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शनिवार, 29 मार्च 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 50 - Prophets (2) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 50 - भविष्यद्वक्ता (2)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 50 

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बाइबल के अनुसार भविष्यद्वक्ताओं की सेवकाई (2)


पिछले लेख में हमने इफिसियों 4:11 में दी गई 5 प्रकार की सेवकाइयों में से दूसरी, अर्थात भविष्यद्वक्ता होने के बारे में देखना आरम्भ किया था। जैसा हमने प्रेरितों के लिए देखा था, उसी प्रकार से परमेश्वर द्वारा नियुक्त इन भविष्यद्वक्ताओं का जीवन, सेवकाई, तथा व्यवहार -भविष्यद्वक्ताओं का लोगों क प्रति और लोगों का उन भविष्यद्वक्ताओं के प्रति, उससे बहुत भिन्न था जैसा हम आज के मनुष्यों द्वारा अथवा स्वयं-नियुक्त तथा-कथित भविष्यद्वक्ताओं में देखते हैं। हमने देखा था कि परमेश्वर द्वारा नियुक्त भविष्यद्वक्ताओं का जीवन कठिनाइयों से भरा होता था, उन्हें सामान्यतः लोगों से तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता था, वे लोकप्रिय, धनी, सम्पन्न नहीं होते थे, और यद्यपि उनके सन्देश परमेश्वर की ओर से होते थे कि लोग परमेश्वर के आने वाले प्रकोप से बच जाएं, लेकिन लोग उनके सन्देशों का सामान्यतः या तो तिरस्कार कर देते थे अथवा अनदेखी करते थे। 


किन्तु आज के ईसाई समाज या मसीहियों में, विशेषकर उन में जो परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से अनेकों प्रकार की गलत शिक्षाओं और धारणाओं को मानते और मनाते हैं, औरों को बताते तथा सिखाते हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के वचन में प्रयोग किए गए “भविष्यद्वक्ता” और “भविष्यवाणी” शब्दों की सही समझ नहीं है, इसलिए ऐसे लोगों के द्वारा परमेश्वर के नाम से कुछ भी “भविष्यवाणी” के रूप में कह देना एक आम बात हो गई है; और “भविष्यद्वक्ता” कहलाए जाने के द्वारा वे लोगों को प्रभावित करने के प्रयास में लगे रहते हैं। “भविष्यद्वक्ता” और “भविष्यवाणी” शब्दों का यह दुरुपयोग न केवल वचन के विरुद्ध है, वरन परमेश्वर की ओर से इसकी भर्त्सना की गई है, और इसे परमेश्वर द्वारा दण्डनीय बताया गया है।


इस संदर्भ में परमेश्वर के वचन से कुछ पद देखिए:


* व्यवस्थाविवरण 18:21-22 और यदि तू अपने मन में कहे, कि जो वचन यहोवा ने नहीं कहा उसको हम किस रीति से पहचानें? तो पहचान यह है कि जब कोई नबी यहोवा के नाम से कुछ कहे; तब यदि वह वचन न घटे और पूरा न हो जाए, तो वह वचन यहोवा का कहा हुआ नहीं; परन्तु उस नबी ने वह बात अभिमान कर के कही है, तू उस से भय न खाना।


* यहेजकेल 13:2-3 हे मनुष्य के सन्तान, इस्राएल के जो भविष्यद्वक्ता अपने ही मन से भविष्यवाणी करते हैं, उनके विरुद्ध भविष्यवाणी कर के तू कह, यहोवा का वचन सुनो। प्रभु यहोवा यों कहता है, हाय, उन मूढ़ भविष्यद्वक्ताओं पर जो अपनी ही आत्मा के पीछे भटक जाते हैं, और कुछ दर्शन नहीं पाया!


* यहेजकेल 13:6-9 वे लोग जो कहते हैं, यहोवा की यह वाणी है, उन्होंने भावी का व्यर्थ और झूठा दावा किया है; और तब भी यह आशा दिलाई कि यहोवा यह वचन पूरा करेगा; तौभी यहोवा ने उन्हें नहीं भेजा। क्या तुम्हारा दर्शन झूठा नहीं है, और क्या तुम झूठमूठ भावी नहीं कहते? तुम कहते हो, कि यहोवा की यह वाणी है; परन्तु मैं ने कुछ नहीं कहा है। इस कारण प्रभु यहोवा तुम से यों कहता है, तुम ने जो व्यर्थ बात कही और झूठे दर्शन देखे हैं, इसलिये मैं तुम्हारे विरुद्ध हूँ, प्रभु यहोवा की यही वाणी है। जो भविष्यद्वक्ता झूठे दर्शन देखते और झूठमूठ भावी कहते हैं, मेरा हाथ उनके विरुद्ध होगा, और वे मेरी प्रजा की गोष्ठी में भागी न होंगे, न उनके नाम इस्राएल की नामावली में लिखे जाएंगे, और न वे इस्राएल के देश में प्रवेश करने पाएंगे; इस से तुम लोग जान लोगे कि मैं प्रभु यहोवा हूँ।


* यिर्मयाह 5:31 भविष्यद्वक्ता झूठमूठ भविष्यवाणी करते हैं; और याजक उनके सहारे से प्रभुता करते हैं; मेरी प्रजा को यह भाता भी है, परन्तु अन्त के समय तुम क्या करोगे?


* यिर्मयाह 14:14 और यहोवा ने मुझ से कहा, ये भविष्यद्वक्ता मेरा नाम ले कर झूठी भविष्यवाणी करते हैं, मैं ने उन को न तो भेजा और न कुछ आज्ञा दी और न उन से कोई भी बात कही। वे तुम लोगों से दर्शन का झूठा दावा कर के अपने ही मन से व्यर्थ और धोखे की भविष्यवाणी करते हैं।


* यिर्मयाह 23:21-22 ये भविष्यद्वक्ता बिना मेरे भेजे दौड़ जाते और बिना मेरे कुछ कहे भविष्यवाणी करने लगते हैं। यदि ये मेरी शिक्षा में स्थिर रहते, तो मेरी प्रजा के लोगों को मेरे वचन सुनाते; और वे अपनी बुरी चाल और कामों से फिर जाते।


* यिर्मयाह 23:30-32 यहोवा की यह वाणी है, देखो, जो भविष्यद्वक्ता मेरे वचन औरों से चुरा चुराकर बोलते हैं, मैं उनके विरुद्ध हूँ। फिर यहोवा की यह भी वाणी है कि जो भविष्यद्वक्ता “उसकी यह वाणी है”, ऐसी झूठी वाणी कहकर अपनी अपनी जीभ डुलाते हैं, मैं उनके भी विरुद्ध हूँ। यहोवा की यह भी वाणी है कि जो बिना मेरे भेजे या बिना मेरी आज्ञा पाए स्वप्न देखने का झूठा दावा कर के भविष्यवाणी  करते हैं, और उसका वर्णन कर के मेरी प्रजा को झूठे घमण्ड में आकर भरमाते हैं, उनके भी मैं विरुद्ध हूँ; और उन से मेरी प्रजा के लोगों का कुछ लाभ न होगा।


* यिर्मयाह 27:15 यहोवा की यह वाणी है कि मैं ने उन्हें नहीं भेजा, वे मेरे नाम से झूठी भविष्यवाणी करते हैं; और इसका फल यही होगा कि मैं तुझ को देश से निकाल दूंगा, और तू उन नबियों समेत जो तुझ से भविष्यवाणी करते हैं नष्ट हो जाएगा।


हम अगले लेख में परमेश्वर के वचन में प्रयोग किए गए “भविष्यद्वक्ता” और “भविष्यवाणी” शब्दों की सही अर्थ को, और उनके आधार पर भविष्यवाणी की सेवकाई की सही समझ देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की गलत समझ और गलत उपयोग से बचें। वचन की सही समझ और सही उपयोग आपके लिए आत्मिक उन्नति और आशीष का कारण होगा, किन्तु गलत समझ और गलत उपयोग बहुत हानिकारक होगा। इसलिए यदि आप किसी गलत शिक्षा अथवा धारणा में पड़े हुए हैं, तो स्थिति को जाँच-परखकर अभी समय और अवसर के रहते उससे बाहर निकल आएं, आवश्यक सुधार कर लें।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है। 

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 50

English Translation

Biblically, The Ministry of the Prophets (2)


In the previous article we began to see about the second of the 5 kinds of ministers given in Ephesians 4:11; i.e., the Prophets. As we had seen about the Apostles, similarly for the Prophets appointed by God, their life, ministry, and the Prophet's behavior - towards the people and of the people towards these Prophets was much different from that which we see amongst the so-called and man or self-appointed 'prophets' of today. We had seen that life of these God appointed Prophets was hard, they usually faced rejection and contempt of the people, they were never popular, never rich and prosperous, and their messages were usually ignored or rejected by the people, despite being messages from God, given for saving the people from God's impending wrath.


But in today’s Christendom and amongst “Believers”, especially amongst those who preach and teach many wrong doctrines and false teachings in the name of God the Holy Spirit, since they do not have a true Biblical understanding of the words “Prophet” and “Prophecy” used in God’s Word, therefore it has become a very common and frivolous thing for them to say anything in the name of God, calling it a “Prophecy” and to try and impress people by being called a “Prophet.” Such misuse of the terms “Prophet” and “Prophecy” is not only against the Word of God, but has also been severely condemned and called seriously punishable in the Bible.


Consider some verses from the Bible about this:


* Deuteronomy 18:21-22 And if you say in your heart, 'How shall we know the word which the Lord has not spoken?' when a prophet speaks in the name of the Lord, if the thing does not happen or come to pass, that is the thing which the Lord has not spoken; the prophet has spoken it presumptuously; you shall not be afraid of him.


* Ezekiel 13:2-3 Son of man, prophesy against the prophets of Israel who prophesy, and say to those who prophesy out of their own heart, 'Hear the word of the Lord!' " Thus says the Lord God: "Woe to the foolish prophets, who follow their own spirit and have seen nothing!


* Ezekiel 13:6-9 They have envisioned futility and false divination, saying, 'Thus says the Lord!' But the Lord has not sent them; yet they hope that the word may be confirmed. Have you not seen a futile vision, and have you not spoken false divination? You say, 'The Lord says,' but I have not spoken. Therefore, thus says the Lord God: Because you have spoken nonsense and envisioned lies, therefore I am indeed against you, says the Lord God. My hand will be against the prophets who envision futility and who divine lies; they shall not be in the assembly of My people, nor be written in the record of the house of Israel, nor shall they enter into the land of Israel. Then you shall know that I am the Lord God.


* Jeremiah 5:31 The prophets prophesy falsely, And the priests rule by their own power; And My people love to have it so. But what will you do in the end?


* Jeremiah 14:14 And the Lord said to me, "The prophets prophesy lies in My name. I have not sent them, commanded them, nor spoken to them; they prophesy to you a false vision, divination, a worthless thing, and the deceit of their heart.”


* Jeremiah 23:21-22 I have not sent these prophets, yet they ran. I have not spoken to them, yet they prophesied. But if they had stood in My counsel, And had caused My people to hear My words, Then they would have turned them from their evil way And from the evil of their doings.


* Jeremiah 23:30-32 Therefore behold, I am against the prophets, says the Lord, who steal My words everyone from his neighbor. Behold, I am against the prophets, says the Lord, who use their tongues and say, 'He says.' Behold, I am against those who prophesy false dreams, says the Lord, and tell them, and cause My people to err by their lies and by their recklessness. Yet I did not send them or command them; therefore, they shall not profit this people at all, says the Lord.


* Jeremiah 27:15 for I have not sent them, says the Lord, yet they prophesy a lie in My name, that I may drive you out, and that you may perish, you and the prophets who prophesy to you.


In the next article, we will see the actual meaning of the terms “Prophet” and “Prophecy” from the Bible, and on that basis come to the correct understanding of these terms and the ministry. If you are a Christian Believer, then it is essential for you to stay safe and away from a wrong understanding and misuse of God’s Word. Having a correct understanding, and properly utilizing God’s word will be a source of growth and blessings for you, but having a wrong understanding and misusing it will bring much and lasting harm. Therefore, if you are caught up in some notion or false teachings, then examine and evaluate the situation, and take the appropriate remedial measures while you have the time and opportunity from God.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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