहते थे, जिन में से एक धनी और एक निर्धन था।
2 Samuel 12:2 धनी के पास तो बहुत सी भेड़-बकरियां और गाय बैल थे;
2 Samuel 12:3 परन्तु निर्धन के पास भेड़ की एक छोटी बच्ची को छोड़ और कुछ भी न था, और उसको उसने मोल ले कर जिलाया था। और वह उसके यहां उसके बाल-बच्चों के साथ ही बढ़ी थी; वह उसके टुकड़े में से खाती, और उसके कटोरे में से पीती, और उसकी गोद मे सोती थी, और वह उसकी बेटी के समान